Tuesday, September 17, 2024

AGRA : LODI MOSQUE & TOMB

 

लोदी काल की मस्जिद और मक़बरा 




🖍 - 17 सितम्बर 2024, 

आगरा, मध्यकालीन भारत का ऐतिहासिक नगर है, इस शहर को मुग़लकालीन राजधानी होने का गौरव प्राप्त है इसलिए यहाँ मुग़ल काल से जुड़े हुए अनेकों भव्य स्मारक मौजूद हैं, जिसका सबसे बड़ा उदाहरण ताजमहल है जिसके कारण आगरा को दुनिया भर में पहचान मिली है। नूरजहां के पिता एत्माउद्दौला का मकबरा, चीनी का रोजा, आगरा किला, जामामस्जिद, फतेहपुर सीकरी और सिकंदरा ये सभी आगरा की प्रमुख मुगलकालीन स्मारक हैं। 

 यूँ तो आगरा शहर की स्थापना 1504 ईसवी में सिकंदर लोदी ने की थी। आगरा से कुछ दूर दिल्ली मार्ग पर उसने सिकंदराबाद नामक शहर बसाया था जो कालांतर में सिकंदरा ने नाम से आज भी स्थित है। परन्तु यह सिकंदरा आज सिकंदर लोदी के कारण नहीं बल्कि मुग़ल सम्राट अकबर के मकबरे के कारण विश्व भर में विख्यात है। यूँ तो आगरा शहर की स्थापना का श्रेय सिकंदर लोदी को जाता है किन्तु आगरा शहर को पहचान मुग़ल शासक अकबर के शासनकाल में ही मिली, उसने इसे अपनी राजधानी बनाया और आगरा किला का निर्माण कराया। अकबर ने अपनी मृत्यु से पूर्व ही अपने मकबरे का भी निर्माण भी आगरा में ही कराया था।  

AGRA : SADIK KHAN & SALAWAT KHAN TOMB


 सादिक खान और सलाबत खान का मकबरा


सादिक खान और उनके पुत्र सलाबत खान, मुगल काल के प्रमुख रईस थे और जहांगीर एवं शाहजहाँ के अधीन उच्च पदस्थ अधिकारी थे, सलाबत खान, जो एक मीर बख्शी (कोषाध्यक्ष) थे, 1644 में आगरा किले में अमर सिंह राठौर द्वारा मारे गए, जबकि उनके पिता सादिक की मृत्यु 1633 में ही हो गई थी।

AGRA : AKBAR TOMB


जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर का मक़बरा  


17 सितम्बर  2024,

जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर का मकबरा आगरा के सिकंदरा में स्थित एक भव्य मुगलकालीन स्मारक है, जिसे उनके पुत्र जहांगीर ने 1605-1613 के बीच बनवाया था। लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर से निर्मित यह 119 एकड़ में फैली एक अनूठी पिरामिडनुमा संरचना है, जो इस्लामी, हिंदू और बौद्ध वास्तुकला का मिश्रण है।

 मुख्य मकबरे का प्रवेश द्वार बुलंद दरवाजे की शैली में बनाया गया है और जटिल नक्काशी से सजाया गया है।इस मकबरे की चारों कोनों पर सफेद संगमरमर की मीनारें हैं।

औरंगजेब के समय में इस मकबरे को जाटों द्वारा लूटा गया था, माना जाता है कि उन्होंने इस मकबरे से बादशाह अकबर के शरीर के अवशेषों को निकालकर उनका दाह संस्कार कर दिया। ब्रिटिश काल में अंग्रेजों (लॉर्ड कर्जन) ने इसकी मरम्मत कराई थी।

Thursday, August 8, 2024

AGRA : FIROZ KHAN TOMB

 

फिरोज खान का मकबरा / FIROZ KHAN TOMB



  • फिरोज खान के मकबरे का निर्माण 17वीं शताब्दी में मुगल बादशाह शाहजहां के शासनकाल के दौरान हुआ था, जब फिरोज खान दीवान-ए-कुल के पद पर थे। फिरोज खान शाहजहां के एक विश्वसनीय अधिकारी थे, जो शाही हरम के प्रभारी के रूप में काम करते थे। उनकी मृत्यु 1637 में हुई थी।

फिरोज खान शाहजहां के शाही हरम के प्रभारी (ख्वाजासरा) और दीवान-ए-कुल थे। 

लाल बलुआ पत्थर से निर्मित यह दो मंजिला अष्टकोणीय मकबरा मुगलकालीन वास्तुकला का उदाहरण है।
  • यह मकबरा लाल बलुआ पत्थर से बना है और अष्टकोणीय (octagonal) आकार का है। यह दो मंजिला इमारत है।
  •  यह स्मारक एएसआई (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) द्वारा संरक्षित है, लेकिन यह एत्माद्दौला के मकबरे की तुलना में बहुत कम प्रसिद्ध और उपेक्षित है।
  • यह मकबरा आगरा शहर से लगभग 5 किमी दूर आगरा-ग्वालियर रोड पर स्थित है।

Friday, March 22, 2024

AGRA : ETMAUDDOULA


एत्माउद्दौला का मक़बरा 


एत्माउद्दौला का मक़बरा, नूरजहाँ के पिता मिर्ज़ा ग्यासबेग़ का मकबरा है जिसे नूरजहाँ ने 1622-1628 के बीच अपने पिता मिर्ज़ा ग़ियासबेग की याद में बनवाया था। इसे 'बेबी ताज' या 'छोटा ताजमहल' भी कहा जाता है, क्योंकि यह पूरी तरह से सफेद संगमरमर से बना पहला मुगल मकबरा है और इसमें पित्रदुरा (कीमती पत्थरों की जड़ाई) का उत्कृष्ट काम किया गया है।

यह मकबरा मुगल साम्राज्ञी नूरजहाँ ने अपने पिता मिर्ज़ा ग़ियासबेग (जिन्हें जहाँगीर ने एतमादुद्दौला की उपाधि दी थी) की स्मृति में बनवाया था।

यह पूरी तरह से सफेद संगमरमर से निर्मित पहली मुगल इमारत है।

यह उत्तर प्रदेश के आगरा शहर में यमुना नदी के पूर्वी तट पर स्थित है और यह भारत में पूरी तरह सफेद संगमरमर से बने पहले मकबरों में से एक है।

मिर्ज़ा गियास बेग ( 1546 - 1621)

जिन्हें उनके शीर्षक एतिमाद-उद-दौला के नाम से भी जाना जाता है , मुग़ल साम्राज्य में एक महत्वपूर्ण अधिकारी थे। 


अपनी गर्भवती पत्नी इस्मत बेगम और तीन बच्चों के साथ वे भारत आ बसे। वहाँ मुगल सम्राट अकबर ने उन्हें अपनी सेवा में नियुक्त कर लिया। अकबर के शासनकाल में, मिर्ज़ा ग़ियास बेग को काबुल प्रांत का कोषाध्यक्ष नियुक्त किया गया 

अकबर के पुत्र और उत्तराधिकारी जहांगीर के शासनकाल में उनकी किस्मत और भी चमक उठी। 1611 में जहांगीर ने उनकी पुत्री नूरजहाँ से विवाह किया और मिर्ज़ा गियास बेग को अपना प्रधानमंत्री नियुक्त किया। 1615 तक, मिर्ज़ा गियास बेग का रुतबा और भी बढ़ गया, जब उन्हें 6,000 सैनिकों का दर्जा दिया गया और उन्हें ध्वज और ढोल भेंट किए गए, जो कि आमतौर पर विशिष्ट राजकुमारों को ही प्राप्त होता था।

सन 1621 में मिर्ज़ा ग्यासबेग की मृत्यु हो गई। 

मिर्ज़ा ग्यासबेग का भारत आगमन 

केवल दो खच्चरों को साथ लेकर, मिर्ज़ा गियासबेग, अपनी गर्भवती पत्नी और अपने तीन बच्चे (मोहम्मद-शरीफ, आसफ खान और एक बेटी) को अपनी भारत की यात्रा के लिए बारी-बारी से खच्चरों पर सवार होकर निकल पड़े। कंधार में असमत बेगम ने अपनी दूसरी बेटी को जन्म दिया। यात्रा का खर्च और गरीबी के चलते अब इन्हें अपनी चौथी संतान की चिंता सताने लगी और कंधार की मस्जिद में खुदा से सलामती की दुआ मांगी। 

कुछ समय बाद मिर्ज़ा ग्यासबेग और उनके परिवार को  एक व्यापारी मलिक मसूद के नेतृत्व वाले एक कारवां  शरण दी, जिसने बाद में गियास बेग को सम्राट अकबर की सेवा में नौकरी दिलाने में मदद की। यह मानते हुए कि बच्ची ने परिवार के भाग्य में बदलाव का संकेत दिया है, उसका नाम मिहर-उन-निस्सा रखा गया, जिसका अर्थ है "महिलाओं में सूर्य"। गियास बेग अपने परिवार का पहला सदस्य नहीं था जो भारत आया था, उसके चचेरे भाई आसफ खान जाफर बेग और असमत बेगम के चाचा, मिर्जा गियासुद्दीन अली आसफ खान, अकबर के प्रांतीय कार्यभारों में नामांकित थे। 

भारत पहुँचने के बाद अकबर ने मिर्ज़ा ग़ियास बेग का स्वागत किया और बाद में उन्हें काबुल प्रांत का दीवान (कोषाध्यक्ष) नियुक्त किया गया। व्यापार संचालन में अपनी कुशल क्षमता के कारण वे शीघ्र ही उच्च प्रशासनिक पदों पर पदोन्नत हो गए। उनके उत्कृष्ट कार्य के लिए सम्राट ने उन्हें 'इतिमद-उद-दौला' ('राज्य का स्तंभ') की उपाधि से सम्मानित किया। 

अपने कार्यों और पदोन्नति के फलस्वरूप, ग़ियास बेग ने मेहरुननिसा  (नूरजहाँ) को ने सर्वोत्तम शिक्षा दिलवाई। वह अरबी और फ़ारसी भाषाओँ के साथ कलासाहित्यसंगीत और नृत्य में भी निपुण हुईं 

गियास की बेटी, मिहर-उन-निस्सा बेगम ( नूर जहाँ ) ने 1611 में अकबर के बेटे जहांगीर से शादी की, और उनके बेटे अब्दुल हसन आसफ खान ने जहांगीर के सेनापति के रूप में और उनके उत्तराधिकारी शाहजहाँ के प्रधान वज़ीर के रूप में कार्य किया ।

ग़ियास, मुमताज़ महल (मूल नाम अर्जुमंद बानू, अब्दुल हसन आसफ़ खान की पुत्री) के दादा भी थे, जो सम्राट शाहजहाँ की पत्नी थीं। जहाँगीर के बाद उनके पुत्र शाहजहाँ शासक बने और अब्दुल हसन, शाहजहाँ के सबसे करीबी सलाहकारों में से एक थे। शाहजहाँ ने अब्दुल हसन की पुत्री अर्जुमंद बानू बेगम (मुमताज़ महल) से विवाह किया, जो उनके चार पुत्रों की माता थीं, जिनमें उनके उत्तराधिकारी औरंगज़ेब भी शामिल थे। शाहजहाँ ने मुमताज़ महल के मकबरे के रूप में ताजमहल का निर्माण करवाया।

 1621 में मिर्ज़ा ग्यास बेग की मृत्यु कांगड़ा के नजदीक हुई । उनके शरीर को आगरा लाया गया और यमुना नदी के बाएं किनारे पर दफनाया गया , जिसे आज एत्माउद्दौला का मकबरा कहते हैं। 





 

Thursday, October 12, 2023

AGRA : ROMAN CATHOLIC CEMETERY


 रोमन कैथोलिक कब्रिस्तान


आगरा में रोमन कैथोलिक कब्रिस्तान का निर्माण 1550 ई. में हुआ था और इसका इस्तेमाल सबसे पहले उन अर्मेनियाई ईसाइयों को दफनाने के लिए किया गया था, जो अकबर के शासनकाल के दौरान इस शहर में आकर बस गए थे। इनके बाद, जैसे-जैसे इस इलाके में दूसरे लोग आकर बसते गए, वैसे-वैसे अन्य ईसाई संप्रदायों के लोगों को भी यहाँ दफनाया जाने लगा।


इस कब्रिस्तान में सबसे पुरानी कब्र जॉन मिल्डेनहॉल की है। जॉन मिल्डेनहॉल एक अंग्रेज व्यापारी थे, जिनकी मृत्यु 1614 में हुई थी। कहा जाता है कि वह पहले ऐसे अंग्रेज थे, जिन्होंने "अकबर को आमने-सामने देखा था"। लेकिन यहाँ कुछ और कब्रें भी हैं, जो ध्यान देने लायक हैंन सिर्फ उन लोगों से जुड़ी कहानियों की वजह से, बल्कि उन कब्रों की वास्तुकला की वजह से भी।

Friday, September 1, 2023

KURUKSHETRA : SHEIKH CHILLI TOMB


शेख़ चिल्ली का मक़बरा 


 

हरियाणा के कुरुक्षेत्र के थानेसर में स्थित शेख चिल्ली का मकबरा, मुगल बादशाह शाहजहाँ के सबसे बड़े बेटे दारा शिकोह ने लगभग 1650 ईस्वी में बनवाया था। यह मकबरा दारा शिकोह के आध्यात्मिक गुरु और प्रसिद्ध सूफी संत शेख चिल्ली की याद में निर्मित है, जिसे 'हरियाणा का ताजमहल' भी कहा जाता है।

यह मकबरा सूफी संत शेख चिल्ली (अब्दुल करीम) की याद में बनवाया गया था। जिसमें फारसी शैली, सफेद संगमरमर और पीले बलुआ पत्थर का उपयोग किया गया है।  यह मकबरा एक ऊंचे चबूतरे पर बना है और इसके परिसर में एक मदरसा और संग्रहालय भी स्थित है। 

शेखचिल्ली एक प्रसिद्ध मुस्लिम सूफ़ी संत थे।  माना जाता है कि वह 17वीं सदी में मुगल राजकुमार दारा शिकोह के गुरु थे, जिनका वास्तविक नाम अब्द-उर-रजाक या अब्द-उर-रहीम था। हरियाणा के थानेसर में स्थित उनका मकबरा भी उनके मुस्लिम सूफी परंपरा से जुड़ा होने का प्रमाण है।
शेख चिल्ली के मकबरे की दीवार 



शेख चिल्ली का मकबरा 

शेख चिल्ली का मकबरा 



मदरसा और जलाशय का एक चित्र 




ऊपरी अहाते में स्थित मकबरा 








लाल बलुआ पत्थर से निर्मित पत्थर मस्जिद 






हर्ष वर्धन की राजधानी के अवशेष 






अगला भाग - राजा हर्ष का टीला 

Saturday, August 12, 2023

AGRA : KAFUR MOSQUE & STONE HORSE

  काफूर की मस्जिद और पत्थर के घोड़े की प्रतिमा 



आगरा-मथुरा हाईवे (सिकंदरा) पर स्थित काफूर की मस्जिद (या इतिबारी खां की मस्जिद) के पास एक रहस्यमयी पत्थर का घोड़ा (लाल बलुआ पत्थर की मूर्ति) स्थित है। 
1605-1623 ईस्वी के बीच निर्मित यह स्थल, जहांगीर के वफादार दरबारी इतिबारी खां द्वारा संत ख्वाजा काफूर के सम्मान में बनवाया गया था, जहां घोड़े की मूर्ति को अकबर के प्रिय घोड़े का स्मारक माना जाता है।

काफूर की मस्जिद और पत्थर के घोड़े का विवरण:
  • स्थान और इतिहास: यह स्थल आगरा के गुरु का ताल के पास, हाईवे के किनारे है। इसका निर्माण इतिबारी खां, जो एक वफादार ख्वाजासरा (शाही हरम के प्रबंधक) थे, ने 17वीं शताब्दी की शुरुआत में करवाया था।
  • पत्थर के घोड़े का रहस्य: यह मूर्ति लाल पत्थर से बनी है। मान्यता है कि जब बादशाह अकबर दिल्ली से आगरा लौट रहे थे, तो उनके प्यारे घोड़े की मृत्यु हो गई थी, और उसकी स्मृति में यह स्मारक बनाया गया।
  • स्थानांतरण: यह मूर्ति मूल रूप से पास की एक रेलवे लाइन के पास मिली थी, जिसे 1922 में वर्तमान स्थान (मस्जिद परिसर) पर स्थानांतरित किया गया था।
  • मस्जिद की वास्तुकला: यह एक छोटी, तीन-मेहराबदार मस्जिद है जिसके ऊपर एक गुंबद है।

AGRA : JASWANT SINGH CHHATRI


जसवंत सिंह की छतरी

 


जसवंत सिंह की छतरी 

 राजस्थानी वास्तुकला की एक विशिष्ट शैली में निर्मित गुंबददार स्तंभों वाला मंडपनुमा स्मारक है, जिसका निर्माण लगभग  1644-58 ईस्वी में जसवंत सिंह राठौर ने अपने बड़े भाई अमर सिंह राठौर की पत्नी रानी हाड़ा की स्मृति में करवाया था। यह छतरी आगरा में यमुना नदी के किनारे राजवाड़ा, बालकेश्वर में स्थित है । अब इसका संरक्षण भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा राष्ट्रीय महत्व के स्मारक के रूप में किया जाता है।


यह मुगलिया स्थापत्य के बीच हिंदू-राजपूत कला (लाल बलुआ पत्थर) का प्रतीक है, जिसका संबंध अमर सिंह राठौड़ से है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित, यह स्थान कभी मनोहर बाग का हिस्सा था

 यह स्मारक राजा जसवंत सिंह द्वारा बनवाया गया था और इसका इतिहास वीर अमर सिंह राठौड़ से जुड़ा है, जिन्होंने शाहजहाँ के दरबार में मीर बख्शी सलाबत खां को मार गिराया था। 

यह लाल बलुआ पत्थर से निर्मित है और इसमें हिंदू-मुगल मिश्रित वास्तुकला की झलक मिलती है, जिसमें बुर्ज, सुंदर छतरियां, और नाजुक जाली वर्क शामिल है। 

यह एएसआइ द्वारा संरक्षित है, लेकिन अब उपेक्षित है और इसके आसपास अवैध निर्माण हो चुके हैं।

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यहाँ अमर सिंह राठौड़ की पत्नी सती हुई थीं, और स्थानीय महिलाएँ यहाँ पूजा करने आती हैं।

AGRA : CHINI KA ROZA

 आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 2

चीनी का रोज़ा


इसे चाइना टॉम्ब के नाम से भी जाना जाता है, यह अफजल खान का मकबरा है जो जहांगीर के शासनकाल में एक फारसी कवि थे, बाद में वे शाहजहाँ के शासनकाल में वज़ीर बने। अफजल खान की मृत्यु 1639 में लाहौर में हुई और उन्हें आगरा में यहीं दफनाया गया। यह मकबरा मक्का शहर की ओर मुख करके बनाया गया है 

मुल्ला शुक्रुल्लाह शिराज़ी (1570–1639), जिन्हें 'अफ़ज़ल ख़ान' के शाही ख़िताब से जाना जाता था, जहाँगीर और शाहजहाँ के शासनकाल के दौरान मुग़ल दरबार के एक दरबारी थे।उन्होंने एक विद्वान के रूप में ख्याति अर्जित की और 1628–1639 की अवधि के दौरान मुग़ल साम्राज्य के 'वज़ीर-ए-आज़म' (Grand Vizier) के पद तक पहुँचे।

अफ़ज़ल खान का जन्म सफ़वी ईरान के शिराज़ में हुआ था, जहाँ उनके पिता फ़ार्स में एक छोटे राजस्व संग्राहक थे। उनके पिता के दो भाई ईरान में वित्तीय पदों पर कार्यरत थे, जबकि दो अन्य ईरान और भारत के बीच व्यापार में लगे हुए थे। 

अफ़ज़ल खान का एक भाई था, जिसका नाम अमानत खान था; वह बाद में उनके साथ भारत आया और ताजमहल पर सुलेखन (calligraphy) के रूप में लिखे गए अभिलेखों को डिज़ाइन करने के लिए प्रसिद्ध हुआ। अफ़ज़ल खान ने लेखन-कला से संबंधित विषयों, जैसे कि सुलेख, लेखा-जोखा और गद्य-रचना में शिक्षा प्राप्त की थी। उनके शुरुआती शिक्षकों में से एक विद्वान तक़ी अल-दीन मुहम्मद शिराज़ी थे।

AGRA : MEHTAB BAGH & ELEVEN STAIRES




आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 1 

मेहताब बाग़ और ताजमहल का एक दृश्य 

       यूँ तो मैं बचपन से ही आगरा शहर में रहा किन्तु कभी ताजमहल को यमुना के दूसरी पार से देखने का मौका नहीं मिला, कारण था इस स्थान की दूरी, और यहाँ जाने वाला रास्ता जिसके बारे में मुझे कोई विशेष जानकारी नहीं थी। जब कभी ताजमहल देखने का मन होता था तो इसके मुख्य द्वार से ही इसे जाकर देख आता था। किन्तु आगरा शहर छोड़ने के अनेक वर्षों बाद अपने पुराने शहर को घूमने की इच्छा मन में जाग्रत हुई और मैं अपनी बाइक उठकर निकल चला आगरा की ऐतिहासिक यात्रा पर। 

    इस यात्रा के तहत मैंने आगरा के उन स्थानों को चिन्हित किया जो मैंने पहले कभी नहीं देखे थे। इसलिए सबसे पहले मैं पहुंचा यमुना नदी के दूसरी पार, जहाँ आगरा की विभिन्न मध्यकालीन ऐतिहासिक इमारतें देखीं जा सकती थीं। 

    इन सभी स्थलों में सबसे मुख्य था मेहताब बाग़, जो मुगलकाल का एक शानदार बगीचा था। इसका निर्माण औरंगजेब ने अपने शासनकाल के दौरान कराया था। इस बगीचे से ताजमहल का बहुत ही शानदार दृश्य दिखाई देता है बिलकुल वैसे ही, जैसे हम इसे ताज के परिसर में प्रवेश करने के बाद देखते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि मेहताब बाग़ से आप सिर्फ ताजमहल को निहार सकते हैं, इसके ख़ूबसूरती को महसूस कर सकते हैं, यमुना नदी के जल में इसका प्रतिबिम्ब देख सकते हैं किन्तु आप इसे छू नहीं सकते, इसके नजदीक नहीं जा सकते हैं क्योंकि मेहताब बाग़ और ताजमहल के बीच यमुना नदी है और यहाँ इसे पार करने की इजाजत नहीं है। 

AGRA : AGRA FORT

आगरा किला 



 आगरा किले का इतिहास

यह मूलतः एक ईंटों का किला था, जो सिकरवार वंश के राजपूतों के पास था। इसका प्रथम विवरण 1080 ई० में आता है, जब महमूद गजनवी की सेना ने इस पर कब्ज़ा किया था। 

सिकंदर लोदी (1487-1517), दिल्ली सल्तनत का प्रथम सुल्तान था जिसने आगरा की यात्रा की तथा इसने इस किले की मरम्म्त १५०४ ई० में करवायी व इस किले में रहा था। सिकंदर लोदी ने इसे १५०६ ई० में राजधानी बनाया और यहीं से देश पर शासन किया। उसकी मृत्यु भी इसी किले में 1517 में हुई थी। बाद में उसके पुत्र इब्राहिम लोदी ने गद्दी नौ वर्षों तक संभाली, तब तक, जब वो पानीपत के प्रथम युद्ध (1526) में मारा नहीं गया। उसने अपने काल में यहां कई स्थान, मस्जिदें व कुएं बनवाये।

पानीपत के बाद मुगलों ने इस किले पर भी कब्ज़ा कर लिया साथ ही इसकी अगाध सम्पत्ति पर भी। इस सम्पत्ति में ही एक हीरा भी था जो कि बाद में कोहिनूर हीरा के नाम से प्रसिद्ध हुआ। तब इस किले में इब्राहिम के स्थान पर बाबर आया। उसने यहां एक बावली बनवायी। 

सन 1530 में यहीं हुमायुं का राजतिलक भी हुआ। हुमायुं इसी वर्ष बिलग्राम में शेरशाह सूरी से हार गया व किले पर उसका कब्ज़ा हो गया। इस किले पर अफगानों का कब्ज़ा पांच वर्षों तक रहा, जिन्हें अन्ततः मुगलों ने 1556 में पानीपत का द्वितीय युद्ध में हरा दिया।