Sunday, July 30, 2023

MANDU : A Historical Empire of Malwa

 MANDU - A CAPITAL OF MALWA

मालवा की प्राचीन और मध्य कालीन राजधानी - माण्डू 


मालवा प्रान्त के विंध्याचल पर्वतमाला की गोद में स्थित मांडू प्राकृतिक रूप से बहुत ही सुन्दर स्थान है। इसके शांत वातावरण और आश्चर्य चकित कर देने वाले प्राकृतिक दृश्यों की वजह से यह अनेकों भारतीय राजाओं का पसंदीदा स्थल रहा है। मानसून के समय यहाँ फैली हरियाली और सुगन्धित वायु, अनायास ही मन को मोह लेती है। इसके अलावा विंध्य पर्वतों के बीच स्थित होने के कारण यह सुरक्षा की दृष्टि से भी सक्षम स्थान है इसीलिए प्राचीन काल से लेकर मध्य काल तक यह अनेकों राजवंशो की शरण स्थली और राजधानी रहा है। 

दसवीं शताब्दी में यहाँ परमार वंश के शासकों का शासन रहा, जिनमें मुंज राज, सिद्धराज और राजा भोज का नाम प्रमुख है। हालाँकि इन शासकों की राजधानी धारा नगरी थी जो वर्तमान में धार जिला है, फिर भी उन्होने मांडू को भी अपना मुख्य राजनितिक केंद्र बनाये रखा था। 



महेश्वर से माण्डू मार्ग 

महेश्वर और सहस्त्रधारा देखने के बाद मैं और सोहन भाई मांडू के लिए बढ़ चले। हम धमनोद की तरफ बढ़ रहे थे, गूगल मैप के हिसाब से धमनोद से ही मांडू का रास्ता अलग होता है। शीघ्र ही हम धमनोद पहुँच गए, यहाँ मैंने मथुरा मिष्ठान भंडार के नाम से एक दुकान देखी, हमें अपने गृहनगर की याद आ गई। धामनोद से निकलने के बाद हम मांडू रोड पर पहुंचे। मौसम बेहद ही खुशनुमा था और मध्य प्रदेश  की धरती पर आज बाइक यात्रा करके मन बहुत ही आनंदित हो उठा था। हर तरफ फैली हरियाली और आसमान में छाए घने बादल हमारी यात्रा को और भी यादगार बनाते जा रहे थे। 

सामने विंध्य पर्वतमाला दिखाई देने लगी थी, उन्हीं ऊँचे पहाड़ो के कहीं माण्डू बसा हुआ है और हम वहां जल्द ही पहुँचने वाले हैं, बस यही सोचकर हम ख़ुशी से आगे बढ़ते ही जा रहे थे। यह वही पर्वत माला थी जिससे हम कल नीचे उतरे थे, जाम गेट की तरफ से। जामगेट हमारी लोकेशन से पूर्व की तरफ है, अर्थात हम अंग्रेजी के U आकार की शेप में यात्रा कर रहे थे जिसमें एक कोने पर जाम गेट था, दूसरे पर मांडू और नीचे की तरफ नर्मदा नदी है। जिसके एक तरफ महेश्वर और दूसरी तरफ धामनोद है। 

शीध्र ही हम एक चौराहे पर पहुंचे। सोहन भाई यहाँ थोड़ी देर रूककर आराम करना चाहते थे, और यह आवश्यक भी था क्योंकि धामनोद के बाद यह हमारा अगला ठहराव था। यहाँ के भील पुरुष की मूर्ति लगी हुई थी। मालवा प्रांत में सामान्यतः भील जनजाति के लोग निवास करते हैं, उनमें से कुछ ऐसे महान पुरुष भी हैं जिन्होंने ने देश और समाज के कल्याण के लिए विभिन्न कार्य किये और अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित किया। उन्हीं महापुरुषों के सम्मान में मध्यप्रदेश के इस प्रांत में अनेकों चौराहों पर प्रतिमाएं देखने को मिलती हैं। कुछ समय यहाँ ठहर कर हम आगे बढ़ चले। 

अब घाट शुरू हो चुके थे और हम गोल घुमावदार चढ़ाई भरे रास्ते पर घने वनों से होकर गुजर रहे थे। सोहन भाई का बाइक चलाना और रूपक जैन साब द्वारा दिलाई गई यह सुजुकी हयाते बाइक दोनों का ही काम इस समय काबिले तारीफ़ था।  बारिश में भीगते हुए हम बस ऊपर चढ़ते ही जा रहे थे।  एक स्थान पर जब बारिश तेज हो  गई तो हम भुट्टे वाली एक दुकान पर रुके और गरम गरम भुने भुट्टे के आनंद लेने लगे। ऐसी भुट्टे के दुकाने इस चढ़ाई  भरे रास्ते पर अलग अलग जगहों पर अनेकों थी। मक्के की भुटिया खाकर हम बरसात कम होते ही आगे बढ़ चले। 


 

महेश्वर से निकलते ही एक मंदिर का दृश्य 

मथुरा स्वीट सेंटर एक चौराहे पर 

रास्ते में एक छोटी नदी का दृश्य 

धामनोद आगमन 

धामनोद में एक मंदिर 

दूर जो वादियां नजर आ रही हैं ना -  वहीँ मांडू है 

मालवा में एक बैलगाड़ी 

मालवा यात्रा 

मांडू रोड 

मांडू रोड पर एक लोकेशन 

भील समाज के एक महापुरुष की प्रतिमा 

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इस भील चौराहे से बाज बहादुर के महल के लिए रास्ता गया है। 

भील चौराहा और बाइक निकालते सोहन भाई 

विंध्य पर्वत शृंखला अब शुरू हो चुकी है 

रास्ते में एक स्थान पर भुट्टे का स्वाद लेते सोहन भाई 

यही भुट्टे की दूकान थी

जहाँ मैंने भी इस मक्के के भुट्टे का आनंद लिया 



 मांडू में प्रवेश


1 . सोनगढ़ किला 

जल्द ही चढ़ाई समाप्त हो गई और हम मांडू की धरती पर पहुँच गए। सर्वप्रथम हम मांडू के सोनगढ़ किले पर पहुंचे जो पर्वत पर ऊपर आते ही हमें एक तरफ दिखाई दिया। हम इस किले में पहुंचे तो देखा, कि इस किले में अब कुछ भी नहीं बचा था सिर्फ इसके मुख्य द्वार के जो देखने में आज भी काफी भव्य लगता है। किले की वास्तुकला और इसकी सामग्री प्राचीन काल की है किन्तु मुख्य प्रवेश द्वार का निर्माण पुनः कराया गया था। 

चूँकि परमारकालीन  शासकों की राजधानी धारा नगरी थी परन्तु उन्होंने अपने समय में मांडू में एक विशाल सुरक्षित गढ़ की स्थापना की थी। सोनगढ़ की वास्तु शैली को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि यह उसी समय का निर्मित है और वैसे भी इस किले का निर्माण वर्ष 11 वीं शताब्दी में ही माना गया है। इस किले से जुडी एक मुख्य घटना का विवरण तब मिलता है जब मुग़ल बादशाह हुमांयू ने मालवा को घेर लिया था और गुजरात का शासक बहादुर शाह इस किले से ही बच निकलकर भागा था। 







2  चोर कोट और मस्जिद 


सोनगढ़ से आगे बढ़ने के बाद हम नीलकंठ मंदिर पहुंचे, किसी कारण इस समय मंदिर के द्वार बंद थे इसलिए हम आगे बढ़ चले। आगे बढ़ने पर हमें चोरकोट नामक यह ईमारत देखने को मिली। 

यह पूरी तरह से एक ध्वस्त इमारत है। इमारत की संरचना को देखकर यह घोड़ों के अस्तबल जैसा प्रतीत होता है।  हो ना हो, सल्तनतकाल में यह सेना के घोड़ों को रखने का ही स्थान रहा हो। 





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3.गुमनाम मकबरा क्रमांक - एक 

चोरकोट के ही नजदीक एक मकबरा दिखाई देता है। मकबरे की वास्तु शैली शानदार है, इसे देखकर लगता है यह सल्तनत काल के किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति का हो सकता है। चूँकि यहाँ पर कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है कि यह मकबरा किसका है।  हम सिर्फ अनुमान के आधार पर ही बता सकते हैं यह किसी धार्मिक प्रवृति वाले व्यक्ति का ही मकबरा है जो शाही दरबार में किसी उच्च पद पर आसीन था।  ऐसा हम इसलिए कह सकते है क्योंकि हमें यहाँ एक मस्जिद भी देखने को मिली जो इस मकबरे के अहाते में है और इसी के बिलकुल नजदीक स्थित है। 

मध्यकाल में किसी इस्लामिक संत की मृत्यु होने पर उसे दफनाकर एक मकबरे का निर्माण किया जाता था और उसी के नजदीक एक मस्जिद का निर्माण भी किया जाता था।   


मकबरे के नजदीक ही मस्जिद बनी है।  


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एक विशाल वृक्ष 

4. गुमनाम मक़बरा क्रमांक - दो 

हम बारिश की फुहारों के बीच मांडू की सड़कों पर घूम रहे थे। चोरकोट से थोड़ा आगे बढ़ते ही हमने एक शानदार मकबरे को देखा। यह मकबरा, इसके चारों तरफ बिछी हरी घास की वजह से और भी सुन्दर लग रहा था। मकबरे  के ठीक सामने एक आम का पेड़ भी था जिसकी डालों पर लटककर सोहन भाई अपने बचपन को याद कर रहे थे और मैं इस मकबरे का विवरण खोजने में लगा था। किन्तु यहाँ कुछ भी ऐसा नहीं था जिससे यह ज्ञात हो सकता, कि आखिर यह मकबरा किसका था,  इसका निर्माण कब हुआ और इसे किसने बनवाया ? 

    मकबरे की वास्तुकला बहुत ही शानदार है, इतना बड़ा मकबरा किसी प्रसिद्ध व्यक्ति का ही हो सकता है। हालांकि इस मकबरे के परिसर में कोई मस्जिद नहीं है, इससे साबित होता है यह मकबरा किसी शाही दरवार  व्यक्ति का है।  मकबरे के अंदर कोई कब्र नहीं थी। मकबरे का अंदरूनी हिस्सा क्षतिग्रस्त था और इसके अंदर बरसात से बचने के लिए गाय, भैंस और बकरियों ने शरण ली हुई थी। 

पुरातत्व विभाग की ओर से भी इस मकबरे की कोई जानकारी यहाँ उपलब्ध नहीं थी। वैसे भी मांडू में सबसे अधिक मकबरे हैं, पुरात्तव विभाग भी कितने मकबरों के इतिहास की पुष्टि करेगा। तेज बारिश आने पर हम कुछ समय गाय भैंसों के साथ मकबरे में छिपे रहे और बारिश बंद होते ही यहाँ से रवाना हो चले।  




















5. दरिया खान का मकबरा 


गुमनाम मकबरा देखने के बाद हम दरिया खान के मकबरे पर पहुंचे। यह एक प्रसिद्द और सुन्दर स्थान है। 
दरिया खान, चौदहवीं शताब्दी में मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी के दरबार में एक प्रतिष्ठित पद पर तैनात थे और उस समय के रईसों में से एक थे। उनकी सेवा और निष्ठा से प्रेरित होकर सुल्तान ने उनका एक उत्कृष्ट मकबरे का निर्माण कराया था। यह मकबरा आज भी काफी भव्य लगता है, मकबरे के अंदर दरिया खान की कब्र है, इसके अलावा यहाँ और भी कब्रें हैं जो शायद उनके परिवार के सदस्यों की हो सकती हैं।  

दरिया खान का मकबरा चारों और से छोटे छोटे कक्षों से घिरा हुआ है, इसके एक किनारे पर जामी मस्जिद है और दूसरे किनारे पर एक सराय के अवशेष दिखाई देते हैं। मकबरे के ठीक पीछे एक पानी से भरा कुंड है जिसे सोमवती कुंड नाम दिया गया है। इस मकबरे के चारों ओर बरामदा बना है और ठीक बीच में दरिया खान का मकबरा है। 

 एक मकबरे के नजदीक इन सबका होना दर्शाता है कि दरिया खान, ना केवल शाही दरबार में एक उच्च प्रशासनिक अधिकारी थे, बल्कि वह एक धार्मिक प्रवृति के व्यक्ति थे क्योंकि इस परिसर में ना केवल जामी मस्जिद बल्कि एक और मस्जिद भी देखने को मिलती है जो बिलकुल वैसी है, जैसी मकबरा क्रमांक एक के साथ देखने को मिली थी। 

यह स्थान बहुत ही मनोरम है, यहीं से कुछ दुरी पर हाथी महल भी दिखाई देता है। 



दरिया खान के मकबरे की तरफ जाता रास्ता 

दरिया खान की मस्जिद का पिछला भाग 
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सामने नजर आती सराय 

दरिया खान की जामीमस्जिद का एक दृश्य 


सोहन भाई का एक फोटो 

सराय का एक दृश्य 

दूर दिखाई देता हाथी महल 

दरिया खान के मकबरे के परिसर में एक और मस्जिद 

मस्जिद का सामने से दृश्य 

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दरिया खान की जामी मस्जिद 



सोमवती कुंड और पीछे दिखती सराय 

सोमवती कुंड और सराय का एक दृश्य 

मकबरे के चारों तरफ इसी प्रकार का बरामदा है 


बरामदे की छत के ऊपर का एक दृश्य 


दरिया खान का मकबरा - पिछले भाग 

मकबरे का दूसरा सिरा 

मकबरे का मुख्य द्वार 

दरिया खान के मकबरे का मुख्य द्वार  

बीच में दरिया खान की कब्र है बाकी उनकी पत्नी या परिवार के सदस्यों की हो सकती हैं। 



दरिया खान के मकबरे का परिसर 








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सोमवती कुंड और दरिया खान के मकबरे का गुंम्बद 






6. मलिक मुगीध की मस्जिद 

द्वार पर उत्कीर्ण अभिलेख के अनुसार इस मस्जिद का निर्माण सुल्तान महमूद खिलजी के पिता मालिक मुघीथ ने 1452 ई. में करवाया था। यह मस्जिद पूर्ण रूप से मुस्लिम वास्तुकला शैली में निर्मित है और अपने समय में प्रथम चरण की है। मस्जिद का प्रवेशद्वार भव्य है और इसके अंदर तीन मेहराबदार एक मस्जिद है जो शानदार स्तम्भों से मिलकर बनी है। 




मालिक मुगीथ की मस्जिद का एक दृश्य 

मस्जिद के अंदर सामने दिखाई देते तीन मेहराब वाला स्तम्भ युक्त एक कक्ष, जो मुख्य मस्जिद है। 

मस्जिद के मुख्य द्वार का अंदर के और से एक दृश्य 

दूर से मस्जिद का एक दृश्य 








7. कारवाँ सराय 

मलिक मुगीध की मस्जिद के ठीक सामने कारवाँ सराय है। यह मध्यकालीन सराय है जहाँ यात्रियों और व्यापारियों के ठहरने हेतु अनेकों कमरे बने हैं। उनके सामान रखने और व्यापार करने हेतु सराय के अंदर काफी बड़ा मैदान है। जैसा कि नाम से ही प्रतीत होता है कि यह एक कारवां सराय है जिसका अर्थ है कि यहाँ मांडू होकर गुजरने वाले यात्रियों अथवा व्यापारियों का कारवां ठहरता होगा। 

 











8. दाई का महल 

हम दाई के महल पर पहुंचे। यह मांडू की एक मुख्य इमारत है। संभवतः यह एक महिला का मकबरा है जो शासनकाल के दौरान शाही राजपरिवार से सम्बंधित रही होगी और उसकी मृत्यु के पश्चात उसके शानदार मकबरे में उसे दफना दिया गया होगा। 
















यह एक बांध है जो दाई के महल से दिखाई देता है। 









9. दाई की छोटी बहिन का महल 

दाई के महल और कारवां सराय में मध्य में दाई की छोटी बहन का महल दिखाई देता है। यह एक शानदार मकबरा है जो सम्भतः किसी राज महिला का है और इसे दाई की छोटी बहन के महल के नाम से जाना जाता है। मकबरे की संरचना बहुत ही आकर्षक है जिसे देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह मध्य काल में कितनी भव्य और आकर्षक  रही होगी। 







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10. लाल बाग़ 


दाई के महल के नजदीक ही लालबाग़ है जो एक खूबसूरत बगीचा था। इस बगीचे में जलप्रणाली की शानदार संरचना देखने को मिलती है। यह एक शानदार फ़व्वबारों वाला बगीचा है। 








11. गुमनाम मकबरा क्रमांक तीन 


दाई के महल के उत्तर की ओर यह गुमनाम मकबरा दिखाई देता है जिसमें मुख्य मकबरे के नीचे अनेक कमरों वाला चौकोर आधार स्थल दिखाई देता है। मकबरे की भव्यता को देखकर लगता है यह किसी उच्च शाही व्यक्ति का होगा। 







10. रूपमती का महल 


अब हम रानी रूपमती के महल की तरफ बढ़ चले थे। रानी रूपमती, मांडू का एक प्रमुख पात्र हैं जिनसे मांडू की लोक कथाएं आज भी प्रचलित हैं। 

रूपमती सहारंगपुर के एक किसान थान सिंह की बेटी थीं।

वह न केवल सुंदर थीं, बल्कि शास्त्रीय संगीत और गायन (विशेषकर राग मलहार) में निपुण थीं।

बाज बहादुर ने उनकी आवाज से मोहित होकर विवाह का प्रस्ताव रखा। रूपमती ने इस शर्त पर विवाह स्वीकार किया कि सुल्तान उन्हें प्रतिदिन पवित्र नर्मदा नदी के दर्शन कराएं।

उनके लिए बाज बहादुर ने मांडू में ऊँची पहाड़ी पर महल बनवाया, जहाँ से वे नर्मदा के दर्शन करती थीं।

 1561 में अकबर के सेनापति आदम खान ने मांडू पर हमला किया। बाज बहादुर की हार के बाद, आदम खान की नजर रूपमती पर पड़ी। रानी रूपमती ने अपनी आन-बान और धर्म की रक्षा के लिए जहर खाकर (हीरे की अंगूठी निगलकर) प्राण त्याग दिए।































11. बाज़बहादुर का महल 


मध्यप्रदेश के मांडू में स्थित प्रसिद्ध बाज बहादुर का महल खिलजी वंश के सुल्तान नासिरुद्दीन, 1508-1509 ईस्वी के दौरान बनवाया था। यह महल रानी रूपमती और बाज बहादुर की प्रेम कहानी का गवाह है। हालाँकि यह महल नासिरुद्दीन ने बनवाया था, लेकिन बाद में राजा बाज बहादुर ने इसे अपने रहने और संगीत समारोहों के लिए उपयोग किया।

यह राजपूत और मुगल स्थापत्य शैली का एक अनूठा मिश्रण है।

राजा बाज बहादुर, जो संगीत और कला के शौकीन थे, इस महल का इस्तेमाल करते थे।














12. रेवा कुंड 


रेवा कुंड का निर्माण 16वीं शताब्दी में राजा बाज बहादुर ने रानी रूपमती के लिए बनवाया था। यह कुंड रानी रूपमती के महल के पास स्थित है और नर्मदा नदी का पानी इसमें आने की मान्यता है, जो इसे पवित्र बनाता है।

यह कुंड बाज बहादुर और रानी रूपमती की अमर प्रेम कहानी और उनके समर्पण का प्रतीक है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, रानी रूपमती नर्मदा नदी की भक्त थीं और उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर नर्मदा जी ने यहाँ निवास करने का आशीर्वाद दिया था।

 यहाँ एक प्राचीन जल लिफ्ट प्रणाली है जो रानी के महल तक पानी पहुँचाने के लिए बनाई गई थी।

यह स्थान नर्मदा परिक्रमा करने वाले तीर्थयात्रियों के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, जो अक्सर यहाँ पूजा-अर्चना करते हैं।

यह स्थान पर्यटकों के लिए एक शांत और मनोरम स्थल है, जो अपनी ऐतिहासिक महत्ता के लिए जाना जाता है।











13 . रोज़ा का मक़बरा ( खादिजा बीवी का मकबरा ) 

 यह खादिजा बीवी का मक़बर है, जो मध्यकाल की प्रसिद्ध सूफी साधिका थीं। इसलिए इस मकबरे को  "रोजा" या समाधि के रूप में जाना जाता है। 

 यह मांडू के प्राचीन शहर में ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व का स्थल है, जो अपने खंडहरों और विरासत वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है।

खादिजा बीवी का निकाह शेख कुतुबद्दीन से हुआ था जिनके देहांत के बाद उन्हें इसी मकबरे में दफनाया गया था। 

















12. डाकिन्या महल 














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अशरफी महल 

 मूल रूप से इसे होशंग शाह ने एक मदरसे (स्कूल) के रूप में बनवाया था, जिसे बाद में महमूद खिलजी ने अपने मकबरे के रूप में बदल दिया। यह अपनी सात मंजिला विजय मीनार और अनूठी वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है।

इसे 1405-1422 के बीच बनवाया गया था। मान्यता है कि यहां की रानियों को सीढ़ियां चढ़ने पर सोने के सिक्के (अशरफी) इनाम में मिलते थे, जिससे इसका नाम अशरफी महल पड़ा।

यहाँ महमूद खिलजी का मकबरा था, जिसमें सफेद, काले और पीले संगमरमर का उपयोग किया गया था। इसके साथ ही यहाँ एक सात मंजिला विजय मीनार भी बनाई गई थी।

उचित रखरखाव के अभाव में इसका विशाल गुंबद ढह गया और अब यह खंडहर (ruins) के रूप में मौजूद है।

यह जामी मस्जिद के ठीक सामने है, जहाँ आप खंडहरों के साथ-साथ शानदार नक्काशी के अवशेष देख सकते हैं।









सुल्तान महमूद खिलजी का मकबरा / MAHMOOD KHILJI TOMB

मालवा सल्तनत के सुल्तान महमूद खिलजी (1436–1469) का मकबरा है। यह ऐतिहासिक स्मारक अशरफी महल के पीछे, जामा मस्जिद और होशंग शाह के मकबरे के पास बना हुआ है। सफेद संगमरमर से निर्मित यह संरचना तत्कालीन वास्तुकला का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है, जिसमें अक्सर मकबरे के साथ ही मदरसा (अशरफी महल) के अवशेष भी देखे जाते हैं।

यह सफेद संगमरमर से बनी एक मीनारनुमा संरचना थी, जिसमें कभी एक ऊंचा गुंबद था, जो अब खंडहरनुमा अवस्था में है।

 महमूद खिलजी मालवा में खिलजी वंश का संस्थापक था और उसने 33 वर्षों तक शासन किया। यह स्थान मांडू के प्रमुख 'ग्राम समूह स्मारक' का हिस्सा है।





GRAVE OF MAHMOOD KHILJI / सुल्तान महमूद खिलजी की कब्र 

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मांडू की जामा मस्जिद 




मांडू की जामा मस्जिद मध्य प्रदेश
के धार जिले में स्थित 15 वीं सदी की एक शानदार धरोहर है, जिसे 1454 ईस्वी में महमूद खिलजी ने पूरा किया था। यह दमिश्क की महान मस्जिद से प्रेरित होकर बनाई गई है, जो अपनी भव्यता, 25 मेहराबों, विशाल प्रांगण और हिंदू-इस्लामिक स्थापत्य कला के मिश्रण के लिए प्रसिद्ध है।

होशंग शाह द्वारा शुरू किया गया और महमूद खिलजी के समय 1454 में पूर्ण।
यह मस्जिद पूरी तरह से लाल पत्थर और चूने से बनी है, जो अपने शानदार मेहराबों और खंभों के लिए जानी जाती है।
इस मस्जिद में कोई मीनार नहीं है। इसमें 3 विशाल गुंबद हैं और छत पर 158 छोटे गुंबद (cupolas) बने हुए हैं।

यह एक ऊँचे चबूतरे पर स्थित है, जिसके सामने 30 सीढ़ियाँ हैं। इसके पश्चिमी हिस्से में मुख्य नमाज़ कक्ष है, जिसके चारों ओर गलियारे हैं।





जहाज महल 


जहाज महल मांडू में स्थित एक 15 वीं सदी की अद्वितीय दो मंजिला ईमारत है, जिसे सुल्तान गयासुद्दीन खिलजी ने बनबाया था। 
कपूर तालाब और मुंज तालाब के बीच स्थित, यह महल पानी में तैरते हुए जहाज जैसा दिखता है, जिसका उपयोग शाही हरम (15,000 बेगमों) के लिए किया जाता था

यह 120 मीटर लंबी और 152 मीटर चौड़ी इमारत है, जो वास्तुकला में हिंदू और इस्लामी शैलियों के मिश्रण को प्रदर्शित करती है।

इसे 1469 से 1500 ईस्वी के बीच बनाया गया था।

महल में वर्षा जल संचयन (Rainwater harvesting) की बेहतरीन व्यवस्था है, जिसमें छत पर बने कमल के आकार के कुंड और रहट तकनीक शामिल है।

इसमें विशाल मंडप, संकरे कमरे और सुंदर मेहराबदार गलियारे हैं।

यह सूर्यास्त का शानदार दृश्य प्रदान करता है और मानसून के दौरान इसकी सुंदरता और अधिक निखर जाती है।

भारतीय पर्यटकों के लिए मामूली प्रवेश शुल्क है, और यह सुबह से शाम तक खुला रहता है।















गदा शाह का महल 

यह १५वीं-१६वीं शताब्दी के राजपूत सरदार मेदिनी राय का निवास स्थान माना जाता है, जो सुल्तान महमूद द्वितीय के अधीन शक्तिशाली थे। यह स्थान अपनी वास्तुकला, महराबदार खिड़कियों और तत्कालीन शॉपिंग मॉल जैसी संरचना के लिए जाना जाता है। 












कपूर झील 







मांडू  संग्रहालय 








तवेली महल 













भंगी दरवाजा 








आलमगीर दरवाजा 




























शाही स्नानघर 














हिंडोला महल 







चंपा बावड़ी 









जहाज महल के पीछे शाही परिसर के अवशेष 































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