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Sunday, July 11, 2021

RATANPUR : CHHATTISGARH 2021


 रतनपुर के ऐतिहासिक मंदिर और किला 

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लाफा चैतुरगढ़ की यात्रा करने के बाद, मैंने एवेंजर बाइक का रुख रतनपुर की ओर कर दिया। रतनपुर, छत्तीसगढ़ की प्राचीन राजधानियों में से एक है और इसे कल्चुरी शासकों की खूबसूरत राजधानी होने का गौरव प्राप्त है। आज भी यहाँ कल्चुरी राजाओं की राजधानी के अवशेष, किले के खंडहरों के रूप में आज भी देखे जा सकते हैं। इसके अलावा समय समय पर विभिन्न शासकों ने यहाँ और इसके आसपास के प्रदेशों ऐतिहासिक मंदिरों का निर्माण भी कराया। इन्हीं में से महामाया देवी का विशाल मंदिर रतनपुर में आज भी पूजनीय है और इसके आसपास स्थित ऐतिहासिक मंदिर, रतनपुर के ऐतिहासिक होने का बख़ान करते हैं। 

LAFA CHATURGARH FORT : CHHATTISGARH 2021

लाफा और चैतुरगढ़ किले की एक यात्रा 


मानसून की तलाश में एक यात्रा भाग - 5,       यात्रा दिनाँक - 11 अगस्त 2021 

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पाली पहुँचने के बाद मैंने एक दुकान से कोकाकोला की किनली की एक पानी की बोतल खरीदी और यहीं पास में खड़े एक चाट वाले से समोसे और कचौड़ी की मिक्स चाट बनवाकर आज के दोपहर का भोजन किया। मैं इस समय चैतुरगढ़ मार्ग पर था। पाली अंतिम बड़ा क़स्बा था और इसके बाद का सफर छत्तीसगढ़ के जंगल और पहाड़ों के बीच से गुजरकर होना था। मैंने चाट वाले से आगे किसी पेट्रोल पंप के होने के बारे में पूछा तो उसने स्पष्ट शब्दों में बता दिया कि आगे कोई पेट्रोल पंप नहीं है। अगर चैतुरगढ़ जा रहे हो तो यहीं पाली से ही पेट्रोल भरवाकर जाओ क्योंकि आगे घना जंगल है और रास्ते भी पहाड़ी हैं। वहां आपको कुछ भी नहीं मिलेगा। पाली से चैतुरगढ़ जाने के लिए एक मात्र विकल्प अपना साधन ही है। पाली से चैतुरगढ़ जाने के लिए कोई साधन नहीं मिलता है। 

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Monday, March 23, 2015

DURG TRIP 2015

UPADHYAY TRIPS PRESENT'S

 पिताजी के साथ दुर्ग की एक रेल यात्रा 




   मेरे पिताजी अभी छ महीने पहले ही अपनी रेल सेवा से सेवानिवृत हुए हैं परन्तु उनका स्वास्थ्य अब उनका साथ नहीं दे रहा था। मधुमेह की बीमारी ने उनके पूरे शरीर पर पूरा प्रभाव रखा हुआ था जिस वजह से वह शारीरिक रूप से काफी कमजोर हो चले थे। हजारों डॉक्टरों की दवाइयों से भी जब उन्हें कोई फायदा नहीं हुआ तो किसी ने मुझे सलाह दी कि आप इन्हें दुर्ग ले जाओ, वहां एक शेख साहब हैं जो मधुमेह के रोगियों को एक काढ़ा बनाकर पिलाते हैं और ईश्वर चाहा तो वह जल्द ही इस बीमारी से सही हो जायेंगे। मुझे मेरे पिताजी के स्वस्थ होने की एक आस सी दिखाई देने लगी। 

   मैंने दुर्ग जाने की तैयारी शुरू कर दी। मथुरा से दुर्ग के लिए मैंने गोंडवाना एक्सप्रेस में रिजर्वेशन कराया और मैं पिताजी को लेकर दुर्ग की तरफ रवाना हो गया। अगले दिन शाम तक मैं और पिताजी दुर्ग पहुँच चुके थे। पिताजी किसी होटल या लॉज में रुकने के इच्छुक नहीं थे क्योंकि वह पैदल चलने में असमर्थ थे इसलिए मैंने प्लेटफॉर्म पर ही अपना और पिताजी का चटाई बिछाकर बिस्तर बनाया और पिताजी को वहीँ बैठा दिया और बाद में मैंने दुर्ग स्टेशन पर ही डोरमेट्री बुक की और दो बिस्तर हमें सोने के लिए मिल गए। 

मैं स्टेशन से बाहर आकर दुर्ग के बाजार गया और शेख साहब के पते पर पहुँचा। वहाँ पहुँचकर मुझे पता चला कि शेख साहब दवा को सुबह मरीजों को पिलायेंगे। यहाँ और भी मरीज थे जो काफी दूर दूर से यहाँ शेख साहब दवा पीने के लिए आये हुए थे। यहाँ इसीप्रकार प्रतिदिन मरीज आते हैं और दवा पीते हैं।