Thursday, October 1, 2026

GWALIOR 2024 : GWALIOR FORT & TEMPLES



 ग्वालियर किले की एक यात्रा 


5 JAN 2024,

     नववर्ष का आगाज  हो चुका था किन्तु इस बार मैं अपनी दक्षिण भारत की यात्रा पर नहीं जा पाया था, क्योंकि मेरा कर्नाटक एक्सप्रेस में रिजर्वेशन था जो इन सर्दियों में घने कोहरे के वजह से काफी विलम्ब से चल रही थी। शाम को साढ़े 9 बजे जाने वाली यह ट्रेन अगले दिन सुबह दस बजे के आसपास मथुरा पहुंची, जिसकारण मेरी आगे की सारी यात्रा का प्लान विफल हो गया और मैंने ट्रेन छोड़ दी। 

    इसके अलावा दूसरा कारण यह भी था कि इस यात्रा पर मेरे साथ जाने वाला मेरा मित्र सोहन सिंह अभी स्वस्थ नहीं है, उनके पैर में हुए फ्रैक्चर के कारण वह इस यात्रा को करने में असमर्थ थे। अतः इस कारण इस नववर्ष की मेरी दक्षिण भारत की दूसरी कर्नाटक यात्रा इस बार असफल होकर रह गई। 

   साल के शुरूआती दिनों में जहाँ लोग नए साल की खुशियां मनाने में व्यस्त थे और एक दूसरे को नए साल के सुन्दर सुन्दर सन्देश मोबाइल पर भेज रहे थे, वहीँ मैं मथुरा रेलवे स्टेशन पर ट्रेन के जाने के बाद उदास मन से बैठा हुआ था। मेरे दिमाग में सिर्फ मेरी यात्रा चल रही थी जिसकी तैयारी मैंने कई महीने पहले से शुरू कर दी थी। 

    अब स्टेशन पर बैठे बैठे, मैं या तो अपनी आगामी यात्रा की कन्फर्म टिकटों को कैंसिल कर रहा था अथवा फिर विलम्बित ट्रेनों का टीडीआर फाइल कर रहा था। मेरी इस वर्ष की दक्षिण भारत यात्रा पूर्ण रूप से कैंसिल हो चुकी थी। 

     मैं काफी देर मथुरा जंक्शन पर बैठा रहा और फिर कुछ समय बाद घर लौट आया। माँ, मुझे देखकर अति प्रसन्न हुई कि मैं उनसे दूर नहीं गया और उनके पास रहा। किन्तु मेरे मष्तिष्क में मेरी यात्रा का पूरा प्लान घूम रहा था, मैं चाहकर भी अपने आप को संतुष्ट नहीं करपा रहा था। मुझे सिर्फ अपनी इस यात्रा के कैंसिल होने का दुःख सताये जा रहा था, सारी तैयारियों के बाबजूद मेरा यह यात्रा प्लान असफल हो गया। मैने यात्रा के लिए ऑफिस से छुट्टियां भी ले रखी थीं इसलिए मैं अभी ऑफिस नहीं जाना चाहता था। 

       इस वर्ष सर्दियाँ जोरो पर थीं, घने कोहरे ने पूरे उत्तर भारत को अपने आगोश में ले रखा था। लोग घरों से बाहर नहीं निकलना चाहते थे, किन्तु मेरा मन घर में बैठे बैठे बाहर की यात्राओं का प्लान कर रहा था। अंततः मेरे मन ने एक ऐसी  यात्रा प्लान की जो ज्यादा दूर की तो नहीं थी किन्तु ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत ही महत्वपूर्ण थी।

   यह यात्रा थी ग्वालियर किले की , जहाँ मुझे वो समस्त ऐतिहासिक स्थल देखने को मिलने वाले थे जिन्हें खोजने में कर्नाटक जा रहा था। ग्वालियर किले में जैन प्रतिमाएं और गुफाएं, गोपांचल पर्वत, प्राचीन ऐतिहासिक मंदिर, गुरुद्वारा, जलकुंड और महल देखने को मिल सकते थे। 

    मैंने तुरंत यह एकदिवसीय यात्रा प्लान की और माँ से आज्ञा लेकर रेलवे स्टेशन की ओर प्रस्थान किया। रेलवे स्टेशन पर आज भी वही हाल था जो एक जनवरी को था। घना कोहरा और लेट लतीफ़ ट्रेनें। लेट लतीफ़ ट्रेनों की वजह अक्सर नुकसान तो होता ही है परन्तु कभी कभी बहुत फायदा भी होता है। 

   ऐसा ही एक फायदा मुझे 20 घंटे  की देरी से चल रही पातालकोट एक्सप्रेस से हुआ, जो  मेरे सामने मथुरा जंक्शन पर जब आई तो यह पूरी खाली पड़ी हुई थी।  इसके देरी के चलने की वजह से मुझे बिना भीड़भाड़ वाली एक खाली ट्रेन ग्वालियर जाने के लिए मिल गई। और मैं इसके जनरलकोच में सवार हुआ। 
  • मथुरा से ग्वालियर - पातालकोट एक्सप्रेस 
     यूँ तो पातालकोट एक्सप्रेस का मथुरा जंक्शन पर आने का समय दोपहर के डेढ़ बजे के आसपास है किन्तु अभी यह कोहरे के कारण 20 घंटे से भी अधिक विलम्ब से चल रही है इसलिए इसके अधिकांश कोच खाली ही पड़े थे। सबसे मुख्य इसका सामान्य कोच भी पूरी तरह खाली था और मुझे इसमें आराम से मनचाही सीट पर बैठकर यात्रा करने की आजादी मिल गई। 

   सामान्य कोच में सबसे शाही सीट आपातकालीन खिड़की वाली सिंगल सीट होती है। इस सीट पर बैठकर बाहर के नज़ारे देखते हुए यात्रा करने का एक अलग ही आनंद प्राप्त होता है। जो आनंद बहुत सारे पैसे खर्च करके ट्रेन के फर्स्ट क्लास कोच में भी नहीं आ सकता वो आनंद कम खर्च में सामान्य कोच की इस आपातकालीन सीट पर प्राप्त होता है। मथुरा से निकलने के बाद ट्रेन आगरा कैंट पहुंची और इसके बाद अगले स्टेशन भांडई पर खड़ी हो गई। 

     भांडई स्टेशन से आगे उटंगन नदी के पुल पर कुछ कार्य चल रहा था जिसकारण इसे काफी देर तक भांडई स्टेशन पर खड़ा करके रखा गया। लगभग आधे पौने घंटे बाद यह यहाँ से रवाना हुई। भांडई, अब जंक्शन स्टेशन बन चुका है। सन 2004 में यहाँ से बटेश्वर जाने के लिए एक रेल लाइन का निर्माण कार्य तत्कालीन माननीय प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी जी ने शुरू करवाया था। 

     दरअसल बटेश्वर तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई जी का पैतृक ग्राम है और उनका बचपन से निवास स्थल रहा है। अब जाकर यह रेल लाइन शुरू हो चुकी है और यह आगरा कैंट से इटावा के बीच दूसरी मुख्य लाइन है। इस रेल लाइन पर आगरा का शमसाबाद, फतेहाबाद, बटेश्वर, बाह और उदी जैसे रेलवे स्टेशन आते हैं। उदी पर ग्वालियर से भिंड होकर आने वाली रेलवे लाइन भी इसमें मिल जाती है और बाद में यह इटावा पहुंचकर दिल्ली - हावड़ा रेल लाइन से मिल जाती है। 

      भांडई जंक्शन से निकलने के बाद ट्रेन सीधे ग्वालियर जाकर रुकी किन्तु इसकी लेट लतीफी ने मेरा आज का भी आधा दिन लगभग निकाल दिया था और अब मेरे पास ग्वालियर का किला घूमने के लिए बहुत ही कम समय बचा था। ग्वालियर स्टेशन के नजदीक मेरे चचेरे भाई यतेश उर्फ़ नीटू की ससुराल है। उसके साले साहब और ससुर जी भी रेलवे में ही कार्यरत हैं और स्टेशन के नजदीक रेल आवास में रहते हैं। नीटू अभी यहीं था और अपने पुत्र के साथ मुझे लेने स्टेशन आया। फिर हम दोनों साथ में उसकी ससुराल पहुंचे। 


मथुरा से रवानगी 

आपातकालीन खिड़की वाली सीट पर एक यात्रा 


भांडई जंक्शन 

ग्वालियर जंक्शन का पुराना बोर्ड 

ग्वालियर आगमन 


यहाँ पुरानी नेरो गेज लाइन भी देखने को मिली 

  • उरवाई दरवाजा - ग्वालियर किला 
     भाई की ससुराल में मिली आवभगत से मन बहुत प्रसन्न हो गया, मेरे पास बहुत ही सीमित समय था इसलिए मैं, नीटू के साथ ग्वालियर किले को देखने के लिए निकल पड़ा। एक ई -रिक्शा के द्वारा हम किले के उरवाई दरवाजे पर पहुंचे। 

यह किले का पश्चिमी दरवाजा है और इसका निर्माण 13 वीं शताब्दी में सुल्तान इल्तुतमिश ने दीवारों को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से करवाया था। उरवाई घाटी में स्थित होने के कारण इस दरवाजे को उरवाई दरवाजा नाम दिया गया।

 ग्वालियर किले का यह दरवाजा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहाँ गाड़ियों से सीधे किले के अंदर तक पहुंचा जा सकता है। यह दरवाजा किले के अंदर जाने के लिए सड़क मार्ग का मुख्य गेट है। उरवाई दरवाजे के अंदर प्रवेश करते ही विशाल जैन प्रतिमाएं दिखाई देती हैं।  


उरवाई गेट की तरफ 


उरवाई दरवाजा 

उरवाई दरवाजे से किले का एक दृश्य 

उरवाई गेट पर मेरी एक फोटो 


उरवाई दरवाजा की प्रस्तर पट्टिका 


  • ग्वालियर किले में उरवाई दरवाजे के नजदीक सिद्धांचल दिगंबर जैन प्रतिमाएं 
    उरवाई दरवाजे से अंदर प्रवेश करते ही थोड़ा सा आगे चलने पर जैन गुफाएं और उनकी प्रतिमाएं दिखाई देती हैं। इन जैन प्रतिमाओं का निर्माण 7वीं ईस्वी से लेकर 15वीं ईस्वी के मध्य विभिन्न कालों में हुआ। अधिकांश प्रतिमाओं का निर्माण 15 वीं शताब्दी में तोमर वंश के शासकों द्वारा करवाया गया था जिनमें सबसे प्रमुख भगवान आदिनाथ की खड़ी प्रतिमा है जिसकी ऊँचाई संभवतः 57 फ़ीट के लगभग है। भगवान आदिनाथ को जैन धर्म के प्रथम तीर्थकर ऋषभदेव के नाम से भी जाना जाता है। 

इसी शताब्दी में जब बाबर का ग्वालियर किले पर आक्रमण हुआ तो उसके आदेश पर इन प्रतिमाओं को खंडित कर दिया गया किन्तु बाद में जैन समाज के लोगों द्वारा इनका जीर्णोद्धार करवाया गया। 

















  • अन्य जैन प्रतिमाएं 
सिद्धांचल समूह के जैन प्रतिमाओं से आगे बढ़ने पर भगवान आदिनाथ की विशाल प्रतिमा दिखाई देती है, यह गोपाचल पर्वत की तलहटी में चट्टानों को काटकर निर्मित की गई भारत की अन्य विशाल जैन प्रतिमाओं में से एक है। इसी के नजदीक सातवीं सदी में बनाई गई प्रतिमाएं भी दृष्टिगोचर होती हैं। 

थोड़ा आगे बढ़ने पर किले का एक द्वार आया जहाँ किले की एक दीवार पर महात्मा बुद्ध की प्रतिमा भी उकेरी हुई दिखाई देती है  जिससे प्रतीत होता है कि ग्वालियर किला  बौद्ध धर्म से भी सम्बंधित रहा है। 

























भगवान आदिनाथ की प्रतिमा 




किले का एक दरवाजा और बौद्ध प्रतिमा 


अंततः नीटू भाई ने किले में भी एक ई रिक्शा किया 


  • अस्सी खम्भों की बावड़ी 
    ग्वालियर किले में अस्सी खम्भों की बावड़ी का निर्माण सन 1500 में राजा मान सिंह तोमर ने किले में जल संचयन और वितरण प्रणाली के तहत करवाया था। इस गोल बावड़ी तक पहुँचने के लिए बलुआ पत्थर के 80 सुंदर खंभों वाला एक विशाल और भव्य हॉल बना हुआ है, जिसके कारण इसे 'अस्सी खंबा बावड़ी' कहा जाता है।

 यह लगभग 9 मंजिला गहरी बावड़ी है, जिसके हर तल पर पानी तक आसानी से पहुँचने के लिए गोल रास्ते और कक्ष बने हैं।





  • मान मंदिर पैलेस - ग्वालियर दुर्ग 
ग्वालियर किले का सबसे मुख्य आकर्षण मान मंदिर महल है। इसका निर्माण तोमर वंश के महान शासक राजा मान सिंह तोमर ने सन 1486 से 1516 ईस्वी के मध्य करवाया था। इसकी बाहरी दीवारों पर नीले, पीले, हरे और सफेद रंग की सुंदर रंगीन टाइल्स और ज्यामितीय डिज़ाइन बने होने के कारण इसे रंगीन मंदिर अथवा चित्र मंदिर भी कहा जाता है। 

यह चार मंजिला भव्य महल पूर्व-मुगलकालीन राजपूत वास्तुकला का एक बेहतरीन और सुरक्षित नमूना है, जिसमें खुले प्रांगण, सुंदर नक्काशीदार खंभे और पत्थर के पर्दे शामिल हैं। इस महल के नीचे बने तहखानों का उपयोग बाद में मुग़ल काल में राजनीतिक कैदियों को कैद रखने और उन्हें यातनाएँ देने के लिए भी किया गया था। औरंगजेब ने इसी स्थान पर अपने भाई मुराद को कैद करके रखा था। 

कुछ लोग इसे फाँसीघर भी कहते हैं, माना जाता है कि यहाँ किले के बंदियों को फांसी पर लटकाया जाता था। इसके आलावा यहाँ जौहर के स्थल भी दिखाई देते हैं जहाँ राजपूत स्त्रियाँ, संकट के समय में  अपनी आबरू बचाने के लिए अग्निकुंड में जौहर कर लेती थीं। 

मैं और नीटू यहाँ काफी देर तक घूमते रहे। हमारे पास सीमित समय था क्योंकि अब शाम हो चली थी और अभी हमने किले का अधिकांश भाग नहीं देखा था इसलिए हम अब महलों को छोड़ वापस किले के अन्य स्थापत्यों को देखने के लिए निकल पड़े। 






महल के खम्भों पर बेहद शानदार नक्काशियां 









फाँसी घर अथवा काल कोठरी 




  • पुरातत्व संग्रहालय - ग्वालियर दुर्ग 
मान मंदिर महल के नजदीक ही पुरातत्व विभाग का एक संग्रहालय है जो गुजरी महल संग्रहालय से अलग है। यहाँ ग्वालियर के आसपास के स्थलों से प्राप्त हुई पुरा सामग्री देखी जा सकती है। 















  • सास बहू का मंदिर 
ग्वालियर का किला और मान मंदिर महल देखने के बाद हम किले में ही स्थित सास बहु के मंदिर पहुंचे। यहाँ दो प्राचीन मंदिरों का समूह है जिसे सास और बहू के मंदिर के नाम से जाना जाता है। यहाँ एक छोटा मंदिर है जिसे बहू का मंदिर कहा जाता है और एक विशाल भव्य मंदिर है जिसे सास का मंदिर कहते हैं। शाब्दिक अर्थ के तौर पर देखा जाए तो यह सहस्त्रबाहु मंदिर का अपभ्रंश लगता है। 

इन मंदिरों का निर्माण कच्छपपात वंश के राजा रतनपाल द्वारा प्रारम्भ किया गया जो सन 1093 ईस्वी में राजा महिपाल के शासनकाल में पूर्ण हुआ। 

इन दोनों जुड़वाँ मंदिरों के बारे में जब मैंने विस्तृत जानकारी की तो मुझे पता चला कि इस मंदिर का प्राचीन नाम सहस्त्रबाहु मंदिर है जो हजार भुजाओं वाले भगवान विष्णु को समर्पित था। वर्तमान में मंदिर के गर्भगृह  कोई प्रतिमा स्थापित नहीं है, इसी तरह इसके नजदीक छोटा मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। 

प्रचलित कहानियों में  एक अन्य मान्यता के अनुसार राजा ने बड़ा मंदिर अपनी पत्नी के लिए और छोटा मंदिर अपनी बहू के लिए बनवाया था, क्योंकि दोनों अलग-अलग देवी-देवताओं की भक्त थीं। यह मंदिर अपनी अद्भुत नक्काशी, सुंदर खंभों और पिरामिड के आकार की भव्य संरचना के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है।


सास बहू के मदिर की प्रस्तर पट्टिका 

सहस्त्रबाहू अथवा सास का मंदिर 

भगवान विष्णु को समर्पित सास का मंदिर 





भगवान शिव को समर्पित बहु का मंदिर 




सास बहु के मंदिर 








  • 1093 ईस्वी का शिलालेख स्तंभ
सास बहू के मंदिर में प्रवेश द्वार के समीप एक पत्थर का बड़ा खम्भा दिखाई देता है। यह खम्भा ही इस मंदिर की जानकारी का प्राचीन ऐतिहासिक स्त्रोत है जिसपर लिखे शिलालेख के अनुसार इस मंदिर का इतिहास ज्ञात होता है। 

1093 ईस्वी का शिलालेख स्तंभ


सर्दी ज्यादा थी इसलिए भाई के साथ एक कॉफी ली 

  • तेली का मंदिर 
अब हम पहुंचे थे, ग्वालियर किले के उस विशाल मंदिर की तरफ जो ग्वालियर किला का सबसे मुख्य आकर्षण है। यह तेली का मंदिर कहलाता है। यह मंदिर ग्वालियर किले परिसर की सबसे ऊंची (लगभग 30 मीटर/100 फीट) और वास्तुकला की दृष्टि से सबसे अनूठी संरचना है। 

इस भव्य व विशाल मंदिर का निर्माण 9वीं शताब्दी ईस्वी में गुर्जर-प्रतिहारवंश के राजा मिहिर भोज के शासनकाल में हुआ था। लोकमान्यता के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण तेल के व्यापारियों द्वारा दान किए गए धन से हुआ था, जिसके कारण इसका नाम 'तेली का मंदिर' पड़ा।

 इस मंदिर में  उत्तर और दक्षिण भारतीय शैलियों का एक दुर्लभ मिश्रण देखने को मिलता है। मंदिर की छत का निर्माण द्रविड़ शैली में किया गया है, जबकि इसकी दीवारों पर की गई बारीक नक्काशी और मूर्तियां उत्तर भारत की नागर शैली में निर्मित हैं। 

यह मंदिर मूल रूप से भगवान विष्णु के गरुड़ रूप को समर्पित एक विष्णु मंदिर था, जिसके मुख्य द्वार पर गरुड़ की प्रतिमा और दोनों तरफ गंगा-यमुना की आकृतियां उकेरी गई हैं। हालांकि, विदेशी आक्रमणों के दौरान इसके गर्भगृह को काफी क्षति पहुंचाई गई थी। 

तेली का मंदिर के परिसर में ही प्राचीन जैन प्रतिमाएं भी देखने को मिलती हैं जो अपनी कायोत्सर्ग (खड़ी हुई) मुद्रा में है। मैं और नीटू यहाँ काफी देर तक घूमते रहे और फिर यहाँ से आगे बढ़ चले। 

























  • श्री सूरज कुंड सरोवर 
तेली का मंदिर देखने के बाद अब हम उस स्थान पर पहुंचे जहाँ से इस सम्पूर्ण ग्वालियर किले और ग्वालियर नगर की आधार शिला रखी गई थी। यह स्थान सूरज कुंड सरोवर कहलाता है जो किले के मध्यस्थ भाग में स्थित है और यह किले के अंदर ऊँची पहाड़ी पर स्थित एक प्राकृतिक जल का स्त्रोत है।  यह केवल एक जल स्रोत नहीं है, बल्कि इसी सरोवर से ग्वालियर का नामकरण और इसके पहले राजवंश की कहानी जुड़ी हुई है।

लोक मान्यताओं और प्राचीन किंवदंतियों के अनुसार, तीसरी से छठी शताब्दी ईस्वी के मध्य, एकबार कछवाहा राजपूत राजा सूरज सेन गोपाचल पहाड़ी के जंगलों में शिकार खेलते हुए रास्ता भटक गए और प्यास से व्याकुल हो गए, इसी पहाड़ी पर उन्हें ऋषि ग्वालिपा ( जिन्हें गालव ऋषि  के नाम से भी जाना जाता है ) मिले। ऋषि ने राजा को पहाड़ी पर ही स्थित एक छोटे से प्राकृतिक जल स्रोत अर्थात कुंड का पानी पीने के लिए दिया।

राजा सूरज सेन उस समय कुष्ठ रोग (Leprosy) से पीड़ित थे। जैसे ही उन्होंने इस पवित्र कुंड का जल पिया, उनका रोग, चमत्कारी रूप से पूरी तरह ठीक हो गया। इस चमत्कार से अभिभूत होकर राजा सूरज सेन ने ऋषि ग्वालिपा के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त की। ऋषि के आदेश पर राजा ने उस जल स्रोत को एक बड़े सुंदर सरोवर (कुंड) का रूप दिया, जिसे राजा के नाम पर सूरज कुंड कहा गया।

गालव ऋषि के परामर्शानुसार,  राजा सूरजसेन ने इस पहाड़ी पर एक अभेद्य दुर्ग का निर्माण करवाया और साथ ही एक नए नगर को बसाया। गालव ऋषि के सम्मान में ही उन्होंने इस स्थान का नाम ग्वालिपुर रखा जो अब वर्तमान  में ग्वालियर कहलाता है। इससे सिद्ध होता है कि ग्वालियर किले में सबसे पहला स्थल यह सूरज कुंड ही है और यही वो एकमात्र केंद्र बिंदु है जहाँ से ग्वालियर की स्थापना हुई अर्थात ग्वालियर का जन्मस्थल।  

ऋषि ग्वालिपा ने राजा सूरज सेन को 'पाल' (रक्षक) की उपाधि दी थी और वरदान दिया था कि जब तक उनके वंशज अपने नाम के आगे 'पाल' लगाते रहेंगे, यह किला उनके अधिकार में रहेगा। हालांकि, उनके 84वें वंशज तेज करण ने इस परंपरा को तोड़ दिया और अपना उपनाम बदल लिया, जिसके बाद उन्होंने यह साम्राज्य खो दिया।

सूरज कुंड के पास ही छठी शताब्दी का एक ऐतिहासिक शिलालेख मिला है जो हूण शासक मिहिरकुल से सम्बंधित है मिहिरकुल का ग्वालियर शिलालेख कहलाता है। इस प्राचीन ऐतिहासिक शिलालेख की खोज सन 1861 में अलेक्जेंडर कनिंघम ने की थी वर्तमान  में इसे सुरक्षा की दृष्टि से कोलकाता के संग्रहालय में रखवाया गया है। 

इस शिलालेख के अनुसार जानकारी मिलती है कि मिहिरकुल के शासनकाल के 15वें वर्ष (लगभग 525 ईस्वी) में उनके एक उच्च अधिकारी मातृचेत ने ग्वालियर किले की गोपाद्रि (गोप) पहाड़ी पर लाल बलुआ पत्थर से एक भव्य सूर्य मंदिर का निर्माण करवाया था। हालाँकि, यह मूल मंदिर समय के साथ नष्ट हो गया और अब वहां मौजूद नहीं है, लेकिन इतिहासकार मानते हैं कि यह वर्तमान 'सूरज कुंड' के पास स्थित था।

इसी मंदिर के निर्माण के समय लाल बलुआ पत्थर पर संस्कृत भाषा में "मिहिरकुल का ग्वालियर शिलालेख"  उत्कीर्ण करवाया गया था।
 
सूरज कुंड के बीच में एक शिव मंदिर है जिसे सूरजकुंड महादेव कहते हैं। स्थानीय लोगों और पर्यटकों में आज भी यह मान्यता है कि इस कुंड के पानी में औषधीय गुण हैं, जिससे त्वचा संबंधी बीमारियां दूर होती हैं।

इस शिव मंदिर तक जाने का रास्ता अभी बंद था, और सूरज कुंड सरोवर में जल के ऊपर अभी हरी काई भी जमी हुई थी। मैंने दूर से ही इस ऐतिहासिक कुंड और भगवान शिव को प्रणाम किया और यहीं स्थित एक देवी माता के मंदिर पहुंचा। 









 
  • हरसिद्धि माँ भगवती माता का मंदिर और प्राचीन सूर्य मंदिर के अवशेष 
सूरजकुंड के समीप ही हरसिद्धि माँ भगवती का मंदिर है जो कि वर्तमान में पूजनीय है। मैं इस मंदिर के दर्शन करने गया और माता को प्रणाम करने के बाद मैंने मंदिर को गौर से देखा। यह मंदिर सामने से आधुनिक युग के मंदिर जैसा प्रतीत होता है किन्तु जब मैं इस मंदिर के पीछे पहुंचा तब मैंने यहाँ अत्यंत ही प्राचीन मंदिर की संरचना मुझे दिखाई दी। यह किसी प्राचीन मंदिर का अधूरा भाग प्रतीत हो रहा था जिसे पूर्व में खंडित कर दिया गया होगा। 

इस विषय में जब मैंने गहन अध्ययन किया तो पाया कि यह उसी प्राचीन सूर्य मंदिर के अवशेष हैं जिसका निर्माण छठवीं शताब्दी में हूण शासक मिहिरकुल के शासनकाल में  हुआ था और इससे सम्बंधित मिहिरकुल का शिलालेख भी यहाँ से प्राप्त हुआ है जिसमें इस सूर्य मंदिर के निर्माण का उल्लेख है। यह सूर्यमंदिर, सूरजकुंड के समीप ही स्थित था और यह मंदिर भी सूरजकुंड के ठीक किनारे स्थित है। 

बारहवीं सदी में मुस्लिम आक्रांताओं ने इस मंदिर को नष्ट कर दिया और इसके नजदीक स्थित प्राचीन शिव मंदिर को भी काफी क्षति पहुंचाई। 

चूँकि प्राचीन लोककथाओं और जनश्रुतियों के अनुसार किले के संस्थापक राजा सूरज सेन हैं जिनकी तिथि तीसरी से छटवीं सदी के मध्य  मानी जाती है, वहीँ पाँचवीं - छटवीं सदी के मध्य मिहिरकुल का शिलालेख पूर्ण रूप से एक ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्य है। 

वर्तमान में यहाँ जो माता भगवती का मंदिर है उस  वह बहुत प्राचीन समय से एक शक्ति स्थल के रूप में पूजनीय रहा है। मान्यता है कि राजा विक्रमादित्य और तोमर राजाओं के काल में उज्जैन की माँ हरसिद्धि के प्रति अगाध श्रद्धा होने के कारण, किले के रक्षकों और राजाओं ने कुलदेवी व रक्षक देवी के रूप में यहाँ माता हरसिद्धि की स्थापना की थी।









  • गुरुद्वारा दाता बन्दी छोड़ 
अब शाम काफी हो चली थी और मेरी ट्रेन का समय नजदीक आता ही जा रहा था, किन्तु जब तक सूर्य का प्रकाश था तब तक हम इस किले में घूम सकते हैं। दिन अभी ढला नहीं था इसलिए मैं और नीटू ग्वालियर किले में स्थित गुरद्वारे पहुंचे जो दाता बंदी छोड़ के नाम से जाना जाता है। यह गुरुद्वारा भी बहुत ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण स्थान है, यहाँ सिखों के छटवें गुरु, गुरु हरगोविंद सिंह जी को उनके बढ़ते सैन्य प्रभाव और शक्ति से भयभीत होकर मुग़ल बादशाह जहांगीर ने उन्हें धोखे से कैद करके नजरबन्द रखा था। इसकी कहानी कुछ इस प्रकार है - 

सिखों के पाँचवें गुरु, गुरु अर्जुन देव जी की शहादत के बाद, उनके पुत्र गुरु हरगोबिंद साहिब जी ने सिखों का नेतृत्व संभाला। उन्होंने सिखों को आत्मरक्षा के लिए शस्त्र धारण करने की प्रेरणा दी। 
मुगल सम्राट जहाँगीर को जब गुरु जी की बढ़ती हुई सैन्य शक्ति और प्रभाव का पता चला, तो वह असुरक्षित महसूस करने लगा और भयभीत हो गया इसलिए उसने चतुराई से कर के कुछ झूठे विवादों का बहाना बनाकर 1609 ईस्वी के आसपास गुरु हरगोबिंद जी को ग्वालियर के किले में नजरबंद (कैद) कर दिया। उस समय ग्वालियर का किला राजनीतिक कैदियों के लिए एक सख्त जेल हुआ करता था।
गुरु हरगोबिंद जी ने किले में लगभग 2 वर्ष बिताए। जेल में रहते हुए भी उनकी आध्यात्मिक आभा और विनम्रता से वहाँ के सुरक्षाकर्मी और अन्य कैदी बेहद प्रभावित हुए। ग्वालियर किले में पहले से ही 52 हिंदू राजा कैद थे, जो बेहद दयनीय स्थिति में रह रहे थे। गुरु जी ने उनके जीवन में आशा की नई किरण जगाई।

कुछ समय बाद जहाँगीर गंभीर रूप से बीमार पड़ गया। उस समय के प्रसिद्ध सूफी संत सांई मियां मीर (जो गुरु घर के बहुत बड़े आदरणीय मित्र थे) ने जहाँगीर को समझाया कि उसकी बीमारी का कारण एक सच्चे संत (गुरु हरगोबिंद जी) को कैद करना है। जहाँगीर को अपनी गलती का अहसास हुआ और उसने तुरंत गुरु जी को रिहा करने का आदेश दे दिया।
जब गुरु हरगोबिंद जी को उनकी रिहाई की बात पता चली, तो उन्होंने अकेले जाने से मना कर दिया। उन्होंने जहाँगीर के सामने शर्त रखी कि "मैं तभी जाऊंगा जब मेरे साथ कैद में बंद सभी 52 हिंदू राजाओं को भी रिहा किया जाएगा।"
जहाँगीर असमंजस में पड़ गया, क्योंकि वह सभी राजाओं को छोड़ना नहीं चाहता था। इसलिए उसने एक चतुराई भरी शर्त रखी, "गुरु जी के अंगरखे (चोगे/पोशाक) के कलियों या छोर को जितने राजा पकड़ सकेंगे, केवल उतने ही राजा रिहा किए जाएंगे।" जहाँगीर को लगा कि एक कपड़े को ज्यादा से ज्यादा 4-5 लोग ही पकड़ पाएंगे।
गुरु हरगोबिंद जी जहाँगीर की चाल समझ गए। उन्होंने एक विशेष चोगा सिलवाया जिसमें 52 लंबी कलियाँ (लटकते हुए धागे या छोर) थीं।
रिहाई के दिन, सभी 52 राजाओं ने उस चोगे की एक-एक कली को अपने हाथों में थाम लिया। इस तरह, गुरु जी के पीछे-पीछे वे सभी 52 राजा भी मुगल कैद से सुरक्षित बाहर आ गए।
बंदी गृह (जेल) से कैदियों (बंदी) को छुड़ाने (छोड़) वाले 'दाता' (दाता) होने के कारण, ग्वालियर के लोगों और सिख संगत ने गुरु हरगोबिंद जी को "दाता बंदी छोड़" की उपाधि दी।
जिस दिन गुरु जी इन सभी राजाओं को मुक्त कराकर अमृतसर के हरिमंदिर साहिब (गोल्डन टेम्पल) पहुँचे, उस दिन पूरे अमृतसर को दीयों से रोशन किया गया था। सिखों द्वारा आज भी इस ऐतिहासिक दिन को "बंदी छोड़ दिवस" के रूप में दिवाली के साथ बेहद धूमधाम से मनाया जाता है।





ऐतिहासिक गुरुद्वारा दाता बंदी छोड़ 


गुरूद्वारे के प्रांगण से दिखाई देता तेली के मंदिर का शिखर 


  • हाथी पोल दरवाजा 
गुरूद्वारे से लौटते ही शाम हो गई और अब हम किले से बाहर आने के लिए रवाना हो लिए। हम आये तो थे उरवाई गेट से होकर किन्तु अब मैं पूर्वी गेट की तरफ से जाना चाहता था जो पैदल का एकमात्र रास्ता था। मान मंदिर के पास पहुंचकर हमने किले से नीचे उतरना शुरू किया। सर्वप्रथम हमने हाथीपोल दरवाजे को पार किया। यह बहुत ही शानदार है। 

15 वीं शताब्दी में इसका निर्माण महाराजा मान सिंह तोमर ने करवाया था और यह उनके महल के  निकट ही स्थित है। एक तरह से यह महाराजा मान सिंह के महल का मुख्य द्वार है। इस दरवाजे के दोनों तरफ हाथियों की विशालकाय प्रतिमा स्थापित थीं जिसकारण इस द्वार का नाम हाथीपोल रखा गया था। वर्तमान में यह दिखाई नहीं देती हैं जिसका कारण इनका नष्ट होना हो सकता है। 




हाथीपोल दरवाजा 






हाथीपोल से ग्वालियर शहर का विहंगम दृश्य 





  • लक्ष्मण दरवाजा - ग्वालियर दुर्ग 
ग्वालियर किले के पूर्वी मार्ग का यह एक बहुत ही ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण द्वार है। प्राचीन काल में यह दरवाजा किले की अभेद्य सुरक्षा का हिस्सा था। इसकी मजबूत दीवारें और ऊँचाई दुश्मनों की सेना, विशेषकर हाथियों को रोकने के लिए डिज़ाइन की गई थी। गेट के पास आज भी भारी लोहे की जंजीरें और सुरक्षा तंत्र के प्राचीन अवशेष देखे जा सकते हैं।

दरवाजे की पत्थरों पर भगवान गणेश, माँ दुर्गा और अन्य देवी-देवताओं की सुंदर आकृतियाँ उकेरी गई हैं। यद्यपि मध्यकाल में हुए आक्रमणों के दौरान इन प्राचीन मूर्तियों को आंशिक रूप से क्षति पहुँचाई गई, फिर भी इनकी बारीक शिल्पकारी आज भी पर्यटकों को आकर्षित करती है।

एक कहावत के अनुसार इस द्वार का निर्माण कछवाहा राजा लक्ष्मण पाल द्वारा करवाया गया था। 



लक्ष्मण दरवाजा 



  • चतुर्भुज मंदिर 
लक्ष्मण गेट के समीप है भगवान विष्णु को समर्पित प्राचीन चतुर्भुज मंदिर है जिसका निर्माण आठवीं - नौवीं शताब्दी के मध्य गुर्जर - प्रतिहार वंश के महान शासक मिहिरभोज ने करवाया था। इस मंदिर की दीवार पर लगे 9वीं शताब्दी के प्रतिहार कालीन शिलालेख में 'शून्य' (0) को एक लिखित संख्या के रूप में दर्शाया गया है। पूरी दुनिया में शून्य के सबसे पुराने प्रामाणिक लिखित साक्ष्यों में ग्वालियर का यह स्थान सबसे प्रमुख माना जाता है।



चतुर्भुज मंदिर 

भगवान विष्णु की चतुर्भुज रूप की प्रतिमा 

मंदिर में एक अभिलेख 

चतुर्भुज मंदिर 

चतुर्भुज मंदिर 


चतुर्भुज मंदिर 



  • गणेश दरवाजा - ग्वालियर दुर्ग 
 इस दरवाजे की बनाबट काफी सादा किस्म की है किन्तु यह किले तक जाने वाले मार्ग का महत्वपूर्ण द्वार है। इसका निर्माण पंद्रहवीं शताब्दी में तोमर राजवंश के प्रसिद्ध राजा डूंगर सिंह तोमर ने करवाया था। 




  • हिंडोला दरवाजा अथवा बादल दरवाजा - ग्वालियर दुर्ग 
लक्ष्मण दरवाजे और आलमगीर दरवाजे के बीच स्थित हिंडोला दरवाजा किले का दूसरा सबसे भव्य और कलात्मक फाटक है, जो सीधे नीचे तलहटी में बने गूजरी महल के पास स्थित है।

इसका निर्माण 15वीं शताब्दी में तोमर राजवंश के शासनकाल के दौरान हुआ था। बाद में 1648 ईस्वी में इसी शैली में इसका जीर्णोद्धार भी किया गया।

 इस दरवाजे को 'बादल गढ़ दरवाजा' भी कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि इसका नाम राजा मानसिंह तोमर के चाचा बादल सिंह तोमर के नाम पर रखा गया था। 

 पुराने समय में इस मुख्य ऊंचे दरवाजे के ठीक बाहर एक विशाल हिंडोला (लोहे या लकड़ी का बड़ा झूला) लगा हुआ था, जिसका उपयोग उत्सवों या विशेष अवसरों पर होता था। इसी वजह से इसे 'हिंडोला पोर' या 'हिंडोला गेट' कहा जाने लगा।



बादलगढ़ गेट अथवा हिंडोला दरवाजा 



  • आलमगीर दरवाजा - ग्वालियर दुर्ग 
यह दरवाजा ग्वालियर किले का सबसे पहला प्रवेश द्वार है। जब आप नीचे शहर (ग्वालियर गेट) की तरफ से किले पर चढ़ना शुरू करते हैं, तो सबसे पहले इसी दरवाजे से आपका सामना होता है इस दरवाजे का निर्माण 1660 ईस्वी (कुछ स्रोतों के अनुसार 1680 ईस्वी) में मुगल सम्राट औरंगजेब के समय हुआ था। 

 इसका निर्माण औरंगजेब के ग्वालियर गवर्नर मोतमिद खान ने करवाया था,  मोतमिद खान ने इस दरवाजे का नाम औरंगजेब की मानद उपाधि 'आलमगीर' के सम्मान में 'आलमगीर दरवाजा' रखा था। इसे स्थानीय लोग 'किला गेट'  या 'ग्वालियर गेट' भी कहते हैं। 

 यह दरवाजा पूरी तरह से मुगल और इस्लामिक स्थापत्य कला का बेहतरीन उदाहरण है, जिसके ऊपरी हिस्से पर खूबसूरत छतरियां बनी हुई हैं।



रात के समय ग्वालियर किले का  दृश्य 

आलमगीर दरवाजा 

आलमगीर दरवाजा 


  • ग्वालियर की एक शाम और गृह प्रस्थान 
किले से नीचे आने के बाद हम ग्वालियर शहर के एक बाजार पहुंचे, जहाँ रचना भाभी पहले से ही अपने बच्चों सहित हमारी प्रतीक्षा करते हुए मिलीं। इसके बाद हमने यहाँ स्ट्रीट फ़ूड मार्किट में जाकर सोयाबीन चाप, पनीर टिक्का और रुमाली रोटी खाई। यह बेहद ही स्वादिष्ट था इसके अलावा और भी खाने पीने के व्यंजन हमने यहाँ देखे। अंत में सारे खर्चे का भुगतान भाभी जी ने किया। 

आज अपने भाई और भाभी व उनके बच्चों के साथ घूमकरऔर थोड़ा सा  समय बिताकर बहुत अच्छा लगा, ग्वालियर की यह शाम, मेरे लिए बहुत ही यादगार रहने वाली थी। ट्रेन का टाइम हो चला था, भैया - भाभी अपने बच्चों  सहित मुझे रेलवे स्टेशन तक विदा करने के लिए आये और ट्रैन आने के बाद मैं उनसे विदा लेकर वापस घर की और रवाना हो चला। 

हालाँकि सीमित समयावधि में, मैं किले का जितना भाग देख सकता था वो मैंने देखा। फिर कुछ ऐसे स्थान शेष रह गए जिनके पूर्ण अध्ययन के लिए मुझे पुनः यहाँ आना होगा। 








धन्यवाद 

🙏