इतिहास
मुगलकालीन स्मारकों के लिए प्रसिद्ध ताजनगरी में एकमात्र राजपूत स्मारक जसवंत सिंह की छतरी है। बल्केश्वर के रजवाड़ा में यमुना किनारे बने इस स्मारक का निर्माण राजा जसवंत सिंह ने कराया था। इसका इतिहास शहंशाह शाहजहां के दरबार में मीर बख्शी सलाबत खां को मौत के घाट उतारने वाले अमर सिंह राठौड़ से जुड़ा हुआ है। यहां अमर सिंह के शव के साथ उनकी पत्नी हाड़ा रानी सती हुई थीं।
यह छतरी 1644-58 ईस्वी में बनी थी और राजस्थान के बूंदी की राजकुमारी रानी हाड़ा को समर्पित है, जिनका विवाह अमर सिंह राठौर से हुआ था। अमर सिंह राठौर 25 जुलाई 1644 को आगरा किले में मारे गए थे। उनका शव उनकी विधवा हाड़ा रानी को सौंप दिया गया था, जिन्होंने वहीं सती कर ली थी। अमर सिंह राठौर के छोटे भाई राजा जसवंत सिंह ने इस स्मारक छतरी का निर्माण करवाया था।
यह छतरी राजा जसवंत सिंह द्वितीय की नहीं है, जिनकी मृत्यु हो गई और 1678 में खैबर दर्रे के जमरुद में उनका अंतिम संस्कार किया गया। बाद में, उनकी छतरी जोधपुर के मंडोर में बनाई गई , जिसे जसवंत थड़ा के नाम से जाना जाता है ।
जोधपुर के राजा गजसिंह के बड़े बेटे अमर सिंह राठौड़ थे। पिता से मतभेद के चलते उन्होंने जोधपुर छोड़ दिया था। वो अच्छे योद्धा थे और शाहजहां के दरबार में बड़ी अहमियत रखते थे। वर्ष 1644 में जब वो छुट्टी से लौटे तो उन पर भारी जुर्माना लगा दिया गया।
आगरा किला के दीवान-ए-आम में शाहजहां के मीर बख्शी सलाबत खां ने उनसे जुर्माना जमा कराने को कहते हुए टिप्पणी कर दी। इस पर अमर सिंह राठौड़ ने दरबार में ही उसे मौत के घाट उतार दिया। मुगल सैनिकों को परास्त कर वो किले से बाहर निकल गए। बाद में उनके साले अर्जुन सिंह ने धोखे से आगरा किला में बुलाकर उनकी हत्या करा दी।
अमर सिंह के शव के साथ उनकी पत्नी हाड़ा रानी सती हुई थीं। बल्केश्वर में जिस जगह पर वो सती हुई थीं, उस जगह राजा जसवंत सिंह ने उनकी स्मृति में छतरी बनवाई थी। यह छतरी बाद में उन्हीं के नाम से प्रसिद्ध हो गई।
वास्तुकला
छतरी राजपूत वास्तुकला की एक अनूठी विशेषता है, जो मुख्य रूप से राजस्थान के शेखावाटी क्षेत्रों में देखी जाती है । जसवंत की छतरी एक वर्गाकार, मंडप-शैली का स्मारक है जो एक ऊंचे चबूतरे पर बारीक तराशे हुए लाल बलुआ पत्थर से निर्मित है और एक नीची परिधि वाली दीवार से घिरा हुआ है।
इसका मुख्य कक्ष विभिन्न ज्यामितीय और पुष्प पैटर्न में उत्कृष्ट खुली पत्थर की जाली ( जाली ) से परिभाषित है, जो मुगल वास्तुकला की समकालीन छतरियों के विपरीत, बिना गुंबद के एक अर्ध-खुला हॉल बनाता है । नदी की ओर वाली बाहरी घेरा दीवार पुष्प मालाओं से घिरे लंबे गले वाले सुराई रूपांकन से समृद्ध रूप से अलंकृत है, जो आगरा किले के बुलंदी बाग की सजावटी योजनाओं की याद दिलाती है।
घेरे में दरवाजे और खिड़कियां मोर्टिस-एंड-टेनन पिवट पर लगे एकल-पत्थर के तहदार पत्तों से सुसज्जित हैं, जो उस काल की उन्नत पत्थर-कारीगरी तकनीकों का उदाहरण हैं। मंडप के नीचे एक उथला पानी का टैंक है, जहाँ कोने की सीढ़ियों से पहुँचा जा सकता है, जिसका उपयोग कभी अनुष्ठानिक स्नान और गर्मियों के महीनों में संरचना को ठंडा करने के लिए किया जाता था।
महाराजा जसवंत सिंह (26 दिसम्बर 1629 – 28 दिसम्बर 1678)
जोधपुर के महाराज गजसिंह के तीन पुत्र थे- अमरसिंह, जसवंतसिंह और अचलसिंह। अचलसिंह का देहांत बचपन में ही हो गया। अमरसिंह वीर किंतु बहुत क्रोधी थे इसलिये गजसिंह ने अपने छोटे पुत्र जसवंतसिंह की ही गद्दी के उपयुक्त समझा। २५ मई १६३८ के दिन बारह बरस का जसवंत गद्दी पर बैठा।
प्राय: राज्य के आरंभ काल से ही जसवंतसिंह शाही सेना में रहा। सन् १६४२ में उसने शाही सेना के साथ ईरान के लिये प्रयाण किया। एक साल बाद वह वापस लौटा। सन् १६४८ में ईरान के शाह अब्बास ने ५०,००० सेना और तोपें लेकर कंधार को घेर लिया। कुछ समय के बाद किला उसके हाथ आया। जसवंतसिंह किले पर घेरा डालनेवाली शाहजादे औरंगजेब की फौज में में संमिलित था। औरंगजेब किला लेने में असमर्थ रहा। इसी बीच जसवंतसिंह के मनसव में अनेक बार बृद्धि हुई और सन् १६५५ में उसे महाराजा की पदवी मिली।
सन् १६५७ में बादशाह शाहजहाँ बीमार हुआ और उसके पुत्रों में राज्याधिकार के लिये युद्ध शुरू हो गया। दारा ने बादशाह से कहकर जसंवतसिंह का मनसब ७,००० ज़ात और ७,००० सवार करवा दिया और उसे एक लाख रुपये और मालवे की सूबेदारी देकर औरंगजेब के विरुद्ध भेजा। दूसरी शाही सेना कासिमखाँ के सेनापतित्व में उससे आ मिली। इसी बीच औरंगजेब ने शाहजादा मुराद को अपनी ओर कर लिया।
'धर्मत' नाम के स्थान पर दोनों सेनाओं का सामना हुआ। कोटा का राव मुकुंदसिंह, उसके तीन भाई, शाहपुरा का सुजानसिंह सीसोदिया, अर्जुन गोड़, दयालदास झाला, मोहनसिंह हाड़ा आदि अनेक राजा और सरदार उसे साथ थे। हरावल का नायक कासिमखाँ था और जसवंतसिंह, स्वयं २,००० राजपूतों के बीच केंद्र में था। उनमें से कई राजपूत सरदार तो प्रारंभिक आक्रमण में ही काम आए। टोड़े का रायसिंह, बुंदेला सुजानसिंह आदि भाग निकले।
जसवंतसिंह अवशिष्ट राजपूतों के साथ वीरता से लड़ता हुआ औरंगजेब के पास तक पहुँचा किंतु इसी बीच वह बुरी तरह घायल हुआ। युद्ध में पराजय को निश्चित समझ उसके साथ के राजपूत जसवंतसिंह को बलपूर्वक युद्ध से बाहर ले गए और उसे जोधपुर लौटना पड़ा।
धर्मत के बाद औरंगजेब ने दारा को सामूगढ़ की लड़ाई में हराया और २२ जुलाई १६५८ को शाहजहाँ को नजरकैद कर औरंगजेब गद्दी पर बैठा। उसी साल जसवंतसिंह ने औरंगजेब की अधीनता स्वीकार की, किंतु मन से वह उसके विरुद्ध था। अत: कोड़े में जब शाहशुजा और औरंगजेब का युद्ध हुआ तो औरंगजेब की फौज का काफी नुकसान कर वह जोधपुर लौट गया। किंतु शाहशुजा युद्ध में हार गया। औरंगजेब को बहुत क्रोध आया, फिर भी मिर्जा राजा जयसिंह के बीच में पड़ने से और जसवंतसिंह से अच्छा संबंध बनाए रखने में ही अपना हित समझकर औरंगजेब ने महाराजा को क्षमा कर दिया।
१६५९ में जसवंतसिंह गुजरात का सूबेदार नियुक्त हुआ, किंतु कुछ समय के बाद औरंगजेब ने उस स्थान पर महावतखाँ की नियुक्ति की। शिवाजी की बढ़ती शक्ति को देखकर औरंगजेब ने शाइस्ताखाँ को उसके विरुद्ध भेजा। उसने पूने में रहना शुरु किया और जसवंतसिंह सिंहगढ़ के मार्ग में ठहरा।
शाइस्ताखाँ पर रात्रि के समय शिवाजी के आक्रमण की कथा प्रसिद्ध है। शिवाजी के विरुद्ध जसवंतसिंह ने कोई विशेष सफलता प्राप्त न की। बादशाह ने उसे दिल्ली वापस बुला लिया और उसके स्थान पर दिलेरखाँ और मिर्जा राजा जयसिंह की नियुक्ति की। किंतु सन् १६७८ में फिर उसकी नियुक्ति दक्षिण में हुई और उसके उद्योग से मुगलों और मरहटों के बीच कुछ समय के लिये संधि हो गई।
सन् १६७० में वह दुबारा गुजरात का सूबेदार नियुक्त हुआ और सन् १६७३ में बादशाही फरमान मिलने पर काबुल के लिये रवाना हुआ। २८ नवम्बर १७३८ को उसका देहांत जमुर्रद में हुआ।
महाराजा जसवंतसिंह वीर ही नहीं दानशील और विद्यानुरागी भी था। उसके रचित ग्रंथों में भाषाभूषण, अपरीक्षसिद्धांत, अनुभवप्रकाश, आनंदविलास, सिद्धांतबोध, सिद्धांतसार और प्रबोधचंद्रोदय आदि प्रसिद्ध हैं। सूरतमिश्र, नरहरिदास और नवीनकवि उसकी सभा के रत्न थे।
जसवंतसिंह का हृदय हिंदुत्व के प्रेम से परिपूर्ण था और उसके सदुद्योग और निरुद्योग से भी हिंदू राजाओं को पर्याप्त सहायता मिली। औरंगजेब भी इस बात स अपरिति न था। यह प्रसिद्ध है कि उसके मरने पर बादशाह ने कहा था, 'आज कुफ्र का दरवाजा टूट गया'।
जसंवतसिंह के लिये हिंदूमात्र के हृदय में सम्मान था और इसी कारण जब औरंगजेब ने उसकी मृत्यु के बाद जोधपुर को हथियाने और कुमारों को मुसलमान बनाने का प्रयत्न किया तो समस्त राजस्थान में विद्वेषाग्नि भड़क उठी और राजपूत युद्ध का आरंभ हो गया।













No comments:
Post a Comment
Please comment in box your suggestions. Its very Important for us.