Friday, October 2, 2020

RANEH WATER FALL

UPADHYAY TRIPS PRESENT'S

 खजुराहो के आसपास के दर्शनीय स्थल 



विश्व धरोहर के रूप खजुराहो पूर्ण रूप से पर्यटन स्थल तो है ही, इसके आसपास के दर्शनीय स्थल भी पर्यटकों को खजुराहो में रुकने के लिए बाध्य करने में कम नहीं हैं। खजुराहो के निकट अनेकों ऐसे स्थल हैं जो यहाँ आने वाले सैलानियों को हर तरह के रोमांच से अवगत कराते हैं। इनका विवरण निम्नलिखित है -

  • रानेह जल प्रपात 
  • केन घड़ियाल अभ्यारण्य 
  • पांडव जलप्रपात 
  • पन्ना टाइगर रिज़र्व 
  • कूटनी बाँध 
  • छतरपुर के राजमहल 
  • मस्तानी का महल 

खजुराहो के पूर्वी समूह के मंदिर देखने के बाद मैं और कुमार खजुराहो से लगभग 20 किमी दूर, रानेह जलप्रपात को देखने के लिए निकल पड़े। मुख्य रास्ते को छोड़कर आज हम इस किराये की प्लेज़र को लेकर बुंदेलखंड के दूरगामी ग्रामों में से होकर गुजर रहे थे। रास्ते के मनोहारी दृश्यों को देखने में एक अलग ही आनंद आ रहा था। कुछ समय बाद जब गाँव का संकीर्ण रास्ता समाप्त हो गया और रास्ते की जगह खेतों की ओर जाने वाली छोटी छोटी पगडंडियों ने ले ली तो कुमार के मन में शंका उत्पन्न होने लगी। उसने मुझसे कहा कि हम रास्ता भटक चुके हैं और मुझे नहीं लगता कि आगे कोई रास्ता रानेह जलप्रपात की ओर जायेगा, परन्तु मुझे अपने गूगल मैप पर पूरा भरोसा था जो अब भी हमें आगे बढ़ने का इशारा देते हुए रास्ता दिखाता चल रहा था। 

काफी देर बाद जब हम एक गाँव को पार करके पगडंडियों को भी खो बैठे तो अब मेरे मन में भी शंका उत्पन्न होने लगी क्योंकि रास्ता और पगडंडियां लगभग समाप्त चुकी थीं और अब हमारी गाडी खेतों में होकर गुजर रही थी जो कि कई बार चलते चलते स्लिप होकर गिर भी जाती थी। रास्ता तो अब कहीं हमें दिखाई नहीं दे रहा था, रास्ता पूछने के लिए दूर दूर तक कोई मानव भी हमें दिखाई नहीं दे रहा था परन्तु गूगल अब भी हमें रास्ता दिखाते हुए आगे बढ़ने पर विवश करने पर लगा हुआ था और गूगल की बात मानने के सिवा हमारे पास कोई रास्ता भी नहीं था। हम आगे बढ़ते रहे और आखिरकार हम खेतों में से होकर मुख्य रास्ते तक पहुँच ही गए। 

KHAJURAHO

UPADHYAY TRIPS PRESENT'S


खजुराहो के पर्यटन स्थल  - अनमोल भारतीय विरासत 



कोरोनाकाल और घुमक्कड़ी 

    इस वर्ष जब पूरे देश में लॉक डाउन लगा, तो इतिहास में पहली बार भारतीय रेलों के पहिये थम गए। सभी शहर और गाँव, बाजार एवं यातायात तक बंद हो चुका था। लोग कोरोना जैसे वायरस से बचने के लिए अपने ही घरों में कैद हो चुके थे। देश की आर्थिक व्यवस्था पूर्ण रूप से डूबने लगी थी। परन्तु इस सबका पर्यावरण पर बेहद गहरा प्रभाव पड़ा था, नदियों का जल एक दम स्वच्छ होने लगा था। अब शुद्ध वायु का प्रभाव साफ़ दिखलाई पड़ता था। इस बीच हम जैसे घुमक्कड़ लोगों की यात्रायें भी स्थगित हो गईं क्योंकि घर से बाहर निकलना, सरकार के आदेशों का उल्लंघन करना था।  

   सभी यातायात के साधन बंद थे, तीर्थ स्थान अनिश्चितकालीन बंद कर दिए गए थे। सभी ऐतिहासिक स्मारक भी पूर्ण रूप से बंद हो चुके थे और इसके अलावा गैर राज्य में जाना तो दूर अपने नजदीकी शहर में भी जाने पर सख्त प्रतिबन्ध था। इसलिए 24 मार्च 2020 से जून 2020 तक हम सभी अपने अपने घरों में बंद रहे। जून के बाद से सरकार ने देश में अनलॉक जारी कर दिया और भारत की अर्थव्यवस्था धीरे धीरे पटरी पर लौटने लगी। यह हमारे समय का कोरोना काल था जो काफी तबाही मचाकर भी अभी तक शांत नहीं हुआ है।   

रेल संचालन और यात्रा प्लान 

    अभी हाल ही में भारतीय रेलों का पुनः संचालन धीरे धीरे शुरू होने लगा था, दक्षिण भारत और महाराष्ट्र के लिए ट्रेनें स्पेशल नंबर के साथ शुरू हो चुकी थीं। इस बार रेल के सामान्य श्रेणी के कोच में भी आरक्षण की सुविधा उपलब्ध थी और ग़ैर आरक्षित टिकट अभी भी प्रतिबंधित थी। रेलवे ने कुरुक्षेत्र से मथुरा आने वाली ट्रेन को खजुराहो तक बढ़ा दिया था जो कि मध्य प्रदेश का एक मुख्य ऐतिहासिक स्थल है और यूनेस्को की विश्व विरासत स्थल की सूची में दर्ज है। 

    मैं पहले भी कई बार यहाँ जाने के रिजर्वेशन करवा चुका था किन्तु कभी जाने का मौका नहीं मिला पाया। 2 अक्टूबर को गांधी जयंती के अवसर पर जो सरकारी अवकाश रहता है उसी अवकाश को मैंने खजुराहो जाने के लिए चुना और अपने दोस्त कुमार भाटिया जो कि आगरा में ही रेलवे में जॉब करता है, अपने साथ जाने को सहयात्री के रूप में चुना। रेलवे से मिलने वाली सुविधा के अंतर्गत उसने अपना और मेरा रिजर्वेशन दोनों तरफ से इसी ट्रेन में करवा लिया और यात्रा की तारीख आने पर हम खजुराहो की तरफ रवाना हो चले। 


Thursday, March 26, 2020

BRAJYATRA : RAMAN RETI - GOKUL


रमणरेती - गोकुल 



    भाद्रपद की अष्टमी की रात जब महाराज बसुदेव, भगवान कृष्ण को लेकर मथुरा से दूर यमुना पार करके बाबा नन्द के यहाँ गोकुल ग्राम पहुंचे और वहाँ बच्चे को जन्म देते ही गहरी नींद में सो जाने वाली यशोदा के बगल में छोड़ उनकी पुत्री योगमाया को वहाँ से उठा लाये और कारागार में वापस आ गए। अगली सुबह बाबा नन्द और यशोदा को अपने पुत्र होने का ज्ञान हुआ और तभी से भगवान श्री कृष्ण नन्दलाल और यशोदा नंदन कहलाने लगे।

... 
   भगवान श्री कृष्ण ने अपने बचपन में जिस मिट्टी पर घुटुअन चलना सीखा, विभिन्न तरह के खेल खेले आज वह भूमि खेलनवन के नाम से जानी जाती है और इसे रमणरेती भी कहते हैं। इसी भूमि पर रहकर कान्हा ने अनेकों लीलाएँ की, अनेकों दैत्यों जैसे पूतना, तृणावर्त, कागासुर आदि का संहार किया और इसके साथ ही माखन की चोरी करना, गाय चराने जाना और रेतीली मिट्टी को खाकर इस ब्रज की रज को पूजनीय बना दिया। जिनका कभी धरती पर प्रार्दुभाव नहीं हुआ वे भोलेनाथ भगवान शिव भी कान्हा के बालस्वरूप के दर्शन करने कैलाश से यहाँ इस भूमि पर पधारे और अपने चरण रज से इसको पवित्र किया। 

Saturday, February 22, 2020

CHANDERI 2020 : KATI GHATI & CHANDERI MUSEUM

UPADHYAY TRIPS PRESENT'S

चंदेरी - एक ऐतिहासिक शहर,  भाग - 3



यात्रा को शुरू से ज़ारी करने के लिए यहाँ क्लिक कीजिये।

    अब हम चंदेरी शहर से बाहर आ चुके थे। चंदेरी से कटी घाटी जाने वाले मार्ग पर एक बार फिर हम एक जैन मंदिर पहुंचे। यह जैन अतिशय क्षेत्र श्री खंदारगिरी कहलाता है जो पहाड़ की तलहटी में बसा, हरे भरे पेड़ पौधों के साथ एक शांत एवं स्वच्छ वातावरण से परिपूर्ण स्थान है। यहाँ जैन धर्म के चौबीसबें और आखिरी प्रवर्तक भगवान महावीर स्वामी का दिव्य मंदिर है और साथ ही पहाड़ की तलहटी में ही चट्टान काटकर उकेरी गई उनकी बहुत बड़ी मूर्ति दर्शनीय है। इसके अलावा यहाँ पहाड़ की तलहटी में और भी ऐसे अन्य मंदिर स्थापित हैं। जैन धर्म का एक स्तम्भ भी यहाँ स्थित है जिसपर महावीर स्वामी से जुडी उनकी जीवन चक्र की घटनाएं चित्रों के माध्यम से उल्लेखित हैं।

CHANDERI 2020 : CHANDERI FORT


चंदेरी - एक ऐतिहासिक नगर भाग - 2




पिछले भाग से जारी। ......

    उसकी नजर पहाड़ चढ़ती एक चींटी पर पड़ी जो बार बार चढ़ने का प्रयास करती और असफल होकर गिर पड़ती, चींटी ने यह प्रयास तब तक किया जब तक वह पहाड़ पर नहीं चढ़ गई। छोटी सी चींटी की इस कार्यविधि और उसके आत्मविश्वास को देखकर बाबर के मन में आई निराशा दूर हो गई और उसे चंदेरी में प्रवेश करने का मार्ग भी सूझ गया। उसने एक ही रात में अपने मार्ग में बाधा बनी पहाड़ी को काट कर रास्ता बनाने का आदेश अपनी सेना को दिया और उसकी सेना ने एक ही रात में पहाड़ी को काटकर चंदेरी में प्रवेश करने का मार्ग बना लिया।

   अगली सुबह बाबर ने अपनी सेना सहित चंदेरी के दुर्ग पर आक्रमण कर दिया। मेदिनीराय के नेतृत्व में राजपूतों ने अपार वीरता का प्रदर्शन किया किन्तु वे परास्त हुए, चंदेरी के मुख्य दरवाजे पर भयंकर मारकाट हुई, असंख्य निर्दोषों को यहाँ मौत के घाट उतार दिया गया जिसके बाद इस दरवाजे जो खुनी दरवाजा कहा जाने लगा।

CHANDERI 2020 : JAKHLAUN TO CHANDERI


चंदेरी - एक ऐतिहासिक नगर भाग - 1




   मध्य प्रदेश के अशोक नगर जिले में और उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले के नजदीक स्थित चंदेरी एक पौराणिक और ऐतिहासिक नगर है। माना जाता है इसे महाभारतकालीन शासक शिशुपाल ने बसाया था जो भगवान श्री कृष्ण के समकालीन थे और उनकी बुआ के पुत्र थे। यह चंदेरी कालान्तर में बूढ़ी चंदेरी के नाम से प्रसिद्ध है जिसके अवशेष वर्तमान अथवा नई चंदेरी कुछ दूरी पर देखने को मिलते हैं। चारों तरफ से छोटे बड़े पहाड़ों से घिरी चंदेरी शुरू से ही भारतीय स्थान में अपनी अमिट छाप बनाये हुए है और अपनी ऐतिहासिक धरोहरों से सहज ही पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती है।


Sunday, February 16, 2020

BRAJYATRA : SOUNKH


कुषाण कालीन मथुरा - सौंख का टीला 



    ब्रजभूमि मथुरा केवल एक पौराणिक स्थान ही नहीं बल्कि पौराणिक होने की वजह से यह भारतीय इतिहास में भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है। भगवान श्री कृष्ण की जन्मभूमि मथुरा पर अनेकों शाशकों ने शासन किया है और मध्ययुगीन काल से पहले यह जैन और बौद्ध धर्म का प्रमुख केंद्र भी रहा है जिसकी पुष्टि यहाँ खुदाई में मिली बौद्ध मूर्ति और जैन धर्म की वस्तुएं से होती है।  मथुरा जिले के आसपास अनेकों मिट्टी के टीले पाए गए और जब इतिहासकारों और पुरातत्ववेत्ताओं की निगरानी में इनकी खुदाई हुई तो इनमें से एक टीले के नीचे कुषाण कालीन अवशेषों की प्राप्ति हुई और आज टीला स्थित है मथुरा से 21 किमी दूर राजस्थान की सीमा पर स्थित सौंख में। 

   मथुरा से राजस्थान की तरफ चलने पर सौंख नामक क़स्बा पड़ता है जहाँ दूर से ही एक ऊँचे टीले के अवशेष दिखाई देते हैं। यह टीला भारतीय इतिहास को जानने का एक महत्वपूर्ण स्त्रोत है जहाँ से खुदाई के दौरान ज्ञात हुआ कि प्राचीन काल में यहाँ तक कुषाण वंशीय सम्राट कनिष्क का साम्राज्य स्थापित था और उसके समय में मथुरा बौद्ध धर्म का एक मुख्य नगर था। सन 1969- 70 के आसपास प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता हर्बर्ट हर्टल के नेतृत्व की गई खुदाई के दौरान यहाँ कई प्राचीन काल की मूर्तियां और कलाकृतियां प्राप्त हुईं जो आज मथुरा के राजकीय संग्रहालय में देखने के लिए रखी हुईं हैं। 

Sunday, January 26, 2020

AIRAKHERA 2020

UPADHYAY TRIPS PRESENT'S

 विष्णु भाई का सगाई समारोह और ग्राम आयराखेड़ा की एक यात्रा 



26 जनवरी 2020 मतलब गणतंत्र दिवस पर अवकाश का दिन।

     पिछले वर्ष जब मैं माँ के साथ केदारनाथ गया था तब माँ के अलावा उनके गाँव के रहने विष्णु भाई और अंकित मेरे सहयात्री थे और साथ ही बाँदा के समीप बबेरू के रहने वाले मेरे मित्र गंगा प्रसाद त्रिपाठी जी भी मेरी इस यात्रा में मेरे सहयात्री रहे थे। 

    आज ग्राम आयराखेड़ा में विष्णु भाई की सगाई का प्रोग्राम था जिसमें शामिल होने के लिए त्रिपाठी बाँदा से सुबह ही उत्तर प्रदेश संपर्क क्रांति एक्सप्रेस से मथुरा आ गए थे। सुबह पांच बजे मैं अपनी बाइक से उन्हें अपने घर ले आया और सुबह दस बजे तक आराम करने के बाद हम आयराखेड़ा की तरफ रवाना हो गए। 

Monday, January 6, 2020

SAI NAGAR SHIRDI



साईं नगर शिरडी 



6 जनवरी 2020                                                               इस यात्रा को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक कीजिये। 

    हम करीब साढ़े नौ बजे शिरडी पहुँच गए थे, एक प्रसाद वाले की दुकान पर अपने बैग रखकर हम साईं बाबा के दर्शन करने लाइन में लग गए और दर्शन पर्ची लेकर साईं बाबा के दर्शन हेतु अपनी बारी का इंतज़ार करने लगे। आज काफी सालों बाद मेरी और साधना की मुलाकात बाबा से होने वाली थी। बहुत दिन हो गए थे बाबा से बिना मिले इसलिए अब जब हमारी यह यात्रा अंतिम चरण में थी तो दिल ने सोचा क्यों ना बाबा के दर्शन कर चलें। आखिर कार हमारी यह यात्रा धार्मिक यात्रा भी तो थी। 

    महाराष्ट्र प्रान्त के गोदावरी नदी के समीप शिरडी नामक ग्राम स्थित है जहाँ 18 वीं सदी में साईंबाबा का प्रार्दुभाव एक वृक्ष के नीचे हुआ था। साईंबाबा के बारे में प्रचलित है कि इनका जन्म और इनकी बाल्यकाल अवस्था अज्ञात है। इनका सबसे प्रथम दर्शन शिरडी वासियों को ही हुआ था, जब उन्होंने एक वृक्ष के नीचे एक दिव्यतेज युवा को ध्यानमग्न अवस्था में देखा। 

AURANGABAD TO SHIRDI


औरंगाबाद से शिरडी रेल यात्रा 




5 - 6 जनवरी 2020                                                             इस यात्रा को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक कीजिये। 

    श्री घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने के बाद ऑटो वाले भाई ने हमें शाम को औरंगाबाद रेलवे स्टेशन पर छोड़ दिया। अब हमारी यात्रा की अगली मंजिल शिरडी की तरफ थी जिसके लिए हमारा रिजर्वेशन औरंगाबाद पर रात को ढाई बजे आने वाली पैसेंजर ट्रेन में था जो सुबह 6 बजे के करीब हमें शिरडी के नजदीकी रेलवे स्टेशन कोपरगाँव उतार देगी। 

    अभी ढ़ाई बजने में बहुत वक़्त था, इसलिए स्टेशन के क्लॉक रूम पर रखे अपने बैगों को लेकर हम वेटिंग रूम पहुंचे। औरंगाबाद रेलवे स्टेशन का वेटिंग रूम बहुत ही शानदार और साफ़ सुथरा था, अधिकतर यात्री यहाँ बेंचों पर बैठकर अपनी अपनी ट्रेन की प्रतीक्षा कर रहे थे। हमने यहाँ एक कोने में अपनी दरी और चटाई बिछाकर अपना बिस्तर लगाया और थोड़ी देर के लिए हम यहाँ आराम करने लेट गए। 

Sunday, January 5, 2020

SHRI GHRISHNESHWAR JYOTIRLING


श्री घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग 2020




5 जनवरी 2020                                                        इस यात्रा को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक कीजिये। 

     एलोरा से थोड़ा सा आगे ही श्री घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थित है। मैं पहले भी एकबार माँ के साथ यहाँ आ चुका हूँ और आज दूसरी बार अपनी पत्नी को लेकर आया हूँ। ऑटो से उतरते ही मंदिर की ओर जाने वाली सड़क पर पूजा सामग्री की दुकानें लाइन से बनी हुई हैं। हमने सबसे पहली दुकान से ही पूजा सामग्री ले ली और जब थोड़ा सा आगे बढे तो पता चला सबसे शुरुआती दुकानदार अंदर वाले दुकानदारों की अपेक्षा काफी महँगा लगाकर सामान बेचते हैं इनमें अधिकतर सब महिलाएं ही थीं। मैंने मंदिर से लौटकर उस दुकानदार महिला को अपनी भाषा में अच्छी खासी सुनाई जिससे हमारे बाद आने वाले अन्य यात्रियों से वो इसप्रकार बेईमानी से सामान महँगा लगाकर न बेचे, और फिर भी बेचे तो वह उसका पाप ही होगा। 

KAILASH TEMPLE : ELLORA



कैलाश मंदिर : एलोरा गुफाएँ 




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5 जनवरी 2020 

    एलोरा गुफाओं का निर्माण राष्टकूट शासक कृष्ण प्रथम के शासनकाल में अजंता की गुफाओं को बनाने वाले कारीगरों के वंशजों ने किया था। एलोरा गुफाओं में के केवल बौद्ध ही नहीं अपितु हिन्दू और जैन धर्म से सम्बंधित अनेकों गुफाएं स्थित हैं। यह सभी गुफाएं अजंता की तरह ही चट्टानों को काटकर बनाई गईं हैं। 8वीं शताब्दी के मध्य एलोरा राष्ट्रकूट शासकों की राजधानी का मुख्य केंद्र रहा है जहाँ राष्ट्रकूट शासकों ने अनेकों गुफाओं का निर्माण कराया और हिन्दू होने के कारण उन्होंने यहाँ पहाड़ को काटकर एक ऐसे मंदिर का निर्माण कराया जिसका वर्णन भारतीय इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों से युक्त है। इस मंदिर की शिल्पकारी और मूर्तिकारी को देखकर ही इसकी भव्यता का अनुमान लगाया जा सकता है और यह मंदिर है एलोरा का कैलाश मंदिर। 

AURANGZEB TOMB



खुलदाबाद - औरंगजेब का मक़बरा



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5 जनवरी 2020 

     दौलताबाद का किला देखने के बाद हम एलोरा गुफाओं की तरफ आगे बढ़ गए। यहाँ रास्ता बेहद ही शानदार था, रास्ते के दोनों तरफ बड़े बड़े छायादार घने वृक्ष लम्बी श्रृंखला में लगे हुए थे। दौलताबाद की सीमा समाप्त होते ही, घाट सेक्शन शुरू हो जाता है और ऑटो अब अपनी पूरी ताकत से इन पहाड़ियों पर गोल गोल घूमकर चढ़ता ही जा रहा था। कुछ समय बाद हम एक मुसलमानों की बस्ती में पहुंचे। यह नगर खुलदाबाद कहलाता है जिसे मुग़ल सम्राट औरंगजेब ने बसाया था। यहां औरंगजेब का मकबरा एक साधारण सी मजार के रूप में स्थित है। इस स्थान के ऐतिहासिक महत्त्व को देखते हुए हम अपने धर्म के विपरीत इस स्थान को देखने गए।

DOULTABAD FORT


दौलताबाद का किला 


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5 जनवरी 2020 


   महाराष्ट्र प्रान्त के औरंगाबाद जिले से वेलूर स्थित एलोरा गुफाएं जाते समय रास्ते में एक शंक्वाकार आकार की पहाड़ी पर एक दुर्ग दिखाई देता है, यह दौलताबाद का किला है जिसे हिन्दू शासनकाल के दौरान देवगिरि के नाम से जाना जाता था। देवगिरि के इतिहास के अनुसार इस किले का निर्माण आठवीँ शताब्दी में यादव कुल के राजा भीमल ने कराया था। 8 वीं शताब्दी से 14वीं शताब्दी तक इस दुर्ग पर यादववंशीय शासकों का अधिकार रहा और उसके पश्चात् यह दिल्ली के सुल्तानों के अधीन आ गया। इस मजबूत किले से जुड़ा इतिहास काफी दुःखद और दयनीय है। 

BIBI KA MAQBARA


बीबी का मक़बरा 



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यात्रा दिनाँक :- 5 जनवरी 2020

    विश्व प्रसिद्ध मुगलकालीन ईमारत ताजमहल की तर्ज पर बना बीबी का मकबरा, असल में मुग़ल साम्राज्य के आखिरी महान शासक औरंगजेब की पत्नी, दिलरस बानो बेग़म का मक़बरा है जिनका देहांत मुमताज़ महल की ही तरह जज्चा संक्रमण की वजह से सन 1657 में हो गया था। इनके मरणोपरांत इन्हें राबिया उदौरानी के नाम से जाना गया जिसका हिंदी अनुवाद 'उस युग की राबिया' है। 

    कई लोग इसे सम्राट औरंगजेब का मकबरा भी समझ लेते हैं किन्तु यह गलत है। बेग़म की मृत्यु के पश्चाय सम्राट औरंगजेब ने यहाँ एक सादा कब्र का निर्माण कराया और बाद में औरंगजेब के पुत्र शहजादा आज़मशाह ने इसे ताजमहल से भी सुन्दर बनवाने की कोशिश की किन्तु अत्यधिक व्यय के चलते औरंगजेब ने ऐसा नहीं होने दिया। 

PANCHAKKI : AURANGABAD


पहुर से औरंगाबाद और पनचक्की 



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5 जनवरी 2020 

    अजंता की गुफाएँ देखने के बाद हम लोग महाराष्ट्र परिवहन की एक बस द्वारा पहुर के लिए रवाना हुए। इस बस में अत्यधिक भीड़ थी इसलिए मुझे बैठने के लिए सीट नहीं मिल सकी परन्तु अपने सहयात्रियों को मैंने आराम से अलग अलग सीटों पर बैठा दिया। पहुर पहुंचकर बस अपने स्टैंड पर खड़ी हो गई, यहाँ से पहुर रेलवे स्टेशन की दूरी 2 किमी थी और यह बस रेलवे स्टेशन होते हुए ही जलगाँव की ओर जा रही थी। मैंने इस बस के कंडक्टर और ड्राइवर महोदय से विनती की, कि हमें रेलवे स्टेशन के नजदीक उतार दें, परन्तु उन्होंने हमारा अनुरोध स्वीकार नहीं किया और हमें बस स्टैंड पर ही उतार दिया। हम पैदल ही रेलवे स्टेशन की तरफ बढ़ चले।

Saturday, January 4, 2020

AJANTA CAVES


अजंता की गुफाएँ 



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यात्रा दिनाँक - 4 जनवरी 2020 
बौद्ध धर्म का उदय

भारतभूमि का इतिहास संसार की दृष्टि में अत्यंत ही गौरवशाली रहा है और अनेकों देशों ने भारत की संस्कृति, कला और धर्मक्षेत्र को अपनाया है। यह एक ऐसी भूमि है जहाँ विभिन्न तरह के परिधान, भाषा - बोली, संस्कृतियां और धर्म अवतरित होते रहे हैं। इसी भूमि पर भगवान विष्णु ने राम और कृष्ण के रूप में अवतरित होकर संसार को धर्म और मर्यादा का ज्ञान कराया, साथ ही महावीर जैन ने भी सत्य, अहिंसा और त्याग का ज्ञान देते हुए जैन धर्म का प्रसार किया। जैन धर्म के बाद एक ऐसे धर्म का उदय भारत भूमि पर हुआ जिसका ज्ञान लगभग जैन धर्म  के ही समान था और इसके प्रवर्तक विष्णु के ही अवतार माने गए और यह धर्म था - बौद्ध धर्म, जिसका ज्ञान गौतम बुद्ध ने संसार को दिया। 

PAHUR RAILWAY STATION


अजन्ता की तरफ एक रेल यात्रा - मुंबई से पहुर



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3 जनवरी 2020

     मुंबई में दो दिवसीय यात्रा के बाद अब वक़्त हो चला था महाराष्ट्र प्रान्त के दर्शनीय स्थलों को देखने का, इसलिए बड़े बेरुखे मन से हमने मुंबई से विदा ली और हम लोकमान्य तिलक टर्मिनल स्टेशन से कुशीनगर एक्सप्रेस द्वारा पाचोरा के लिए रवाना हुए। कुशीनगर एक्सप्रेस में हमारा पाचोरा तक रिजर्वेशन कन्फर्म था और यह ट्रेन रात को दस बजे के आसपास पाचोरा के लिए रवाना हो गए। 

   आज हम पूरे दिन के थके हुए थे और अधिक से स्पॉटों को कवर करने के लिए हमने एक पल भी आराम नहीं किया था। इसलिए ट्रेन की सीट पर लेटते ही नींद ने हमें अपने आगोश में ले लिया और महानगर मुंबई से हम कब दूर हो गए पता ही नहीं चला।

Friday, January 3, 2020

KANHERI CAVES


कान्हेरी गुफाएँ


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    भारतवर्ष में बौद्ध धर्म का उदय होने के बाद, भारतीय लोगों की इस धर्म के प्रति आस्था को देखते हुए अनेकों मठ, विहार स्थल, स्तूप और पर्वतों को काट छाँट कर गुफाओं का निर्माण हुआ। यह स्थल बौद्ध लोगों और भिक्षुयों के लिए रहने और महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं के प्रसार प्रचार हेतु बनाये गए थे। प्राचीन भारत के सबसे बड़े साम्राज्य, मगध में मौर्य वंश के दौरान से ही इन सभी का निर्माण कार्य आरम्भ हुआ। मौर्य वंश के पतन के पश्चात भी अनेकों राजवंशों ने बौद्ध धर्म के प्रति अपनी आस्था बनाये रखी तथा इसे राजधर्म तक घोषित किया और ऐसे ही स्मारकों और गुफाओं का निर्माण होता रहा, जिनमें कुषाण और हर्षवर्धन का काल सर्वाधिक महत्वपूर्ण रहा। 

Wednesday, January 1, 2020

MUMBAI : 2020


मुंबई 2020 - नए साल की सैर


1 जनवरी 2020
 
   अपनी ऐतिहासिक यात्रा को आगे बढ़ाते हुए और भीमबेटकाउदयगिरि की गुफाओं के देखने के बाद अब मन में अन्य गुफाओं को देखने ललक जाग उठी थी। भारत की समस्त ऐतिहासिक गुफाओं की एक लिस्ट तैयार की गई और पाया कि ऐसी अधिकतर गुफाएँ महाराष्ट्र प्रान्त में है जो यूनेस्को की विश्व विरासत स्थल की सूची में भी दर्ज हैं जिनमें मुख्यतः एलिफेंटा, अजन्ता और एलोरा का मुख्य स्थान है। 

   इन गुफाओं को देखने के लिए यात्रा कार्यक्रम तैयार हुआ और हमने इस यात्रा कार्यक्रम को इस प्रकार बनाया कि यह ऐतिहासिक होने साथ साथ तीर्थ और पर्यटन यात्रा भी साबित हुई। इस यात्रा में रेलमार्ग को मुख्यता के रूप में चुना गया और इस यात्रा की शुरुआत हुई देश की आर्थिक राजधानी मुंबई से।

Sunday, December 22, 2019

BHOPAL 2019 : BHOPAL CITY


भोपाल शहर और घर वापसी 



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भोजपुर से लौटने के बाद दिन ढल चुका था और भोपाल शहर ने काले रंग की शॉल से ओढ़ ली थी परन्तु मध्य प्रदेश की राजधानी होने के नाते इसकी चमक बरकरार थी जिससे यह लग ही नहीं रहा था कि शाम हो चुकी है और अँधेरा बढ़ने लगा है। जैनसाब, शाम के भोजन के लिए एक आलिशान रेस्टोरेंट में हमें लेकर पहुंचे। यहाँ उज्जैनी के प्रसिद्ध दाल फाफले मिलते हैं जो मैंने जीवन में पहली बार खाये थे। यह खाने में अत्यंत ही स्वादिष्ट थे और हमारे खाने के बाद रेस्टोरेंट की मैनेजर ने हमसे खाने की गुणवत्ता को लेकर फीडबैक भी लिया जो हमारी तरफ से शानदार था। 

SANCHI AND CANCER TROPIC


साँची के स्तूप और कर्करेखा 



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    अपनी कलिंग विजय के दौरान जब सम्राट अशोक ने रणभूमि में भयंकर रक्तपात देखा, दोनों ओर की सेनाओं के वीर सैनिकों के शव और चारों ओर मची शोकभरी चीत्कार सुनकर उसका हृदय काँप उठा और मानसिक रूप से विचलित हो उठा। भयंकर रक्तपात और नरसंहार ने उसका सुकून छीन सा लिया था। एक राजा के लिए युद्ध लड़ना आवश्यक नहीं बल्कि उसकी मजबूरी होता है फिर चाहे वो युद्ध साम्राज्य वाद के लिए हो, अपने राज्य की रक्षा के लिए हो या फिर किसी राज्य को लूटने के उद्देश्य से हो परन्तु सम्राट अशोक के लिए इस युद्ध के पीछे क्या कारण था यह अज्ञात है किन्तु इस युद्ध के बाद उसका हृदय परिवर्तित हो गया और उसने हिंसा का मार्ग छोड़कर अहिंसा का मार्ग अपनाया और जिस धर्म ने उसे अहिंसा का मार्ग दिखलाया वह था बौद्ध धर्म। जिसकी शुरआत सम्राट अशोक ने साँची का स्तूप बनवाकर की। 

UDAIGIRI CAVES


उदयगिरि की गुफाएँ


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 अगला दिन - 22 DEC 2019

  मध्ययुगीन काल से पहले भी भारतभूमि में बाहरी प्रजाति के शासकों ने, भारत की भूमि पर अपना साम्राज्य स्थापित करने के लिए कई बारआक्रमण किये, जिनमें शक और हूणों का नाम मुख्यता से लिया जा सकता है। शकों के परास्त होने और हूणों को भारत में अपना साम्राज्य स्थापित करने से पहले भारत के एक ऐसे काल का उदय हुआ जो भारतीय इतिहास में स्वर्णिम काल के नाम से विख्यात है और यह काल था देश के महानतम और यशस्वी सम्राटों का काल - गुप्तकाल। 

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    गुप्तकाल की स्थापना का श्रेय 'श्रीगुप्त' को जाता है किन्तु इस काल के जिन महान सम्राटों ने भारत को एक अखंड राष्ट्र बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी, वह थे - चन्द्रगुप्त प्रथम, समुद्रगुप्त, चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य, कुमारगुप्त और स्कंदगुप्त। यह सभी शासक हिन्दुधर्म के अनुयायी थे और शैव धर्म तथा वैष्णव धर्म में विशेष आस्था रखते थे। इतिहासकारों के अनुसार इस काल का सबसे प्रतापी सम्राट और प्रजाहितकारी शासक 'चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य' था जिसकी अनेको कहानियां पुराणों में वर्णित हैं।

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Saturday, December 21, 2019

BHOPAL 2019 : Bhojpur Shiv Temple



भोजपुर शिव मंदिर 



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    भीमबेटका से लौटकर अब जैन साब के साथ हम भोजपुर शिव मंदिर की तरफ रवाना हुए। दिन ढलने की कगार पर था और शाम अब करीब आ चली थी। भोपाल से होशंगाबाद वाले इस राजमार्ग पर अभी मार्ग चौड़ीकरण का कार्य चल रहा था, आने वाले समय में यह रास्ता भोपाल से भीमबेटका या होशंगाबाद जाने वाले राहगीरों के लिए बहुत ही सुविधा जनक हो जाएगा। अब्दुल्लागंज आने पर जैनसाब ने गाडी सड़क के बाईं ओर खड़ी करके शुभ भाई को यहाँ की मशहूर दुकान से कचौड़ी लाने के लिए कहा जो कि दाल की बनी बेहद ही स्वादिष्ट और गर्मागर्म थीं जिन्हें शाम की चाय के साथ हमें खाने बहुत ही आनंद आया। 

BHOPAL 2019 : BHIMBETKA CAVES - A ROCK SHELTERS



आदिमानव का आश्रय स्थल - भीमबेटका गुफ़ाएँ



आदिमानव और उसका निवास 
    
     देश के मध्यभाग में स्थित और मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से 40 - 50 किमी दूर दक्षिण दिशा में विंध्यांचल पर्वत की विशाल श्रृंखला है जहाँ प्राचीन काल से ही ऋषिमुनियों के आश्रम तथा जीव जंतुओं का निवास रहा है और इसके साथ ही यह स्थान मानव के उस युग से सीधा सम्बन्ध रखता है जब मनुष्य को अपने मनुष्य होने का ज्ञान भी नहीं था, वह कौन था, किसलिए था इन सभी जानकारियों से परे शिकार करके जीवन निर्वाह करना और मौसम की मार से बचने के लिए प्राकृतिक गुफाओं में आश्रय लेना ही उसकी मानवता को दर्शाती है। यह काल प्रागेतिहासिक काल के नाम से जाना गया और उस समय का मानव 'आदिमानव' के नाम से। 


Bhopal City and Jain Sab



मैं, कुमार और जैनसाहब से एक मुलाकात - झीलों के शहर भोपाल में  





  रूपकजैन साहब से मुलाकात होने के बाद हमारी एक दूसरे से काफी अच्छी मित्रता हो गई। जल्द ही जैन साब ने मुझे अपने शहर भोपाल घूमने के लिए आने को कहा। मेरी लिस्ट में भोपाल व उसके आसपास के दर्शनीय स्थल थे जो मुझे कभी ना कभी तो देखने ही थे इसलिए अब उन जगहों पर जाने का वक़्त आ चुका था। मैंने भोपाल का रिजर्वेशन करा लिया और साथ में कुमार को भी भोपाल घुमाने के लिए राजी कर लिया।

   उसने भी अपनी टिकट अपने पीटीओ पर बुक कर ली और साल के आखिरी माह में हमारी 2019 की आखिरी ट्रिप भोपाल फाइनल हो गई। मैंने और कुमार ने अपना रिजर्वेशन ग्रांडट्रक एक्सप्रेस में कराया था। हालांकि सर्दियों के दिन थे इसलिए ट्रैन का प्रतिदिन भोपाल पहुँचने का स्टेटस रूपकजैन साब मुझे फोन पर देते थे। मैं हैरान था कि भला कोई मेरा अपना भी ऐसा भी हो सकता है जो इतनी बेसब्री से मेरी प्रतीक्षा कर रहा हो।

Thursday, December 5, 2019

Traveling and Friendship



घुमक्क्ड़ी ग्रुप और मेरी मित्रता 

     लोग कहते हैं जमाना बदल रहा है, टेक्नोलॉजी का समय आ गया है। आज के समय में सभी के हाथों में स्मार्ट फोन हैं जिन्होंने इंसान को इतना अकेला कर दिया है कि उसके पास सिवाय अपने फोन के, ना अपने परिजनों से बात करने समय है और नाही किसी रिश्तेदार या भाई बंधू का हालचाल जानने के लिए। आधुनिक युग में विज्ञान की प्रगति ने आज के मानव को इतना व्यस्त बना दिया है कि वो चाहकर भी किसी और के लिए क्या, अपने लिए भी समय नहीं निकाल पाता और यही कारण है कि अन्य वर्षों की तुलना में अपने देश में रिश्तों में भारी गिरावट देखने को मिली है। मगर वहीँ इंटरनेट पर बनी सोशल साइटों के जरिये लोगों को एक दूसरे को पहचान बनाने का मौका मिला  और साथ ही इस पहचान को दोस्ती में बदलने का भी।

Sunday, September 1, 2019

BIKANER 2019 : JUNAGARH FORT



जूनागढ़ - बीकानेर का किला



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आज शाम को ही मुझे और किशोर मामा जी को मथुरा निकलना था जिसके लिए मैंने पहले ही बीकानेर से हावड़ा जाने वाली एक्सप्रेस ट्रेन में रिजर्वेशन करवा रखा था। झंझेऊ से दोपहर में विदा होकर मैं बीकानेर आया और आज मेरा मकसद बीकानेर का प्रसिद्ध किला जूनागढ़ देखना था। बस से उतारकर एक ऑटो द्वारा मैं जूनागढ़ किला पहुंचा।

राजस्थान के अधिकांश किले किसी ना किसी पहाड़ी पर स्थित होते हैं परन्तु यह राजस्थान का एक ऐसा किला है जो किसी पहाड़ी पर स्थित ना होकर शहर के बीचोंबीच स्थित है। इसकी बाहरी दीवारें मुझे ऐसा एहसास करा रही थी कि यह हूबहू आगरा किले के समान है।

Saturday, August 31, 2019

BIKANER 2019 : BIKANER MUSEUM



बीकानेर संग्रहालय 


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    झंझेऊ से जब मैं बस द्वारा बीकानेर आया तो बस ने मुझे गंगानगर चौक पर उतारा, यह चौक बीकानेर संग्रहालय के ठीक सामने है। जब मैं संग्रहालय के सामने खड़ा था तो मैंने सोचा चलो पहले इसे ही देख लिया जाय। यह राजकीय संग्रहालय है जो महाराजा गंगा सिंह जी के नाम से विख्यात है।  आज तापमान बहुत ज्यादा ही गर्म था इसलिए मैंने कुछ समय इस संग्रहालय में ही बिताना उचित समझा। एक दुकान से पानी की एक बोतल लेकर मैं टिकट खिड़की पर पहुंचा और 20 रूपये की एक टिकट लेकर मैं संग्रहालय देखने चल दिया।  आप भी देखिये क्या क्या था इस संग्रहालय में चित्रों के माध्यम से। ...

बीकानेर संग्रहालय 

Chila Mata Temple & Desert Village Jhanjheu

UPADHYAY TRIPS PRESENT'S

चीला माता मंदिर - मरुभूमि ग्राम झंझेऊ 



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श्री डूँगरगढ़ से झंझेऊ बस यात्रा 


     श्री डूंगरगढ़ स्टेशन से एक ऑटो द्वारा मैं राष्ट्रीय राजमार्ग 11 पर पहुंचा। यह आगरा से बीकानेर मार्ग है जो राजस्थान का एक मुख्य राष्ट्रीय राजमार्ग है। मामाजी ने मुझे बताया था कि यहाँ से ग्राम झंझेऊ 12 किमी के आसपास है और बीकानेर 50 किमी के आसपास। इसलिए मुझे यहाँ से बस द्वारा झंझेऊ उतरना है जो की इसी राजमार्ग पर स्थित है। मामाजी फ़िलहाल चूरू में एक रिश्तेदारी में गए हुए थे अतः वे शामतक झंझेऊ पहुंचेंगे इसलिए मैं अकेला ही अपने मामा की ससुराल झंझेऊ की तरफ एक बस द्वारा बढ़ चला। मैं यहाँ काफी सालों बाद आया था इसलिए मैंने अपने पास बैठे एक राजस्थानी सज्जन से झंझेऊ ग्राम आने पर बताने के लिए कह दिया था। 

     राष्ट्रीय राजमार्ग के दोनों और रेत के बड़े बड़े और ऊँचे ऊँचे टीले दिखने शुरू हो चुके थे जो मुझे एहसास करा रहे थे कि मैं अब मरुस्थलीय क्षेत्र में हूँ। यहाँ आबादी बहुत ही कम है इसलिए सड़क दूर दूर तक खाली ही नजर आ रही थी और इस खाली सड़क पर बस बड़ी ही तेज रफ़्तार से दौड़ी जा रही थी। कुछ समय बाद मैं झंझेऊ पहुँच गया। यहाँ रोड पर लगा चीला माता के मंदिर का बोर्ड ही इस ग्राम की पहचान कराता है। यह तंवरों का ग्राम है और चीला माता उनकी कुलदेवी हैं अतः यहाँ चीला माता की विशेष मान्यता है। बोर्ड के कुछ फोटो खींचने के बाद मैं ग्राम में अंदर अपने मामाजी की ससुराल की तरफ बढ़ चला।