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Saturday, May 14, 2022

PURNAGIRI TEMPLE : UTTRAKHAND 2023

 शक्तिपीठ माँ पूर्णागिरि मंदिर 



आख़िरकार दो साल बाद, कोरोना जैसी महामारी को हराकर यात्राएँ फिर से शुरू हो चुकी थीं, इस वर्ष उत्तराखंड और हिमाचल में जैसे टूरिस्टों, तीर्थयात्रियों और घुमक्क्ड़ों की जैसे बाढ़ सी आ गई थी। उत्तराखंड के चारों धाम गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ के अलावा समूचे प्रदेश में हर  सड़क, हर होटल में यात्रियों का ताँता सा लगा हुआ था। हरिद्वार और ऋषिकेश जैसे तीर्थ शहर हॉउसफुल हो चुके थे। आखिरकार लोगों को दो साल बाद प्रकृति से रूबरू होने का मौका जो मिला था। इसबीच मैंने भी अपना यात्रा प्लान उत्तराखंड की ओर ही बना रखा था और अंत में तय हुआ कि कुमाँयु में ही कोई यात्रा की जाए। 

मैं काठगोदाम और नैनीताल नहीं जाना चाहता था और पिछले कुछ समय से मेरा मन टनकपुर स्थित माँ पूर्णागिरि धाम के दर्शनों को बहुत व्याकुल हो रहा था। इस बार वहीँ जाने का विचार लेकर मैं रात को आगरा फोर्ट से रामनगर जाने वाली साप्ताहिक एक्सप्रेस में आकर बैठ गया और रात को 11 बजे ट्रेन के चलने के साथ ही इसकी खाली पड़ी सीट पर बिस्तर लगाकर सो गया। सुबह तक़रीबन तीन बजे जब मेरी आँख खुली तो देखा ट्रेन बरेली के स्टेशन पर खड़ी थी। मेरा गंतव्य यहाँ से अगले स्टेशन इज़्ज़त नगर तक ही था इसलिए इस ट्रेन को मैंने इज़्ज़त नगर पर छोड़ दिया और स्टेशन पर बने वेटिंग रूम में मैंने सुबह होने तक एक नींद और खींच ली। 

अब सुबह के सात बज चुके थे, वेटिंग रूम में ही मैं नहाधोकर तैयार हो गया और अब अपनी अगली यात्रा इज़्ज़त नगर से टनकपुर के लिए होनी थी। बरेली से टनकपुर के बीच सुबह एक डीएमयु ट्रेन चलती है। इसी ट्रैन का टिकट लेकर मैं टनकपुर की ओर रवाना हो चला। टनकपुर उत्तराखंड का आखिरी रेलवे स्टेशन है, जिसतरह देहरादून, ऋषिकेश, रामनगर और काठगोदाम टर्मिनल रेलवे स्टेशन है ठीक उसी तरह टनकपुर भी उत्तराखंड का टर्मिनल स्टेशन है। कुछ समय पहले तक यहाँ सिर्फ मीटर गेज ट्रैन ही चलती थी किन्तु अब आमान परिवर्तन के बाद यहाँ ब्रॉड गेज लाइन बिछी और टनकपुर देश के कुछ मुख्य शहरों से जुड़ गया। पीलीभीत के बाद उत्तर प्रदेश की सीमा समाप्त हो जाती है और उत्तराखंड की झलक देखने को मिलती है। 

खटीमा उत्तराखंड का मुख्य शहर है जो हल्द्वानी के निकट स्थित है। पीलीभीत के बाद खटीमा ही टनकपुर रेल लाइन का बड़ा स्टेशन है जो प्राकृतिक सौन्दर्यता से निखरा हुआ है, इसके बाद ट्रेन जंगलों के बीच से होती हुई बनबसा पहुँचती है और इससे आगे हिमालय के पहाड़ दृष्टिगोचर होने लगते हैं। उत्तराखंड के पहाड़ों की तलहटी में टनकपुर बसा हुआ है जो कि चम्पावत जिले में स्थित है। 

ट्रेन टनकपुर रेलवे स्टेशन पहुँच चुकी है, मैंने जिसप्रकार आज से पहले इस रेलवे स्टेशन की कल्पना की थी, उससे इसे परे ही पाया। स्टेशन परिसर के बाहर निकलते ही मुझे इसके मीटर गेज के होने के समय का एहसास सा हो गया। यह उत्तराखंड का आखिरी टर्मिनल रेलवे स्टेशन है जहाँ  ज्यादातर ट्रेनों का आवागमन नहीं है। 

रेलवे स्टेशन के आखिरी सिरे पर एक रेलवे फाटक है जिसके किनारे ही टनकपुर का बस स्टैंड है। इस बस स्टैंड से अन्य शहरों के लिए अनेकों बसें चलती हैं किन्तु अपने अपने समय पर। यहाँ हिमाचल प्रदेश की भी बस सेवा है जो शिमला से टनकपुर के बीच पूरी होती है। मेरे सामने ही हिमाचल की यह बस यहाँ आई और कुछ समय ठहरकर शिमला के लिए वापस चली गई। 

मैंने आज लोहाघाट जाने का प्लान बनाया था परन्तु समय की कमी के चलते मेरा यह प्लान फ्लॉप हो गया और मैंने आज माँ पूर्णागिरि मंदिर जाने का विचार बनाया जहाँ मैं लोहाघाट से लौटकर जाना चाहता था। टनकपुर से पूर्णागिरि की दूरी लगभग 23 किमी है जहाँ जाने के लिए अनेकों जीपें हर समय उपलब्ध रहती हैं। इन्हीं में से एक जीप के द्वारा मैं पूर्णागिरि पहुंचा। 

जीप वाले ने मुझे भैरव मंदिर के समीप उतार दिया। इसके बाद अब रास्ता पैदल का था और चढ़ाई भरा था। किन्तु यहाँ मुझे इस चढ़ाई भरे रास्ते में दोनोंतरफ अनेकों ऐसी दुकाने दिखीं जिनमें अनेकों गद्दे बिछे हुए थे, जिसका मतलब था यह यहाँ आने वाले भक्तों के विश्राम के लिए थे। ऐसी ही एक दुकान पर मैंने भी थोड़ी देर विश्राम किया और इस दुकानदार से यहाँ की अधिकांश जानकारी एकत्र की। थोड़ी देर पश्चात मैं यहाँ से आगे बढ़ चला। मैं जैसे जैसे आगे बढ़ता जा रहा था, रास्ता और भी कठिन और चढ़ाई भरा होता जा रहा था। आज इस यात्रा में मुझे वैष्णो देवी यात्रा की याद आ गई। 

पर्वत की चोटी पर देवी माता का एक छोटा सा मंदिर है, यह एक मुख्य शक्तिपीठ है और यहाँ की मान्यता है कि यहाँ सती की नाभि गिरी थी, जिससे यह स्थान एक प्रमुख शक्तिपीठ बन गया। माता के दर्शन कर अब मैं वापस हो चला। जब मैं पर्वत से उतरकर नीचे पहुंचा तो मुझे यहाँ मेरा चचेरा भाई यतेश मिला जो अपने परिवार सहित माता के दर्शन के लिए यहाँ आया था। मुझे यह पहले से पता नहीं था अन्यथा इस यात्रा को मैं अकेले नहीं बल्कि अपने भाई के साथ कर सकता था। परन्तु अब मेरी यात्रा पूर्ण हो चुकी थी, इसलिए भाई से विदा लेकर मैं वापस तनकपुर के लिए निकल पड़ा। 

शाम को चार बजे के लगभग मैं टनकपुर पहुंचा, यहाँ पहुंचकर मैंने थोड़ी देर बाजार घुमा और रेलवे स्टेशन पहुंचकर अपनी ट्रेन को देखा, जो पीलीभीत तक जाने के लिए तैयार थी। ट्रेन बिलकुल खाली पड़ी थी, यहाँ मैंने उत्तराखंड के जाम का आनंद लिया और अब ट्रैन भी चल पड़ी थी। रात को दस बजे तक मैं पीलीभीत पहुँच चुका था, यहाँ से मेरी अगली ट्रेन बरेली के लिए थी जो रात को साढ़े ग्यारह बजे चलेगी। मेरे पास डेढ़ घंटे का समय था। 

मैंने स्टेशन से बाहर निकलकर बाजार घूमा और एक दुकान पर जाकर रात्रि भोज किया। बरेली पहुंचकर मुझे रामनगर - आगरा एक्सप्रेस मिल गई जिससे मैं मथुरा पहुँच गया। 

जय माता दी  









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Tuesday, June 4, 2019

KEDARNATH 2019 : Return from Shri Kedarnath

UPADHYAY TRIPS PRESENT'S

श्री केदारनाथ जी से मथुरा वापसी ( एक चमत्कारिक यात्रा )





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केदारनाथ नगर में भ्रमण :-
सुबह से शाम तक लाइन में लगे रहने के बाद आख़िरकार मुझे मेरे आराध्य भगवान शिव के केदारनाथ जी   के दर्शन हो ही गए।  दर्शन से मन को तृप्त करने के बाद मैंने भीमशिला के भी दर्शन किये जिसने त्रासदी के समय केदारनाथ मंदिर जी रक्षा की थी और फिर मैंने केदारनाथ नगर का भ्रमण किया जो मात्र साल में छः महीने ही गुलजार रहता है बाकी छः महीने यह बर्फ के आगोश में छिप जाता है। त्रासदी के समय यहाँ अत्यधिक विनाश हुआ था जिसके निशाँ उस दर्द की कहानी आज भी बयां करते नजर आते हैं। नगर भ्रमण करने के बाद अब मुझे भूख भी लग आई थी, राजस्थान वालों का यहाँ विशाल भंडारा चल रहा था जिसमे स्वादिष्ट भोजन और कुछ जलेबी खाकर अब मैं वापस अपने घर की तरफ लौट लिया था किन्तु मुझे क्या पता था कि घर अभी बहुत दूर था।

केदारनाथ जी से वापसी :-
केदारनाथ से लिंचोली तक आते आते अब मैं बहुत ही बुरी तरह से थक चुका था, पहाड़ उतरते समय आज मुझे पहली बार एहसास हुआ कि पहाड़ से उतरना, पहाड़ पर चढ़ने से भी ज्यादा मुश्किल होता है। इन खाली घोड़ों को यूँ नीचे की तरफ जाते देख कभी कभी मन करता की क्यों ना इन्हीं एक घोड़े पर बैठकर मैं भी निकल जाऊं परन्तु जब जेब का ख्याल आता तो पता चला कि पैसे तो पैदल चलने के लायक भी नहीं बचे थे आज, जो आखिरी बीस रूपये थे उसका भी मैं प्रसाद ले आया था, अब तो बस मेरी मंजिल माँ ही थी जो इसवक्त भीमबली में थी और शायद मेरे अन्य सहयात्री विष्णु भाई और त्रिपाठी जी भी मुझे वहीँ मिले। शाम हो चुकी थी और अब सूर्य का प्रकाश धीरे धीरे घाटी में से प्रस्थान कर रहा था और अँधेरे का आगमन शुरू हो चुका था। अँधेरे में ये पहाड़ और भी खतरनाक हो जाते हैं और मुझे फिर इन पहाड़ों से डर लगने लगता है।

Kedarnath 2019 : Shri Kedarnath Jyotirling

UPADHYAY TRIPS PRESENT'S

श्री केदारनाथ ज्योतिर्लिंग यात्रा 2019 


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   पर्वतराज हिमालय की हिमाच्छादित चोटियों पर साक्षात् ईश्वर का वास माना जाता रहा है, इसलिए हिमालय  देवभूमि कहलाता है। हिमालय के उत्तराखंड राज्य में हिन्दुओं के मुख्य तीर्थ स्थल चार धाम स्थित हैं जिनमें श्री बद्रीनाथ जी, केदारनाथ जी, गंगोत्री और यमुनोत्री हैं। इनके अलावा यहाँ हर कोस पर किसी न किसी देवता का मंदिर भी स्थित है। श्री केदारनाथ जी भारतवर्ष के मुख्य बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक हैं जिनका दिव्य मंदिर हिमालय की केदार नामक ऊँची चोटी पर स्थित है। केदारनाथ ज्योतिर्लिंग के मंदिर के बारे में विख्यात है कि इस प्राचीन मंदिर का निर्माण पांडवों ने कराया था जो पर्वत की 11750 फुट की ऊँचाई पर स्थित है।

Monday, June 3, 2019

KEDARNATH 2019 : GAURIKUND TO LINCHOLI

UPADHYAY TRIPS PRESENT'S

 श्री केदारनाथ मार्ग और मेरे अनुभव - गौरीकुंड से बड़ी लिंचोली



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   अब चढ़ाई शुरू हो चुकी थी और मेरा संपर्क अब प्रकृति के साथ हो चला था, भोलेनाथ के भक्तों की भीड़ के साथ साथ अब मैं भी भोलेनाथ के दरबार की तरफ बढ़ने लगा था कि अचानक मुझे याद आया कि माँ का पर्स और उनका बैग तो मेरे पास ही रह गया था जिसका मतलब था कि अब उनके पास एक पैसा भी नहीं था जिससे वो कहीं किसी दुकान पर चाय पी लें या कुछ खा लें, जब कि वो तो डायबिटीज की मरीज हैं उन्हें भूख बहुत ही जल्द लग आती है, अब कैसे होगा, क्या होगा बस कुछ ऐसे ही विचारों को अपने दिमाग में सोचते हुए मैं आगे बढ़ रहा था, एक तरफ मुझे माँ से बिछड़कर दुःख भी हो रहा था और दूसरी तरफ मन ये सोच कर खुश भी था कि जो भी हो अब मेरी माँ घोड़े पर बैठकर मंदिर तक तो पहुँच ही जाएगी। 

   मैं भी मंदिर पर पहुँच जाऊंगा जहाँ मेरी मुलाकात माँ से हो जाएगी बस चिंता इसी बात की रहेगी कि उनके पास पैसे नहीं हैं परन्तु हो सकता है भोलेनाथ कोई चमत्कार ही कर दें, मेरे अन्य सहयात्री जो कल के भोलेनाथ से मिलने गए हुए हैं उनकी भेंट माँ से हो जाए और फिर उन्हें कोई परेशानी ना हो।

Sunday, June 2, 2019

KEDARNATH 2019 : SONPRAYAG TO GAURIKUND



केदारनाथ यात्रा 2019  -  सोनप्रयाग से गौरीकुण्ड


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    स्टेटबैंक के एटीएम के बाहर रातभर जमीन पर सोने के बाद मेरी आँख सुबह जल्दी ही खुल गई, दरअसल मैं रात को ठीक से सो ही नहीं सका और सुबह होने की प्रतीक्षा करता रहा था, दिल में भोलेनाथ से मिलने की लालसा अब उनके द्वार पर आकर और भी तीव्र हो चली थी, अब बस ऐसा लग रहा था कि बस जल्दी से चढ़ाई शुरू कर दूँ और केदारनाथ बाबा के मंदिर पर जाकर माथा टेकूँ, बस ऐसा सोच ही रहा था कि सबसे पहले नहा धोकर तैयार आचार्य विष्णुजी ने बताया कि ऊपर चढ़ाई शुरू करने से पहले रजिस्ट्रेशन करवाना होगा, तभी चढ़ाई शुरू होगी। रजिस्ट्रेशन करवाने के लिए और अपनी

   आगे की यात्रा को अंतिम पड़ाव तक पहुँचाने केलिए हम सभी सोनप्रयाग स्थित रजिस्ट्रेशन काउंटर पर पहुंचे। यह सोनप्रयाग में केदारनाथ मार्ग में स्थित है। यहाँ पहुंचकर देखा तो बहुत ही लम्बी लाइन लगी हुई थी, माँ को चाय की दुकान पर बैठाकर हम रजिस्ट्रेशन हेतु लाइन में लग गए, एक घंटे लाइन में लगे रहने के बाद हमें पता चला कि यह रजिस्ट्रेशन हम अपने मोबाइल में भी स्वतः ही कर सकते हैं, लाइन से हटकर हमने अपना अपना रजिस्ट्रेशन किया और जय बाबा केदारनाथ का जयकारा लगाकर हम गौरीकुंड के लिए बढ़ चले।

Saturday, June 1, 2019

KEDARNATH 2019 : HARIDWAR TO SONPRAYAG


केदारनाथ यात्रा 2019 - हरिद्वार से सोनप्रयाग बस यात्रा


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शाम को गंगा स्नान करने  के बाद हम धर्मशाला पहुंचें और अपने अपने घरों से जो कुछ हम खाने को लाये थे उसे ही खाकर अपने बिस्तर लगाकर सो गए।  त्रिपाठी जी धर्मशाला की सबसे  ऊपर की छत पर जाकर सो गए जहाँ इस जून के महीने में भी हमें  ठंडी हवा रात को लगी रही थी। सुबह तड़के ही हम सब उठकर नहाधोकर बस स्टैंड की तरफ निकल गए। बस स्टैंड पहुंचकर देखा तो बद्रीनाथ जाने वाली उत्तराखंड की एकमात्र रोडवेज बस निकल चुकी थी, इसलिए बस स्टैंड के बाहर से ही चलने वाली एक प्राइवेट बस में हमने अपनी अपनी सीट बुक कर लीं। 

सुबह आठ बजे  के आसपास बस हरिद्वार से रवाना हो चली, यह बस अगस्तमुनि तक ही जा रही थी। अगस्तमुनि रुद्रप्रयाग से आगे केदारनाथ जाने वाले मार्ग में पड़ता है। ऋषिकेश निकलने के पश्चात् बस अब पहाड़ों की तरफ अपना रुख कर रही थी। यही वो पहाड़ थे जिनमें जाने का सपना मैं काफी समय से देख रहा था। गोलाकार घुमावदार सड़कों पर बस में बैठकर यात्रा करने का आनंद ही कुछ और होता है, गंगा नदी अब काफी नीचे गहरी घाटी में बहती हुई दिखाई दे रही थी। जितना यहाँ यात्रा करने में आनंद आता है उतना ही बस की खिड़की से गंगा ज की गहरी घाटी को देखकर डर भी लगता है। यह उत्तराखंड के पहाड़ हैं और उत्तराखंड एक देवभूमि है यहां जहाँ कहीं भी नजर जाती है वहीँ ईश्वरीय शक्ति आभास अनायास ही होने लगता है। 

Sunday, July 2, 2017

BIKE TRIP 2017 : DDN TO MTJ

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देहरादून घंटाघर और वापसी


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            नीलकंठ से लौटने के बाद अब हमारा प्लान मसूरी जाने का बना इसके लिए देहरादून पहुँचना जरुरी था, इसलिए हम सबसे पहले ऋषिकेश बस स्टैंड पहुँचे। यहाँ पहाड़ों में ऊपर जाने वाली बसें भी खड़ी हुई थी और कुछ बसें दिल्ली जाने के लिए भी खड़ी हुई थी। तभी  देहरादून की एक बस आई, साधना , भरत और मामी जी बस में चढ़ गए और मैं अपनी बाइक से देहरादून की तरफ रवाना हो गया। रास्ता शानदार था और घने जंगलों के बीच से होकर गुजरता है। डोईवाला के बाद जंगल समाप्त हो जाते हैं, और देहरादून का शहरीय क्षेत्र शुरू हो जाता है।

NEELKANTH MAHADEV : RISHIKESH

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नीलकंठ महादेव और लक्ष्मण झूला

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           पिछले दो दिनों से लगातार बाइक चला रहा था और रात को गंगाजी के किनारे से भी थोड़ा लेट लौटा था इसलिए सुबह जल्दी आँख नहीं खुली और साढ़े छ बजे तक सोता ही रहा। मोबाइल रात को चार्जिंग में लगा दिया था इसलिए फुल चार्ज हो गया था। धर्मशाला के सामने ही गंगा जी थीं फटाफट नहाधोकर तैयार हो गया। गत रात्रि से अब सुबह गंगाजी का बहाब काफी तेज हो गया था और पानी भी काफी ठंडा था, इससे लगता है ऊपर पहाड़ों में काफी तेज बारिश हुई होगी। यहाँ के स्थानीय लोगों ने भी बताया था कि इस वक़्त पहाड़ों में तेज बारिश हो रही है, पहाड़ फिसलने का भी डर है। इसलिए बद्रीनाथ जाने का विचार अगली बार पर छोड़ दिया और नीलकंठ जाने का विचार बनाया।
 

Saturday, July 1, 2017

RISHIKESH 2017

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ऋषिकेश धाम - वर्ष 2017 


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     चीला के रास्ते हम हरिद्धार से ऋषिकेश पहुंचे। साधना ऑटो के जरिये हमसे पहले ही पहुँच गई थी। ऋषिकेश साधु संतो की तपोस्थली है और उत्तराखंड के चारों धामों की तरफ जाने का प्रवेश द्वार है। चूँकि हरिद्धार को ही हरि का द्धार माना जाता है क्योंकि भगवान विष्णु का धाम बद्रीनाथ, भगवान शिव का धाम केदारनाथ दोनों ही जगह जाने के लिए यात्रा हरिद्धार से ही शुरू होती है ,परन्तु पहाड़ो पर चढ़ाई ऋषिकेश से ही शुरू होती है। आज ऋषिकेश का मौसम मनभावक हो रहा था, यहाँ ऊँचे ऊँचे पहाड़ों को देखकर एक बार तो दिल में आया कि अभी इन पहाड़ों पर चला जाऊं, परन्तु अभी हमें ऋषिकेश भी घूमना था।
   
     सबसे पहले हम त्रिवेणी घाट पहुंचे। यह एक सुन्दर और मनोहर घाट है जहाँ सामने कल कल करती हुई गंगा बहती है और उस पार हरे भरे पहाड़ देखने को मिलते हैं। हम काफी देर यहाँ रुके।यहाँ एक भगवत कथा का आयोजन भी था, गंगा के किनारे देवो की स्थली में भागवत कथा का श्रवण किस्मत से ही मिलता है ।  यहाँ घाट पर ही पार्किंग भी है जहाँ मेरी बाइक निःशुल्क खड़ी हुई। यहीं मैंने अपनी बाइक को भी गंगा स्नान भी कराया। शाम को आरती का वक़्त हो चला था काफी संख्या में लोग यहाँ एकत्र होने लगे। हमें यहाँ से अब रामझूला की तरफ निकलना था.

HARIDWAR 2017

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मायानगरी हरिद्धार में 


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      स्टेशन से लौटकर सबसे पहले हमने एक धर्मशाला में दो कमरे लिए। यह दो सौ रूपये प्रति कमरे के हिसाब से थे। मोबाईल चार्ज करके हम हर की पैड़ी की तरफ चल दिए। गंगा आरती का समय हो चुका था पर जब तक हम वहां पहुंचे आरती हो चुकी थी। यह शुभ मौका मैं खोना नहीं चाहता था परन्तु किस्मत से ज्यादा किसी को नहीं मिलता। आज भी गंगा आरती देखना मेरे नसीब में नहीं थी। मैंने बाइक एनाउंसमेंट ऑफिस के बाहर खड़ी कर दी और गंगा स्नान करने घाट पर आ गया बाकी सभी लोग सुबह नहाएंगे। गंगा स्नान कर वापस हम धर्मशाला की तरफ चल दिए अब खाने का और सोने का समय हो चला था। धर्मशाला में बाइक खड़ी नहीं हो सकती थी इसलिए उसे मैं रेलवे स्टेशन पर स्टैंड पर खड़ी कर आया।

Friday, June 30, 2017

BIKE TRIP 2017 : MTJ TO HW

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मथुरा से हरिद्धार बाइक यात्रा

     मानसून का मौसम शुरू हो चुका था, मन में कई दिनों से इसबार बाइक से कहीं लम्बा सफर करने का मन कर रहा था परन्तु केवल पहाड़ों की तरफ। मेरे मन में इसबार नैनीताल जाने का विचार बना पर तभी आगरा से साधना ( मेरी ममेरी बहिन ) का फोन आया और उसने हरिद्वार जाने की इच्छा जाहिर की। मैं हरिद्धार पहले भी कई बार जा चुका हूँ परन्तु वह पहली बार हरिद्धार जा रही थी इसलिए नैनीताल जाने का विचार कैंसिल और हरिद्धार का प्लान पक्का। हालाँकि मैं इस बार बाइक से ही यात्रा करना चाहता था इसलिए मैंने इस यात्रा को थोड़ा और आगे तक बढ़ाने का विचार बनाया मतलब बद्रीनाथ जी तक।

Friday, June 26, 2015

HARIDWAR 2015


हरिद्धार यात्रा - 2015 


जून 2015, 

मेरे पिताजी के स्वर्गवास के बाद मैं उनकी अस्थियों को लेकर हरिद्वार जाना चाहता था। हरिद्वार, वही स्थान है जहाँ मैं बचपन से ही अपने माता पिता के साथ गया था और उन्हीं के साथ मैंने गंगा के तट और इसकी धार्मिक महिमा को समझा था। मैंने कभी नहीं सोचा था कि जीवन में मुझे हरिद्वार की एक ऐसी भी यात्रा करनी पड़ेगी जिसमें मेरे पिताजी सशरीर ना होकर केवल अस्थियों के रूप में होंगें और यह मेरे पिताजी के साथ मेरी अंतिम यात्रा होगी। 

मेरे बड़े भाई धर्मेंद्र भरद्वाज जी इस यात्रा में मेरे सहयात्री के रूप में मेरे साथ थे। नईदिल्ली से देहरादून चलने वाली नंदादेवी एक्सप्रेस में विनोद जी ने हमारा हरिद्वार तक आरक्षण करा रखा था। शाम को मैं और भैया, पिताजी की अस्थियां लेकर नईदिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंचे। वहां विनोद जी हमें मिले और उन्होंने काउंटर से कराई गई ट्रेन की टिकट हमें दी और फिर हम हरिद्वार के लिए निकल पड़े। हमारी टिकट कन्फर्म नहीं हुई थी इसलिए हमें कोई सीट नहीं मिली थी। पूरी रात का यह सफर हमने खड़े खड़े ही पूरा किया गनीमत थी कि यह AC कोच था, अन्यथा गर्मी कोई कसर नहीं छोड़ रही थी। 

अगली सुबह हम हरिद्वार पहुंचे, यहाँ पहुंचकर अनायास ही मेरी आँखों में आंसू आ गए, रेलवे स्टेशन के बाहरी परिसर को देखकर मुझे मेरी बीती हरिद्वार की यात्रा की याद आ गई जिसमें अब तक मेरे पिताजी मेरे साथ थे किन्तु आज वह मेरे साथ मौजूद नहीं थे, बस उसके फूल मेरे साथ थे। भैया ने मेरे दुःख को समझ लिया और वह मुझे एक चाय नाश्ते के दुकान पर लेकर गए। हरिद्वार में सुबह की चाय पीने के बाद हम हरि की पैडी की ओर रवाना हो चले। 

...

हरि की पैडी पर पहुंचकर माँ गंगा को नमन करके मैंने अपने पिता जी की अस्थियां गंगा जी में विसर्जित कीं और फिर गंगा स्नान के पश्चात अपने पिताजी को नमन करते हुए उनसे अंतिम विदा ली और वापस स्टेशन की ओर प्रस्थान किया। यह क्षण मेरे लिए अत्यंत ही भावुक थे और सहज ही ना सम्भलने वाले थे, परन्तु भैया मेरे साथ थे जिनकी वजह से मुझमे हौंसला भी था और हिम्मत भी, इन दुख्नों के क्षणों को ग्रहण करने की। मेरा हृदय यह स्वीकार ही नहीं कर पा रहा था कि मेरे सिर से मेरे पिता का साया हट चुका है, मैंने अपने पिता को खो दिया है। 

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पिता की याद मन में बसाये आँखों में आंसू लिए मैं, भैया के साथ रेलवे स्टेशन की ओर रवाना हो चला। मार्ग में एक पुलिस स्टेशन के नजदीक लगे एक बड़े पोस्टर को मैंने पढ़ा, जिसमें जीवन और मृत्यु से सम्बंधित कुछ महत्वपूर्ण बातें लिखी हुईं थीं। इसमें एक पिता और पुत्र के दायित्वों का भी विशेष विवरण दिया हुआ था। इसे पढ़कर मुझे एहसास हुआ कि एक पिता का अपने पुत्र के जीवन में कितना महत्वपूर्ण योगदान रहता है। 

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एक भोजनालय पर भोजन करने के बाद हम रेलवे स्टेशन पहुंचे। यहाँ से हमारा वापसी का आरक्षण नहीं था, इसलिए सामान्य श्रेणी की टिकट लेकर हम ट्रेन में सवार हो गए। कोच में सीट तो कोई भी खाली नहीं थी, इसलिए दरवाजे के पास ही खड़े होकर हमने यात्रा की।  पिताजी के जीवन काल में मैंने कभी जनरल कोच में यात्रा नहीं की थी, मेरे पिताजी के पास स्लीपर का पास था, जिससे मैं किसी भी ट्रैन के स्लीपर कोच में यात्रा कर सकता था बिना किसी मूल्य के। आज उनके जाने बाद मैं सामान्य श्रेणी का मुसाफिर बन चुका हूँ। 


IN DELHI METRO

HARIDWAR ARRIVED AT 4 AM 




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MY BIG BROTHER DHARMENDRA BHARDWAJ

HARI KI PAIRI 

HARI KI POURI, HARIDWAR 


GANGA RIVER 


GANGA RIVER 





























जय श्री राधे