Saturday, September 19, 2026

JAMMU 2023 : ANU MARRIDGE

अन्नू की शादी में 

जम्मू में अन्नू की शादी का दिन 



21 OCT 2023, 

अम्बारां का बौद्ध विहार देखने के बाद अब मैं और साहिल वापस जम्मू की तरफ रवाना हो चले। चिनाब नदी पार करने के बाद हम अखनूर - जम्मू मुख्य मार्ग पर आ गए। साहिल की ऑफिस का समय भी हो चला था इसलिए वह शीघ्र अतिशीघ्र जम्मू पहुंचना चाहता था, इधर मेरे पास कुमार का भी फोन आ गया था, उसके अनुसार आज हमें अनू की लगुन - सगाई लेकर उसकी ससुराल जाना था, इसी की तैयारी के लिए कुमार जम्मू गया हुआ था और वापस लौटने वाला था। 

जल्दी ही साहिल ने मुझे NN रिसोर्ट जाने वाले मार्ग पर उतार दिया। मैंने साहिल का अपनी इस यात्रा में पूर्ण सहयोग करने के लिए उसका हार्दिक धन्यवाद किया और उसे आज शाम शादी में आमंत्रित होने का न्योता दिया। साहिल शाम को शादी में नहीं आ सकता था क्योंकि आज उसके गाँव में उसके ही एक में परिवार शादी का कार्यक्रम था जिसकी तैयारियां मैंने भी सुबह उसके गाँव में देखी थी। 

बाजार से शॉपिंग करने के बाद हम वापस रिसोर्ट पहुंचे और इसके बाद लड़के वालों की तरफ से आई एक गाडी के जरिये हम सभी लोग लड़के वालों के घर की तरफ रवाना हुए। आज अनु और उसकी बड़ी बहिन प्रिया भी कार के जरिये रिसोर्ट पहुँच चुके थे। अब रिसोर्ट पर अनु और प्रिया ही थे। हम लोग लड़की पक्ष की तरफ से रिसोर्ट से कुछ किमी दूर लड़के वालों के घर की तरफ आ चुके थे। 

JAMMU 2023 : AMBARAN - A BUDDHIST SITE IN JAMMU


जम्मू और कश्मीर एक प्राचीन बौद्ध स्थल - अम्बारां 



21 OCT 2023,

अखनूर किले से निकलने के बाद हम कुछ ही दूरी पर स्थित एक प्राचीन बौद्ध स्थल पर पहुंचे। यह चिनाब नदी के ठीक किनारे पर स्थित है। यहाँ प्राचीन बौद्ध स्तूप होने के प्रमुख प्रमाण मिले है और पुरातत्व विभाग द्वारा यहाँ उत्खनन कराये जाने के बाद इसके प्राचीन बौद्ध स्थल होने की पुष्टि हुई है। जम्मू कश्मीर राज्य का सबसे पहला  बौद्ध स्थल होने की पुष्टि। 

अखनूर के नजदीक ही अम्बारां नामक स्थान है जहाँ चिनाब नदी के दाहिने तट पर एक प्राचीन स्थल होने के प्रमाण मिले। वर्ष 1973 - 74 के बीच भारतीय पुरातत्व विभाग के श्रीनगर मंडल द्वारा यहाँ प्रथम बार सीमित उत्खनन कराया गया परन्तु वर्ष 1999 - 2001 एवं 2008 - 09 में इसके पुनः उत्खनन के पश्चात यहाँ एक प्राचीन बौद्ध स्तूप होने के प्रमाण मिले। विस्तृत उत्खनन के पश्चात यह पूर्ण रूप से एक प्राचीन बौद्ध विहार के रूप में विश्व के समक्ष उजागर हुआ। यहाँ हुए उत्खनन के पश्चात इसके सांस्कृतिक महत्त्व के चार अलग अलग काल खंडों का पता चला है। 

प्रथम काल खंड, दूसरी - पहली शताब्दी ईसा पूर्व का है जिसके फलस्वरूप यहाँ उत्खनन से प्राप्त हुए इस काल के धूसर मृदभांडों के टुकड़े प्राप्त हुए जिसने अंदाजा लगाया जा सकता है कि यहाँ पहली और दूसरी शताब्दी में कोई प्राचीन बस्ती रही होगी। 

द्वितीय काल खंड एक महत्वपूर्ण काल खंड है क्योंकि यह कुषाण कालीन है क्योंकि पहली से तीसरी सदी ईस्वी के मध्य यहाँ बौद्ध स्तूप और विहार का निर्माण हुआ और साथ ही यहाँ से कुषाणकालीन सम्राट कनिष्क और हुविष्क के ताँवे के सिक्के भी प्राप्त हुए हैं। 

इस काल के सही अवशेषों में सबसे प्रमुख है एक स्तूप का अधिष्ठान जो 6 X 6 मीटर वर्गाकार है और इसमें सादी अलंकृत ईंटों का प्रयोग किया गया गया है। इसके मध्य भाग में नदी के छोटे छोटे पत्थर, मिटटी के साथ गारे में लगाए गए हैं जिनेक ऊपर स्तूप का अण्ड एवं हर्मिका आदि रहे होंगे, जिनके ध्वंशावशेष उत्खनन से प्राप्त हुए हैं। 
इसके अलावा यहाँ अन्य छोटे छोटे स्तूप भी मिले हैं जिनका निर्माण कुषाणकाल या उत्तर कुषाणकाल के दौरान किया गया होगा। 

तृतीय कालखंड, गुप्त काल का माना जाता है जिसकी संभावित तिथि चौथी और पांचवीं सदी ईस्वी हो सकती है, इस काल में इस बौद्ध विहार की दीवारों को और अधिक मजबूत और सुदृढ़ किया गया था, इसके साथ ही इन दीवारों सुन्दर मृण्मूर्तियों को भी अलंकृत किया गया था जिनके अवशेष इस स्थान से प्राप्त हुए हैं और जिनका निर्माण गुप्तकाल के दौरान हुआ था। 

चतुर्थ काल खंड लगभग छटवीं और सातवीं ईस्वी के मध्य का है जिसे गुप्तोत्तर काल भी कहा जाता है। इस काल में बौद्ध विहार की दीवारों का जीर्णोद्धार करवाया गया और इसे सुरक्षित रखने की पूर्ण कोशिश की गई। गुप्तोत्तर काल के पश्चात भारत भूमि से बौद्ध धर्म का पतन होना शुरू हो गया जिसके फलस्वरूप इस बौद्ध विहार को कोई संरक्षण प्राप्त नहीं हो सका और यह नदी में आई बाढ़ के कारण अधिकांश रूप से नष्ट हो गया। 

यहाँ लगे पुरातत्व बोर्ड के अनुसार जानकारी मिलती है कि इस स्तूप के उत्खनन से एक ताम्र मंजूषा प्राप्त हुई जिसके अंदर रजत मंजूषा और उसके अंदर भगवान बुद्ध के पवित्र अस्थि अवशेष सहित स्वर्ण मंजूषा प्राप्त हुई जिसके अंदर कुछ स्वर्ण एवं रजत पत्र, मोती, मनके और ताम्र मुद्राएं आदि प्राप्त हुईं। 

प्रसिद्ध बौद्ध गुरु दलाई लामा ने 16 नवंबर 2011 को इस ऐतिहासिक और प्राचीन बौद्ध स्थल का दौरा किया था। अपनी यात्रा के दौरान दलाई लामा ने इस प्राचीन मठ परिसर  को देखकर कहा था कि अंबारन में मिलने वाले अवशेष इतने महत्वपूर्ण हैं कि इनके अध्ययन से बौद्ध इतिहास के कुछ पहलुओं को फिर से लिखने की आवश्यकता पड़ सकती है। उनकी इस ऐतिहासिक यात्रा के बाद ही यह स्थान वैश्विक स्तर पर चर्चा में आया और इसे अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध मानचित्र पर एक विशेष पहचान मिली।


काफी देर मैंने इस परिसर को निहारा और प्राचीन कला विधियों को देखा। इस बौद्ध विहार के परिसर में एक छोटा सा संग्रहालय भी है जिसमें इसके उत्खनन से संबंधित अनेकों जानकारियां और चित्र देखने को मिलते हैं, यहाँ से जो कुछ भी प्राप्त हुआ वह देश के अलग अलग संग्रहालयों में सुरक्षित रखवा दिए गए हैं। 

हमारे अनुरोध पर यहाँ कार्यरत गार्ड ने हमारे लिए म्यूजियम का गेट खोल दिया और हमने इस संग्रहालय में यहाँ उत्खनन से प्राप्त हुई सामग्री और इस स्थान के विभिन्न समयों पर हुई खुदाई के बारे में विस्तृत जानकारी ली। इसके पश्चात हम यहाँ से वापस जम्मू की ओर रवाना हो गए।   


इसी पुल के नीचे अम्बारां का प्राचीन बौद्ध विहार है। 

प्राचीन बौद्ध विहार का प्रवेश द्वार 

अपनी बाइक खड़ी करता साहिल 


पुरास्थल अम्बारां का ऐतिहासिक पटल 

इंग्लिश में भी उपलब्ध है। 



प्राचीन बौद्ध स्तूप का अवशेष 

अन्य लघु स्तूपों के अवशेष 

प्राचीन बौद्ध स्तूप के अवशेष जहाँ से स्वर्ण मंजूषा प्राप्त हुई। 













अन्य लघु स्तूप 




संग्रहालय में रखी  प्राचीन बौद्ध स्तूप की प्रति 



 2011 में अम्बारां बौद्ध विहार की यात्रा करते प्रसिद्ध बौद्ध गुरु दलाई लामा 

इस चित्र स्वर्ण मंजूषा की प्राप्ति का वर्णन देता है 



इस स्थल से प्राप्त हुए मृदभांड और उनके अवशेष 

दूसरी - पहली सदी ईसापूर्व के प्राचीन अवशेष 




इस बौद्ध स्थल की विस्तृत जानकारी 



बौद्ध विहार परिसर  स्थित एक लघु संग्रहालय 



बौद्ध विहार के नजदीक बहती चिनाब नदी 

अम्बारां बौद्ध विहार से वापसी 


इस यात्रा की मुख्य और अंतिम कड़ी :- अन्नू की शादी में जम्मू की एक शाम 
 

JAMMU 2023 : AKHNOOR FORT & CHINAB RIVER


 अख़नूर का किला, चिनाब नदी और पांडव गुफा 


21 अक्टूबर 2023

     भारत के जम्मू कश्मीर राज्य में जम्मू शहर से 28 किमी दूर, चिनाब नदी के दाहिने तट पर स्थित अखनूर का किला, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण स्थल माना जाता है। यह किला एक प्राचीन स्थल पर स्थित है जिसे स्थानीय रूप से मांडा के नाम से जाना जाता है जो कि सिंधु घाटी सभ्यता का सबसे उत्तरी छोर कहलाता है। यहाँ हुई खुदाई में तीन काल की संस्कृतियों के साक्ष्य मिले हैं—हड़प्पा कालीन बर्तन, आरंभिक ऐतिहासिक वस्तुएं और कुषाण काल के अवशेष।

यह कभी हड़प्पा कालीन नगर था जो कि आस्किन नदी के किनारे स्थित था। आस्किन नदी को वर्तमान में चिनाब नदी कहते है एवं इसका एक नाम चंद्रभागा भी है। किले के अंदर हुए उत्खनन से प्राप्त अवशेषों से ही इसके प्राचीन तीन संस्कृतियों के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। 

मध्यकाल में इस किले का निर्माण 1762 ईसवीं में महाराजा तेज सिंह ने करवाया था, और उनके पश्चात उनके उत्तराधिकारी, राजा आलम सिंह ने 1802 ईस्वी में इसे पूर्ण करवाया। 17 जून 1822 को इसी किले के पास चिनाब नदी के जिया पोता घाट पर महाराजा रणजीत सिंह ने महाराजा गुलाब सिंह का राज्याभिषेक भी किया था।

'अखनूर' नाम के बारे में कहा जाता है कि मुगल सम्राट जहाँगीर की आँखों में संक्रमण हो गया था। यहाँ की ठंडी हवा और वातावरण से उनकी आँखों की रोशनी में सुधार हुआ, जिसके बाद इसे 'आँख-का-नूर' कहा गया जो बाद में अखनूर बन गया।

ऐसा भी माना जाता है कि अखनूर महाभारत काल की प्रसिद्ध विराट नगरी है। यहाँ पास में ही एक प्राचीन गुफा स्थित है जिसे पांडव गुफा के नाम से जाना जाता है, गुफा के अंदर पाँचो पांडवों सहित राजा विराट और महर्षि वेदव्यास जी की प्रतिमा दर्शनीय है। 

Thursday, September 17, 2026

JAMMU 2023 : A NIGHT IN A VILLAGE OF JAMMU


जम्मू और कश्मीर के गांव की एक रात 



20 - 21 अक्टूबर 2023 

शाम को साहिल के साथ मैं रिसोर्ट से उसके गाँव की तरफ रवाना हो चला। मेरे लिए यह पहला मौका था जब मैं जम्मू कश्मीर राज्य के किसी गाँव को देखूंगा और साथ ही एक रात वहां ठहरूंगा। जम्मू से अखनूर जाने वाला राजमार्ग बहुत ही शानदार था, सर्दियों की शुरुआत हो चुकी थी इसलिए साहिल की बाइक पर मुझे हलकी हलकी ठण्ड सी भी लग रही थी। इसी रास्ते से दूर कहीं पहाड़ों में माता वैष्णोंदेवी का धाम भी नजर आ रहा था, जो कि पहाड़ पर जलती बत्तियों की रौशनी से स्पष्ट पहचान में आ रहा था। मुझे साहिल ने ही बताया था कि यह माता वैष्णों देवी का मंदिर है और यह साहिल के गाँव और उसके घर की छत से भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। 

Monday, September 14, 2026

JAMMU 2023 : BAHU FORT & TEMPLE

अन्नू की शादी में 

जम्मू शहर की एक यात्रा 


20 अक्टूबर 2023 

अगली सुबह हम जम्मू रेलवे स्टेशन पहुँच चुके थे। काफी देर प्रतीक्षा कराने के बाद अंततः लड़के वालों की ओर से एक गाडी आई और हम सभी उसमें सवार होकर अखनूर रोड पर स्थित जम्मू के N N रिसोर्ट पहुंचे। यह रिसोर्ट मुख्य राजमार्ग से थोड़ा सा अंदर था। रिसोर्ट में ही एक बड़ा हॉल था जिसमें हमारे रुकने की व्यवस्था की गई थी। यहीं हम सभी नहा धोकर तैयार हो गए। रिसोर्ट को शादी के लिए सजाने का कार्य चल रहा था, जो कि तीन दिन बाद ही थी। 

अक्टूबर माह की सुबह सुबह की गुनगुनी धुप बहुत ही शानदार लगती है। यह मौसम सर्दियों का आगाज होता है और मौसम ठंडा होने की कगार पर होता है। आज यहाँ हमारा कोई विशेष काम नहीं था इसलिए मैं कुमार से पूछकर जम्मू शहर घूमने के  लिए निकल गया। रिसोर्ट से राजमार्ग तक मैं पैदल पहुंचा और पहुँचते ही मुझे जम्मू शहर जाने वाली मिनी बस मिल गई जो कि जम्मू की नगरीय बस कहलाती हैं। 

जल्द ही बस ने मुझे जम्मू के एक मुख्य चौक पर उतार दिया। यहाँ एक बाहु नामक प्रसिद्ध किला है जहाँ बाहु वाली माता का विशाल मंदिर है। यह मंदिर जम्मू के एक  ऊँचे स्थान पर हैं जहाँ जाने के लिए अनेकों छोटी बसें चलती है। एक ऐसी ही बस द्वारा मैं बाहु वाली माता के मंदिर पहुँचा। चूँकि अभी नवरात्री चल रही हैं इसलिए मुझे यहाँ बहुत रोल चोल देखने को मिली। बाहु माता का मंदिर किले के बीच भाग में है, यहाँ देवी माता के महाकाली के रूप में दर्शन हैं। मैं माता के दर्शन करने के लिए लाइन में लग गया। 

Friday, September 11, 2026

JAMMU 2023 : MTJ TO JAT BY KOTA EXPRESS



मथुरा से जम्मू - अन्नू की शादी में 


19 OCT 2023, 

अक्टूबर का महीना है, इस समय मौसम बदलता है और त्योहारों का समय चल रहा है। अभी नवरात्री हैं और कुछ समय बाद दीपावली का महापर्व भी आएगा। यह एक ऐसा समय होता है जब मेरा कार्य जोरों शोरों से चलता है और मुझे खाना खाने तक की भी फुर्सत नहीं मिल पाती है। इसी बीच मेरे परम मित्र कुमार भाटिया का मुझे कॉल आता है और वह मुझसे तुरंत जम्मू चलने के लिए बोलता है। दरअसल एक दो दिन बाद कुमार की छोटी बहिन अन्नू की शादी है, और इसके लिए वह अपने परिवार और रिश्तेदारों के साथ जम्मू जा रहा है। 

उसने अपने परिवार और रिश्तेदारों की सभी कन्फर्म टिकट कोटा एक्सप्रेस में बुक कर रखे हैं। आज यात्रा का दिन है और उसके साथ सिवाय उसके परिवार के जाना वाला कोई नहीं था, उसकी अधिकांश सीटें खाली जा रही हैं क्योंकि उसके अधिकतर रिश्तेदार अपनी पारवारिक जिम्मेवारियों के बीच जम्मू नहीं जा रहे हैं। चूँकि उसकी ट्रेन मथुरा से शाम को जाने वाली है इसलिए उसने मुझे फोन करके अपने साथ चलने को कहा, बिना सोचे समझे मैंने उसे हाँ बोल दिया। आखिर वो मित्र है और मैं उसकी सहायता के लिए हमेशा तत्पर रहता हूँ। 

मैंने ऑफिस में सर से इमरजेंसी में तीन दिन का अवकाश लिया जो कि सर ने स्वीकृत नहीं किया क्योंकि यह मेरी कंपनी का मुख्य सीजन का समय था किन्तु मेरे लिए मेरा कार्य प्रतिदिन का है, परन्तु अभी सिर्फ मित्रता निभाने का समय है और यही सोचकर मैं कुमार के साथ जम्मू के लिए रवाना हो चला। अपनी माँ से आज्ञा और आशीर्वाद लेकर मैं मथुरा रेलवे स्टेशन पहुंचा और कुछ ही समय बाद आगरा से कुमार भी अपने परिवार सहित मथुरा स्टेशन आ पहुंचा। मुझे देखकर वह अत्यंत ही प्रसन्न हुआ। जल्द ही कोटा एक्सप्रेस से हम जम्मू के लिए रवाना हो चले। 

Tuesday, July 14, 2026

TRIP TO KASHMIR : 2026


उत्तराखंड से कश्मीर एक रेल यात्रा 



 17 मई 2026 

सही पांच बजकर बीस मिनट पर हेमकुंट एक्सप्रेस श्रीमाता वैष्णोंदेवी कटरा के लिए योगनगरी ऋषिकेश से प्रस्थान कर गई। ट्रेन का कोच अभी लगभग खाली ही था। अगला स्टेशन वीरभद्र आया, यहाँ थोड़ी देर ट्रेन खड़ी रही और इसके बाद रायवाला जंक्शन पहुंची। रायवाला पर देहरादून से आने वाली रेलवे लाइन भी इसी में मिल जाती है इसलिए रायवाला एक जंक्शन स्टेशन है और यह राजाजी नेशनल पार्क के क्षेत्र में स्थित है। मोतीचूर के बाद अंततः हमारी ट्रेन हरिद्वार पहुंची और यहाँ हमारे पास की अन्य सीटों पर सभी सवारियां आ गईं। 

पूरी रात सफर करने और दिन में घूमने के कारण मैं काफी थक चुका था और मुझे अब नींद भी आने लगी थी। हमारी सीट पूरी तरह कन्फर्म नहीं हुई थी और यह RAC में ही रह गई थी इसलिए हमें  साइड लोअर सीट पर यात्रा करनी पड़ रही थी। हालांकि रात्रि के समय हमारी साइड अपर सीट लगभग खाली ही थी और कल्पना इसी पर सो चुकी थी। अगली सुबह जम्मू निकलने के बाद मेरी नींद खुली। हम तवी नदी को पार कर रहे थे। 

जम्मू के बाद सुरंगों और घाटियों का नजारा शुरू हो जाता है और हम इन्हीं नजारों को देखते हुए यात्रा कर रहे थे। 

Tuesday, June 23, 2026

GITA BHAWAN : RISHIKESH 2026


 अमावस्या पर गंगा स्नान और गीता भवन - ऋषिकेश 2026 



योगनगरी रेलवे स्टेशन के बाहर  हमने नवनिर्मित जानकी झूला जाने के लिए ऑटो तलाश किये, किराया लगभग 40  रूपये माँगा उसने, किन्तु थोड़ी ही देर बाद वह पलट गया और 50 रूपये प्रति सवारी के हिसाब से किराया मांगने लगा। हमने तुरंत अपना रुख इस ऑटो वाले की तरफ से मोड़ लिया और दूसरे साधन का विकल्प ढूढ़ने लगे। जल्द ही हमें बैटरीचलित रिक्शा जानकी झूला जाने के लिए मिल गया। किराया वही चालीस रूपये प्रति सवारी। 

चंद्रभागा नदी का पुल पार किया, यह एक बरसाती नदी है और अभी फिलहाल सुखी है बहुत एक छोटी सी धारा इसमें बहती हुई दिखाई दे रही थी और कुछ धाराएं इसमें नालों के रूप में भी बहती हुई दिखाई देती हैं। थोड़ी देर बाद हम श्री हेमकुंड साहिब गुरुद्वारा के सामने पहुंचे। यूँतो श्री हेमकुंड साहिब गुरुद्वारा यहाँ से काफी दूर और ऊपर पहाड़ों में बद्रीनाथ जी के निकट है, जहाँ पहुंचने के लिए बहुत ही दुर्गम मार्ग पर पैदल यात्रा करनी पड़ती है। ऋषिकेश में स्थित यह गुरुद्वारा श्री हेमकुंड साहिब ट्रस्ट का मुख्यालय है। 

Thursday, June 18, 2026

YOG NAGARI RISHIKESH RAILWAY STATION

उत्तराखंड से कश्मीर तक ग्रीष्मकालीन यात्रा : वर्ष 2026 

यात्रा क्रमांक - 1 

मथुरा से योगनगरी ऋषिकेश - एक रेल यात्रा 

15 MAY 2026

    प्राचीन काल से ही माँ गंगा के पावन तट पर बसी ऋषिकेश नगरी, साधु - संतो और ऋषि मुनियों की तपोस्थली रही है। यहाँ का  सुरम्य वातावरण मन को मोह लेता है, यहाँ आकर मन को असीम शांति प्राप्त होती है और शरीर एक नई ऊर्जा को अनुभव करने लगता है। 

शाम के समय माँ गंगा के घाट पर बैठकर गंगा आरती देखने का एक अलग ही आनंद है, मन आध्यत्मिक रूप से प्रफुल्लित हो उठता है ईश्वर का गुणगान करने लगता है। यहाँ आकर आध्यात्म की अनुभूति होना आम बात है। 

ऋषिकेश में लक्ष्मण झूला एक प्राचीन स्थल है। गंगा नदी के ऊपर बना तारों का एक झूला है जिसे हम बचपन से ही देखते और इसपर गुजरते हुए आ रहे है। लक्ष्मण झूला के आसपास अनेकों मंदिर हैं। यहीं से कुछ दूर गंगाजी के किनारे चलते हुए राम झूला के निकट पहुँच जाते है। लक्ष्मण झूला के बाद राम झूला का निर्माण हुआ था। अब वर्तमान में जानकी झूला का निर्माण होने के बाद यह ऋषिकेश का मुख्य सेतु बन गया है। 

राम झूला और जानकी झूला के मध्य प्रसिद्ध गीता भवन है, यहाँ साधु संतो के ठहरने का अच्छा प्रबंध है। आम यात्रियों को यहाँ ठहरने की आज्ञा नहीं है। गीता भवन में सुबह और शाम अत्यंत ही स्वादिष्ट और सात्विक भोजन मिलता है। 

इस बार मन बना लिया था कि इस अमावस्या पर गंगा स्नान हेतु ऋषिकेश ही जाऊंगा। ईश्वर की कृपा रही और मैंने मई के महीने में एक शानदार यात्रा प्लान की। यह यात्रा कश्मीर की यात्रा थी जिसमें हमने श्रीमाता वैष्णोंदेवी और श्रीनगर जाने का प्लान बनाया। इस यात्रा में मेरी ममेरी बहिन साधना और उसका परिवार, मेरा दोस्त, कुमार अपने परिवार सहित जाने के लिए तैयार थे। 

Wednesday, December 31, 2025

MY TRIP IN AGRA : AGRA 2025

 

MY AGRA TRIPS IN 2025


📅10 FEB' 25

मैं आज अपनी कंपनी की किया करेन्स गाडी लेकर टेस्ट ड्राइव के लिए आगरा गया। पार्श्वनाथ पंचवटी, जो की फतेहाबाद रोड के नजदीक स्थित है, वहां मैं गाडी की एक ग्राहक को टेस्ट ड्राइव कराइ और उसके बाद लौटते समय प्रतापपुरा चौराहे पर मैं अपने मित्र कुमार से मिला। कुमार से थोड़ी देर मिलने के बाद मैं अपने एक अन्य मित्र पप्पू से भी मिला जो कि सरोजनी नायडू मेडिकल कॉलेज में ही कार्यरत है। 

बचपन के शहर और दोनों मित्रों से मिलने के बाद मैं वापस आगरा आ गया। 

Tuesday, September 17, 2024

AGRA : LODI MOSQUE & TOMB

 

आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 12

लोदी काल की मस्जिद और मक़बरा 




🖍 - 17 सितम्बर 2024, 

आगरा, मध्यकालीन भारत का ऐतिहासिक नगर है, इस शहर को मुग़लकालीन राजधानी होने का गौरव प्राप्त है इसलिए यहाँ मुग़ल काल से जुड़े हुए अनेकों भव्य स्मारक मौजूद हैं, जिसका सबसे बड़ा उदाहरण ताजमहल है जिसके कारण आगरा को दुनिया भर में पहचान मिली है। नूरजहां के पिता एत्माउद्दौला का मकबरा, चीनी का रोजा, आगरा किला, जामामस्जिद, फतेहपुर सीकरी और सिकंदरा ये सभी आगरा की प्रमुख मुगलकालीन स्मारक हैं। 

 यूँ तो आगरा शहर की स्थापना 1504 ईसवी में सिकंदर लोदी ने की थी। आगरा से कुछ दूर दिल्ली मार्ग पर उसने सिकंदराबाद नामक शहर बसाया था जो कालांतर में सिकंदरा ने नाम से आज भी स्थित है। परन्तु यह सिकंदरा आज सिकंदर लोदी के कारण नहीं बल्कि मुग़ल सम्राट अकबर के मकबरे के कारण विश्व भर में विख्यात है। 

आगरा शहर की स्थापना का श्रेय सिकंदर लोदी को जाता है किन्तु आगरा शहर को पहचान मुग़ल शासक अकबर के शासनकाल में ही मिली, उसने इसे अपनी राजधानी बनाया और आगरा किला का निर्माण कराया। अकबर ने अपनी मृत्यु से पूर्व ही अपने मकबरे का भी निर्माण भी आगरा में ही कराया था।  

AGRA : SADIK KHAN & SALAWAT KHAN TOMB


आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 11

 सादिक खान और सलाबत खान का मकबरा


सादिक खान और उनके पुत्र सलाबत खान, मुगल काल के प्रमुख रईस थे और बादशाह जहांगीर एवं शाहजहाँ के अधीन उच्च पदस्थ अधिकारी थे। सलाबत खान, बादशाह शाहजहाँ के मुग़ल दरबार में मीर बख्शी (कोषाध्यक्ष) थे, जो 1644 में आगरा किले में अमर सिंह राठौर द्वारा मारे गए थे  जबकि उनके पिता सादिक खान की मृत्यु 1633 में ही हो गई थी। दोनों पिता पुत्र मुग़ल दरबार में क्रमशः बादशाह जहांगीर और शाहजहां के कार्यकाल के दौरान नियुक्त थे। 

AGRA : AKBAR TOMB



आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 10

जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर का मक़बरा  


17 सितम्बर  2024,

जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर का मकबरा आगरा के सिकंदरा में स्थित एक भव्य मुगलकालीन स्मारक है, जिसे उनके पुत्र जहांगीर ने 1605-1613 के बीच बनवाया था। लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर से निर्मित यह 119 एकड़ में फैली एक अनूठी पिरामिडनुमा संरचना है, जो इस्लामी, हिंदू और बौद्ध वास्तुकला का मिश्रण है।

 मुख्य मकबरे का प्रवेश द्वार बुलंद दरवाजे की शैली में बनाया गया है और जटिल नक्काशी से सजाया गया है।इस मकबरे की चारों कोनों पर सफेद संगमरमर की मीनारें हैं।

औरंगजेब के समय में इस मकबरे को जाटों द्वारा लूटा गया था, माना जाता है कि उन्होंने इस मकबरे से बादशाह अकबर के शरीर के अवशेषों को निकालकर उनका दाह संस्कार कर दिया। ब्रिटिश काल में अंग्रेजों (लॉर्ड कर्जन) ने इसकी मरम्मत कराई थी।