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Friday, October 20, 2023

JAMMU 2023 : BAHU FORT & TEMPLE

अन्नू की शादी में 

जम्मू शहर की एक यात्रा 


20 अक्टूबर 2023 

अगली सुबह हम जम्मू रेलवे स्टेशन पहुँच चुके थे। काफी देर प्रतीक्षा कराने के बाद अंततः लड़के वालों की ओर से एक गाडी आई और हम सभी उसमें सवार होकर अखनूर रोड पर स्थित जम्मू के N N रिसोर्ट पहुंचे। यह रिसोर्ट मुख्य राजमार्ग से थोड़ा सा अंदर था। रिसोर्ट में ही एक बड़ा हॉल था जिसमें हमारे रुकने की व्यवस्था की गई थी। यहीं हम सभी नहा धोकर तैयार हो गए। रिसोर्ट को शादी के लिए सजाने का कार्य चल रहा था, जो कि तीन दिन बाद ही थी। 

अक्टूबर माह की सुबह सुबह की गुनगुनी धुप बहुत ही शानदार लगती है। यह मौसम सर्दियों का आगाज होता है और मौसम ठंडा होने की कगार पर होता है। आज यहाँ हमारा कोई विशेष काम नहीं था इसलिए मैं कुमार से पूछकर जम्मू शहर घूमने के  लिए निकल गया। रिसोर्ट से राजमार्ग तक मैं पैदल पहुंचा और पहुँचते ही मुझे जम्मू शहर जाने वाली मिनी बस मिल गई जो कि जम्मू की नगरीय बस कहलाती हैं। 

जल्द ही बस ने मुझे जम्मू के एक मुख्य चौक पर उतार दिया। यहाँ एक बाहु नामक प्रसिद्ध किला है जहाँ बाहु वाली माता का विशाल मंदिर है। यह मंदिर जम्मू के एक  ऊँचे स्थान पर हैं जहाँ जाने के लिए अनेकों छोटी बसें चलती है। एक ऐसी ही बस द्वारा मैं बाहु वाली माता के मंदिर पहुँचा। चूँकि अभी नवरात्री चल रही हैं इसलिए मुझे यहाँ बहुत रोल चोल देखने को मिली। बाहु माता का मंदिर किले के बीच भाग में है, यहाँ देवी माता के महाकाली के रूप में दर्शन हैं। मैं माता के दर्शन करने के लिए लाइन में लग गया। 

Saturday, September 23, 2023

DELHI 2023 : LOTUS TEMPLE


बहाई उपासना मंदिर - दिल्ली 


19 वीं सदी में ईरान में एक प्रमुख संत बहाउल्लाह द्वारा बहाई धर्म की स्थापना की गई थी जो सभी धर्मों के मूल महत्त्व और मानव - एकता की शिक्षा देता है। शुरुआत में यह ईरान और पश्चिमी एशिया के कुछ हिस्सों में विकसित हुआ और अंत में यह भारत में भी विकसित होने लगा। बहाई धर्म में कोई पुरोहित नहीं होता, यह केवल ईश्वरीय प्रार्थना पर निर्भर है। 

भारत में राजधानी दिल्ली में कालकाजी के संमीप स्थित कमल मंदिर बहाई धर्म का एक मुख्य केंद्र अथवा प्रार्थना स्थल है। सफ़ेद संगमरमर से बनी 9 पंखुड़ियों वाले इस कमल मंदिर की शोभा ना सिर्फ भारत देश में अपितु समूचे विश्व भर में प्रसिद्ध है। 

बहाई कमल मंदिर सभी धर्मों के लोगों के लिए खुला है, यहाँ बिना किसी भेदभाव के, किसी भी धर्म या जाति के  लोग आसानी से प्रवेश कर सकते हैं और शांत वातावरण के बीच ईश्वर की प्रार्थना कर सकते हैं। बहाई धर्म, एक ईश्वर, एक धर्म और एक मानवता के जोर पर बल देता है। 

DELHI 2023 : ISCON TEMPLE

 

इस्कॉन मंदिर - दिल्ली 

23 SEP 2023

दिल्ली के पूर्वी कैलाश में श्री कृष्णा हिल्स में दिल्ली का इस्कॉन मंदिर स्थित है। इस मंदिर को श्री श्री राधा पार्थसारथी मंदिर कहते हैं क्योंकि मंदिर के गर्भगृह में भगवान श्री कृष्ण के साथ राधा रानी की प्रतिमा स्थापित है। इस मंदिर का उद्घाटन 5 अप्रैल 1998 को भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी जी ने किया था। यह भारत के सबसे बड़े मंदिरों में से एक है। मंदिर में अनेकों कक्ष और सभागार हैं। 

इस मंदिर की सबसे मुख्य विशेषता है कि यहाँ विश्व की सबसे बड़ी पुस्तक अद्भुत भगवत गीता रखी हुई है जो इटली में मुद्रित हुई थी और जिसका वजन अनुमानित 800 किलोग्राम है। इसका अनावरण 26 फ़रवरी 2019 को भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा किया गया था। 

मैं आज सुबह ही यहाँ पहुँच गया और मंदिर के बाहर अपने जूते खोलकर दर्शन की लाइन में लग गया। अनेको दिल्लीवासी लोग यहाँ प्रभु के दर्शनों हेतु लाइन में लगे हुए थे और कुछ ही समय बाद मुझे भी ईश्वर के दर्शन हो गए। मंदिर काफी बड़ा है, अनेकों फुवारे मंदिर की शोभा को बढ़ाते हैं। सुरक्षा के लिए यहाँ हरसमय सुरक्षा कर्मी तैनात रहते हैं। 

Friday, September 1, 2023

KURUKSHETRA 2023 : STHANESHWAR TEMPLE & BHADRA KALI TEMPLE, DEVIKUP


स्थानेश्वर महादेव मंदिर एवं देवीकूप धाम 


कुरुक्षेत्र की भूमि, ना केवल पौराणिक ग्रंथों में विशेष महत्त्व रखती है बल्कि इसका भारत के प्राचीन इतिहास में भी महत्वपूर्ण स्थान रहा है। छटवीं शताब्दी में यहाँ पुष्यभूति वंश के महान सम्राट हर्षवर्धन का शासन रहा है जिनकी राजधानी कुरुक्षेत्र में स्थित थानेश्वर में ही थी। थानेश्वर शब्द, यहाँ स्थित स्थानेश्वर का ही अपभ्रंश है जो कि भगवान शिव का निवास माना जाता है।  

स्थानेश्वर मंदिर अत्यंत ही प्राचीन है और वर्धन काल में पुष्यभूति वंश के सम्राटों के कुलदेवता के रूप में विद्यमान हैं। ऐतिहासिक साक्ष्यों में हर्षवर्धन के पिता प्रभाकरवर्धन द्वारा इस मंदिर में पूजा का उल्लेख है। 

Friday, June 30, 2023

MURDESHWAR TEMPLE

UPADHYAY TRIPS PRESENT'

 कोंकण V मालाबार की मानसूनी यात्रा पर - भाग 11 

 श्री मुर्देश्वर मंदिर - समुद्री तट पर अलौकिक शिव धाम  

30 जून 2023 

     कर्नाटक के उत्तरी कन्नड़ जिले में, अरब सागर के तट पर कंडूका नामक पहाड़ी है जहाँ आज वर्तमान में भगवान शिव का एक शानदार मंदिर बना हुआ है। यहाँ 123 फ़ीट ऊँची भगवान शिव की एक विशाल प्रतिमा है जो बहुत दूर से ही दिखाई देती है। यह दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी शिव प्रतिमा है, इसी प्रतिमा के नीचे भगवान का प्राचीन मंदिर है जहाँ शिव लिंग रूप में धरती से 2 फ़ीट नीचे विराजमान हैं। मंदिर परिसर के प्रमुख द्वार के समीप ही बहुत ऊँचा राजगोपुरम बना हुआ है जिसके सबसे ऊपरी शिखर से मंदिर, समुद्र और आसपास का विहंगम नजारा देखा जा सकता है। 

     मैं और कल्पना आज एक पैसेंजर ट्रेन से सुबह मंगलौर से चलकर मुर्देश्वर पहुँचे। मुर्देश्वर स्टेशन पर पहुंचकर हमने यहाँ क्लॉक रूम देखा जो उपलब्ध तो था किन्तु इसका चार्ज हमें समय की अपेक्षा ज्यादा ही लगा इसलिए हमने अपना बैग यहाँ जमा नहीं किया। रेलवे स्टेशन से मुर्देश्वर मंदिर के बीच की दूरी लगभग तीन किमी है, स्टेशन के बाहर ही मंदिर जाने के लिए ऑटो तैयार मिलते हैं और समय अंतराल पर बसें भी चलती हैं। हम एक ऑटो द्वारा मंदिर के लिए रेलवे स्टेशन से प्रस्थान कर गए। जल्द ही हम मंदिर के सामने थे। 

     हम मंगलुरु स्टेशन से  नहाधोकर तैयार होकर निकले थे, इसलिए हमनें यहाँ रुकने की कोई व्यवस्था नहीं देखी। मंदिर के सामने एक प्रसाद की दुकान से प्रसाद लिया और यहीं अपना बैग भी कुछ घंटों के लिए रख दिया। यहीं पास में ही कर्नाटक की कुछ महिलाएं दक्षिण भारत का प्रसिद्ध सुगन्धित फूलों का गजरा बेच रहीं थीं। मैंने भी यहाँ पहलीबार कल्पना के लिए यह गजरा ख़रीदा और कल्पना के बालों में लगाया। गजरा लगने के बाद कल्पना सुन्दर तो लग ही रही थी साथ ही वह अब उत्तर भारतीय से ज्यादा दक्षिण भारतीय महिला लग रही थी। 

Wednesday, June 28, 2023

SRI ANANT PADAMNABH SWAMY TEMPLE : TIRUVANANTPURAM 2023

UPADHYAY TRIPS PRESENT'S

 कोंकण V मालाबार की मानसूनी यात्रा पर - भाग 5 

 श्री अनंत पद्यनाभस्वामी मंदिर - तिरुवनंतपुरम 

28 जून 2023 

केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम का नाम यहाँ स्थित श्री अनंत पद्नाभस्वामी मंदिर के नाम से लिया गया है। तिरुवनंतपुरम में तिरु अर्थात श्री विष्णु, अनंत अर्थात शेषनाग और पुरम अर्थात नगरी, श्री विष्णु और शेष नाग जी का धाम। मान्यता है कि पृथ्वी पर सर्वप्रथम भगवान श्री विष्णु की मूर्ति यहीं पाई गई थी। अतः शेष शैया पर लेटे हुए भगवान विष्णु की इस विशाल मूर्ति को प्राचीन काल में उसी स्थान पर स्थापित किया जहाँ आज वर्तमान में है। 

श्री अनंत पद्नाभ स्वामी का मंदिर केरल और द्रविड़ शैली का मिश्रित रूप है। यहाँ का गोपुरम द्रविड़ शैली में निर्मित है और मुख्य मंदिर केरल शैली का एक अनुपम उदाहरण है। मंदिर के अंदर अष्टधातु के स्तम्भ हैं जिनपर सुन्दर कारीगरी देखने को मिलती है। 

हजारों जलते हुए दीपों से मंदिर की रौशनी बनी रहती है और मंदिर के गर्भगृह में शेष शैय्या पर लेटे हुए भगवान श्री विष्णु के दिव्य दर्शन होते हैं। मंदिर में सिर्फ हिन्दू  लोगों का प्रवेश ही मान्य है इसके अलावा यहाँ पुरुष और महिलाओं के लिए सिर्फ धोती पहनकर ही दर्शन करने की परंपरा है। 

मंदिर का निर्माण तो प्राचीन काल से है किन्तु समय समय पर इस मंदिर की देख रेख होने के वजह से आज यह केरल राज्य का मुख्य तीर्थ स्थान है। सत्रहवीं शताब्दी में त्रावणकोर के महाराज श्री मार्तण्ड वर्मा ने इस मंदिर का पुनः जीर्णोद्धार करवाया था। वर्तमान में भी त्रावणकोर राज परिवार के लोग ही इस मंदिर की देख रेख करते हैं।  

इस मंदिर की महत्ता यहीं समाप्त नहीं होती, वर्तमान में कुछ साल पहले इस मंदिर के तहखानों से लाखों करोड़ों रूपये का खजाना मिला है। माना जाता है कि मंदिर के नीचे सात तहखाने हैं जिनमें से एक तहखाना खुलना बाकी है क्योंकि उसपर भारतीय सर्वोच्च न्यायलय ने रोक लगा दी है। 

Sunday, March 5, 2023

GIRNAR HILL : GUJRAT 2023

UPADHYAY TRIPS PRESENT'S

 गिरनार पर्वत की एक साहसिक यात्रा 

यात्रा दिनाँक - 5 मार्च 2023 

गिरनार पर्वत एक प्राचीन पर्वत है, प्राचीनकाल में यह रैवतक पर्वत कहलाता था और इसके आसपास का भू भाग रैवत प्रदेश कहलाता था जो वर्तमान में सौराष्ट्र प्रान्त है। 

पौराणिक काल के हिसाब से सतयुग में यहाँ महाराज रैवत का राज्य था, उनकी पुत्री रेवती थीं जो द्वापर युग में भगवान् श्री कृष्ण के बड़े भ्राता बलराम जी की पत्नी बनी। इसप्रकार भगवान् श्रीकृष्ण और बलराम ने इस प्रदेश को अपने निवास स्थान के रूप में चुना, यहीं समुद्र से थोड़ी से जगह मांगकर द्वारिका नगरी का निर्माण किया। मगध सम्राट जरासंध ने गिरनार पर्वत तक श्री कृष्ण और बलराम का पीछा  किया और जब वह गिरनार पर्वत पर आकर, जरासंध की नजरों से ओझल हो गए तो उसने इस पर्वत पर आग लगा दी। 

जरासंध यह सोचकर यहाँ से वापस लौट गया कि दोनों भाई इस पर्वत की आग में जलकर भस्म हो गए। किन्तु भगवान् श्री कृष्ण और बलराम यहाँ से बच निकलकर सीधे द्वारिका द्वीप पहुंचे और वहां देवशिल्पी विश्वकर्मा का आहवान कर एक नई नगरी का निर्माण कराया। यही नगरी द्वारिका नगरी के नाम से आज प्रसिद्ध है। 

Thursday, January 5, 2023

MAHABALIPURAM 2023

 तमिलनाडु की ऐतिहासिक धरा पर …   भाग - 11 

 महाबलीपुरम - पल्लवों की ऐतिहासिक विरासत 


5 JAN 2023

चेन्नई से दक्षिण की ओर समुद्र के किनारे मामल्लापुरम नामक स्थान है जिसे महाबलीपुरम भी कहते हैं।  इस स्थान पर पल्लवकालीन अनेकों अवशेष स्थित हैं जिनमें शोर मंदिर और पांडव रथ महत्वपूर्ण हैं। वर्तमान में यह एक शानदार पर्यटक स्थल है जहाँ समुद्र के बीच के साथ साथ भारतीय इतिहास की एक शानदार झलक देखी जा सकती है। 

चेन्नई से महानगरीय बसें सीधे मामल्लापुरम पहुँचती हैं और प्रत्येक आधे घंटे के अंतराल पर उपलब्ध हैं। चेन्नई से मामल्लपुरम की दूरी लगभग 40 किमी है। महाबलीपुरम में अनेकों प्राचीन प्रस्तर कलाओं के ऐतिहासिक अवशेष देखने को मिलते हैं जो सातवीं शताब्दी में निर्मित किये गए थे। यह पल्लवकालीन हैं और पल्लव शासकों ने अलग अलग समय पर इनका निर्माण कराकर अपने समय की अमिट छाप छोड़ी थी। 

Tuesday, January 3, 2023

ROCKFORT TEMPLE : TIRUCHHIRAPALLI 2023

 तमिलनाडू की ऐतिहासिक धरा पर   भाग - 8 

रॉकफोर्ट मंदिर और त्रिची की एक शाम 



3 JAN 2023

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तमिलनाडू के मध्य भाग में स्थित त्रिची एक बड़ा और सुन्दर नगर है। यह नगर कावेरी नदी के किनारे स्थित है।  प्राचीनकाल में यह चोल शासकों की प्रथम राजधानी भी रहा है जिसे उरैयूर के नाम से जाना जाता था। चोल सभ्यता के अलावा यहाँ पल्लवकालीन सभ्यता के अवशेष भी देखने को मिलते हैं। 

नगर के बीचोबीच एक ऊँची चट्टान पर रॉकफोर्ट स्थित हैं जहाँ से अनेक पल्लवकालीन अवशेष प्राप्त हुए हैं। चट्टान के सबसे ऊपरी शिखर पर श्री गणेश जी का मंदिर स्थित है जहाँ गणेश जी को दूब ( घास ) चढाने का विशेष महत्त्व है। यहाँ से समूचे नगर का विहंगम दृश्य देखा जा सकता है और साथ ही कावेरी की अविरल धाराएं भी यहाँ से स्पष्ट नजर आती हैं। 

कावेरी के मध्य में स्थित भगवान विष्णु का धाम श्री रंगम जी का मंदिर भी दिखलाई पड़ता है। 

VIJAYALAY CHOLESHWARAM TEMPLE : TAMILNADU 2023

 तमिलनाडू की ऐतिहासिक धरा पर … भाग - 7 

विजयालय चोलेश्वरम मंदिर - नारतामलाई 

3 JAN 2023

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वर्तमान में तंजौर का बृहदेश्वर मंदिर और गंगईकोंड चोलपुरम का बृहदीश्वर मंदिर चोल स्थापत्य के मुख्य उत्कृष्ट उदाहरण तो हैं ही किन्तु इसके निर्माण से भी सैकड़ों वर्षों पूर्व भी एक साधारण से गाँव की विशाल चट्टान पर, प्रथम चोल सम्राट विजयालय ने अपनी विजयों के फलस्वरूप आठवीं शताब्दी में एक शानदार शिव मंदिर का निर्माण कराया, जिसे उन्होंने अपने ही नाम से सम्बोधित किया ''विजयालय चोलेश्वर कोविल'' जिसका अर्थ है विजयालय चोल के ईश्वर का मंदिर। मंदिर की वास्तुकला और शैली बेहद शानदार है इसी कारण यह इतने वर्षों के पश्चात भी ज्यों का त्यों स्थित है। 

BRIHDESHWAR TEMPLE - THANJAVOUR 2023

तमिलनाडू की ऐतिहासिक धरा पर, भाग - 4 

 बृहदेश्वर अथवा राजराजेश्वर मंदिर 

2 JAN 2023

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वैदिक धर्म के विपरीत बौद्ध और जैन धर्म की भारतवर्ष में ही नहीं, अपितु भारत के नजदीकी देशों में भी प्रसरता अपने चरमोत्कर्ष पर थी। मौर्य सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म का सबसे अधिक प्रचार प्रसार किया और उसके पुत्र व पुत्री ने श्री लंका में बौद्ध धर्म की पराकाष्ठा बढ़ाई। गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद उत्तर भारत में हर्षवर्धन ने भी बौद्ध धर्म को सबसे अधिक महत्त्व दिया, इसकारण भारत अब विभिन्न धर्मों का देश बन चुका था।

 किन्तु दक्षिण भारत की बात अलग थी, यहाँ के राजवंश और शासकों ने शुरू से ही केवल वैदिक धर्म को सर्वोच्च स्थान दिया था। वह वैदिक धर्म के अनुयायी थे और पूर्ण रूप से अपने रीतिरिवाजों और अपनी संस्कृति के साथ अपने धार्मिक अनुष्ठानों को पूर्ण किया करते थे। उनके द्वारा निर्मित अभिलेखों से इस बात की पुष्टि होती है। 

चोल वंश का सबसे प्रतापी सम्राट राज राज प्रथम था जिसका मूल नाम अरिमोलीवर्मन था। उसने अपने साहस और कुशल रणनीति से चोल राज्य को साम्राज्य में बदल दिया था। अपने राज्यभिषेक के सुअवसर पर उसने राजराज की उपाधि धारण की थी। इसके अलावा और भी अनेकों उपाधि थी जो उसने धारण की किन्तु सबसे अधिक प्रसिद्धि उसे राजराज की उपाधि से ही मिली। 

इसी उपाधि के चलते उसने दक्षिण भारत के तंजौर नगर में देश के सबसे बड़े मंदिर का निर्माण कराया जो भगवान शिव को समर्पित है। उसने इस मंदिर का नाम राजराजेश्वर मंदिर रखा जो कालांतर में बड़ा मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। सत्रहवीं शताब्दी में मराठा सरदारों ने इसे बृहदेश्वर मंदिर नाम दिया। जिसका अर्थ होता है सबसे बड़ा मंदिर। 

Monday, January 2, 2023

BRIHDEESHWAR TEMPLE : GANGAIKOND CHOLAPURAM 2023

 तमिलनाडू की ऐतिहासिक धरा पर…. भाग - 5 

प्राचीन चोल राजधानी - गंगईकोन्ड चोलापुरम 


2 JAN 2023

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सम्राट राजेंद्र प्रथम ( 1014  - 1044 ई. )

महान चोल सम्राट राजराज प्रथम की तरह उनका पुत्र राजेंद्र प्रथम भी एक योग्य उत्तराधिकारी हुआ जिसने ना सिर्फ अपने पिता के द्वारा निर्मित चोल साम्राज्य के वैभव को बनाये रखा बल्कि उसकी सीमाओं का दूर दूर तक विस्तार भी किया। वह एक योग्य पिता का योग्य पुत्र था। राजराज प्रथम उनकी प्रतिभा और सैन्य पराक्रम को देखते हुए अपने जीवनकाल में ही उसे चोल साम्राज्य का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। 

राजेंद्र प्रथम ने अपने जीवन काल में अनेकों उपाधियाँ धारण कीं, जिनमें सबसे अधिक श्रेय उसे गंगईकोंड की उपाधि से मिला जिसका अर्थ है गंगा को जीतने वाला। यह उपाधि उसने बंगाल को जीतने के बाद धारण की। दरअसल अपने नजदीकी राज्यों को जीतने के बाद उसने अपना रुख उत्तर भारत की ओर किया और इसे गंगाघाटी अभियान का नाम दिया। 

इस अभियान का लक्ष्य गंगा नदी का जल लाना था। किन्तु इस अभियान से पूर्व उसने अपनी सेना के सैन्य परीक्षण के उद्देश्य से कलिंग पर आक्रमण किया और कलिंग जीतने के बाद उसने बंगाल पर चढ़ाई शुरू कर दी। इस समय बंगाल का तत्कालीन शासक महिपाल प्रथम था जो चोलसेना से बुरी तरह पराजित हुआ और अब चोलों की धाक उत्तर भारत के बंगाल तक जम गई।

 गंगाघाटी अभियान के विजयोपरांत राजेंद्र प्रथम ने गंगईकोंड की उपाधि धारण की और साथ उसने तंजौर से दूर कावेरी के उसपार एक नई राजधानी का निर्माण किया जिसका नाम उसने गंगईकोंड चोलापुरम रखा।  

Saturday, May 14, 2022

PURNAGIRI TEMPLE : UTTRAKHAND 2023

 शक्तिपीठ माँ पूर्णागिरि मंदिर 



आख़िरकार दो साल बाद, कोरोना जैसी महामारी को हराकर यात्राएँ फिर से शुरू हो चुकी थीं, इस वर्ष उत्तराखंड और हिमाचल में जैसे टूरिस्टों, तीर्थयात्रियों और घुमक्क्ड़ों की जैसे बाढ़ सी आ गई थी। उत्तराखंड के चारों धाम गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ के अलावा समूचे प्रदेश में हर  सड़क, हर होटल में यात्रियों का ताँता सा लगा हुआ था। हरिद्वार और ऋषिकेश जैसे तीर्थ शहर हॉउसफुल हो चुके थे। आखिरकार लोगों को दो साल बाद प्रकृति से रूबरू होने का मौका जो मिला था। इसबीच मैंने भी अपना यात्रा प्लान उत्तराखंड की ओर ही बना रखा था और अंत में तय हुआ कि कुमाँयु में ही कोई यात्रा की जाए। 

मैं काठगोदाम और नैनीताल नहीं जाना चाहता था और पिछले कुछ समय से मेरा मन टनकपुर स्थित माँ पूर्णागिरि धाम के दर्शनों को बहुत व्याकुल हो रहा था। इस बार वहीँ जाने का विचार लेकर मैं रात को आगरा फोर्ट से रामनगर जाने वाली साप्ताहिक एक्सप्रेस में आकर बैठ गया और रात को 11 बजे ट्रेन के चलने के साथ ही इसकी खाली पड़ी सीट पर बिस्तर लगाकर सो गया। सुबह तक़रीबन तीन बजे जब मेरी आँख खुली तो देखा ट्रेन बरेली के स्टेशन पर खड़ी थी। मेरा गंतव्य यहाँ से अगले स्टेशन इज़्ज़त नगर तक ही था इसलिए इस ट्रेन को मैंने इज़्ज़त नगर पर छोड़ दिया और स्टेशन पर बने वेटिंग रूम में मैंने सुबह होने तक एक नींद और खींच ली। 

अब सुबह के सात बज चुके थे, वेटिंग रूम में ही मैं नहाधोकर तैयार हो गया और अब अपनी अगली यात्रा इज़्ज़त नगर से टनकपुर के लिए होनी थी। बरेली से टनकपुर के बीच सुबह एक डीएमयु ट्रेन चलती है। इसी ट्रैन का टिकट लेकर मैं टनकपुर की ओर रवाना हो चला। टनकपुर उत्तराखंड का आखिरी रेलवे स्टेशन है, जिसतरह देहरादून, ऋषिकेश, रामनगर और काठगोदाम टर्मिनल रेलवे स्टेशन है ठीक उसी तरह टनकपुर भी उत्तराखंड का टर्मिनल स्टेशन है। कुछ समय पहले तक यहाँ सिर्फ मीटर गेज ट्रैन ही चलती थी किन्तु अब आमान परिवर्तन के बाद यहाँ ब्रॉड गेज लाइन बिछी और टनकपुर देश के कुछ मुख्य शहरों से जुड़ गया। पीलीभीत के बाद उत्तर प्रदेश की सीमा समाप्त हो जाती है और उत्तराखंड की झलक देखने को मिलती है। 

खटीमा उत्तराखंड का मुख्य शहर है जो हल्द्वानी के निकट स्थित है। पीलीभीत के बाद खटीमा ही टनकपुर रेल लाइन का बड़ा स्टेशन है जो प्राकृतिक सौन्दर्यता से निखरा हुआ है, इसके बाद ट्रेन जंगलों के बीच से होती हुई बनबसा पहुँचती है और इससे आगे हिमालय के पहाड़ दृष्टिगोचर होने लगते हैं। उत्तराखंड के पहाड़ों की तलहटी में टनकपुर बसा हुआ है जो कि चम्पावत जिले में स्थित है। 

ट्रेन टनकपुर रेलवे स्टेशन पहुँच चुकी है, मैंने जिसप्रकार आज से पहले इस रेलवे स्टेशन की कल्पना की थी, उससे इसे परे ही पाया। स्टेशन परिसर के बाहर निकलते ही मुझे इसके मीटर गेज के होने के समय का एहसास सा हो गया। यह उत्तराखंड का आखिरी टर्मिनल रेलवे स्टेशन है जहाँ  ज्यादातर ट्रेनों का आवागमन नहीं है। 

रेलवे स्टेशन के आखिरी सिरे पर एक रेलवे फाटक है जिसके किनारे ही टनकपुर का बस स्टैंड है। इस बस स्टैंड से अन्य शहरों के लिए अनेकों बसें चलती हैं किन्तु अपने अपने समय पर। यहाँ हिमाचल प्रदेश की भी बस सेवा है जो शिमला से टनकपुर के बीच पूरी होती है। मेरे सामने ही हिमाचल की यह बस यहाँ आई और कुछ समय ठहरकर शिमला के लिए वापस चली गई। 

मैंने आज लोहाघाट जाने का प्लान बनाया था परन्तु समय की कमी के चलते मेरा यह प्लान फ्लॉप हो गया और मैंने आज माँ पूर्णागिरि मंदिर जाने का विचार बनाया जहाँ मैं लोहाघाट से लौटकर जाना चाहता था। टनकपुर से पूर्णागिरि की दूरी लगभग 23 किमी है जहाँ जाने के लिए अनेकों जीपें हर समय उपलब्ध रहती हैं। इन्हीं में से एक जीप के द्वारा मैं पूर्णागिरि पहुंचा। 

जीप वाले ने मुझे भैरव मंदिर के समीप उतार दिया। इसके बाद अब रास्ता पैदल का था और चढ़ाई भरा था। किन्तु यहाँ मुझे इस चढ़ाई भरे रास्ते में दोनोंतरफ अनेकों ऐसी दुकाने दिखीं जिनमें अनेकों गद्दे बिछे हुए थे, जिसका मतलब था यह यहाँ आने वाले भक्तों के विश्राम के लिए थे। ऐसी ही एक दुकान पर मैंने भी थोड़ी देर विश्राम किया और इस दुकानदार से यहाँ की अधिकांश जानकारी एकत्र की। थोड़ी देर पश्चात मैं यहाँ से आगे बढ़ चला। मैं जैसे जैसे आगे बढ़ता जा रहा था, रास्ता और भी कठिन और चढ़ाई भरा होता जा रहा था। आज इस यात्रा में मुझे वैष्णो देवी यात्रा की याद आ गई। 

पर्वत की चोटी पर देवी माता का एक छोटा सा मंदिर है, यह एक मुख्य शक्तिपीठ है और यहाँ की मान्यता है कि यहाँ सती की नाभि गिरी थी, जिससे यह स्थान एक प्रमुख शक्तिपीठ बन गया। माता के दर्शन कर अब मैं वापस हो चला। जब मैं पर्वत से उतरकर नीचे पहुंचा तो मुझे यहाँ मेरा चचेरा भाई यतेश मिला जो अपने परिवार सहित माता के दर्शन के लिए यहाँ आया था। मुझे यह पहले से पता नहीं था अन्यथा इस यात्रा को मैं अकेले नहीं बल्कि अपने भाई के साथ कर सकता था। परन्तु अब मेरी यात्रा पूर्ण हो चुकी थी, इसलिए भाई से विदा लेकर मैं वापस तनकपुर के लिए निकल पड़ा। 

शाम को चार बजे के लगभग मैं टनकपुर पहुंचा, यहाँ पहुंचकर मैंने थोड़ी देर बाजार घुमा और रेलवे स्टेशन पहुंचकर अपनी ट्रेन को देखा, जो पीलीभीत तक जाने के लिए तैयार थी। ट्रेन बिलकुल खाली पड़ी थी, यहाँ मैंने उत्तराखंड के जाम का आनंद लिया और अब ट्रैन भी चल पड़ी थी। रात को दस बजे तक मैं पीलीभीत पहुँच चुका था, यहाँ से मेरी अगली ट्रेन बरेली के लिए थी जो रात को साढ़े ग्यारह बजे चलेगी। मेरे पास डेढ़ घंटे का समय था। 

मैंने स्टेशन से बाहर निकलकर बाजार घूमा और एक दुकान पर जाकर रात्रि भोज किया। बरेली पहुंचकर मुझे रामनगर - आगरा एक्सप्रेस मिल गई जिससे मैं मथुरा पहुँच गया। 

जय माता दी  









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Saturday, March 19, 2022

NARESHWAR TEMPLES : GWALIOR 2022

 UPADHYAY TRIPS PRESENT'S

गुर्जर प्रतिहार कालीन - नरेश्वर मंदिर समूह 


     छठवीं शताब्दी के अंत में,सम्राट हर्षवर्धन की मृत्यु के साथ ही भारतवर्ष में बौद्ध धर्म का पूर्ण पतन प्रारम्भ हो गया। भारतभूमि पर पुनः वैदिक धर्म अपनी अवस्था में लौटने लगा था, नए नए मंदिरों के निर्माण और धार्मिक उत्सवों की वजह से लोग वैदिक धर्म के प्रति जागरूक होने लगे थे। सातवीं शताब्दी के प्रारम्भ होते ही अखंड भारत अब छोटे छोटे प्रांतों में विभाजित हो गया और इन सभी प्रांतों के शासक आपस में अपने अपने राज्यों की सीमाओं का  विस्तार करने की होड़ में हमेशा युद्धरत रहते थे।

भारतभूमि में इसप्रकार आपसी द्वेष और कलह के चलते अनेकों विदेशी आक्रमणकारियों की नजरें अब हिंदुस्तान को जीतने का ख्वाब देखने लगी थीं और इसी आशा में वह हिंदुस्तान की सीमा तक भी आ पहुंचे थे किन्तु शायद उन्हें इस बात का आभास नहीं था कि बेशक भारत अब छोटे छोटे राज्यों में विभाजित हो गया हो, बेशक इन राज्यों के नायक आपसी युद्धों में व्यस्त रहते हों परन्तु इन नायकों की देशप्रेम की भावना इतनी सुदृढ़ थी कि अपने देश की सीमा में विदेशी आक्रांताओं की उपस्थिति सुनकर ही उनका खून खौल उठता था और वह विदेशी आक्रमणकारियों को देश की सीमा से कोसों दूर खदेड़ देते थे। 

इन शासकों का नाम सुनते ही विदेशी आक्रांता भारतभूमि पर अपनी विजय का स्वप्न देखना छोड़ देते थे। भारत भूमि के यह महान वीर शासक राजपूत कहलाते थे और भारत का यह काल राजपूत काल के नाम से जाना जाता था। राजपूत काल के दौरान ही सनातन धर्म का चहुंओर विकास होने लगा क्योंकि राजपूत शासक वैदिक धर्म को ही राष्ट्र धर्म का दर्जा देते थे और वैदिक संस्कृति का पालन करते थे। राजपूत शासक अनेक राजवंशों में बंटे थे जिनमें गुर्जर प्रतिहार शासकों का योगदान सर्वोपरि है। 

Thursday, February 24, 2022

BRAJYATRA : KIRTI MANDIR - BARSANA

UPADHYAY TRIPS PRESENT'S

कीर्ति मंदिर  



श्री राधारानी की माता और महाराज वृषभान जी की पत्नी महारानी कीर्ति को समर्पित कीर्ति मंदिर का निर्माण जगद्गुरु कृपालु महाराज के सानिध्य में जगद्गुरु कृपालु परिषद द्वारा किया गया। सन 2006 में जगद्गुरु कृपालु महाराज ने स्वयं अपने हाथों से इस मंदिर की नीवं रखी थी।

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 यह मंदिर ब्रज क्षेत्र में मथुरा जिले के बरसाना में स्थित है और रंगीली महल के नजदीक प्रांगण में निर्मित है। इस मंदिर की वास्तुकला अद्भुत है जो अनायास ही भक्तों को अपनी ओर आकर्षित कर लेती है। कीर्ति मंदिर का सम्पूर्ण प्रांगण सफ़ेद रंग की संगमरमर से निर्मित है और भक्तगण यहाँ घंटों बैठकर श्री राधारानी का चिंतन करते हैं। इस मंदिर की भव्यता दूर से देखते ही बनती है। 

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 ना केवल ब्रज क्षेत्र में बल्कि समस्त भारतवर्ष में महारानी कीर्ति का यह एकमात्र मंदिर है जिसमें महारानी कीर्ति की गोद में बैठी श्री राधारानी के सुन्दर और वात्सल्य छवि के दर्शन होते हैं। 

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Saturday, February 5, 2022

SHRI KAILADEVI TEMPLE : KARAULI 2022


 श्री राजराजेश्वरी कैलादेवी मंदिर - करौली 


यात्रा दिनाँक :- 05 फरवरी 2022 

     भारतवर्ष में अनेकों हिन्दू देवी देवताओं के मंदिर हैं जिनमें भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंग, भगवान विष्णु के चार धाम और आदि शक्ति माँ भवानी के 51 शक्तिपीठ विशेष हैं। इन्हीं 51 शक्तिपीठों में से एक है माँ कैलादेवी का भवन, जो राजस्थान राज्य के करौली जिले से लगभग 25 किमी दूर अरावली की घाटियों के बीच स्थित है। माँ कैलादेवी के मन्दिर का प्रांगण बहुत ही भव्य और रमणीय है। जो यहाँ एकबार आ जाता है उसका फिर लौटने का मन नहीं करता किन्तु सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों के चलते भक्तों का यहाँ आने और जाने का सिलसिला निरंतर चलता ही रहता है। 

Saturday, July 10, 2021

CHANDREH TEMPLE : MADHYA PRADESH 2021


 चन्द्रेह मंदिर और भँवरसेन का पुल 

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मानसून की तलाश में एक यात्रा - भाग 3 

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पिछले भाग में आपने पढ़ा कि मैं भरहुत स्तूप देखने के बाद सतना के लिए रवाना हो गया और अब मैं सतना के बस स्टैंड पर पहुँच चुका था। अब अपनी ''ऐतिहासिक मंदिरों की एक खोज की श्रृंखला'' को आगे बढ़ाते हुए मेरी अगली मंजिल नौबीं शताब्दी का ऐतिहासिक चन्द्रेह शिव मंदिर था जो रीवा से लगभग 35 किमी आगे मध्य प्रदेश के सीधी जिले में स्थित है। यह मंदिर मुख्य शहरों और बाजारों से कोसों दूर एक वियावान स्थान पर एक नदी के किनारे स्थित था। मुख्य राजमार्ग से भी इसकी दूरी लगभग दस किमी के आसपास थी। यहाँ तक पहुँचने से पहले मेरे मन में अनेकों चिंताएं और जिज्ञासाएं थीं। 

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SHARDA TEMPLE : MAIHAR 2021

मानसून की तलाश में एक यात्रा - भाग 1 

 शारदा माता के दरबार में - मैहर धाम यात्रा 


यात्रा दिनांक - 10 जुलाई 2021 

अक्सर मैंने जुलाई के महीने में बरसात को बरसते हुए देखा है किन्तु इसबार बरसात की एक बूँद भी सम्पूर्ण ब्रजभूमि दिखाई नहीं पड़ रही थी। बादल तो आते थे किन्तु हवा उन्हें कहीं और रवाना कर देती थी। काफी दिनों से समाचारों में सुन भी रहा था कि भारत के इस राज्य में मानसून आ गया है, यहाँ इतनी बारिश पड़ रही है  कि सड़कें तक भर चुकीं हैं। पहाड़ी क्षेत्रों से बादल फटने तक की ख़बरें भी सामने आने लगीं थीं किन्तु ब्रज अभी भी सूखा ही पड़ा था और समस्त ब्रजवासी गर्मीं से हाल बेहाल थे। इसलिए सोचा क्यों ना हम ही मानसून को ढूढ़ने निकल पड़ते हैं। मानसून के मौसम में मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ से भला और कौन सी जगह उचित हो सकती थी इसलिए बघेलखण्ड और रतनपुर की यात्रा का प्लान बन गया। 

Thursday, April 1, 2021

SHRI JAGANNATH PURI

UPADHYAY TRIPS PRESENT'S


मैं, माँ और हमारी जगन्नाथ पुरी की चमत्कारिक यात्रा 


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पिछले भाग में आपने पढ़ा कि रात को ट्रेन में अचानक माँ की तबियत ख़राब हो गई और वह अपनी सुध बुध खो बैठीं। अपनी सीट को छोड़कर वह अन्य कोचों में चलती जा रही थीं। एक सहयात्री के कहे अनुसार मैं उन्हें देखने अन्य कोचों में गया और भगवान श्री जगन्नाथ जी की कृपा से वह मुझे मिल गईं। वह मुझे मिल तो गईं थीं किन्तु अब वह बिलकुल भी ऐसी नहीं थीं जैसी कि वह कल यात्रा के वक़्त अथवा यात्रा से पूर्व घर पर थीं। वह अपनी सुध खो चुकीं थीं। 

लगभग मुझे भी पहचानना अब उन्हें मुश्किल हो रहा था। वह कहाँ हैं, क्या कर रही हैं, कहाँ जा रही हैं, अब उन्हें कुछ  भी ज्ञात नहीं था। माँ की ऐसी हालत देखकर मैं बहुत डर सा गया था। काफी कोशिशों के बाद मैं उन्हें अपने कोच तक लेकर आ पाया था। इधर ट्रेन खोर्धा रोड स्टेशन छोड़ चुकी थी और अपनी आखिरी मंजिल पुरी की तरफ दौड़ी जा रही थी। 

Thursday, January 7, 2021

VIJAY NAGAR : KARNATAKA 2021

 UPADHYAY TRIPS PRESENT'S

विजय नगर साम्राज्य के अवशेष - हम्पी 

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तेरहवीं शताब्दी में भारत वर्ष की अधिकांश भूमि पर इस्लाम के वाशिंदों का राज्य स्थापित हो चुका था, साम्राज्य अब सल्तनतों में तब्दील होने लगे थे। भारतीय हिन्दू सम्राटों की जगह अब देश की बागडोर तुर्की मुसलमानों के हाथों में आ चुकी थी जो स्वयं को सम्राट की बजाय सुल्तान कहलवाना पसंद करते थे। 

भारत का मुख्य केंद्रबिंदु दिल्ली, अब इन्हीं तुर्कों के अधीन थी और ये तुर्क समस्त भारत भूमि को अपने अधीन करने का सपना देखने लगे थे। भारत देश अब नए नाम से जाना जाने लगा था जिसे तुर्की लोग हिंदुस्तान कहकर सम्बोधित करते थे। हर तरफ इस्लामीकरण का जोर चारों ओर था, हिन्दुओं को जबरन तलवार के बल पर इस्लाम कबूल कराया जाने लगा था। हिन्दुओं पर अत्याचार, अब आम बात हो चली थी। 

भारतीय हिन्दू अब वैदिक धर्म को खोने लगे थे, सल्तनत की सीमायें बढ़ती जा रही थीं और अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में दिल्ली सल्तनत की सीमायें, दक्षिण भारत को छूने लगी थीं, जहाँ अभी तक हिन्दू अपने धर्म और संस्कृति को बचाये हुए थे। इस्लाम के प्रसार को रोकने और वैदिक धर्म को क्षीणता से बचाने के लिए आखिरकार दक्षिण भारत में एक नए महान साम्राज्य की स्थापना हुई जिसे विजय नगर साम्राज्य के नाम से जाना गया।