Tuesday, September 17, 2024

AGRA : SADIK KHAN & SALAWAT KHAN TOMB


आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 11

 सादिक खान और सलाबत खान का मकबरा


सादिक खान और उनके पुत्र सलाबत खान, मुगल काल के प्रमुख रईस थे और बादशाह जहांगीर एवं शाहजहाँ के अधीन उच्च पदस्थ अधिकारी थे। सलाबत खान, बादशाह शाहजहाँ के मुग़ल दरबार में मीर बख्शी (कोषाध्यक्ष) थे, जो 1644 में आगरा किले में अमर सिंह राठौर द्वारा मारे गए थे  जबकि उनके पिता सादिक खान की मृत्यु 1633 में ही हो गई थी। दोनों पिता पुत्र मुग़ल दरबार में क्रमशः बादशाह जहांगीर और शाहजहां के कार्यकाल के दौरान नियुक्त थे। 


चूँकि आगरा शहर मुगलों की राजधानी रहा है और यहाँ मुग़ल काल से जुड़े हुए अनेकों ऐतिहासिक स्मारक हैं। ऐसा ही एक स्मारक का बोर्ड आगरा ISBT बस स्टैंड के सामने राष्ट्रीय राजमार्ग पर दिखाई देता है जिसके अनुसार यह स्मारक दो मकबरें हैं जो मुग़ल काल के प्रतिष्ठित व्यक्तियों के हैं।  यह सादिक खान और सलाबत खान के मकबरे हैं जो आपस में पिता और पुत्र थे। 

आमतौर पर इस स्मारक तक जाने वाले गेट पर अक्सर ताला लगा रहता था, इसके दो मुख्य कारण हैं, पहला यह कि यहाँ पर्यटक  ना के बराबर आते हैं अथवा आते ही नहीं हैं। और दूसरा मुख्य कारण है इन स्मारकों की असामाजिक तत्वों से सुरक्षा। 

इसे इत्तेफ़ाक़ कहूं या अपना भाग्य कि मुझे आज इस गेट का ताला खुला मिला और मैंने इन इमारतों को आज अंदर जाकर बखूबी देखा। किसी भी स्मारक का महत्त्व तब समझ आता है जब आपको इस स्मारक से जुड़ा इतिहास पता हो। इन स्मारकों को देखने के बाद मैंने सादिक खान और सलाबत खान के बारे में पूर्ण जानकारी हासिल की और उसके बाद मध्य काल के इतिहास की कड़ी दर कड़ी मुझे समझ आती गई। 


सादिक खां

सादिक खान एक ईरानी रईस, एत्माद्दौला की पदवी वाले मिर्जा ग्यास बेग के भतीजे थे जो मुगल बादशाह जहांगीर और शाहजहां के दरबार में भी रहे। जहांगीर ने मीर बख्शी के रूप में उन्हें 1622 में नियुक्त किया और उसके बाद 1623 में पंजाब का गवर्नर नियुक्त कर दिया। उन्होंने शाहजहाँ के अधीन मीर बख्शी के रूप में सेवा की, 1633 में उनकी मृत्यु हो गई, और उन्हें एक मकबरे में दफनाया गया है। 

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पास मौजूद जानकारी के मुताबिक जहांगीर के बाद शाहजहां ने सादिक खां को 4000 जात का मनसब और 4000 सवार का मनसब प्रदान किया। 3 सितंबर 1633 को सादिक खां के निधन के बाद बेटे सलावत खां ने उनका आगरा के गैलाना में मकबरा बनवाया।

सलाबत खान (मीर बख्शी)

 सलाबत खान, सादिक खान का पुत्र, व शाहजहाँ का प्रिय था और 1644 में व्यक्तिगत अपमान के कारण राव अमर सिंह राठौर द्वारा आगरा किले के दीवान-ए-आम में उसकी हत्या कर दी गई थी। रिश्ते में यह शाहजहां के साले थे और उसके मीर बख्शी (शाही कोषाध्यक्ष) थे। सादिक खां के पुत्र सलाबत खां को शाहजहां के दरबार में चार हजार का मनसब मिला हुआ था।


भारत पुरातत्व विभाग के रिकार्ड के अनुसार शाहजहां के मीर बख्शी सलाबत खां ने अमर सिंह पर अनुचित टिप्पणी कर दी थी। इस पर अमर सिंह राठौड़ ने आगरा किला के दीवान-ए-आम में शाहजहां के दरबार में ही सलाबत खां को मौत के घाट उतार दिया था। मुगल सैनिक उन पर टूट पड़े थे, मगर अमर सिंह राठौड़ उन्हें परास्त कर किले से निकलने में सफल रहे थे।

उन्होंने घोड़े पर सवार होकर आगरा किला की दीवार से छलांग लगा दी थी। बाद में धोखे से उनकी हत्या आगरा किला के गेट के पास कर दी गई थी। यह गेट आज अमर सिंह गेट कहलाता है
    • सादिक खान का मकबरा: 
    • एक ऊंचे चबूतरे पर निर्मित अष्टकोणीय संरचना में निर्मित है साथ ही इसमें पारसीय वास्तुकला भी दृष्टिगोचर होती है। 
    • सलाबत खान का मकबरा (चौसठ खंबा): 
    • चौंसठ स्तंभों के हॉल के रूप में जाना जाने वाला, लाल बलुआ पत्थर का यह मंडप 1644-1650 के बीच बनाया गया था।

दोनों स्मारक अपनी अलग-अलग अनूठी वास्तु और निर्माण शैली के बने हैं। और सबसे मुख्य दोनों पिता - पुत्र की कब्रें एक सीध में निर्मित हैं। 

यह मकबरे आगरा-दिल्ली राजमार्ग (एनएच19) के पास, अकबर के मकबरे के नजदीक स्थित हैं

सलाबत खान और अमर सिंह राठौर की गाथा 

शाही सेना के मनसबदार केसरीसिंह जोधा द्वारा अटक नदी के पार जाने के शाही हुक्म को मानने से इन्कार करने पर बख्शी सलावत खां ने उनकी मनसबदारी जब्त करवा दी। राव अमरसिंह राठौड़ ने केसरीसिंह जोधा को सम्मानपूर्वक तीस हजार का पट्टा व कुछ गांव जागीर में देकर नागौर की सुव्यवस्था का दायित्व सौंपा। बख्शी सलावत खां इस कारण राव अमरसिंह राठौड़ से नाराज हो गया।

राव अमरसिंह राठौड़ जब शाही दरबार में बादशाह शाहजहां से मुलाकात करने के लिये गये तो सलावत खां ने कहा कि ‘बादशाह के लिये नजराना लाये हो तो निकाल कर दंे।’ जवाब में अमरसिंह राठौड़ बोले कि ‘बादशाह मुझे पहचानते हैं।’ इस पर सलावत खां बोला कि ‘रावजी फीळचराई की रकम जमा कराओ।’ मीर बख्शी तैश में आकर बोला, ‘अपनी जगह छोड़कर गैर-हाजिरी की कतार में खड़े हो जाओ।’ सलावत ने फिर जोर से बोलते हुये हुक्म दिया ‘रावजी तुम्हारी गैर-हाजिरी के कारण तुमसे बड़ोद का परगना जब्त किया जाता है।’  फिर आक्रोषित होकर शाही बख्शी सलावत खां ने राव अमरसिंह राठौड़ को उत्तेजना में ’‘गंवार’’ कहकर अपमानित किया। स्वाभिमानी वीर अमरसिंह राठौड़ को यह अपमान सहन नहीं हुआ और भरे दरबार मे शाहजहाँ के साले सलावत खान ने अमर सिंह राठौड़ (नागौर राजा) को हिन्दू और काफ़िर कह कर गालियाँ बकनी शुरू की और सभी मुगल दरबारी उन गालियों को सुनकर हँस रहे थे...!


स्वाभिमानी वीर अमरसिंह राठौड़ को यह अपमान सहन नहीं हुआ और अगले ही पल सैनिकों और शाहजहाँ के सामने वहीं पर दरबार में अमर सिंह राठौड़ ने सलावत खान का सर काट फेंका ...!
शाहजहाँ कि सांस थम गयी। इस 'शेर' के इस कारनामे को देख कर मौजूद सैनिक वहाँ से भागने लगे. अफरा तफरी मच गयी, किसी की हिम्मत नहीं हुई कि अमर सिंह को रोके या उनसे कुछ कहे. मुसलमान दरबारी जान लेकर इधर-उधर भागने लगे.

बादशाह ने अपनी आंखों से यह दृश्य देखकर कहा कि ‘अमरसिंह तुम धाप गये हो। तुमने अपनी मर्दानी दिखा दी है। अब अपनी कटार म्यान में डाल लो’। राव अमरसिंह राठौड़ को कटार लेकर अपनी ओर बढ़ता देखकर बादशाह शाहजहां जनानाखाना में घुस गया। 

अमर सिंह अपने घोड़े को किले से कुदाकर घर (नागौर) लौट आये.
यह घटना देखकर बादशाह ने अपने पुत्र दाराशिकोह से कहा कि एक हिन्दू राजा ने जो किया, यह रोम का बादशाह सुनेगा तो वह क्या कहेगा?  शाही दरबार के षड़यंत्रानुसार, एक हिन्दू अर्जुन गौड़ ने बादशाह से सुलह कराने के नाम पर धोखे से अमरसिंह राठौड़ को बादशाह से मुलाकात कराने हेतु आगरा के किले में मिलने बुलवाया। किले के दरवाजे के दरवाजे में प्रवेश करते ही किसी ने राव अमरसिंह राठौड़ की पीठ में तलवार घोंप दी। घायल अवस्था में भी उन्होंने अनेक शाही सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया तथा अर्जुन गौड़ का कान काट दिया और स्वयं भी वीरगति को प्राप्त हो गये।
उसने अमर सिंह की लाश को एक बुर्ज पे डलवा दिया ताकि उस लाश को चील कौए खा लें।
अमर सिंह की रानी ने जब ये समाचार सुना तो सती होने का निश्चय कर लिया, लेकिन पति की देह के
बिना वह वो सती कैसे होती। रानी ने बचे हुए थोड़े राजपूतों सरदारो से अपनें पति की देह लाने को प्रार्थना की, पर किसी ने हिम्मत नहीं की और तब अन्त में उनको अमरसिंह के परम मित्र बल्लुजी चम्पावत की याद आई और उनको बुलवाने को भेजा ! बल्लूजी अपनें प्रिय घोड़े पर सवार होकर पहुंचे जो उनको मेवाड़ के महाराणा नें बक्शा था !
उसने कहा- 'राणी साहिबा' मैं जाता हूं या तो मालिक की देह को लेकर आऊंगा या मेरी लाश भी वहीं गिरेगी।'
वह राजपूत वीर घोड़े पर सवार हुआ और घोड़ा दौड़ाता सीधे बादशाह के महल में पहुंच गया।
महल का फाटक जैसे ही खुला द्वारपाल बल्लु जी को अच्छी तरह से देख भी नहीं पाये कि वो घोड़ा दौड़ाते हुवे वहाँ चले गए जहाँ पर वीरवर अमर सिंह की देह रखी हुई थी !

बुर्ज के ऊपर पहुंचते-पहुंचते सैकड़ों मुसलमान सैनिकों ने उन्हें घेर लिया।
बल्लूजी को अपनें मरने-जीने की चिन्ता नहीं थी। उन्होंने मुख में घोड़े की लगाम पकड़ रखी थी,दोनों हाथों से
तलवार चला रहे थे ! उसका पूरा शरीर खून से लथपथ था। सैकड़ों नहीं, हजारों मुसलमान सैनिक उनके पीछे थे
जिनकी लाशें गिरती जा रही थीं और उन लाशों पर से बल्लूजी आगे बढ़ते जा रहा थे !
वह मुर्दों की छाती पर होते बुर्ज पर चढ़ गये और अमर सिंह की लाश उठाकर अपनें कंधे पर रखी और एक हाथ से तलवार चलाते हुवे घोड़े पर उनकी देह को रखकर आप भी बैठ गये और सीधे घोड़ा दौड़ाते हुवे गढ़ की बुर्ज के ऊपर चढ़ गए और घोड़े को नीचे कूदा दिया ! नीचे मुसलमानों की सेना के आने से पहले, बल्लू जी बिजली की भाँति अपने सैनिकों तक पहुंचे और उन्हें अमर सिंह जी के देह सौंपकर स्वयं वीरगति को प्राप्त हो गए। सैनिक अमर सिंह के शरीर को लेकर वहां पहुंचे जहाँ रानी चिता सजाकर बैठी थीं।
अपने पति की देह पाकर वो चिता में ख़ुशी ख़ुशी बैठ गई !
सती ने बल्लू जी को आशीर्वाद दिया- 'बेटा ! गौ,ब्राह्मण,धर्म और सती स्त्री की रक्षा
के लिए जो संकट उठाता है,
भगवान उस पर प्रसन्न होते हैं। आपनें आज मेरी प्रतिष्ठा रखी है। आपका यश
संसार में सदा अमर रहेगा।' बल्लू चम्पावत मुसलमानों से लड़ते हुवे वीर गति को प्राप्त हुवे उनका दाहसंस्कार
यमुना के किनारे पर हुआ उनके और उनके घोड़े की याद में वहां पर स्म्रति स्थल बनवाया गया।



VIEW OF SADIK KHAN TOMB


SADIK KHAN TOMB



SADIK KHAN TOMB


सादिक खान का अष्टकोणीय मकबरा 

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सादिक खान के मकबरे के अंदर  दृश्य 


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चौसठ खम्बों पर निर्मित सलावत खान का मकबरा 


SALABAT KHAN TOMB 



SALABAT KHAN TOMB 

चौसठ खम्बे से निर्मित, सलावत खान का मकबरा 

मकबरे के अंदर की डिज़ाइन 





एक सीध में दोनों पिता - पुत्र के कब्रें निर्मित हैं। 

सलावत खान का मकबरा 

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SADIK KHAN TOMB VIEW FROM SALAWAT KHAN TOMB 


SALAWAT KHAN TOMB 

A VIEW OF SALAWAT KHAN TOMB 

A VIEW OF SADIK KHAN TOMB 





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