UPADHYAY TRIPS PRESENT'S
कर्नाटक की ऐतिहासिक यात्रा पर - भाग 6
ऐहोल के मंदिर
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अब वक़्त आ चुका था अपनी उस मंजिल पर पहुँचने का, जिसे देखने की धारणा अपने दिल में लिए मैं अपने घर से इतनी दूर कर्नाटक आया था और वह मंजिल थी बादामी जो प्राचीन काल की वातापि है और मेरी इस यात्रा का केंद्र बिंदु भी। बादामी, प्राचीन काल में वातापि के चालुक्यों की राजधानी थी जिन्होंने यहाँ अजंता और एलोरा की तरह ही पहाड़ों को काटकर उनमें गुफाओं का निर्माण कराया और इन्हीं गुफाओं के ऊपर अपने किले का निर्माण कराया। बादामी से पूर्व चालुक्यों ने बादामी से कुछ मील दूर ऐहोल नामक स्थान को अपनी राजधानी बनाया था और वहां अनेकों मंदिर और देवालयों का निर्माण कराया था। वर्तमान में ऐहोल कर्नाटक का एक छोटा सा गाँव है मगर इसकी ऐतिहासिकता को देखते हुए पर्यटकों का यहाँ आना जाना लगा रहता है।
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मैं सुबह 6 बजे ही बादामी पहुँच गया था और स्टेशन पर बने वेटिंग रूम में नहाधोकर तैयार हो गया। चूँकि कोरोना की वजह से रेलवे स्टेशन पर वेटिंग रूम में ठहरने की सुविधा उपलब्ध नहीं है किन्तु स्टेशन मास्टर साब ने मुझे उत्तर भारतीय होने से और कर्नाटक की यात्रा पर होने से अतिथि देवो भवः का अर्थ सार्थक किया और वेटिंग रूम की चाबी मुझे दे दी। अपने गीले वस्त्रों को मैंने यहीं वेटिंग रूम में सुखा दिया था क्योंकि आज रात को ही मुझे अपनी अगली मंजिल पर भी निकलना था। इसप्रकार स्टेशन का वेटिंग रूम, मेरे लिए एक होटल के कमरे के समान ही बन गया। स्टेशन के बाहर बनी दुकान पर चाय नाश्ता करने के बाद मैंने अपने बैग को भी यहीं रख दिया और कैमरा लेकर बाहर आ गया। यह दुकान प्राचीन काल की काठ से बनी दुकान थी।
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बाहर आकर मैंने अपने फेसबुक मित्र नागराज को कॉल किया जो बादामी में ही रहते हैं। उन्होंने तुरंत मेरा फोन उठाया और मुझे मिलने स्टेशन आ गए। हम दोनों की आज आभासी दुनिया से वास्तविक दुनिया में पहली भेंट थी। नागराज के साथ उनकी बाइक पर बैठकर मैं बादामी के बस स्टेशन पहुंचा और उन्होंने मुझे ऐहोल जाने वाली बस में बैठा दिया। समस्त कर्नाटक में रोडवेज बस की सुविधा अति उत्तम है परन्तु यदि आपको कन्नड़ भाषा नहीं आती तो आपको अपनी बस पहचानने में मुश्किल हो सकती है क्योंकि यहाँ की बसों पर बस का गंतव्य स्थल कन्नड़ भाषा में ही लिखा होता है और आपको सही बस पहचानने के लिए एक कर्णाटक के व्यक्ति से पूछना ही होगा।
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बस के ड्राइवर और कंडक्टर, नागराज को अच्छी तरह से जानते थे, कन्नड़ भाषा में नागराज ने उन्हें बता दिया कि मैं यूपी से आया हूँ। यह मैं उनके चेहरे के भाव देखकर पहचान गया था। खैर अपने प्रदेश की यात्रा पर आया हुआ जानकार उन्होंने मुझे अच्छा सम्मान दिया और ऐहोल के लिए मैं इस बस से रवाना हो गया। बादामी से 25 किमी दूर ऐहोल ग्राम स्थित है। बस ने जब इस गांव में प्रवेश किया तो गांव के चारों तरफ मुझे ऐतिहासिक मंदिर दिखने शुरू हो गए। मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था क्योंकि आज यहाँ आकर मैंने अपनी मंजिल को पा लिया था। ऐहोल और बादामी के बारे में मैंने बहुत पढ़ा था परन्तु आज इसे देखने का मौका मिला, यह मेरे लिए बहुत ही महत्वपूर्ण बात थी। मैंने मन ही मन अपने घरवालों, ऑफिस वालों और कर्नाटक वालों का धन्यवाद किया जिनकी वजह से आज मैं ऐहोल में था।
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ऐहोल के रास्ते में हनुमान जी का एक मंदिर |
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मालप्रभा नदी / |
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ऐहोल के रास्ते में एक गाँव |
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ऐहोल की ओर |
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ऐतिहासिक ग्राम ऐहोल |
ऐहोल संग्रहालय
बस ने मुझे पुरातत्व विभाग की ऑफिस के सामने उतारा जो ऐहोल के प्रसिद्ध दुर्ग मंदिर या दुर्गा मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। यूँ तो समस्त ऐहोल एक ऐतिहासिक ग्राम है और इसके चारों तरफ ऐतिहासिक धरोहरें बिखरी पड़ी हैं किन्तु यहाँ का प्रसिद्ध दुर्ग मंदिर और लाड़खान मंदिर पुरातत्व विभाग के अधीन है और इन्हें देखने के लिए उचित टिकट लेकर ही प्रवेश करना होता है। दुर्गा मंदिर के प्रांगण में ही पुरातत्व विभाग का ऐहोल संग्रहालय स्थित है जिसे देखने के बाद मैंने इस प्रांगण में बने प्राचीन मंदिरों को देखना शुरू किया जिनका विवरण निम्नलिखित है -
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पुरातत्व संग्रहालय - ऐहोल |
दुर्ग मंदिर
यह ऐहोल का सबसे प्रसिद्ध मंदिर है, यह किस देवता को समर्पित है इसमें अभी इतिहासकारों में अनेकों मतभेद हैं क्योंकि गर्भगृह के अंदर किसी भी प्रकार की मूर्ति प्राप्त नहीं हुई है परन्तु इसकी संरचना को देखते हुए और यहाँ मिले अभिलेखों के आधार पर इसे दुर्गा या दुर्ग मंदिर माना जाता है। इस मंदिर का निर्माण छटवीं शताब्दी में चालुक्य सम्राट पुलकेशिन द्वितीय ने करवाया था। मंदिर की संरचना और आकर देखने योग्य है। हालांकि गर्भगृह में कोई मूर्ति तो स्थित नहीं है किन्तु उसकी बाहरी दीवारों पर काफी सुन्दर और आश्चर्य में डालने वाली मूर्तियां उकेरी हुई हैं इनमें भगवान विष्णु की और देवी जगदम्बा की मूर्ति मुख्य हैं।
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दुर्गा मंदिर - ऐहोल |
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दुर्गा मंदिर के अंदर का दृश्य |
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दुर्गा मंदिर - ऐहोल |
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दुर्ग मंदिर - ऐहोल |
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गर्भ गृह - दुर्ग मंदिर, ऐहोल |
दुर्ग मंदिर की बाहरी दीवारों पर उकेरी हुई मूर्तियां  |
देवी दुर्गा की प्रतिमा |
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विष्णु अवतार - वराह जिनके सींग पर पृथ्वी की भी सुंदर प्रतिमा है और नीचे शेषनाग जी |
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कुमार कार्तिकेय की प्रतिमा अपने मयूर के साथ |
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नर्सिंह अवतार |
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भगवान शिव की अष्टभुजी प्रतिमा |
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ऐहोल का मुख्य आकर्षण - दुर्ग मंदिर |
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दुर्ग मंदिर का प्रवेश द्वार |
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शानदार दुर्ग मंदिर |
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दुर्ग मंदिर या दुर्गा मंदिर |
लाड़खान मंदिर
दुर्ग मंदिर के नजदीक ही अन्य ऐतिहासिक मंदिर क्रमानुसार बने हुए हैं जिनमें लाड़खान मंदिर प्रमुख है। हालांकि ऐहोल का सबसे प्रथम हिन्दू मंदिर है किन्तु एक मुसलमान के नाम से होने का कारण यह है कि यहीं नजदीक में एक मुश्लिम फ़कीर लाड़खान रहा करते थे जिन्होंने इस मंदिर की बहुत सेवा की और उन्हीं के नाम पर इस मंदिर का नाम लाड़खान मंदिर हो गया। मंदिर की छत का निर्माण चक्राकार पद्धति में हुआ है और इस मंदिर का शिखर नहीं है। यह मंदिर भगवान् शिव को समर्पित है।
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लाड़खान मंदिर - ऐहोल |
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लाड़खान मंदिर - ऐहोल का प्रथम मंदिर |
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लाड़खान मंदिर - ऐहोल |
बडिगेर ( बढ़ई ) मंदिर
लाड़खान मंदिर के नजदीक ही यह मंदिर स्थित है। नागर शैली में निर्मित यह मंदिर देखने में बहुत ही भव्य लगता है। इस मंदिर का निर्माण 9 वीं शताव्दी के लगभग हुआ था और यह भगवान सूर्य को समर्पित है अर्थात यह एक सूर्य मंदिर है।
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बड़िगेर गुड़ी - ऐहोल |
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बड़िगेर मंदिर - ऐहोल |
चक्र मंदिर
नागर शैली में निर्मित यह मंदिर भगवान् शिव को समर्पित है। इस मंदिर के द्वार पर गरुड़ को सांपो को लेकर पकडे हुए दर्शाया गया है। इसी मंदिर के समीप पुष्करिणी भी स्थित है।
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चक्र गुड़ी - ऐहोल |
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चक्र गुड़ी - ऐहोल |
गौडार गुड़ी
लाड़खान मंदिर के नजदीक ही गौदारगुडी स्थित है। कन्नड़ भाषा में मंदिर का अर्थ गुड़ी होता है।
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गौदारगुडी |
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गौदारगुड़ी का एक दृश्य |
सूर्यनारायण मंदिर
सूर्यदेव को समर्पित यह मंदिर भी लाड़खान मंदिर ने नजदीक ही स्थित है। यह द्रविड़ शैली में निर्मित मंदिर है।
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सूर्यनारायण मंदिर - ऐहोल |
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सूर्यनारायण मंदिर - ऐहोल |
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सूर्य नारायण मंदिर का मंडप और गर्भगृह |
दुर्ग मंदिर समुच्चय के अन्य मंदिर
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ऐहोल |
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ऐहोल |
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दुर्ग मंदिर अहाते में स्थित पुष्करिणी |
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एक मंदिर - ऐहोल |
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ऐहोल मंदिर |
अम्बिगेर गुड़ी समुच्चय दुर्ग मंदिर से बाहर निकलकर ठीक सामने की ओर अंबिगेर मंदिरों का समूह है। इसमें जो मंदिर बना है वह कुंड के बीचोंबीच अब भग्नावस्था में है।
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दुर्ग मंदिर के बाहर बाजार |
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अम्बिगेर गुड़ी |
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अम्बिगेर गुड़ी |
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अम्बिगेर गुड़ी |
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अम्बिगेर गुड़ी |
BREAKFAST TIME - AIHOLE
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ऐहोल में सुबह का भोजन |
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सांभर सहित चावल |
चिक्की मंदिर
दुर्ग मंदिर के उत्तर की ओर और अंबिगेर मंदिर के ठीक बराबर प्राचीन शिव का मंदिर है जिसके आगे नंदी की बैठी हुई मूर्ति दर्शनीय है। इस समूह में और भी मंदिर थे जिनके नामोनिशान अब देखने को नहीं मिलते हैं किन्तु मंदिरों के स्थान आज भी दिखाई देते हैं।
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चिक्की मंदिर - ऐहोल |
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चिक्की मंदिर समुच्चय - ऐहोल |
हुच्चीमल्लि शिव मंदिर
चालुक्य राजा विजयादित्य द्वारा निर्मित यह मंदिर ऐहोल ग्राम के बाहर उत्तर दिशा में स्थित है। यह मंदिर उत्तर भारत की प्रसिद्ध नागर शैली में बना हुआ है। मंदिर के गर्भगृह में भगवान शिव का विशाल शिवलिंग स्थापित है और मंदिर के ठीक सामने एक कुंड भी निर्मित है। ऐहोल में अधिकतर मंदिरों के साथ साथ जल के कुंड या पुष्करिणी भी बनाई गई थीं जहाँ राजा स्नान करने के पश्चात ही अपने आराध्य की स्तुति करते होंगे।
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हुच्चीमल्लि मंदिर का गर्भगृह |
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हुच्चीमल्लि मंदिर - ऐहोल |
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हुच्चीमल्लि मंदिर - ऐहोल |
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हुच्चीमल्लि मंदिर - ऐहोल |
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हुच्चीमल्लि मंदिर - ऐहोल |
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हुच्चीमल्लि मंदिर - ऐहोल |
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हुच्चीमल्लि मंदिर - ऐहोल |
रावनाफाड़ी गुफा मंदिर
ऐहोल का एकमात्र गुफा मंदिर है, जो भगवान शिव को समर्पित है। यह गुफा मंदिर अत्यंत ही प्राचीन है और इसका निर्माण बादामी की गुफाओं से पूर्व लगभग छटी शताब्दी के आसपास हुआ था। इसके दोनों किनारों पर पत्थरों को काट छांट कर भगवान् विष्णु के अवतार और भगवान शिव की दस भुजाओं वाली नृत्य करती हुआ प्रतिमा दर्शनीय है। मंदिर के बाहर एक स्तम्भ भी दर्शनीय है।
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रावनाफाड़ी गुफा मंदिर |
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रावनाफाड़ी गुफा मंदिर |
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सुन्दर कर्नाटक - ऐहोल |
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रावनाफाड़ी गुफा मंदिर |
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नंदी की खंडित प्रतिमा - ऐहोल |
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रावनाफाड़ी गुफा मंदिर |
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रावनाफाड़ी गुफा मंदिर का गर्भगृह |
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अष्टभुजीय नृत्य करते शिव की प्रतिमा |
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यज्ञ स्थल - इसकी छत पर यज्ञ के धुएं की परतें आज भी दिखती हैं |
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वराह प्रतिमा |
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माँ दुर्गा की प्रतिमा |
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रावण फाड़ी का शिवलिंग |
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गर्भगृह के सामने का दृश्य |
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सुन्दर मूर्तिकला |
ज्योतिर्लिंग मंदिर समुच्चय
इस मंदिर समूह में द्रविड़ शैली और वेशर शैली में निर्मित अनेक छोटे बड़े शिवालय बने हैं, इन्हें भारत के 12 ज्योतिर्लिंग के रूप में देखा जाता है अतः यह ज्योतिर्लिंग मंदिर समुच्चय के नाम से प्रसिद्द हैं।
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एक मंदिर - ऐहोल |
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ज्योतिर्लिंग समुच्चय - ऐहोल |
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ज्योतिर्लिंग समुच्चय - ऐहोल |
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ज्योतिर्लिंग समुच्चय - ऐहोल |
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ज्योतिर्लिंग समुच्चय - ऐहोल |
गौरी मंदिर
ऐहोल ग्राम के बीचोंबीच यह मंदिर स्थित है। ग्रामवासी इन ऐतिहासिक धरोहरों को नुकसान ना पहुंचाए इसलिए पुरातत्व विभाग की ओर से अनेकों मंदिर बंद रहते हैं और यहाँ ताला लगा रहता है। ऐसा ही ताला मुझे गौरी मंदिर पर भी देखने को मिला। वैसे नाम से ही स्पष्ट है कि यह मंदिर माता पार्वती को समर्पित है जिन्हें गौरी भी कहा जाता है।
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ऐतिहासिक ग्राम ऐहोल |
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गौरी मंदिर - ऐहोल |
जैन मंदिर
गौरी मंदिर के नजदीक गाँव के बीचोंबीच जैन मंदिर बने हुए हैं, इनके गर्भगृह में भगवान आदिनाथ की शानदार मूर्ति के दर्शन होते हैं।
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जैन मंदिर समुच्चय - ऐहोल |
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जैन मंदिर शानदार मंडप |
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भगवान आदिनाथ जैन की प्रतिमा - ऐहोल |
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एक और गर्भगृह |
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अनाम मूर्ति गर्भगृह - ऐहोल |
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जैन मंदिर समुच्चय |
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वेशर शैली - ऐहोल |
मल्लिकार्जुन मंदिर समुच्चय
मल्लिकार्जुन मंदिर समूह के गेट पर भी पुरातत्व विभाग का ताला लगा हुआ था। यह मंदिर समूह ऐहोल की सबसे रमणीय स्थल के रूप में बना हुआ है। भगवान् शिव के मंदिरों को समर्पित यह मल्लिकार्जुन मंदिर समूह के नाम से जाना जाता है।
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मल्लिकार्जुन मंदिर समुच्चय - ऐहोल |
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मल्लिकार्जुन मंदिर समुच्चय - ऐहोल |
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मल्लिकार्जुन मंदिर समुच्चय - ऐहोल |
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मल्लिकार्जुन मंदिर समुच्चय - ऐहोल |
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मल्लिकार्जुन मंदिर समुच्चय - ऐहोल |
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मल्लिकार्जुन मंदिर समुच्चय - ऐहोल |
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मल्लिकार्जुन मंदिर समुच्चय - ऐहोल |
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मल्लिकार्जुन मंदिर समुच्चय - ऐहोल |
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मल्लिकार्जुन मंदिर समुच्चय - ऐहोल |
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मल्लिकार्जुन मंदिर समुच्चय - ऐहोल |
मेगुती जैन मंदिर और ऐहोल का किला
मल्लिकार्जुन मंदिर समूह के ठीक सामने पहाड़ी पर किले के बीचोंबीच यह मंदिर ऐहोल का सबसे अंतिम निर्मित मंदिर है जिसका निर्माण पुलकेशिन द्वितीय के राजकवि रविकीर्ति जैन ने कराया था। यह एक जैन मंदिर है अतः सीए जिनेन्द्र मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। इसी मंदिर में ऐहोल का शिलालेख स्थित है जिसमें चालुक्य सम्राट पुलकेशिन द्वितीय के विजयगाथाओं का विवरण उत्कीर्ण है। इसी शिलालेख के माध्यम से पुलकेशिन के उत्तर भारत के सम्राट हर्षवर्धन से नर्मदा के तट पर हुए युद्ध का वर्णन मिलता है जिसमें हर्ष, पुकेशिन से पराजित हुआ था। इस मंदिर तक पहुँचने के लिए शानदार सीढ़ियां बनी हुई हैं, मंदिर से ठीक पहले एक बौद्ध मंदिर के अवशेष देखने को मिलते हैं।
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मेगुती जैन मंदिर जाने के लिए रास्ता |
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कर्नाटक का बैल - ऐहोल |
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प्राचीन बौद्ध मंदिर - ऐहोल |
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बौद्ध प्रतिमा - ऐहोल |
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खंडित बौद्ध प्रतिमा - ऐहोल |
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मेगुती जैन मंदिर - ऐहोल |
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ऐहोल किला प्रांगण |
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एक देवता की मूर्ति - ऐहोल किला |
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मेगुती जैन मंदिर - ऐहोल |
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ऐहोल किला |
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ऐहोल किले से ग्राम का दृश्य |
त्र्यंबक मंदिर समुच्चय
भगवान् शिव के त्र्यम्बकेश्वर नाम से स्थित यह मंदिर समूह द्रविड़ शैली में निर्मित है। मंदिर के प्रांगण खुले हुए हैं जिसका उपयोग ग्राम की महिलाएं अपने निजी कार्यों में लेती हैं। फ़िलहाल यहाँ लाल मिर्च सूख रही थी।
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एक मंदिर - ऐहोल |
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त्र्यम्बक मंदिर समुच्चय - ऐहोल |
चरंति मठ
जैन मंदिरों के लिए प्रसिद्ध यह स्थान ऐहोल ग्राम के बीच में स्थित है।
हुच्चप्पैया मठ
कुंती मंदिर समुच्चय
ऐहोल के अन्य स्थल


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ऐहोल का किला |
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आधुनिक शिव मंदिर - ऐहोल |
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आधुनिक शिव मंदिर - ऐहोल |
यात्रा अभी जारी है ...
ऐहोल पधारने हेतु आपका हार्दिक धन्यवाद
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कर्नाटक यात्रा से सम्बंधित यात्रा विवरणों के मुख्य भाग :-
मजा आ रहा ह् भाई जी यात्रा पढ़ने में
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