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| शेख चिल्ली के मकबरे की दीवार |
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| शेख चिल्ली का मकबरा |
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| शेख चिल्ली का मकबरा |
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| मदरसा और जलाशय का एक चित्र |
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| ऊपरी अहाते में स्थित मकबरा |
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| लाल बलुआ पत्थर से निर्मित पत्थर मस्जिद |
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| हर्ष वर्धन की राजधानी के अवशेष |
अगला भाग - राजा हर्ष का टीला
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| शेख चिल्ली के मकबरे की दीवार |
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| शेख चिल्ली का मकबरा |
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| शेख चिल्ली का मकबरा |
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| मदरसा और जलाशय का एक चित्र |
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| ऊपरी अहाते में स्थित मकबरा |
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| लाल बलुआ पत्थर से निर्मित पत्थर मस्जिद |
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| हर्ष वर्धन की राजधानी के अवशेष |
गुजरात यात्रा - 2023
जूनागढ़ - गुजरात का एक ऐतिहासिक नगर
श्री गिरनार पर्वत की तलहटी में बसा जूनागढ़ नगर, गुजरात के सौराष्ट्र प्रान्त का एक प्रमुख नगर है। जूनागढ़ ना केवल ऐतिहासिक अपितु पौराणिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।पौराणिक काल में यह रैवत प्रदेश कहलाता था, इसलिए गिरनार पर्वत का दूसरा नाम रैवतक पर्वत भी है। जूनागढ़, श्री नरसी जी की भूमि है जिनकी भक्ति से प्रसन्न होकर स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने उनकी अनेकों बार सहायता की थी।
ऐतिहासिक दृष्टि से जूनागढ़ अथवा गिरनार मौर्य काल से ही इतिहास में अपना योगदान रखता है, सम्राट अशोक, रुद्रदामन, स्कन्द गुप्त जैसे महान सम्राटों के शिलालेख यहाँ देखने को मिलते हैं।
चूँकि जूनागढ़ नगर का भ्रमण करना, मेरी इस यात्रा का उद्देश्य नहीं था, मैं तो केवल जूनागढ़ से देलवाड़ा जाने वाली मीटर गेज ट्रेन से यात्रा करना चाहता था परन्तु कल वघई से लौटने के बाद, जूनागढ़ आने वाली सौराष्ट्र ट्रेन के निकल जाने के कारण मेरी आगे की यात्रा का सारा कार्यक्रम रद्द हो गया और फिर भी मैं उस ट्रैन के मिलने की उम्मीद लिए जूनागढ़ आ गया। मीटर गेज की ट्रैन सुबह सात बजे यहाँ से रवाना हो गई जबकि मैं यहाँ सुबह दस बजे पहुंचा था। अब मेरे पास जूनागढ़ नगर को देखने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था।
जय गुरु गोरखनाथ
गोगामेड़ी यात्रा - 2022
पिछले कुछ दिनों से मन में कुलदेवता बाबा जाहरवीर के दर्शनार्थ गोगामेड़ी जाने की इच्छा सी हो रही थी, और साथ ही अपनी पत्नी कल्पना को भी मैं वहां ले जाना चाहता था। जल्द ही बाबा ने मेरी मन की बात सुन ली और मेरे पास किशोर मामा जी का फोन आया और उन्होंने मेरे गोगामेड़ी जाने के बारे में पुछा, मैंने आश्चर्यचकित होकर उनसे कहा कि आपको कैसे [पता चला कि मैं गोगामेड़ी जा रहा हूँ, तब उन्होंने कहा कि उन्हें यह बात धर्मेंद्र भाई से पता चली है।
दरअसल धमेंद्र भाई मेरे बड़े मामाजी के बेटे हैं, और मुझसे उम्र में बड़े हैं इसलिए वह मेरे लिए मेरे बड़े भाई हैं, पिछली बार जब वह मथुरा आये थे तब से उनसे मैंने गोगामेड़ी जाने के प्लान के बारे में जिक्र किया था। उन्होंने मेरी यह बात इतनी पसंद आई कि उन्होंने भी सपरिवार बाबा के दर्शन हेतु यात्रा की तैयारी कर ली। उनके साथ ही किशोर मामाजी भी अपने परिवार सहित यात्रा पर चलने को तैयार हो गए।
अब यात्रा में इतने सारे सहयात्री हो ही गए थे तो मैं अपने मुख्य सहयात्री को कैसे अकेला छोड़ सकता था और वो सहयात्री थी मेरे माँ, जिनके साथ एकबार पहले भी मैं गोगामेड़ी के यात्रा कर चुका हूँ। उस समय मीटरगेज का दौर था, हम गोगामेड़ी से जयपुर तक मीटरगेज की ट्रेन में गए थे जिसमें हमारा आरक्षण भी था स्लीपर क्लास में। मैंने भैया और किशोर मामा के साथ जाने वाली बात जब माँ को बताई तो वो भी बहुत खुश हो गईं और यात्रा पर जाने के लिए उत्साहित हो गईं।
हम एक इ रिक्शा से रेलवे स्टेशन पहुंचे। भिवानी जाने वाली पैसेंजर ट्रेन प्लेटफॉर्म चार पर खड़ी है। ट्रेन के नजदीक पहुंचकर हमें किशोर मामा और उनका परिवार, साथ ही धर्मेंद्र भाई, भाभी, नंदू, सन्नी और मेरी बड़ी मामी रूपवती जी हमें हमारा इंतज़ार करते हुए मिले। सभी हमें देखकर खुश हुए। मैं, माँ और कल्पना इस ट्रैन के स्लीपर कोच में सवार हो गए तथा बाकी हमारे अन्य सहयात्री सामान्य कोच में।
जल्द ही ट्रेन मथुरा स्टेशन से रवाना हो गई और शाम को साढ़े चार बजे के लगभग अलवर स्टेशन पहुंची। अलवर राजस्थान का एक मुख्य नगर है। इस स्टेशन पर ट्रेन का इंजन आगे से हटकर पीछे लगता है और ट्रेन रेवाड़ी जाने के लिए तैयार हो जाती है। अलवर स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर उतरकर मैंने और भैया ने एक एक चाय पी और थोड़ी देर स्टेशन पर घूमे। इसके बाद शाम को पांच बजे ट्रेन रेवाड़ी के लिए रवाना हो चली।
शाम को साढ़े छः बजे हम रेवाड़ी स्टेशन पहुंचे। यहाँ हमने यह ट्रेन छोड़ दी और यहाँ से गोगामेड़ी जाने वाली दूसरी ट्रैन का इंतज़ार करने लगे जो कि रात को साढ़े आठ बजे यहाँ आने वाली थी। अभी हमारे पास दो घंटे का पर्याप्त समय था। हमने रेवाड़ी के प्लेटफॉर्म पर ही अपने आसन बिछाए और इस शाम को अपने सहयात्रियों के साथ भरपूर इंजॉय किया। भैया और किशोर मामा जी स्टेशन के बाहर जाकर रात के भोजन की व्यवस्था कर लाये और गोगामेड़ी जाने के लिए टिकट भी ले आये।
स्टेशन पर माँ के साथ बिताये गए ये क्षण, मेरे लिए कभी ना भूलने वाले थे। सभी को एक साथ अपनी इस यात्रा में साथ देखकर मैं बहुत प्रसन्न था। रात को गोगामेड़ी जाने वाली ट्रेन भी आ गई और हम इससे आगे अपनी यात्रा पर बढ़ चले। यह ट्रेन रात को डेढ़ बजे के आसपास गोगामेड़ी पहुंची। अभी आधी रात थी, इसलिए सुबह तक हमने गोगामेड़ी रेलवे स्टेशन पर ही विश्राम किया और सुबह चार - पांच बजे के आसपास हम, गोरख टीला के लिए रवाना हो गए जो स्टेशन से काफी दूर नहीं था। माँ पैदल चलने में असमर्थ थीं, इसलिए हमने एक बैटरी वाले रिक्शे में माँ और कल्पना को बैठा दिया।
जल्द ही हम गोरख टीला पहुंचे। यह गुरु गोरखनाथ का स्थान है और यहाँ उनके दर्शन होते हैं। सुबह सुबह ही आसमान में घनी काली घटायें छाईं हुईं थीं, और शीघ्र ही घनघोर बारिश शुरू हो गई। अभी दिन निकला नहीं था, सुबह के चार से पांच बजे का समय था, हम सुबह की इस बारिश में ही नहा लिए और हमारे साथ की महिलाएं, पास ही में बने सुविधाजनक बाथरूमों में नहाकर तैयार हो गईं। यहाँ गुरु गोरखनाथ और बाबा जाहरवीर के नाम से पूजा की जाती है, दो लोंग के जोड़ों के साथ उनकी भेंट दी जाती है। हमसे भी पूर्व हमारे पूर्वज इस पूजा और प्रथा को करते आ रहे हैं, उनका मानना है कि बाबा जाहरवीर हमारे कुलदेवता हैं और हमें इनकी पूजा करनी चाहिए।
भैया और किशोरमामा जी ने भी यहाँ पूजा अर्चना की और उनके बाद हम बाबा गोरखनाथ जी के दर्शन करने गोरख टीला मंदिर में प्रवेश कर गए। गुरु गोरखनाथ जी के दर्शन करने के पश्चात हम मंदिर के पीछे बने प्रांगण में पहुंचे, यहाँ बहुत ही सुन्दर उद्यान बना हुआ है जिसमें बहुत सुन्दर प्रतिमाएं लगी हुईं हैं। नजदीक है पवित्र सरोवर है जिसमें भक्त स्नान करते हैं। .
गोरखटीला के दर्शन करने के बाद हम यहाँ से एक किमी दूर बाबा जाहरवीर जी की समाधी पर पहुंचे। इसे ही गोगामेड़ी कहा जाता है क्योंकि यह गोगाजी महाराज जाहरवीर की समाधी है। राजस्थान सरकार ने यहाँ काफी अच्छा विकास कराया है और भक्तों हेतु अनेकों सुविधाएँ मुहैया कराइ हैं। जाहरवीर बाबा की समाधी के दर्शन करने के बाद मन प्रफुल्लित हो उठा। मेरे साथ मेरी माँ और मेरी पत्नी कल्पना ने आज बाबा के दर्शन किये और अब हम वापस रेलवे स्टेशन की तरफ रवाना हो चले।
किशोर मामा जी तो हमारे साथ वापस हो लिए किन्तु धमेंद्र भाई की कुछ और ही योजना थी। इस यात्रा में उनका और हमारा साथ यही तक था, हम ट्रेन द्वारा वापस सादुलपुर की ओर रवाना हो गए और धर्मेंद्र भाई अपने परिवार सहित, हिसार की तरफ।