Tuesday, October 6, 2026

TRIP WITH SAURABH MANDLIK 2024 : LOHAGARH FORT

जनवरी के घने कोहरे के बीच लोहागढ़ किले की एक यात्रा  

16 JAN 2024,

बीती रात वृन्दावन से लौटने के बाद हम अपने घर पर आराम से सोये और अगली सुबह हम बाइक से आज भरतपुर जाने के लिए तैयार हो गए। आज , कल की अपेक्षा ठण्ड अत्यधिक थी और कोहरा भी बहुत घना था। दिन निकल आया है ऐसा प्रतीत ही नहीं हो रहा था। सौरभ भाई के अनुसार उन्हें उत्तर भारत की इस भयंकर सर्दी का एहसास नहीं था, इस कोहरे का उन्हें तनिक भी आभास नहीं था अन्यथा वह इस यात्रा को जनवरी में प्लान नहीं करते। 

हम बाइक से भरतपुर मार्ग पर पहुंचे, शीतलहर चल रही थी और सड़क पर घने कोहरे का साम्राज्य था। आज मथुरा से भरतपुर की यह 30 किमी की छोटी सी दूरी भी बहुत लम्बी प्रतीत हो रही थी। मेरे पास मफलर देखकर सौरभ भाई के मित्रों ने मुझसे इसके बारे में पूछा और कल रात ही अपने लिए एक नया मफलर खरीद लिया था। आज की इस यात्रा  में इस मफलर ने उन्हें बहुत राहत पहुंचाई। 

रास्ते में एक दुकान पर हमने रूककर गर्मागर्म चाय पी और उनके पश्चात पुनः भरतपुर की ओर रवाना हो गए। 

भरतपुर में जाट शासकों द्वारा निर्मित एक भव्य किला है जिसे लोहागढ़ के नाम से जाना जाता है। इस किले का निर्माण जाट वंश के महाराजा सूरजमल ने 19 फरवरी 1733 को शुरू करवाया था। इसे 'लोहागढ़' इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसकी दीवारें इतनी मजबूत थीं कि ब्रिटिश सेना 13 बार आक्रमण करने के बाद भी इसे भेद नहीं पाई थी। इस किले की दीवारें पत्थर या लोहे की नहीं, बल्कि दोहरी मिट्टी की बनी हैं। तोप के गोले मिट्टी में धंस जाते थे और बेअसर हो जाते थे।

 किले के चारों ओर एक गहरी खाई है, जिसमें मोती झील से सुजानगंगा नहर का पानी भरा रहता था। किले में प्रवेश के लिए दो मुख्य द्वार हैं—उत्तर में अष्टधातु द्वार (जिसे महाराजा जवाहर सिंह 1765 में दिल्ली से लाए थे) और दक्षिण में चौबुर्झा द्वार।

सर्वप्रथम हम किले के अंदर स्थित जवाहर बुर्ज पहुंचे। मुगलों पर विजय की स्मृति में महाराजा जवाहर सिंह ने इसका निर्माण कराया था। यहाँ कुछ इमारतें है और एक लौहस्तम्भ है जो दर्शनीय है। 

इसके पश्चात हम किले के अंदर स्थित राजकीय संग्रहालय पहुंचे। मैं इसे पहले भी देख चुका हूँ इसलिए मैं बाहर ही रुक गया और सौरभ भाई अपने मित्रों के साथ संग्रहालय देखने गए। इस संग्रहालय में प्राचीन हथियार, सिक्के और ऐतिहासिक वस्तुएं रखी हैं।

शीघ्र ही हम किले के अंदर किशोरी महल पहुंचे। यह किले का मुख्य महल है और राजा सूरजमल जी का निवास स्थान है। किशोरी महल के बाहर ही महाराजा सूरजमल की अश्वारूढ़ एक भव्य प्रतिमा है जो उनकी वीरता और कुशलता का एहसास कराती है। 

कुछ देर किला घूमने के बाद हम पुनः मथुरा की ओर वापस लौट गए। 


































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TRIP WITH SAURABH MANDLIK 2024 : VRINDAVAN & MATHURA


नववर्ष पर सौरभ मंडलीक भाई और उनके मित्रों के साथ वृन्दावन की एक यात्रा 



15 JAN 2024,

अभी इसी नववर्ष पर ग्वालियर यात्रा के कुछ दिनों बाद ही मेरे एक आभासी मित्र सौरभ मंडलीक, अपने अन्य दो मित्रों के साथ महाराष्ट्र से ब्रज यात्रा पर पधारे। सौरभ मंडलीक भाई महाराष्ट्र में पुणे के नजदीक एक नगर में रहते हैं और वह महाराष्ट्र तथा देश अन्य नगरों के प्राचीन और मध्यकालीन किलों का भ्रमण कर चुके हैं और अपने यूट्यूब चैनल पर इन किलों से संबंधित अनेकों वीडियो साझा कर चुके हैं। 

चूँकि फेसबुक की आभासी दुनिया में हम ऐतिहासिक यात्रा पटल के घुमक्कड़ होने के नाते आपस में मित्र हैं, और अभी तक हमारी बात कॉल और मैसेज पर होती रहीं हैं। वह काफी दिनों से मथुरा - वृन्दावन यात्रा  का प्लान कर रहे थे, अंततः इस जनवरी  में उन्होंने अपनी इस यात्रा को पूर्ण किया और बृज दर्शन हेतु मथुरा पधारे। उनके साथ उनके अन्य दो मित्र भी इस यात्रा पर मथुरा आये। 

हालांकि यह मौसम बृज यात्रा के अनुकूल नहीं है, जनवरी का महीना है और इस माह में उत्तर भारत में कड़ाके की सर्दी पड़ती है। चारों ओर घने कोहरे का साम्राज्य रहता है और इस वर्ष तो सर्दी अपने चरम पर थी, कई दिनों से धूप नहीं निकली थी, बस पूरा दिन कोहरे के बीच गुजर रहा था। कब सुबह से शाम हो जाती कुछ पता ही नहीं चल रहा था। लोग अपने घरों में रहकर ही अपने को सुरक्षित महसूस कर रहे थे। 

इस बीच मेरे पास महाराष्ट्र से सौरभ भाई का कॉल आया और उन्होंने मुझे अपने ब्रजभूमि आने का कार्यक्रम बताया। चूँकि उनका यात्रा कार्यक्रम निर्धारित हो चुका था इसलिए मैंने भी उन्हें इस यात्रा की अग्रिम बधाइयाँ दी और उनकी प्रतीक्षा की। मकर सक्रांति के अगले दिन सौरभ भाई अपने मित्रों के साथ मथुरा आ गए। मैंने उन्हें अपने घर ही आने का सुझाव दिया और अगले दिन सौरभ भाई से मेरी वास्तविक भेंट हुई। 

मैंने सौरभ भाई की मुलाक़ात अपनी माँ से और पत्नी से कराई, सभी उनसे मिलकर अति प्रसन्न हुए। सौरभ भाई हमारे लिए महाराष्ट्र से स्वादिष्ट मुंबई की भेलपुरी और भाकरी लाये थे इसके अलावा वीर शिवाजी महाराज की सिंहासनारूढ़ प्रतिमा भी उन्होंने मुझे भेंट की। उनके द्वारा प्रेम से लाये गए इन उपहारों को मैंने माँ को भेंट किया। माँ मेरे इन नए मित्रों से मिलकर अति प्रसन्न हुईं। 

सौरभ भाई के आने से पूर्व मैं एक गाडी का इंतज़ाम करना चाहता था किन्तु समयाभाव के कारण नहीं कर सका। परन्तु मैंने एक अतिरिक्त बाइक का इंतज़ाम अवश्य ही कर लिया था। इसलिए आज की यात्रा हमारी बाइक यात्रा थी और हम शीघ्र ही मथुरा से वृन्दावन के लिए निकल पड़े। भयंकर सर्दी और घने कोहरे के बीच हम मदन मोहन जी के मंदिर पहुंचे जो कि वृन्दावन के सप्त देवालयों में से एक मध्यकाल का ऐतिहासिक मंदिर है।  

  • मदन मोहन जी का मंदिर 
श्री राधा मदन मोहन जी मंदिर का मध्यकाल का एक प्राचीन मंदिर है जिसका निर्माण सन 1580 में गोस्वामी महाराज की उपस्थिति में मुल्तान के एक व्यापारी द्वारा संपन्न कराया गया था। यह लाल बलुआ पत्थर से निर्मित वृन्दावन का पहला मंदिर मंदिर माना जाता है। यह यमुना नदी के किनारे कालिया घाट के समीप द्वादशादित्य टीले पर निर्मित कराया गया था। द्वादशादित्य टीले के प्राचीन अवशेष अभी भी यहाँ दिखाई देते हैं। 

अद्वैत आचार्य ने वृंदावन में एक पुराने वट वृक्ष के नीचे मदन मोहन जी की मूल विग्रह (प्रतिमा) की खोज की थी और इसे सनातन गोस्वामी को सौंपा था। सनातन गोस्वामी यहीं रहकर भजन और मदन मोहन जी की सेवा करते थे। उनकी प्रेरणा और मार्गदर्शन से मुल्तान के एक धनी व्यापारी कपूर राम दास ने इस भव्य मंदिर का निर्माण करवाया जब वह एक नाव द्वारा यमुना जी के रास्ते अपने व्यापार के उद्देश्य से काशी की ओर जा रहे थे। वृन्दावन में इस द्वादशादित्य टीले के पास आकर उनकी नाव भँवर में फंस गई। 

इस विकट परिस्थिति में सनातन गोस्वामी जी की प्रेरणा से उन्होंने श्री मदन मोहन जी मन ही मन प्रार्थना की और यहाँ उनका एक भव्य मंदिर के निर्माण का संकल्प लिया। अगले ही क्षण उनकी नाव भँवर से मुक्त हो गई और उन्हें इसे ईश्वर की इच्छा जान उनका यहाँ भव्य मंदिर बनवाया। 

सन 1670 में औरंगजेब के आक्रमण के समय सुरक्षा की दृष्टि से मदन मोहन जी के मूल विग्रह को वृंदावन से पहले जयपुर और बाद में राजस्थान के करौली स्थानांतरित कर दिया गया, जहाँ वे आज भी विराजमान हैं।
वर्तमान वृंदावन मंदिर में मदन मोहन जी की प्रतिरूप (प्रतीक) प्रतिमा स्थापित है। मदन मोहन जी का मंदिर देखने के बाद हम श्री बाँके बिहारी के मंदिर उनके दर्शन करने पहुंचे। 



मदनमोहन मंदिर - कोहरे के बीच 

  •  श्री बाँकेबिहारी जी के दर्शन 
भयंकर सर्दी और कोहरा होने के बाबजूद भी श्री बाँके बिहारी जी महाराज के दर्शन करने आने वाले उनके श्रद्धालुओं की संख्या में कोई कमी दिखाई नहीं दी थी। आज भी उनके अनेकों भक्त इस नववर्ष पर उनके दर्शन करने हेतु वृन्दावन पधारे थे। हम भी अपने आराध्य के दर्शनों हेतु लाइन में लग गए और शीघ्र ही श्री वृन्दावन बिहारी लाल  जी ने हमें अपने दर्शन देकर कृतार्थ किया। 

बिहारी जी के दर्शन करने के पश्चात हम श्री राधाबल्लभ जी के प्राचीन मंदिर के दर्शन करके श्री शाह जी के मंदिर पहुंचे। 

सौरभ भाई और उनके मित्रों के साथ श्री बांके बिहारी जी के दर्शन 



सौरभ मांडलिक 



  • शाहजी मंदिर 
श्री बाँके बिहारी जी मंदिर से कुछ दूर और निधिवन जी के समीप शाह जी मंदिर स्थित है। इस मंदिर का भव्य द्वार अपने सभी आगंतुकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। मंदिर परिसर टेढ़े मेढ़े खम्भों का प्रयोग हुआ है इसलिए इसे टेढ़े मेढ़े खम्बों वाला मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। 

इस भव्य मंदिर का निर्माण सन 1860 में शुरू हुआ और यह सन 1868 यानी आठ साल में बनकर पूरा हुआ। इस भव्य मंदिर का निर्माण शाह कुंदन लाल और शाह फुंदन लाल ने करवाया था , जो लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह के दरबार से जुड़े थे। यह मंदिर अपनी अनूठी वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है। इसमें सफेद संगमरमर के लगभग 15 फीट ऊंचे 12 सर्पिल (टेढ़े) खंभे हैं।

मंदिर का दरबार हॉल 'बसंती कमरा' कहलाता है, जो बेल्जियम कांच के झूमरों और सुंदर चित्रों से सजा है। यह साल में केवल दो बार (बसंती पंचमी और झूलन यात्रा पर) खुलता है।


शाहजी मंदिर का प्रवेश द्वार 





शाहजी मंदिर 


  • श्री रंगजी का मंदिर 
 श्री रंगनाथ जी का मंदिर ना केवल वृन्दावन का अपितु यह उत्तर भारत का एक मात्र प्रख्यात मंदिर है जो दक्षिण भारत की द्रविड़ शैली में निर्मित है।  

वृन्दावन स्थित श्री रंग जी मंदिर का निर्माण कार्य वर्ष 1845 में शुरू हुआ था और 1851 में पूरा हुआ, और इसे  चेन्नई के रहने वाले सेठ गोविंद दास और सेठ राधाकृष्ण दास द्वारा बनबाया गया था।

तमिलनाडू के प्रसिद्ध श्री रंगम अथवा रंगनाथ स्वामी मंदिर की तर्ज पर इसे बनाने के लिए विशेष रूप से दक्षिण भारत से कुशल कारीगरों और श्रमिकों को वृंदावन बुलाया गया था। इस मंदिर की मुख्य इमारत दक्षिण भारतीय (द्रविड़) शैली में बनी है, जिसका गोपुरम (प्रवेश द्वार) 30 मीटर ऊंचा है। वहीं, इसके बाहरी द्वार और कुछ हिस्से राजस्थानी (जयपुर/राजपूत) शैली की सुंदर नक्काशी दिखाते हैं।

यह मंदिर भगवान विष्णु के रूप भगवान रंगनाथ (शेषनाग पर लेटे हुए स्वरूप) और दक्षिण भारत की प्रसिद्ध संत गोदा देवी (आंदाल) को समर्पित है। यहां भगवान कृष्ण दूल्हे के रूप में हाथ में छड़ी लिए हुए और उनके साथ आंदाल व गरुड़ विराजमान हैं। मंदिर परिसर में 50 फीट ऊंचा सोने-चांदी के पानी से रंजित स्वर्ण स्तंभ (ध्वज स्तंभ) भी स्थित है।


द्रविड़ शैली में श्री रंगजी मंदिर का गोपुरम 




राजपूत शैली में रंगजी का प्रवेश द्वार 




  • श्री गोविन्द देव जी का मंदिर 
श्री रंग जी मंदिर से थोड़ी ही दूरी पर एक विशाल प्राचीन मंदिर के अवशेष दिखाई देते हैं। यह श्री गोविन्द देव जी का मंदिर है जो वृन्दावन के प्राचीन सप्तदेवालयों में से एक है। यह मंदिर भी मध्यकालीन है और इसका निर्माण 1590 ईस्वी में आमेर के राजा मानसिंह प्रथम ने करवाया था। 

 सन् 1525 में श्री चैतन्य महाप्रभु के शिष्य श्री रूप गोस्वामी को गोमा टीले (वृंदावन) के नीचे भगवान श्रीकृष्ण के प्राचीन विग्रह (मूर्ति) के दबे होने का संकेत मिला था। खुदाई के बाद यहाँ दिव्य मूर्ति प्रकट हुई। इसी पवित्र स्थल पर सन् 1590 में राजा मानसिंह ने लाल बलुआ पत्थरों से सात मंजिला एक अत्यंत भव्य और गगनचुंबी मंदिर का निर्माण कराया। इस निर्माण कार्य में वैष्णव संतों—रूप गोस्वामी और सनातन गोस्वामी का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ था।

17वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में मुगल शासक औरंगजेब के शासनकाल में इस मंदिर को तोड़ा गया, जिसके कारण इसकी ऊपरी चार मंजिलें नष्ट हो गईं और आज यह भग्न (क्षतिग्रस्त) अवस्था में भी अपनी वास्तुकला की भव्यता की गवाही देता है।

औरंगजेब के आक्रमण के समय ही मूल विग्रह को सुरक्षित रूप से आमेर/जयपुर ले जाया गया था, जहाँ यह आज भी जयपुर के सिटी पैलेस परिसर में स्थापित हैं। वृंदावन के मूल प्राचीन मंदिर परिसर में बाद में नए विग्रह स्थापित किए गए।


गोविंददेव जी मंदिर 

  • श्री बाबा नींब करोरी आश्रम 
अटल्ला चुंगी से कुछ दूर परिक्रमा मार्ग पर श्री नीबकरोरी महाराज का समाधी स्थल है। अपने जीवन के अंतिम दिनों में श्री बाबा लक्ष्मणदास जी, जो नीबकरोरी जी महाराज के नाम से जाने जाते हैं, यहाँ आये और यहीं उन्होंने इस ब्रज की पवित्र धरा पर निर्वाण प्राप्त किया। 

नीबकरोरी जी महाराज को हनुमान जी का अवतार समझा जाता है और यह हनुमान जी के ही परम भक्त थे। वर्ष 1973 में उन्होंने यहाँ महासमाधि ली और तभी से वृन्दावन में श्री नीवकरोरी जी महाराज का यह आश्रम भक्तों के लिए खुला है जहाँ भक्त उनकी समाधी के दर्शन करने आते हैं। 

हर साल अनंत चतुर्दशी के अवसर पर यहाँ बाबा का महासमाधि भंडारा और विशेष उत्सव मनाया जाता है, जिसमें देश-विदेश से भक्त पहुंचते हैं।

सौरभ भाई की यहाँ आने की हार्दिक इच्छा थी, श्री महाराज जी ने उन्हें अपनी कृपा प्रदान की और उन्होंने श्री महाराज जी की दिव्य समाधी के दर्शन किये। 

श्री नीबकरोरी आश्रम 




  • श्री कृष्ण जन्मभूमि - मथुरा 
पूरा दिन वृन्दावन में घूमने के बाद शाम को हम वापस घर पहुंचे और अगले दिन हम बाइक से ही मथुरा से कुछ दूर राजस्थान में भरतपुर शहर पहुंचे। यहाँ का लोहागढ़ किला देखने के बाद हम दोपहर तक वापस मथुरा आ गए और शाम को मथुरा स्थित भगवान श्रीकृष्ण जी की जन्मभूमि देखने पहुंचे। 

मैं श्री कृष्ण जन्मभूमि कई बार देख चुका हूँ, इसलिए मैंने सौरभ भाई और उनके मित्रों को जन्मभूमि के प्रवेशद्वार पर पहुंचा दिया। वे अपने मोबाइल मुझे देकर जन्मभूमि परिसर घूमने चले गए। लगभग एक दो घंटे के बाद वह वापस लौटे तो मैं उन्हें पुनः वृन्दावन लेकर गया जहाँ उन्होंने प्रेम मंदिर के दर्शन किये और प्रसिद्ध संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के भी उन्हें यहाँ दर्शन हो गए जब वह अपनी गाडी में अपने आश्रम से प्रस्थान कर रहे थे। 

आज रात को सौरभ भाई का ग्वालियर के लिए केरला एक्सप्रेस में रिजर्वेशन था। माँ से विदा लेकर सौरभ भाई ने हमारे घर से प्रस्थान किया और मैं उन्हें लेकर रेलवे स्टेशन पहुंचा, यहाँ पहुंचकर हमें पता चला कि केरला एक्सप्रेस अपने समय से दो घंटे विलम्ब से चल रही है जबकि हम जब घर से निकले थे तो वह सही समय से नई दिल्ली से प्रस्थान कर चुकी थी। 

किन्तु मार्ग में घना कोहरा और कम अदृश्यता होने के कारण यह ट्रेन विलम्बित हो गई। सर्दी बहुत थी और कोहरा भी हो चला था। मैंने सौरभ भाई और उनके मित्रों से वापस घर चलने के लिए कहा किन्तु उन्होंने मना कर दिया, और प्लेटफॉर्म पर ही समय गुजारने के बात की। स्टेशन पर बहुत अधिक ठण्ड थी, वेटिंग रूम भी लगभग पूरी तरह से भरे हुए थे। इस सर्दी में स्टेशन पर खुले में रुकना असहनीय था इसलिए मैं उन्हें स्टेशन से वापस लेकर बाहर आया। 

यहाँ धौलीप्याऊ में श्री राम धर्मशाला में मैंने उन्हें एक कमरा दिला दिया जो उनकी ट्रेन आने तक उनके रुकने के लिए पर्याप्त था। सौरभ भाई से दूर होने का मन तो नहीं था किन्तु बड़े भारी मन से मैंने उनसे विदा ली और उनके साथ बिताये इन दो दिनों की यात्रा के दौरान अपनी तरफ हुई किसी भी भूल के लिए क्षमा मांगी। 

सौरभ भाई और उनके मित्रों ने भी मेरा खूब आभार व्यक्त किया और पुनः मिलने का वादा लेकर मैं वापस घर आ गया।  

श्रीकृष्ण जन्मभूमि का प्रवेश द्वार 

श्री कृष्ण जन्मभूमि - मथुरा 


श्रीराम धर्मशाला में सौरभ भाई और उनके मित्रों के साथ एक सेल्फी 

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