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Sunday, March 5, 2023

JUNAGARH : GUJRAT 2023

गुजरात यात्रा - 2023 

 जूनागढ़ - गुजरात का एक ऐतिहासिक नगर 


5 MAR 2023

श्री गिरनार पर्वत की तलहटी में बसा जूनागढ़ नगर, गुजरात के सौराष्ट्र प्रान्त का एक प्रमुख नगर है। जूनागढ़ ना केवल ऐतिहासिक अपितु पौराणिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।पौराणिक काल में यह रैवत प्रदेश कहलाता था, इसलिए गिरनार पर्वत का दूसरा नाम रैवतक पर्वत भी है। जूनागढ़, श्री नरसी जी की भूमि है जिनकी भक्ति से प्रसन्न होकर स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने उनकी अनेकों बार सहायता की थी। 

ऐतिहासिक दृष्टि से जूनागढ़ अथवा गिरनार मौर्य काल से ही इतिहास में अपना योगदान रखता है, सम्राट अशोक, रुद्रदामन, स्कन्द गुप्त जैसे महान सम्राटों के शिलालेख यहाँ देखने को मिलते हैं। 

चूँकि जूनागढ़ नगर का भ्रमण करना, मेरी इस यात्रा का उद्देश्य नहीं था, मैं तो केवल जूनागढ़ से देलवाड़ा जाने वाली मीटर गेज ट्रेन से यात्रा करना चाहता था परन्तु कल वघई से लौटने के बाद, जूनागढ़ आने वाली सौराष्ट्र ट्रेन के निकल जाने के कारण मेरी आगे की यात्रा का सारा कार्यक्रम रद्द हो गया और फिर भी मैं उस ट्रैन के मिलने की उम्मीद लिए जूनागढ़ आ गया। मीटर गेज की ट्रैन सुबह सात बजे यहाँ से रवाना हो गई जबकि मैं यहाँ सुबह दस बजे पहुंचा था। अब मेरे पास जूनागढ़ नगर को देखने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था। 

Monday, April 5, 2021

VIJYAPUR : KARNATAKA 2021

 UPADHYAY TRIPS PRESENT'S

कर्नाटक की ऐतिहासिक यात्रा पर  भाग - 11 

आदिलशाही राज्य बीजापुर 

TRIP DATE :- 05 JAN 2021

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     दक्षिण भारत में मुहम्मद बिन तुगलक के लौट जाने के बाद बहमनी सल्तनत की शुरुआत हुई थी, यह दक्षिण भारत की सबसे बड़ी सल्तनत थी किन्तु सल्तनत चाहे कितनी भी बड़ी क्यों ना हो, उसके शासक कितने भी शक्तिशाली क्यों ना हो, हमेशा स्थिर नहीं रहती। एक ना एक दिन उसे इतिहास के पन्नों में समाना ही होता है और ऐसा ही बहमनी सल्तनत के साथ हुआ। बहमनी सल्तनत का, महमूद गँवा की मृत्यु के बाद से ही पतन होना प्रारम्भ हो गया था और जब इस सल्तनत को कोई योग्य सुल्तान नहीं मिला तो यह पांच अलग अलग प्रांतों में विभाजित हो गई। इनमें से ही एक बीजापुर की आदिलशाही सल्तनत थी जिसके दमन का प्रमुख कारण मराठा और मुग़ल थे। 

Monday, February 22, 2021

BIDAR : KARNATAKA 2021

 UPADHYAY TRIPS PRESENT'S

कर्नाटक की ऐतिहासिक यात्रा पर भाग - 4, 

01 JAN 2021

     बीदर - क्राउन ऑफ़ कर्नाटक 


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बीदर का सल्तनतकालीन इतिहास 

   दिल्ली सल्तनतकाल के दौरान तुगलक वंश के संस्थापक ग़यासुद्दीन तुग़लक़ की मृत्यु के बाद, उसका पुत्र जूना खां, मुहम्मद बिन तुगलकशाह के नाम से दिल्ली की गद्दी पर बैठा। अपने शासनकाल के दौरान उसने साम्राज्यवादी नीति को अपनाकर अपने साम्राज्य का विस्तार किया। दिल्ली सल्तनत की सीमायें भारत के उत्तर और पश्चिम में अब कांधार और करजाल, पूर्व में बंगाल और दक्षिण भारत के राज्यों को छूने लगीं थीं। मुहम्मद बिन तुगलक निसंदेह एक दूर की सोच रखने वाला सुल्तान था, उसने अपने साम्राज्य का काफी हद तक विस्तार किया किन्तु उसने अपने शासनकाल के दौरान जो योजनाएँ लागू कीं, वह विफल रहीं। इन्हीं में से एक योजना थी राजधानी परिवर्तन की। उसने अपनी राजधानी दिल्ली से हटाकर देवगिरि स्थानांतरित की जो पूर्ण रूप से असफल रही और इस योजना के विफल हो जाने के बाद उसका राज्य छिन्न भिन्न हो गया। 

   हालांकि उसने देवगिरि को राजधानी के तौर पर इसलिए चुना ताकि देवगिरि से साम्राज्य की चारों दिशाओं में नियंत्रण स्थापित किया जा सके। उसका मुख्य उद्देश्य उत्तर भारत के साथ साथ दक्षिण भारत पर भी अपना प्रभुत्व स्थापित रखना था किन्तु दिल्ली की जनता, देवगिरि जैसे सुदूर प्रदेश में नहीं ढल सकी और मजबूरन सुल्तान को फिर से राजधानी दिल्ली स्थानांतरित करनी पड़ी। देवगिरि से दिल्ली राजधानी परिवर्तन होने के बाद दक्षिण भारत के सामंतों ने विद्रोह कर दिया और स्वयं को तुगलक वंश का उत्तराधिकारी मानकर अपने नवीन वंशों की स्थापना की और स्वयं को सम्राट या सुल्तान घोषित किया। इन्हीं में से एक सामंत था हसन, जिसने दक्षिण भारत में बहमनी वंश की नींव रखी और देवगिरि के सिंहासन पर आसीन हुआ। 

   देवगिरि पर कुछ समय शासन करने के बाद उसने अपनी नई राजधानी गुलबर्गा को बनाया। 1422 ई. में अहमदशाह ने बहमनी सल्तनत की राजधानी गुलबर्गा से हटाकर बीदर में स्थानांतरित की और बीदर से ही राज्य का सञ्चालन आरम्भ किया। 1526 ई. में एक अमीर अलीबरीद ने आखिरी अयोग्य बहमनी सुल्तान को अपदस्थ कर स्वतंत्रता की घोषणा कर दी और बीदर में फिर एक नए वंश बरीदशाही की स्थापना कर सुल्तान बन गया। बरीदशाही वंश के बाद बीदर पर मराठाओं का साम्राज्य स्थापित हो गया और बाद में चलकर यहाँ ब्रिटिश हुकूमत का राज रहा। देश की स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में लोकतंत्र स्थापित हुआ और बीदर की रियासत अब भारत का अभिन्न हिस्सा बन गई। बीदर महाराष्ट्र और तेलंगाना राज्यों का सीमावर्ती शहर है और कर्णाटक के सबसे शीर्ष पर स्थित होने के कारण यह कर्नाटक का मुकुट या ताज भी कहलाता है।  

Friday, April 17, 2020

SAI NAGAR SHIRDI



साईं नगर शिरडी 



6 जनवरी 2020                                                               इस यात्रा को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक कीजिये। 

    हम करीब साढ़े नौ बजे शिरडी पहुँच गए थे, एक प्रसाद वाले की दुकान पर अपने बैग रखकर हम साईं बाबा के दर्शन करने लाइन में लग गए और दर्शन पर्ची लेकर साईं बाबा के दर्शन हेतु अपनी बारी का इंतज़ार करने लगे। आज काफी सालों बाद मेरी और साधना की मुलाकात बाबा से होने वाली थी। बहुत दिन हो गए थे बाबा से बिना मिले इसलिए अब जब हमारी यह यात्रा अंतिम चरण में थी तो दिल ने सोचा क्यों ना बाबा के दर्शन कर चलें। आखिर कार हमारी यह यात्रा धार्मिक यात्रा भी तो थी। 

    महाराष्ट्र प्रान्त के गोदावरी नदी के समीप शिरडी नामक ग्राम स्थित है जहाँ 18 वीं सदी में साईंबाबा का प्रार्दुभाव एक वृक्ष के नीचे हुआ था। साईंबाबा के बारे में प्रचलित है कि इनका जन्म और इनकी बाल्यकाल अवस्था अज्ञात है। इनका सबसे प्रथम दर्शन शिरडी वासियों को ही हुआ था, जब उन्होंने एक वृक्ष के नीचे एक दिव्यतेज युवा को ध्यानमग्न अवस्था में देखा। 

Tuesday, April 7, 2020

AURANGZEB TOMB



खुलदाबाद - औरंगजेब का मक़बरा



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5 जनवरी 2020 

     दौलताबाद का किला देखने के बाद हम एलोरा गुफाओं की तरफ आगे बढ़ गए। यहाँ रास्ता बेहद ही शानदार था, रास्ते के दोनों तरफ बड़े बड़े छायादार घने वृक्ष लम्बी श्रृंखला में लगे हुए थे। दौलताबाद की सीमा समाप्त होते ही, घाट सेक्शन शुरू हो जाता है और ऑटो अब अपनी पूरी ताकत से इन पहाड़ियों पर गोल गोल घूमकर चढ़ता ही जा रहा था। कुछ समय बाद हम एक मुसलमानों की बस्ती में पहुंचे। यह नगर खुलदाबाद कहलाता है जिसे मुग़ल सम्राट औरंगजेब ने बसाया था। यहां औरंगजेब का मकबरा एक साधारण सी मजार के रूप में स्थित है। इस स्थान के ऐतिहासिक महत्त्व को देखते हुए हम अपने धर्म के विपरीत इस स्थान को देखने गए।

Sunday, April 5, 2020

BIBI KA MAQBARA


बीबी का मक़बरा 



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यात्रा दिनाँक :- 5 जनवरी 2020

    विश्व प्रसिद्ध मुगलकालीन ईमारत ताजमहल की तर्ज पर बना बीबी का मकबरा, असल में मुग़ल साम्राज्य के आखिरी महान शासक औरंगजेब की पत्नी, दिलरस बानो बेग़म का मक़बरा है जिनका देहांत मुमताज़ महल की ही तरह जज्चा संक्रमण की वजह से सन 1657 में हो गया था। इनके मरणोपरांत इन्हें राबिया उदौरानी के नाम से जाना गया जिसका हिंदी अनुवाद 'उस युग की राबिया' है। 

    कई लोग इसे सम्राट औरंगजेब का मकबरा भी समझ लेते हैं किन्तु यह गलत है। बेग़म की मृत्यु के पश्चाय सम्राट औरंगजेब ने यहाँ एक सादा कब्र का निर्माण कराया और बाद में औरंगजेब के पुत्र शहजादा आज़मशाह ने इसे ताजमहल से भी सुन्दर बनवाने की कोशिश की किन्तु अत्यधिक व्यय के चलते औरंगजेब ने ऐसा नहीं होने दिया। 

Tuesday, February 18, 2020

Safdarjung Tomb



सफदरजंग का मक़बरा 





नवंबर 2018 

मैं आज दिल्ली में हूँ और दिल्ली के पुराने अतीत के जीवन को वर्तमान में पहचानने की कोशिश में हूँ। मैं निकला था दिल्ली के प्राचीन शहर महरौली की तरफ जहाँ आज भी दिल्ली का सल्तनतकालीन और उसके वंशजों द्वारा बनवाये गए किले, मकबरे और महल अपने भव्य समय की याद दिलाते हैं जिनमे सबसे मुख्य तो विश्व प्रसिद्ध कुतुबमीनार है जो आज दिल्ली की ही नहीं पूरे भारतवर्ष की शान है। इससे पहले दिल्ली की सरकारी बस में बैठकर मैं सफ़दरजंग के मकबरे पर पहुंचा। आज सफदरजंग केवल एक व्यक्ति का नाम ही नहीं रह गया है बल्कि यह नाम दिल्ली में एक जाना माना स्थान बन चुका है और इसी नाम पर दिल्ली का रेलवे स्टेशन और अस्पताल भी मुख्य हैं। 

Sunday, October 22, 2017

SHERSHAH SURI TOMB

UPADHYAY TRIPS PRESENT'S


शेरशाह सूरी और उसका मक़बरा 



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      बिहार की ऐतिहासिक धरती पर इतिहास को खोजते हुए मैं, इतिहास के महान शासक शेरशाह सूरी तक जा पहुँचा, जिसने अपने शासन काल में भारतीय इतिहास के सबसे बड़े और विशाल साम्राज्य  'मुग़ल साम्राज्य ' को छिन्न भिन्न कर दिया। बाबर द्वारा स्थापित मुग़ल साम्राज्य की जमीं नींव को उखाड़ फेंकने और दिल्ली की गद्दी पर किसी मुग़ल शासक को हटाकर खुद दिल्ली का शासक बनने और मुग़ल वंश को हटाकर सूरी वंश की स्थापना करने का श्रेय महान शासक शेरशाह सूरी को ही जाता है।

Monday, April 2, 2012

HALDIGHATI : MEWAR 2012

UPADHYAY TRIPS PRESENT'S

हल्दीघाटी - एक प्रसिद्ध रणभूमि


मैं और मेरी पत्नी कल्पना ,चेतक की समाधी पर 



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   आज हमारा विचार हल्दीघाटी जाने का बना, जीतू ने आज छुटटी ले थी साथ ही एक बाइक का इंतजाम भी कर दिया। मैं ,कल्पना, दिलीप, जीतू और उसका बेटा अभिषेक दो बाइकों से चल दिए एक प्रसिद्ध रणभूमि की तरफ जिसका नाम था हल्दीघाटी। यूँ तो हल्दीघाटी के बारे में हम कक्षा चार से ही पढ़ते आ रहे हैं, और एक कविता भी आज तक याद है जो कुछ इसतरह से थी,
             
                        रण बीच चौकड़ी भर भर कर , चेतक बन गया निराला था।
                         महाराणा प्रताप के घोड़े से   , पड़  गया  हवा का पाला था ।।

    हल्दीघाटी के मैदान में आज से पांच सौ वर्ष पूर्व मुग़ल सेना और राजपूत सेना के बीच ऐसा भीषण संग्राम हुआ जिसने हल्दीघाटी को इतिहास में हमेशा के लिए अमर कर दिया और साबित कर दिया कि भारत देश के वीर सपूत केवल इंसान ही नहीं,  जानवर भी कहलाते हैं जो अपनी जान की परवाह किये बगैर अपने मालिक के प्रति सच्ची वफ़ादारी का उदाहरण पेश करते हैं और ऐसा ही एक उदाहरण हल्दीघाटी के मैदान में महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक ने अपनी जान देकर दिया। ऐसे वीर घोड़े को सुधीर उपाध्याय का शत शत नमन।