Thursday, August 31, 2023

MATHURA TO THANESAR : KURUKSHETRA 2023

 मथुरा से थानेश्वर - एक रेल यात्रा 


सितम्बर का महीना चल रहा है जिसका मतलब ना अधिक सर्दी है और ना अधिक गर्मी है और अब बरसात भी थम सी चुकी है। यह यात्रा करने का सर्वोत्तम समय है इसलिए मैंने इस बार हरियाणा की यात्रा को महत्त्व देते हुए कुरक्षेत्र की यात्रा का मन बनाया। यहाँ प्रसिद्ध रणभूमि है जहाँ महाभारत का विशाल युद्ध हुआ था, यहीं भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को श्रीमद भगवद गीता का ज्ञान दिया था। इस पुण्य स्थान की यात्रा मेरे ब्लॉग में होनी चाहिए थे इसलिए मैंने इस यात्रा को पूर्ण किया। 

शाम को मैं मथुरा रेलवे स्टेशन पहुंचा और आगरा छावनी से होशियारपुर जाने वाली ट्रैन में बैठा। रात बारह एक बजे अम्बाला पहुँच गया क्योंकि यह ट्रैन कुरुक्षेत्र पर नहीं रुकी। अम्बाला से कुरक्षेत्र वापसी के लिए मैं कालका मेल में बैठा जिसमे टिकट चल दस्ते वालों ने मुझसे मेरा टिकट माँगा। चूँकि मैं सिर्फ कुरुक्षेत्र तक जा रहा था, इसलिए स्टाफ बोलकर उनसे बैठने की रिक्वेस्ट की। उन्होंने मुझसे कुछ नहीं कहा। 

मैं कुरुक्षेत्र उतरगया, अभी सुबह होने में काफी समय था इसलिए यहीं प्लेटफॉर्म पर एक बेंच पर सो गया। अगली सुबह जब उठा तो कैथल जाने वाली पैसंजर तैयार खड़ी हुई थी। इसी ट्रेन से मैं थानेसर आ गया जो ब्रह्म कुंड के बिलकुल नजदीक था। 


















अगला भाग - ब्रह्म सरोवर 

इस यात्रा के अन्य भाग 

Saturday, August 12, 2023

AGRA : KAFUR MOSQUE & STONE HORSE


आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 5


  काफूर की मस्जिद और पत्थर के घोड़े की प्रतिमा 



आगरा-मथुरा हाईवे (सिकंदरा) पर स्थित काफूर की मस्जिद (या इतिबारी खां की मस्जिद) के पास एक रहस्यमयी पत्थर का घोड़ा (लाल बलुआ पत्थर की मूर्ति) स्थित है। 
1605-1623 ईस्वी के बीच निर्मित यह स्थल, जहांगीर के वफादार दरबारी इतिबारी खां द्वारा संत ख्वाजा काफूर के सम्मान में बनवाया गया था, जहां घोड़े की मूर्ति को अकबर के प्रिय घोड़े का स्मारक माना जाता है।

AGRA : JASWANT SINGH CHHATRI

आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 4

जसवंत सिंह की छतरी

 


जसवंत सिंह की छतरी 

 राजस्थानी वास्तुकला की एक विशिष्ट शैली में निर्मित गुंबददार स्तंभों वाला मंडपनुमा स्मारक है, जिसका निर्माण लगभग 1644-58 ईस्वी में जसवंत सिंह राठौर ने अपने बड़े भाई अमर सिंह राठौर की पत्नी रानी हाड़ा की स्मृति में करवाया था। यह छतरी आगरा में यमुना नदी के किनारे राजवाड़ा, बलकेश्वर में स्थित है । अब इसका संरक्षण भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा राष्ट्रीय महत्व के स्मारक के रूप में किया जाता है।


यह मुगलिया स्थापत्य के बीच हिंदू-राजपूत कला (लाल बलुआ पत्थर) का प्रतीक है, जिसका संबंध अमर सिंह राठौड़ से है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित, यह स्थान कभी मनोहर बाग का हिस्सा था

 यह स्मारक राजा जसवंत सिंह द्वारा बनवाया गया था और इसका इतिहास वीर अमर सिंह राठौड़ से जुड़ा है, जिन्होंने शाहजहाँ के दरबार में मीर बख्शी सलाबत खां को मार गिराया था। 

यह लाल बलुआ पत्थर से निर्मित है और इसमें हिंदू-मुगल मिश्रित वास्तुकला की झलक मिलती है, जिसमें बुर्ज, सुंदर छतरियां, और नाजुक जाली वर्क शामिल है। 

यह एएसआइ द्वारा संरक्षित है, लेकिन अब उपेक्षित है और इसके आसपास अवैध निर्माण हो चुके हैं।

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यहाँ अमर सिंह राठौड़ की पत्नी सती हुई थीं, और स्थानीय महिलाएँ यहाँ पूजा करने आती हैं।

AGRA : CHINI KA ROZA

 आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 3

चीनी का रोज़ा


इसे चाइना टॉम्ब के नाम से भी जाना जाता है, यह अफजल खान का मकबरा है जो जहांगीर के शासनकाल में एक फारसी कवि थे, बाद में वे शाहजहाँ के शासनकाल में वज़ीर बने। अफजल खान की मृत्यु 1639 में लाहौर में हुई और उन्हें आगरा में यहीं दफनाया गया। यह मकबरा मक्का शहर की ओर मुख करके बनाया गया है 

मुल्ला शुक्रुल्लाह शिराज़ी (1570–1639), जिन्हें 'अफ़ज़ल ख़ान' के शाही ख़िताब से जाना जाता था, जहाँगीर और शाहजहाँ के शासनकाल के दौरान मुग़ल दरबार के एक दरबारी थे।उन्होंने एक विद्वान के रूप में ख्याति अर्जित की और 1628–1639 की अवधि के दौरान मुग़ल साम्राज्य के 'वज़ीर-ए-आज़म' (Grand Vizier) के पद तक पहुँचे।

अफ़ज़ल खान का जन्म सफ़वी ईरान के शिराज़ में हुआ था, जहाँ उनके पिता फ़ार्स में एक छोटे राजस्व संग्राहक थे। उनके पिता के दो भाई ईरान में वित्तीय पदों पर कार्यरत थे, जबकि दो अन्य ईरान और भारत के बीच व्यापार में लगे हुए थे। 

अफ़ज़ल खान का एक भाई था, जिसका नाम अमानत खान था; वह बाद में उनके साथ भारत आया और ताजमहल पर सुलेखन (calligraphy) के रूप में लिखे गए अभिलेखों को डिज़ाइन करने के लिए प्रसिद्ध हुआ। अफ़ज़ल खान ने लेखन-कला से संबंधित विषयों, जैसे कि सुलेख, लेखा-जोखा और गद्य-रचना में शिक्षा प्राप्त की थी। उनके शुरुआती शिक्षकों में से एक विद्वान तक़ी अल-दीन मुहम्मद शिराज़ी थे।

AGRA : MEHTAB BAGH & ELEVEN STAIRES




आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 2 

मेहताब बाग़ और ताजमहल का एक दृश्य 

       यूँ तो मैं बचपन से ही आगरा शहर में रहा किन्तु कभी ताजमहल को यमुना के दूसरी पार से देखने का मौका नहीं मिला, कारण था इस स्थान की दूरी, और यहाँ जाने वाला रास्ता जिसके बारे में मुझे कोई विशेष जानकारी नहीं थी। जब कभी ताजमहल देखने का मन होता था तो इसके मुख्य द्वार से ही इसे जाकर देख आता था। किन्तु आगरा शहर छोड़ने के अनेक वर्षों बाद अपने पुराने शहर को घूमने की इच्छा मन में जाग्रत हुई और मैं अपनी बाइक उठकर निकल चला आगरा की ऐतिहासिक यात्रा पर। 

    इस यात्रा के तहत मैंने आगरा के उन स्थानों को चिन्हित किया जो मैंने पहले कभी नहीं देखे थे। इसलिए सबसे पहले मैं पहुंचा यमुना नदी के दूसरी पार, जहाँ आगरा की विभिन्न मध्यकालीन ऐतिहासिक इमारतें देखीं जा सकती थीं। 

    इन सभी स्थलों में सबसे मुख्य था मेहताब बाग़, जो मुगलकाल का एक शानदार बगीचा था। इसका निर्माण औरंगजेब ने अपने शासनकाल के दौरान कराया था। इस बगीचे से ताजमहल का बहुत ही शानदार दृश्य दिखाई देता है बिलकुल वैसे ही, जैसे हम इसे ताज के परिसर में प्रवेश करने के बाद देखते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि मेहताब बाग़ से आप सिर्फ ताजमहल को निहार सकते हैं, इसके ख़ूबसूरती को महसूस कर सकते हैं, यमुना नदी के जल में इसका प्रतिबिम्ब देख सकते हैं किन्तु आप इसे छू नहीं सकते, इसके नजदीक नहीं जा सकते हैं क्योंकि मेहताब बाग़ और ताजमहल के बीच यमुना नदी है और यहाँ इसे पार करने की इजाजत नहीं है। 

AGRA : AGRA FORT


आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 1 

आगरा किला 



 आगरा किले का इतिहास


माना जाता है कि आगरा किले का निर्माण मुग़ल शासक अकबर ने करवाया था किन्तु उससे पूर्व भी आगरा किले के अस्तित्व में होने के कुछ उदाहरण मिलते हैं जिनके बाद स्पष्ट हो जाता है कि अकबर ने इस किले का निर्माण नहीं बल्कि इसके स्थान पर बने पुराने किले की मरम्मत कराकर इसे एक नया रूप दिया था। 

इससे पूर्व यह एक ईंटों का किला था, जो सिकरवार वंश के राजपूतों के पास था। इसका प्रथम विवरण 1080 ई० में आता है जब महमूद गजनवी की सेना ने इस पर कब्ज़ा किया था। 

सिकंदर लोदी (1487-1517), दिल्ली सल्तनत का प्रथम सुल्तान था जिसने आगरा की यात्रा की तथा इस किले की मरम्म्त 1504 ई० में करवायी और इस किले को अपने निवास के रूप में चुना। सिकंदर लोदी ने इसे 1506 ई० में राजधानी बनाया और यहीं से देश पर शासन किया। उसकी मृत्यु भी इसी किले में 1517 में हुई थी। 

बाद में उसके पुत्र इब्राहिम लोदी ने भी नौ वर्षों तक इस किले से राज्य किया, जब तक वो पानीपत के प्रथम युद्ध (1526) में बाबर द्वारा मारा नहीं गया। उसने अपने काल में यहां कई स्थान, मस्जिदें व कुएं बनवाये जो आज भी आगरा में विभिन्न स्थानों पर दृष्टिगोचर होते हैं। 

पानीपत के युद्ध के बाद मुगलों ने इस किले पर कब्ज़ा कर लिया साथ ही इसकी अगाध सम्पत्ति पर भी। इस सम्पत्ति में ही एक हीरा भी था जो कि बाद में कोहिनूर हीरा के नाम से प्रसिद्ध हुआ। तब इस किले में इब्राहिम के स्थान पर बाबर आया। उसने यहां एक बावली बनवायी। 

सन 1530 में आगरा किले में हुमायुं का राजतिलक भी हुआ। हुमायुं इसी वर्ष बिलग्राम में शेरशाह सूरी से हार गया व किले पर उसका कब्ज़ा हो गया। इस किले पर अफगानों का कब्ज़ा पांच वर्षों तक रहा, जिन्हें अन्ततः मुगलों ने 1556 में पानीपत का द्वितीय युद्ध में हरा दिया।