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Friday, July 23, 2021

VISHNU VARAH - KARITALAI 2021

 विष्णु वराह मंदिर और कच्छ - मच्छ की प्रतिमा  - कारीतलाई 

यात्रा दिनांक -  12 जुलाई 2021 

सतयुग में जब हिरण्याक्ष नामक एक दैत्य पृथ्वी को पाताललोक के रसातल में ले गया तो भगवान विष्णु को वराह रूपी अवतार धारण करना पड़ा और हिरण्याक्ष का वध करके पृथ्वी को रसातल से बाहर लेकर आये। उनका यह अवतार वराह भगवान के रूप में पृथ्वी पर पूजा जाने लगा जो कालांतर में भी पूजनीय है। किन्तु पाँचवी से बारहवीं शताब्दी के मध्य, भारतवर्ष में भगवान विष्णु का यह अवतार सबसे मुख्य और सबसे अधिक पूजनीय रहा। 

अनेकों हिन्दू शासकों ने वराह भगवान को अपना ईष्ट देव चुना और वराहरूपी प्रतिमा को अपना राजचिन्ह। इसी समय में मध्य भारत में भगवान वराह की अनेक प्रतिमाओं और मंदिरों का निर्माण भी कराया गया। इन्ही में से एक मंदिर मध्य प्रदेश के बघेलखण्ड प्रान्त के छोटे से गाँव कारीतलाई में भी स्थित था जिसके अवशेष आज भी यहाँ देखने को मिलते हैं। 

Thursday, July 22, 2021

RATANPUR : CHHATTISGARH 2021


 रतनपुर के ऐतिहासिक मंदिर और किला 

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लाफा चैतुरगढ़ की यात्रा करने के बाद, मैंने एवेंजर बाइक का रुख रतनपुर की ओर कर दिया। रतनपुर, छत्तीसगढ़ की प्राचीन राजधानियों में से एक है और इसे कल्चुरी शासकों की खूबसूरत राजधानी होने का गौरव प्राप्त है। आज भी यहाँ कल्चुरी राजाओं की राजधानी के अवशेष, किले के खंडहरों के रूप में आज भी देखे जा सकते हैं। इसके अलावा समय समय पर विभिन्न शासकों ने यहाँ और इसके आसपास के प्रदेशों ऐतिहासिक मंदिरों का निर्माण भी कराया। इन्हीं में से महामाया देवी का विशाल मंदिर रतनपुर में आज भी पूजनीय है और इसके आसपास स्थित ऐतिहासिक मंदिर, रतनपुर के ऐतिहासिक होने का बख़ान करते हैं। 

Tuesday, July 20, 2021

LAFA CHATURGARH FORT : CHHATTISGARH 2021

लाफा और चैतुरगढ़ किले की एक यात्रा 


मानसून की तलाश में एक यात्रा भाग - 5,       यात्रा दिनाँक - 11 अगस्त 2021 

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पाली पहुँचने के बाद मैंने एक दुकान से कोकाकोला की किनली की एक पानी की बोतल खरीदी और यहीं पास में खड़े एक चाट वाले से समोसे और कचौड़ी की मिक्स चाट बनवाकर आज के दोपहर का भोजन किया। मैं इस समय चैतुरगढ़ मार्ग पर था। पाली अंतिम बड़ा क़स्बा था और इसके बाद का सफर छत्तीसगढ़ के जंगल और पहाड़ों के बीच से गुजरकर होना था। मैंने चाट वाले से आगे किसी पेट्रोल पंप के होने के बारे में पूछा तो उसने स्पष्ट शब्दों में बता दिया कि आगे कोई पेट्रोल पंप नहीं है। अगर चैतुरगढ़ जा रहे हो तो यहीं पाली से ही पेट्रोल भरवाकर जाओ क्योंकि आगे घना जंगल है और रास्ते भी पहाड़ी हैं। वहां आपको कुछ भी नहीं मिलेगा। पाली से चैतुरगढ़ जाने के लिए एक मात्र विकल्प अपना साधन ही है। पाली से चैतुरगढ़ जाने के लिए कोई साधन नहीं मिलता है। 

...

Monday, July 19, 2021

BILASPUR : CHHATTISGARH 2021

बिलासपुर शहर और पाली का महादेव मंदिर  

मानसून की तलाश में एक यात्रा भाग - 4 

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चन्द्रेह से वापस लौटने के बाद मैं ट्रेन के चलने से सही दस मिनट पहले ही रीवा स्टेशन पहुँच गया था। स्टेशन के एक नंबर प्लेटफार्म पर ही बिलासपुर जाने वाली ट्रेन खड़ी हुई थी। मेरी अब अगली यात्रा बिलासपुर के लिए होनी थी जहाँ मुझे लाफा चैतुरगढ़ के पहाड़, ऐतिहासिक मंदिर और किला  देखना था और इसके साथ ही मुझे छत्तीसगढ़ की प्राचीन राजधानी रतनपुर को भी देखना था, जिसके बारे में मैंने सुना है कि यह कल्चुरी शासकों की प्राचीन राजधानी है जिसे बाद में बिलासपुर नामक शहर बसाने के बाद यहाँ स्थानांतरित कर दिया गया। रतनपुर में आज इन्हीं शासकों का पुराना किला और इनके द्वारा बनबाये गए प्राचीन मंदिर दर्शनीय हैं। 

Tuesday, April 13, 2021

GADAG CITY : KARNATAKA 2021

 UPADHYAY TRIPS PRESENT'S

कर्नाटक की ऐतिहासिक यात्रा पर,  भाग - 13 

गदग का त्रिकुटेश्वर शिव मंदिर 

TRIP DATE :- 06 JAN 2021

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सुबह 9 बजे तक मैं बल्लारी पैसेंजर से गदग स्टेशन पहुँच गया था। स्टेशन पर बने वेटिंग रूम में नहाधोकर तैयार हो गया। आज मेरा कर्नाटक यात्रा का सातवाँ दिन था और अभी दो दिन मेरी इस यात्रा को पूर्ण होने में शेष थे इसलिए ये अगले दो दिन मुझे विजय नगर साम्राज्य मतलब हम्पी और किष्किंधा को देखने में गुजारने थे और आज के पूरे दिन की यात्रा मुझे कर्नाटक के छोटे छोटे गाँवों में स्थित मंदिरों की खोज करने में करनी थी। जिसमें से मैं अन्निगेरी की आज की यात्रा पूर्ण कर चुका था। 

अब मुझे घर की और माँ की याद आने लगी थी इसलिए मैंने अपने अगले दो दिन बाद के रिजर्वेशन को एक दिन बाद का करवा लिया था। अपने घर लौटने की टिकट मैंने गदग स्टेशन पर ही करवा ली। इस प्रकार हम्पी के लिए अब कल का ही दिन मेरे पास शेष बचा था और कल ही रात से मेरी कर्नाटक से वापसी की यात्रा शुरू हो जाएगी। 

Saturday, April 10, 2021

ANNIGERI : KARNATAKA 2021

 UPADHYAY TRIPS PRESENT'S

कर्नाटक की ऐतिहासिक यात्रा पर, भाग - 12 

अन्निगेरी का अमृतेश्वर शिव मंदिर 

TRIP DATE - 06 JAN 2021

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सल्तनतों से बाहर निकलकर अब मैं अपनी प्राचीन सांस्कृतिक धरोहरों की ओर रवाना हो चुका था जिन्हें खोजने और देखने की लालसा लिए ही मैं कर्नाटक की इस यात्रा पर आया था। बीजापुर की इस्लामिक छवि देखने के बाद अब मुझे उस महान साम्राज्य की तरफ बढ़ना था जिसे मिटाने के लिए इस्लाम की चार सल्तनतों को मिलकर एकजुट होना पड़ा था, तब जाकर कहीं वह विजय नगर जैसे अकेले महान हिन्दू साम्राज्य का मुकाबला कर सके थे। परन्तु विजय नगर पहुँचने से पूर्व मुझे कुछ मुख्य ऐतिहासिक हिन्दू मंदिर भी देखने थे जिनमें सर्वप्रथम मैंने धारवाड़ जिले में अन्निगेरी के अमृतेश्वर शिव मंदिर को चुना। 

मेरी ट्रेन सुबह चार बजे ही गदग स्टेशन पहुँच चुकी थी। इस ट्रेन के सामान्य श्रेणी के सभी कोच लगभग खाली से ही पड़े थे। यह ट्रेन गदग से अब अपने आखिरी गंतव्य हुबली की तरफ जाने को तैयार थी। गदग से हुबली की तरफ जाने पर अगला स्टेशन अन्निगेरी ही था, जहाँ के लिए मेरा रिजर्वेशन इस ट्रेन में था। जनवरी के माह की इस खुशनुमा सुबह में, मैं इस ट्रेन के जरिये गदग को पीछे छोड़ चुका था और जल्द ही अन्निगेरी के छोटे से स्टेशन पर उतर गया। 

Saturday, March 27, 2021

GULBARGA CITY : KARNATAKA 2021

 UPADHYAY TRIPS PRESENT'S

कर्नाटक की ऐतिहासिक यात्रा पर भाग - 10 

गुलबर्गा अब कलबुर्गी शहर 


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मालखेड किला घूमने के बाद मैंने मालखेड़ बस स्टैंड से मैंने कलबुर्गी शहर जाने के लिए कर्नाटक की रोडवेज बस पकड़ी। कलबुर्गी यहाँ से 40 किमी दूर था। कलबुर्गी का पुराना नाम गुलबर्गा है जो कि एक सल्तनतकालीन शहर है। बस, शहर के बाईपास रोड से होती हुई कलबुर्गी के बस स्टैंड पहुंची। दोपहर हो चुकी थी और आज मैं नहाया भी नहीं था इसलिए मैंने यहाँ से रेलवे स्टेशन के लिए एक ऑटो किया और कलबुर्गी रेलवे स्टेशन पहुंचा। कोरोना प्रभाव की वजह से रेलवे स्टेशन पर किसी भी व्यक्ति का प्रवेश प्रतिबंधित था। 

मैंने स्टेशन पर प्रवेश करने की कोशिस की तो मुझे वहां बैठे आरपीएफ के जवान ने मुझे रोका। मैंने उसे बताया कि मेरी शाम को लौटने की ट्रेन है तब तक के लिए मैं अपना बैग क्लॉक रूम में जमा कराना चाहता हूँ। यह सुनकर उसने मुझे क्लॉक रूम का रास्ता बता दिया और मैं स्टेशन पर प्रवेश कर गया। 

Sunday, March 21, 2021

BADAMI : KARANATAKA 2021

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                                                कर्नाटक की ऐतिहासिक यात्रा पर भाग - 8                                                  

चालुक्यों की वातापि - हमारी बादामी 


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TRIP DATE - 3 JAN 2021 

समस्त भारतवर्ष पर राज करने वाले गुप्त सम्राटों का युग जब समाप्ति की ओर था और देश पर बाहरी शक्तियाँ अपना प्रभुत्व स्थापित करने में लगी हुईं थी उस समय उत्तर भारत में पुष्यमित्र वंश की स्थापना हुई और भारत वर्ष में गुप्तशासकों के बाद हर्षवर्धन नामक एक योग्य और कुशल शासक उभर कर सामने आया जिसने अपनी बिना इच्छा के राजसिंहासन ग्रहण किया था क्योंकि उसके हाथों की लकीरों में एक महान सम्राट के संकेत जो छिपे थे। उसके सामने परिस्थितियाँ ऐसी उत्पन्न हुईं कि ना चाहते हुए भी वह भारत का सम्राट बना और देश को बाहरी शक्तियों के प्रभाव से रोका। 

… 

वहीं दक्षिण भारत में गुप्त सम्राटों द्वारा स्थापित अखंड भारत अब अलग अलग प्रांतों में विभाजित हो गया और यहाँ के शासक एक दूसरे से निरंतर युद्धों में लगे रहते थे। गुप्त काल के दौरान दक्षिण में वाकाटक शासकों का राज्य स्थापित था जिसके पतन के पश्चात दक्षिण में अनेक राजवंशों ने जन्म लिया। इन्हीं में से एक राजवंश था पश्चिमी चालुक्यों का, जिन्होंने एहोल को अपनी राजधानी बनाया और अपना शासन प्रारम्भ किया किन्तु कुछ समय बाद जब उनका साम्राज्य विस्तृत होने लगा तो उन्होंने अपनी नई राजधानी वातापी को चुना। उनकी यह प्राचीन वातापि ही आज आधुनिक बादामी है। 

… 

जैसा कि पिछले भाग में आपने पढ़ा कि मैं बेंगलुरु से शाम को गोलगुम्बज स्पेशल से सुबह छः बजे ही बादामी पहुँच गया था। रेलवे स्टेशन पर सुबह नहा धोकर तैयार हो गया। मुझे यहाँ बादामी के रहने वाले मित्र नागराज मिलने आये और मैं उनके साथ बादामी के बस स्टैंड पहुँचा। उन्होंने मुझे यहाँ से एहोल की बस में बैठा दिया। दोपहर तक मैं एहोल और पत्तदकल घूमकर वापस बादामी आया। 

एहोल और पत्तदकल के मंदिर समूह देखने के बाद उतरती दोपहर तक मैं बादामी पहुँच गया। बादामी पहुंचकर मैंने नागराज को कॉल किया तो उन्होंने बताया कि वह किसी आवश्यक कार्य से अभी बादामी से बाहर हैं। उन्होंने मुझे बादामी घुमाने के लिए किसी दोस्त को भेजने के लिए कहा जिसके लिए मैंने उनसे मना कर दिया। अब दोपहर हो चुकी थी, मैं थोड़ा थक भी गया था और मुझे भूख भी लग रही थी। मैंने पैदल पैदल ही बादामी के बाजार को घूमना शुरू कर दिया किन्तु मुझे कोई शुद्ध शाकाहारी भोजनालय हिंदी या अंग्रेजी में लिखा कहीं नहीं दिखा। एक दो जगह मुझे कुछ रेस्टोरेंट से नजर आये भी जिनके बाहर लगे बोर्डों पर बढ़िया खाने की थाली छपी हुई थी, परन्तु लिखा कन्नड़ भाषा में था जो मेरी समझ से परे थी। कुछ देर बाद अंग्रेजी भाषा के जरिये मुझे एक शाकाहारी भोजनालय मिला गया।

… 

यहाँ आलू और गेँहू के आटे की रोटी का मिलना अत्यंत ही दुर्लभ है या मानिये कि ना के बराबर है। मैं इस शाकाहारी भोजनालय पर गया तो यहाँ भी वही चावल, इडली, डोसा और साँभर। अब पेट भरने के लिए कुछ तो खाना ही था इसलिए अपने पसंदीदा चावल ही लिए और दाल के साथ नहीं, बल्कि साम्भर के साथ। क्योंकि कि यह दक्षिण है यहाँ साम्भर को उतनी ही इज़्ज़त प्राप्त है जितनी उत्तर भारत में दालों को है। साम्भर और चावल खाकर कुछ देर के लिए पेट तो भर गया मगर जो पर्याप्त भूख मुझे लगी थी वह पूरी ना हो सकी क्योंकि पिछले तीन चार दिन से मैं ऐसा ही कुछ खाता आ रहा था। खाना खाकर मैं बादामी की गुफाओं की तरफ बढ़ चला जिनका निर्माण चालुक्य राजाओं ने करवाया था। 


 

 स्टेशन के बाहर चाय की दुकान 

मेरे बादामी के मित्र नागराजा 

स्टेशन से बादामी शहर की ओर 

बादामी बस स्टैंड 


 

Thursday, March 18, 2021

PATTADAKAL : KARNATAKA 2021

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कर्नाटक की ऐतिहासिक यात्रा पर - भाग 7 

विश्व विरासत स्थल - पट्टादाकल मंदिर समूह 


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मालप्रभा नदी के किनारे स्थित पत्तदकल विश्वदाय स्मारक स्थल की सूची में दर्ज है। यहाँ पश्चिमी चालुक्य सम्राटों द्वारा अनेक मंदिर स्थापित हैं। पत्तदकल, बादामी और एहोल के मध्य में स्थित है। प्राचीनकाल में इस स्थान का नाम किषुवोडल मिलता है। एहोल के बाद जब चालुक्यों का राजनीतिक उत्कर्ष हुआ तो उन्होंने अपनी राजधानी एहोल से हटाकर वातापि में स्थापित की जो आज की बादामी कहलाती है। राजधानी का यह परिवर्तन पुलकेशिन प्रथम के समय में हुआ और उसने बादामी में ही किले का निर्माण कराया। चालुक्यों के अंतिम वर्षों में राजधानी पत्तदकल में स्थानांतरित हो गई। पत्तदकल के बारे में कहा जाता है कि चालुक्यों सम्राटों का राज्याभिषेक पत्तदकल में ही पूर्ण होता था। 

Saturday, March 13, 2021

AIHOLE : KARNATAKA 2021

 

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कर्नाटक की ऐतिहासिक यात्रा पर - भाग 6 

ऐहोल के मंदिर 


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अब वक़्त आ चुका था अपनी उस मंजिल पर पहुँचने का, जिसे देखने की धारणा अपने दिल में लिए मैं अपने घर से इतनी दूर कर्नाटक आया था और वह मंजिल थी बादामी जो प्राचीन काल की वातापि है और मेरी इस यात्रा का केंद्र बिंदु भी। बादामी, प्राचीन काल में वातापि के चालुक्यों की राजधानी थी जिन्होंने यहाँ अजंता और एलोरा की तरह ही पहाड़ों को काटकर उनमें गुफाओं का निर्माण कराया और इन्हीं गुफाओं के ऊपर अपने किले का निर्माण कराया। बादामी से पूर्व चालुक्यों ने बादामी से कुछ मील दूर ऐहोल नामक स्थान को अपनी राजधानी बनाया था और वहां अनेकों मंदिर और देवालयों का निर्माण कराया था। वर्तमान में ऐहोल कर्नाटक का एक छोटा सा गाँव है मगर इसकी ऐतिहासिकता को देखते हुए पर्यटकों का यहाँ आना जाना लगा रहता है। 

... 

मैं सुबह 6 बजे ही बादामी पहुँच गया था और स्टेशन पर बने वेटिंग रूम में नहाधोकर तैयार हो गया। चूँकि कोरोना की वजह से रेलवे स्टेशन पर वेटिंग रूम में ठहरने की सुविधा उपलब्ध नहीं है किन्तु स्टेशन मास्टर साब ने मुझे उत्तर भारतीय होने से और कर्नाटक की यात्रा पर होने से अतिथि देवो भवः का अर्थ सार्थक किया और वेटिंग रूम की चाबी मुझे दे दी। अपने गीले वस्त्रों को मैंने यहीं वेटिंग रूम में सुखा दिया था क्योंकि आज रात को ही मुझे अपनी अगली मंजिल पर भी निकलना था। इसप्रकार स्टेशन का वेटिंग रूम, मेरे लिए एक होटल के कमरे के समान ही बन गया। स्टेशन के बाहर बनी दुकान पर चाय नाश्ता करने के बाद मैंने अपने बैग को भी यहीं रख दिया और कैमरा लेकर बाहर आ गया। यह दुकान प्राचीन काल की काठ से बनी दुकान थी। 

... 

Wednesday, March 3, 2021

BENGALURU : KARNATAKA 2021

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कर्नाटक की ऐतिहासिक यात्रा पर भाग - 5,                                                        यात्रा दिनांक -  02 JAN 2021 

बेंगलूर शहर में इतिहास की खोज 



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पूरा दिन बीदर शहर साइकिल चलाकर घूमने के बाद जब शाम को मैं बीदर स्टेशन पहुंचा, तो बेंगलुरु जाने वाली ट्रेन प्लेटफॉर्म पर तैयार खड़ी थी। हालाँकि मेरी यात्रा का उद्देश्य केवल उत्तर कर्नाटक की यात्रा का था किन्तु रात व्यतीत करने के लिए कोई स्थान तो चाहिए इसलिए मैंने होटल के स्थान पर ट्रेन को पसंद किया जिसमें मैं रात को आराम से सो भी जाऊँगा और सुबह बेंगलुरु भी पहुँच जाऊँगा। सही समय के साथ ट्रेन बीदर से रवाना हो चली, और मैंने ऊपर वाली सीट पर अपना बिस्तर लगाया और सो गया।  सुबह जब मेरी आँख खुली तो ट्रेन बेंगलोर पहुँच चुकी थी। ट्रेन में से बेंगलोर शहर की ऊँची ऊँची इमारतें और बड़ी बड़ी सड़कें दिखाई दे रही थीं। कर्नाटक के एक छोटे से शहर से मैं अब कर्नाटक की राजधानी बेंगलोर पहुँच चुका था। 

बीदर से आने वाली यह ट्रेन बेंगलोर के यशवंतपुर स्टेशन पहुंची। बहुत नाम सुना था मैंने इस स्टेशन का, आज देख भी लिया। बहुत ही साफ़ सुथरा और बड़ा स्टेशन है। यहीं बने एक जन सुविधा केंद्र में नहा धोकर मैं तैयार हो गया और स्टेशन के बाहर निकला। बेंगलोर का मौसम मुझे बीदर की अपेक्षा बहुत अलग मिला। ना ज्यादा यहाँ सर्दी थी और ना ही गर्मी। आसमान में बादल से हो रहे थे इसलिए सूर्य भी दिखाई नहीं दे रहा था। स्टेशन के ठीक सामने बेंगलोर मेट्रो का यशवंतपुर नाम से स्टेशन है। बेंगलोर की मेट्रो नम्मा मेट्रो के नाम से प्रसिद्ध है। कन्नड़ भाषा में नम्मा का मतलबा हमारी या हमारा होता है इसलिए बेंगलोर वासियों के लिए यह उनकी मेट्रो है। मैंने मेट्रो का कार्ड लिया और प्लेटफार्म पर पहुंचा। 

Monday, February 22, 2021

BIDAR : KARNATAKA 2021

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कर्नाटक की ऐतिहासिक यात्रा पर भाग - 4, 

01 JAN 2021

     बीदर - क्राउन ऑफ़ कर्नाटक 


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बीदर का सल्तनतकालीन इतिहास 

   दिल्ली सल्तनतकाल के दौरान तुगलक वंश के संस्थापक ग़यासुद्दीन तुग़लक़ की मृत्यु के बाद, उसका पुत्र जूना खां, मुहम्मद बिन तुगलकशाह के नाम से दिल्ली की गद्दी पर बैठा। अपने शासनकाल के दौरान उसने साम्राज्यवादी नीति को अपनाकर अपने साम्राज्य का विस्तार किया। दिल्ली सल्तनत की सीमायें भारत के उत्तर और पश्चिम में अब कांधार और करजाल, पूर्व में बंगाल और दक्षिण भारत के राज्यों को छूने लगीं थीं। मुहम्मद बिन तुगलक निसंदेह एक दूर की सोच रखने वाला सुल्तान था, उसने अपने साम्राज्य का काफी हद तक विस्तार किया किन्तु उसने अपने शासनकाल के दौरान जो योजनाएँ लागू कीं, वह विफल रहीं। इन्हीं में से एक योजना थी राजधानी परिवर्तन की। उसने अपनी राजधानी दिल्ली से हटाकर देवगिरि स्थानांतरित की जो पूर्ण रूप से असफल रही और इस योजना के विफल हो जाने के बाद उसका राज्य छिन्न भिन्न हो गया। 

   हालांकि उसने देवगिरि को राजधानी के तौर पर इसलिए चुना ताकि देवगिरि से साम्राज्य की चारों दिशाओं में नियंत्रण स्थापित किया जा सके। उसका मुख्य उद्देश्य उत्तर भारत के साथ साथ दक्षिण भारत पर भी अपना प्रभुत्व स्थापित रखना था किन्तु दिल्ली की जनता, देवगिरि जैसे सुदूर प्रदेश में नहीं ढल सकी और मजबूरन सुल्तान को फिर से राजधानी दिल्ली स्थानांतरित करनी पड़ी। देवगिरि से दिल्ली राजधानी परिवर्तन होने के बाद दक्षिण भारत के सामंतों ने विद्रोह कर दिया और स्वयं को तुगलक वंश का उत्तराधिकारी मानकर अपने नवीन वंशों की स्थापना की और स्वयं को सम्राट या सुल्तान घोषित किया। इन्हीं में से एक सामंत था हसन, जिसने दक्षिण भारत में बहमनी वंश की नींव रखी और देवगिरि के सिंहासन पर आसीन हुआ। 

   देवगिरि पर कुछ समय शासन करने के बाद उसने अपनी नई राजधानी गुलबर्गा को बनाया। 1422 ई. में अहमदशाह ने बहमनी सल्तनत की राजधानी गुलबर्गा से हटाकर बीदर में स्थानांतरित की और बीदर से ही राज्य का सञ्चालन आरम्भ किया। 1526 ई. में एक अमीर अलीबरीद ने आखिरी अयोग्य बहमनी सुल्तान को अपदस्थ कर स्वतंत्रता की घोषणा कर दी और बीदर में फिर एक नए वंश बरीदशाही की स्थापना कर सुल्तान बन गया। बरीदशाही वंश के बाद बीदर पर मराठाओं का साम्राज्य स्थापित हो गया और बाद में चलकर यहाँ ब्रिटिश हुकूमत का राज रहा। देश की स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में लोकतंत्र स्थापित हुआ और बीदर की रियासत अब भारत का अभिन्न हिस्सा बन गई। बीदर महाराष्ट्र और तेलंगाना राज्यों का सीमावर्ती शहर है और कर्णाटक के सबसे शीर्ष पर स्थित होने के कारण यह कर्नाटक का मुकुट या ताज भी कहलाता है।  

Saturday, February 13, 2021

CHARMINAR : TELANGANA 2020

 UPADHYAY TRIPS PRESENT'S

कर्नाटक की ऐतिहासिक यात्रा पर भाग-3, 31 DEC 2020

नववर्ष पर हैदराबाद की एक शाम 


यात्रा दिनाँक  - 31 DEC 2020 

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अपने सही समय पर तेलांगना स्पेशल ने मुझे हैदराबाद पहुँचा दिया और स्टेशन बाहर निकलकर सबसे पहले मैंने उस वेटिंग रूम को देखा जहाँ पिछली बार मैं और माँ पूरी रात यहाँ रुके थे और सुबह होने पर तेलांगना एक्सप्रेस से ही अपने मथुरा को रवाना हुए थे। शाम हो चुकी थी और हैदराबाद का स्टेशन इस शाम के अँधेरे में अलग अलग रोशनी के रंगों से जगमगा रहा था। स्टेशन के ऐसे दृश्य को देखकर मुझसे रहा नहीं गया और मैंने स्टेशन के बाहर ड्यूटी कर रहे एक हैदराबाद पुलिस के सिपाही से अपना फोटो लेने के लिए कहा, उसने बिना हिचक मेरे दो तीन फोटो दिए, जब उसे लगा कि फोटो में अँधेरा ज्यादा आ रहा है, तो उसने मुझे थोड़ा हटकर खड़े होने को कहा और फिर से फोटो खींच दिया, वो बात अलग है कि वो फोटो खींचते समय बीच बीच में अपने सीनियर की ओर भी देख रहा था जो हमसे थोड़ी दूर अलग कुर्सी पर बैठा था और अपने काम में मशगूल था। 

फोटो खिंचवाकर मैं थोड़ा आगे बढ़ा तो पहलीबार हैदराबाद की मेट्रो और स्टेशन पर नजर पहुँची। पिछली बार जब मैं और माँ यहाँ आये थे तब इसके निर्माण का कार्य चल रहा था। मुझे चारमीनार जाना था इसलिए मैंने मेट्रो की बजाय सिटी बस से जाना उचित समझा और रोड क्रॉस करके दूसरी साइड पहुँचा, यहाँ जितनी भी बसें आ रही थी सभी पर उसके स्थान  नाम तेलगु भाषा में लिखा था जो मेरी समझ से बहुत दूर थी इसलिए यहाँ बस का इंतज़ार कर रहे एक यात्री से मैंने चारमीनार जाने वाली बस के बारे में पूछा तो उसने बताया कि चारमीनार के लिए 9c नंबर की बस जाती है। करीब आधा घंटे इंतज़ार करने के बाद 9c नंबर की बस आई और मैं चारमीनार के लिए रवाना हो गया। बस में से हैदराबाद शहर की इस शाम का नजारा देखने लायक था, यहाँ की सड़कें और बाज़ार सचमुच एहसास कराते हैं कि हम देश के एक बड़े शहर में हैं। 

Friday, April 17, 2020

SAI NAGAR SHIRDI



साईं नगर शिरडी 



6 जनवरी 2020                                                               इस यात्रा को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक कीजिये। 

    हम करीब साढ़े नौ बजे शिरडी पहुँच गए थे, एक प्रसाद वाले की दुकान पर अपने बैग रखकर हम साईं बाबा के दर्शन करने लाइन में लग गए और दर्शन पर्ची लेकर साईं बाबा के दर्शन हेतु अपनी बारी का इंतज़ार करने लगे। आज काफी सालों बाद मेरी और साधना की मुलाकात बाबा से होने वाली थी। बहुत दिन हो गए थे बाबा से बिना मिले इसलिए अब जब हमारी यह यात्रा अंतिम चरण में थी तो दिल ने सोचा क्यों ना बाबा के दर्शन कर चलें। आखिर कार हमारी यह यात्रा धार्मिक यात्रा भी तो थी। 

    महाराष्ट्र प्रान्त के गोदावरी नदी के समीप शिरडी नामक ग्राम स्थित है जहाँ 18 वीं सदी में साईंबाबा का प्रार्दुभाव एक वृक्ष के नीचे हुआ था। साईंबाबा के बारे में प्रचलित है कि इनका जन्म और इनकी बाल्यकाल अवस्था अज्ञात है। इनका सबसे प्रथम दर्शन शिरडी वासियों को ही हुआ था, जब उन्होंने एक वृक्ष के नीचे एक दिव्यतेज युवा को ध्यानमग्न अवस्था में देखा। 

Monday, April 13, 2020

SHRI GHRISHNESHWAR JYOTIRLING


श्री घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग 2020




5 जनवरी 2020                                                        इस यात्रा को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक कीजिये। 

     एलोरा से थोड़ा सा आगे ही श्री घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थित है। मैं पहले भी एकबार माँ के साथ यहाँ आ चुका हूँ और आज दूसरी बार अपनी पत्नी को लेकर आया हूँ। ऑटो से उतरते ही मंदिर की ओर जाने वाली सड़क पर पूजा सामग्री की दुकानें लाइन से बनी हुई हैं। हमने सबसे पहली दुकान से ही पूजा सामग्री ले ली और जब थोड़ा सा आगे बढे तो पता चला सबसे शुरुआती दुकानदार अंदर वाले दुकानदारों की अपेक्षा काफी महँगा लगाकर सामान बेचते हैं इनमें अधिकतर सब महिलाएं ही थीं। मैंने मंदिर से लौटकर उस दुकानदार महिला को अपनी भाषा में अच्छी खासी सुनाई जिससे हमारे बाद आने वाले अन्य यात्रियों से वो इसप्रकार बेईमानी से सामान महँगा लगाकर न बेचे, और फिर भी बेचे तो वह उसका पाप ही होगा। 

Wednesday, April 8, 2020

KAILASH TEMPLE : ELLORA



कैलाश मंदिर : एलोरा गुफाएँ 




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5 जनवरी 2020 

    एलोरा गुफाओं का निर्माण राष्टकूट शासक कृष्ण प्रथम के शासनकाल में अजंता की गुफाओं को बनाने वाले कारीगरों के वंशजों ने किया था। एलोरा गुफाओं में के केवल बौद्ध ही नहीं अपितु हिन्दू और जैन धर्म से सम्बंधित अनेकों गुफाएं स्थित हैं। यह सभी गुफाएं अजंता की तरह ही चट्टानों को काटकर बनाई गईं हैं। 8वीं शताब्दी के मध्य एलोरा राष्ट्रकूट शासकों की राजधानी का मुख्य केंद्र रहा है जहाँ राष्ट्रकूट शासकों ने अनेकों गुफाओं का निर्माण कराया और हिन्दू होने के कारण उन्होंने यहाँ पहाड़ को काटकर एक ऐसे मंदिर का निर्माण कराया जिसका वर्णन भारतीय इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों से युक्त है। इस मंदिर की शिल्पकारी और मूर्तिकारी को देखकर ही इसकी भव्यता का अनुमान लगाया जा सकता है और यह मंदिर है एलोरा का कैलाश मंदिर। 

Tuesday, March 31, 2020

MUMBAI : 2020


मुंबई 2020 - नए साल की सैर


1 जनवरी 2020
 
   अपनी ऐतिहासिक यात्रा को आगे बढ़ाते हुए और भीमबेटकाउदयगिरि की गुफाओं के देखने के बाद अब मन में अन्य गुफाओं को देखने ललक जाग उठी थी। भारत की समस्त ऐतिहासिक गुफाओं की एक लिस्ट तैयार की गई और पाया कि ऐसी अधिकतर गुफाएँ महाराष्ट्र प्रान्त में है जो यूनेस्को की विश्व विरासत स्थल की सूची में भी दर्ज हैं जिनमें मुख्यतः एलिफेंटा, अजन्ता और एलोरा का मुख्य स्थान है। 

   इन गुफाओं को देखने के लिए यात्रा कार्यक्रम तैयार हुआ और हमने इस यात्रा कार्यक्रम को इस प्रकार बनाया कि यह ऐतिहासिक होने साथ साथ तीर्थ और पर्यटन यात्रा भी साबित हुई। इस यात्रा में रेलमार्ग को मुख्यता के रूप में चुना गया और इस यात्रा की शुरुआत हुई देश की आर्थिक राजधानी मुंबई से।

Saturday, January 11, 2020

Amarkantak


अमरकंटक की एक सैर 



अमरकंटक :-  मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ राज्यों की सीमा तथा मैकाल पर्वत श्रृंखला पर स्थित प्राकृतिक वातावरण से भरपूर भगवान शिव और उनकी पुत्री श्री नर्मदा देवी जी का दिव्यधाम है। यहीं से श्री नर्मदा नदी का उद्गम हुआ है और साथ ही सोन तथा जाह्नवी नदी का भी यह उद्गम स्थल है। प्राकृतिक वातावरण से भरपूर और एक पर्वतीय स्थल होने के कारण यह स्थान प्राचीनकाल से ही साधू संतो तथा ऋषि मुनियों केलिए साधना एवं तप करने योग्य उचित स्थान है और आज भी यहाँ अनेकों ऋषि मुनि अपनी तप और साधना में लग्न रहते हैं। यहाँ अनेकों आश्रम स्थित हैं जिनमें अच्छी सुविधा के साथ ठहरने की उचित व्यवस्था है। कुल मिलकर अमरकंटक एक दिव्य और पुण्य धाम तथा हिन्दुओं का धार्मिक केंद्र है।

अमरकंटक में दर्शनीय स्थल :- हालांकि समस्त अमरकंटक धाम दर्शनीय है किन्तु यहाँ अनेकों प्राचीन स्थान ऐसे हैं जिन्हें देखने के लिए दूर दूर से अनेकों तीर्थयात्री प्रतिदिन यहाँ आते हैं और कुछदिन यहाँ रहकर अपनी प्रतिदिन के व्यस्त जीवन और भागदौड़ से थोड़ा आराम पाते हैं। यहाँ के दर्शनीय स्थल निम्न प्रकार हैं -

  • श्री नर्मदा जी का मंदिर तथा उद्गम स्थल 
  • कल्चुरी काल के ऐतिहासिक मंदिर जिनमे सबसे प्रमुख कर्ण मंदिर है। 
  • माई की बगिया 
  • माई का मंडप 
  • सोनमुड़ा  ( सोन नदी का उद्गम स्थल )
  • श्री यंत्र महामेरु मंदिर 
  • श्री मार्कण्डेय आश्रम 
  • श्री गायत्री मंदिर 
  • कपिल धारा 
  • दूध धारा 
  • श्री आदिनाथ जैन मंदिर 
  • श्री जालेश्वर मंदिर 
  • कबीर चबूतरा 
  • मैकाल पार्क 
अमरकंटक कैसे पहुंचे :- अमरकंटक धाम मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले में मैकाल पर्वत पर छत्तीसगढ़ की सीमारेखा पर स्थित है। यहाँ ट्रेन द्वारा पहुँचने के लिए सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन पेण्ड्रा रोड है जो कटनी से बिलासपुर रेलमार्ग पर स्थित है। स्टेशन के बाहर से ही अमरकंटक जाने के लिए टैक्सियां उपलब्ध रहती हैं जो 80 रूपये पर व्यक्ति के हिसाब से किराया लेती हैं। नजदकी एयरपोर्ट बिलासपुर में स्थित है। 


Tuesday, June 4, 2019

Return from Shri Kedarnath

UPADHYAY TRIPS PRESENT'S

श्री केदारनाथ जी से मथुरा वापसी ( एक चमत्कारिक यात्रा )





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केदारनाथ नगर में भ्रमण :-
सुबह से शाम तक लाइन में लगे रहने के बाद आख़िरकार मुझे मेरे आराध्य भगवान शिव के केदारनाथ जी   के दर्शन हो ही गए।  दर्शन से मन को तृप्त करने के बाद मैंने भीमशिला के भी दर्शन किये जिसने त्रासदी के समय केदारनाथ मंदिर जी रक्षा की थी और फिर मैंने केदारनाथ नगर का भ्रमण किया जो मात्र साल में छः महीने ही गुलजार रहता है बाकी छः महीने यह बर्फ के आगोश में छिप जाता है। त्रासदी के समय यहाँ अत्यधिक विनाश हुआ था जिसके निशाँ उस दर्द की कहानी आज भी बयां करते नजर आते हैं। नगर भ्रमण करने के बाद अब मुझे भूख भी लग आई थी, राजस्थान वालों का यहाँ विशाल भंडारा चल रहा था जिसमे स्वादिष्ट भोजन और कुछ जलेबी खाकर अब मैं वापस अपने घर की तरफ लौट लिया था किन्तु मुझे क्या पता था कि घर अभी बहुत दूर था।

केदारनाथ जी से वापसी :-
केदारनाथ से लिंचोली तक आते आते अब मैं बहुत ही बुरी तरह से थक चुका था, पहाड़ उतरते समय आज मुझे पहली बार एहसास हुआ कि पहाड़ से उतरना, पहाड़ पर चढ़ने से भी ज्यादा मुश्किल होता है। इन खाली घोड़ों को यूँ नीचे की तरफ जाते देख कभी कभी मन करता की क्यों ना इन्हीं एक घोड़े पर बैठकर मैं भी निकल जाऊं परन्तु जब जेब का ख्याल आता तो पता चला कि पैसे तो पैदल चलने के लायक भी नहीं बचे थे आज, जो आखिरी बीस रूपये थे उसका भी मैं प्रसाद ले आया था, अब तो बस मेरी मंजिल माँ ही थी जो इसवक्त भीमबली में थी और शायद मेरे अन्य सहयात्री विष्णु भाई और त्रिपाठी जी भी मुझे वहीँ मिले। शाम हो चुकी थी और अब सूर्य का प्रकाश धीरे धीरे घाटी में से प्रस्थान कर रहा था और अँधेरे का आगमन शुरू हो चुका था। अँधेरे में ये पहाड़ और भी खतरनाक हो जाते हैं और मुझे फिर इन पहाड़ों से डर लगने लगता है।

Shri Kedarnath Jyotirling

UPADHYAY TRIPS PRESENT'S

श्री केदारनाथ ज्योतिर्लिंग यात्रा 2019 


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   पर्वतराज हिमालय की हिमाच्छादित चोटियों पर साक्षात् ईश्वर का वास माना जाता रहा है, इसलिए हिमालय  देवभूमि कहलाता है। हिमालय के उत्तराखंड राज्य में हिन्दुओं के मुख्य तीर्थ स्थल चार धाम स्थित हैं जिनमें श्री बद्रीनाथ जी, केदारनाथ जी, गंगोत्री और यमुनोत्री हैं। इनके अलावा यहाँ हर कोस पर किसी न किसी देवता का मंदिर भी स्थित है। श्री केदारनाथ जी भारतवर्ष के मुख्य बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक हैं जिनका दिव्य मंदिर हिमालय की केदार नामक ऊँची चोटी पर स्थित है। केदारनाथ ज्योतिर्लिंग के मंदिर के बारे में विख्यात है कि इस प्राचीन मंदिर का निर्माण पांडवों ने कराया था जो पर्वत की 11750 फुट की ऊँचाई पर स्थित है।