दरिया खान का मकबरा चारों और से छोटे छोटे कक्षों से घिरा हुआ है, इसके एक किनारे पर जामी मस्जिद है और दूसरे किनारे पर एक सराय के अवशेष दिखाई देते हैं। मकबरे के ठीक पीछे एक पानी से भरा कुंड है जिसे सोमवती कुंड नाम दिया गया है। इस मकबरे के चारों ओर बरामदा बना है और ठीक बीच में दरिया खान का मकबरा है।
एक मकबरे के नजदीक इन सबका होना दर्शाता है कि दरिया खान, ना केवल शाही दरबार में एक उच्च प्रशासनिक अधिकारी थे, बल्कि वह एक धार्मिक प्रवृति के व्यक्ति थे क्योंकि इस परिसर में ना केवल जामी मस्जिद बल्कि एक और मस्जिद भी देखने को मिलती है जो बिलकुल वैसी है, जैसी मकबरा क्रमांक एक के साथ देखने को मिली थी।
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| दरिया खान के मकबरे की तरफ जाता रास्ता |
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| दरिया खान की मस्जिद का पिछला भाग |
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| सामने नजर आती सराय |
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| दरिया खान की जामीमस्जिद का एक दृश्य |
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| सोहन भाई का एक फोटो |
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| सराय का एक दृश्य |
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| दूर दिखाई देता हाथी महल |
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| दरिया खान के मकबरे के परिसर में एक और मस्जिद |
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| मस्जिद का सामने से दृश्य |
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| दरिया खान की जामी मस्जिद |
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| सोमवती कुंड और पीछे दिखती सराय |
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| सोमवती कुंड और सराय का एक दृश्य |
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| मकबरे के चारों तरफ इसी प्रकार का बरामदा है |
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| बरामदे की छत के ऊपर का एक दृश्य |
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| दरिया खान का मकबरा - पिछले भाग |
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| मकबरे का दूसरा सिरा |
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| मकबरे का मुख्य द्वार |
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| दरिया खान के मकबरे का मुख्य द्वार |
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| बीच में दरिया खान की कब्र है बाकी उनकी पत्नी या परिवार के सदस्यों की हो सकती हैं। |
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| दरिया खान के मकबरे का परिसर |
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| सोमवती कुंड और दरिया खान के मकबरे का गुंम्बद |
6. मलिक मुगीध की मस्जिद
द्वार पर उत्कीर्ण अभिलेख के अनुसार इस मस्जिद का निर्माण सुल्तान महमूद खिलजी के पिता मालिक मुघीथ ने 1452 ई. में करवाया था। यह मस्जिद पूर्ण रूप से मुस्लिम वास्तुकला शैली में निर्मित है और अपने समय में प्रथम चरण की है। मस्जिद का प्रवेशद्वार भव्य है और इसके अंदर तीन मेहराबदार एक मस्जिद है जो शानदार स्तम्भों से मिलकर बनी है।
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| मालिक मुगीथ की मस्जिद का एक दृश्य |
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| मस्जिद के अंदर सामने दिखाई देते तीन मेहराब वाला स्तम्भ युक्त एक कक्ष, जो मुख्य मस्जिद है। |
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| मस्जिद के मुख्य द्वार का अंदर के और से एक दृश्य |
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| दूर से मस्जिद का एक दृश्य |
7. कारवाँ सराय
मलिक मुगीध की मस्जिद के ठीक सामने कारवाँ सराय है। यह मध्यकालीन सराय है जहाँ यात्रियों और व्यापारियों के ठहरने हेतु अनेकों कमरे बने हैं। उनके सामान रखने और व्यापार करने हेतु सराय के अंदर काफी बड़ा मैदान है। जैसा कि नाम से ही प्रतीत होता है कि यह एक कारवां सराय है जिसका अर्थ है कि यहाँ मांडू होकर गुजरने वाले यात्रियों अथवा व्यापारियों का कारवां ठहरता होगा।
8. दाई का महल
हम दाई के महल पर पहुंचे। यह मांडू की एक मुख्य इमारत है। संभवतः यह एक महिला का मकबरा है जो शासनकाल के दौरान शाही राजपरिवार से सम्बंधित रही होगी और उसकी मृत्यु के पश्चात उसके शानदार मकबरे में उसे दफना दिया गया होगा।
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| यह एक बांध है जो दाई के महल से दिखाई देता है। |
9. दाई की छोटी बहिन का महल
दाई के महल और कारवां सराय में मध्य में दाई की छोटी बहन का महल दिखाई देता है। यह एक शानदार मकबरा है जो सम्भतः किसी राज महिला का है और इसे दाई की छोटी बहन के महल के नाम से जाना जाता है। मकबरे की संरचना बहुत ही आकर्षक है जिसे देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह मध्य काल में कितनी भव्य और आकर्षक रही होगी।
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10. लाल बाग़
दाई के महल के नजदीक ही लालबाग़ है जो एक खूबसूरत बगीचा था। इस बगीचे में जलप्रणाली की शानदार संरचना देखने को मिलती है। यह एक शानदार फ़व्वबारों वाला बगीचा है।
11. गुमनाम मकबरा क्रमांक तीन
दाई के महल के उत्तर की ओर यह गुमनाम मकबरा दिखाई देता है जिसमें मुख्य मकबरे के नीचे अनेक कमरों वाला चौकोर आधार स्थल दिखाई देता है। मकबरे की भव्यता को देखकर लगता है यह किसी उच्च शाही व्यक्ति का होगा।
10. रूपमती का महल
अब हम रानी रूपमती के महल की तरफ बढ़ चले थे। रानी रूपमती, मांडू का एक प्रमुख पात्र हैं जिनसे मांडू की लोक कथाएं आज भी प्रचलित हैं।
रूपमती सहारंगपुर के एक किसान थान सिंह की बेटी थीं।
वह न केवल सुंदर थीं, बल्कि शास्त्रीय संगीत और गायन (विशेषकर राग मलहार) में निपुण थीं।
बाज बहादुर ने उनकी आवाज से मोहित होकर विवाह का प्रस्ताव रखा। रूपमती ने इस शर्त पर विवाह स्वीकार किया कि सुल्तान उन्हें प्रतिदिन पवित्र नर्मदा नदी के दर्शन कराएं।
उनके लिए बाज बहादुर ने मांडू में ऊँची पहाड़ी पर महल बनवाया, जहाँ से वे नर्मदा के दर्शन करती थीं।
1561 में अकबर के सेनापति आदम खान ने मांडू पर हमला किया। बाज बहादुर की हार के बाद, आदम खान की नजर रूपमती पर पड़ी। रानी रूपमती ने अपनी आन-बान और धर्म की रक्षा के लिए जहर खाकर (हीरे की अंगूठी निगलकर) प्राण त्याग दिए।
रानी रूपमती और बाज बहादुर का प्रेम, उनके द्वारा गाए गए गीत और महल आज भी मांडू की पहचान हैं।
11. बाज़बहादुर का महल
मध्यप्रदेश के मांडू में स्थित प्रसिद्ध बाज बहादुर का महल खिलजी वंश के सुल्तान नासिरुद्दीन, 1508-1509 ईस्वी के दौरान बनवाया था। यह महल रानी रूपमती और बाज बहादुर की प्रेम कहानी का गवाह है। हालाँकि यह महल नासिरुद्दीन ने बनवाया था, लेकिन बाद में राजा बाज बहादुर ने इसे अपने रहने और संगीत समारोहों के लिए उपयोग किया।
यह राजपूत और मुगल स्थापत्य शैली का एक अनूठा मिश्रण है।
राजा बाज बहादुर, जो संगीत और कला के शौकीन थे, इस महल का इस्तेमाल करते थे।
12. रेवा कुंड
रेवा कुंड का निर्माण 16वीं शताब्दी में राजा बाज बहादुर ने रानी रूपमती के लिए बनवाया था। यह कुंड रानी रूपमती के महल के पास स्थित है और नर्मदा नदी का पानी इसमें आने की मान्यता है, जो इसे पवित्र बनाता है।
यह कुंड बाज बहादुर और रानी रूपमती की अमर प्रेम कहानी और उनके समर्पण का प्रतीक है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, रानी रूपमती नर्मदा नदी की भक्त थीं और उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर नर्मदा जी ने यहाँ निवास करने का आशीर्वाद दिया था।
यहाँ एक प्राचीन जल लिफ्ट प्रणाली है जो रानी के महल तक पानी पहुँचाने के लिए बनाई गई थी।
यह स्थान नर्मदा परिक्रमा करने वाले तीर्थयात्रियों के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, जो अक्सर यहाँ पूजा-अर्चना करते हैं।
यह स्थान पर्यटकों के लिए एक शांत और मनोरम स्थल है, जो अपनी ऐतिहासिक महत्ता के लिए जाना जाता है।
13 . रोज़ा का मक़बरा ( खादिजा बीवी का मकबरा )
यह खादिजा बीवी का मक़बर है, जो मध्यकाल की प्रसिद्ध सूफी साधिका थीं। इसलिए इस मकबरे को "रोजा" या समाधि के रूप में जाना जाता है।
यह मांडू के प्राचीन शहर में ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व का स्थल है, जो अपने खंडहरों और विरासत वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है।
खादिजा बीवी का निकाह शेख कुतुबद्दीन से हुआ था जिनके देहांत के बाद उन्हें इसी मकबरे में दफनाया गया था।
12. डाकिन्या महल
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अशरफी महल
मूल रूप से इसे होशंग शाह ने एक मदरसे (स्कूल) के रूप में बनवाया था, जिसे बाद में महमूद खिलजी ने अपने मकबरे के रूप में बदल दिया। यह अपनी सात मंजिला विजय मीनार और अनूठी वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है।
इसे 1405-1422 के बीच बनवाया गया था। मान्यता है कि यहां की रानियों को सीढ़ियां चढ़ने पर सोने के सिक्के (अशरफी) इनाम में मिलते थे, जिससे इसका नाम अशरफी महल पड़ा।
यहाँ महमूद खिलजी का मकबरा था, जिसमें सफेद, काले और पीले संगमरमर का उपयोग किया गया था। इसके साथ ही यहाँ एक सात मंजिला विजय मीनार भी बनाई गई थी।
उचित रखरखाव के अभाव में इसका विशाल गुंबद ढह गया और अब यह खंडहर (ruins) के रूप में मौजूद है।
यह जामी मस्जिद के ठीक सामने है, जहाँ आप खंडहरों के साथ-साथ शानदार नक्काशी के अवशेष देख सकते हैं।
सुल्तान महमूद खिलजी का मकबरा / MAHMOOD KHILJI TOMB
मालवा सल्तनत के सुल्तान महमूद खिलजी (1436–1469) का मकबरा है। यह ऐतिहासिक स्मारक अशरफी महल के पीछे, जामा मस्जिद और होशंग शाह के मकबरे के पास बना हुआ है। सफेद संगमरमर से निर्मित यह संरचना तत्कालीन वास्तुकला का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है, जिसमें अक्सर मकबरे के साथ ही मदरसा (अशरफी महल) के अवशेष भी देखे जाते हैं।
यह सफेद संगमरमर से बनी एक मीनारनुमा संरचना थी, जिसमें कभी एक ऊंचा गुंबद था, जो अब खंडहरनुमा अवस्था में है।
महमूद खिलजी मालवा में खिलजी वंश का संस्थापक था और उसने 33 वर्षों तक शासन किया। यह स्थान मांडू के प्रमुख 'ग्राम समूह स्मारक' का हिस्सा है।
यह मकबरा अब मुख्य रूप से खंडहर के रूप में ही मौजूद है, लेकिन ऐतिहासिक और स्थापत्य कला की दृष्टि से मांडू के दर्शनीय स्थलों में से एक है।
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| GRAVE OF MAHMOOD KHILJI / सुल्तान महमूद खिलजी की कब्र |
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मांडू की जामा मस्जिद
मांडू की जामा मस्जिद मध्य प्रदेश
के धार जिले में स्थित 15 वीं सदी की एक शानदार धरोहर है, जिसे 1454 ईस्वी में महमूद खिलजी ने पूरा किया था। यह दमिश्क की महान मस्जिद से प्रेरित होकर बनाई गई है, जो अपनी भव्यता, 25 मेहराबों, विशाल प्रांगण और हिंदू-इस्लामिक स्थापत्य कला के मिश्रण के लिए प्रसिद्ध है।
होशंग शाह द्वारा शुरू किया गया और महमूद खिलजी के समय 1454 में पूर्ण।
यह मस्जिद पूरी तरह से लाल पत्थर और चूने से बनी है, जो अपने शानदार मेहराबों और खंभों के लिए जानी जाती है।
इस मस्जिद में कोई मीनार नहीं है। इसमें 3 विशाल गुंबद हैं और छत पर 158 छोटे गुंबद (cupolas) बने हुए हैं।
यह एक ऊँचे चबूतरे पर स्थित है, जिसके सामने 30 सीढ़ियाँ हैं। इसके पश्चिमी हिस्से में मुख्य नमाज़ कक्ष है, जिसके चारों ओर गलियारे हैं।
जहाज महल
जहाज महल मांडू में स्थित एक 15 वीं सदी की अद्वितीय दो मंजिला ईमारत है, जिसे सुल्तान गयासुद्दीन खिलजी ने बनबाया था।
कपूर तालाब और मुंज तालाब के बीच स्थित, यह महल पानी में तैरते हुए जहाज जैसा दिखता है, जिसका उपयोग शाही हरम (15,000 बेगमों) के लिए किया जाता था।
यह 120 मीटर लंबी और 152 मीटर चौड़ी इमारत है, जो वास्तुकला में हिंदू और इस्लामी शैलियों के मिश्रण को प्रदर्शित करती है।
इसे 1469 से 1500 ईस्वी के बीच बनाया गया था।
महल में वर्षा जल संचयन (Rainwater harvesting) की बेहतरीन व्यवस्था है, जिसमें छत पर बने कमल के आकार के कुंड और रहट तकनीक शामिल है।
इसमें विशाल मंडप, संकरे कमरे और सुंदर मेहराबदार गलियारे हैं।
यह सूर्यास्त का शानदार दृश्य प्रदान करता है और मानसून के दौरान इसकी सुंदरता और अधिक निखर जाती है।
भारतीय पर्यटकों के लिए मामूली प्रवेश शुल्क है, और यह सुबह से शाम तक खुला रहता है।
गदा शाह का महल
यह १५वीं-१६वीं शताब्दी के राजपूत सरदार मेदिनी राय का निवास स्थान माना जाता है, जो सुल्तान महमूद द्वितीय के अधीन शक्तिशाली थे। यह स्थान अपनी वास्तुकला, महराबदार खिड़कियों और तत्कालीन शॉपिंग मॉल जैसी संरचना के लिए जाना जाता है।
कपूर झील
मांडू संग्रहालय
तवेली महल
भंगी दरवाजा
आलमगीर दरवाजा
शाही स्नानघर
हिंडोला महल
चंपा बावड़ी
जहाज महल के पीछे शाही परिसर के अवशेष
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