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कर्नाटक की ऐतिहासिक यात्रा पर भाग - 17
कुकनूर की एक शाम
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दिन ढलने से पहले ही एक लोडिंग ऑटो, जिसमें पीछे बैठने के लिए लकड़ी के बड़े बड़े तख्ते लगे हुए थे, से मैं इत्तगि से कुकनूर के लिए रवाना हो गया। इत्तगि से कुकनूर की यह दूरी लगभग 10 किमी थी। मेरे कुकनूर पहुँचने तक अँधेरा हो चला था। कुकनूर से पहले, वाड़ी से कोप्पल आने वाली नई रेल लाइन का पुल भी पार किया जहाँ कुकनूर का रेलवे स्टेशन बनाने का काम जोरो पर चल रहा था। इसी पुल के समीप एक ऐतिहासिक मंदिर भी दिखलाई पड़ रहा था जो रात के अँधेरे में मुझे साफ़ नहीं दिखपाया परन्तु इसके बारे में जब बाद में पता किया तो जाना कि यह कालीनतेश्वर मंदिर था जिसके बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं थी।
आज पूरे दिन कर्नाटक गाँवों की सैर करने के बाद आखिरकार शाम को मैं कुकनूर शहर पहुँच ही गया। यहाँ आकर मेरे मन को थोड़ा सुकून सा मिला। मैं आज ही हम्पी पहुंचना चाहता था जिसके लिए शायद बस मुझे कुकनूर से ही मिल सकती थी, इसलिए मैं कुकनूर के बस स्टैंड पहुंचा। यहाँ होस्पेट या हम्पी की तरफ जाने वाली कोई बस नहीं खड़ी थी। कुकनूर शहर में आकर मुझे भूख भी लग आई थी परन्तु यहाँ भी मेरे साथ वही शाकाहारी भोजनालय की परेशानी थी। क्योंकि एक दो होटल मैंने देखे भी परन्तु वह सभी कन्नड़ भाषा में लिखे हुए थे। इसलिए मैंने एक केले बेचने वाली अम्मा से 25/- रूपये के एक दर्जन केले खरीदे और बस स्टैंड पर बैठे बैठे उन्हें मैं खाता रहा।
बस आने में अभी देर थी इसलिए मैं कुकनूर का बाजार देखने के लिए निकल पड़ा। यहाँ कर्नाटक टूरिज्म का मैंने एक बोर्ड लगा हुआ देखा जो महामाया नामक मंदिर की ओर जाने का इशारा कर रहा था। इस बोर्ड के निर्देशानुसार मैं भी इस मंदिर को देखने के लिए बढ़ चला। कुकनूर के पुराने बाजार में से होते हुए कुछ समय बाद मैं किलेनुमा इस मंदिर के विशाल दरवाजे पर पहुंचा। जनवरी की इस शाम में बहती हुई ठंडी हवा और इसी हवा के कारण लहराता हुआ मंदिर का ध्वज, मन को एक सुकून सा महसूस करा रहे थे।
मैंने बाहर अपने जूते उतारे और मंदिर के प्रांगण में प्रवेश किया। यह महामाया का प्रसिद्ध मंदिर है जिसके गर्भगृह में तीन प्रतिमाएं दर्शनीय हैं, इनमें से दो प्रतिमाएं स्त्री रूप में हैं जो माता लक्ष्मी और पार्वती ( महामाया ) की हैं बाकी अन्य हरिहर की है जिसका अर्थ है आधा शिव और आधा विष्णु का स्वरूप। ऐसी दिव्य प्रतिमा मैंने अपने जीवन में पहली बार ही देखी थी। इसी मंदिर के अन्य भाग में ऐतिहासिक मंदिरों की भरमार है, यह सभी मंदिर नवलिङ्ग के नाम से प्रसिद्ध हैं और इनका निर्माण कल्याणी के चालुक्यों द्वारा ही कराया हुआ माना जाता है जैसा कि यहाँ रखे अभिलेखों से ज्ञात होता है।
महामाया मंदिर के बारे में जब मैंने पूर्ण जानकरी की, तो मुझे ज्ञात हुआ कि यह मंदिर आठवीं ईसापूर्व से पहले का है जिसके बारे में महाभारत महाकाव्य में भी वर्णन मिलता है। महाभारत के अनुसार, इस मंदिर के तहखाने के बहुत ही प्राचीन माँ काली का मंदिर स्थित है जिसके बारे में प्रचलित था कि यहाँ नरबलि की मान्यता थी। आधुनिक समय में जब इसका पता लगाने की कोशिश की गई तो ग्रामीणों के विरोध के चलते इसे रोक दिया गया और आज भी यह एक रहस्य ही बनकर रह गया।
इतिहास के इतने पुराने मंदिर को मैंने अपनी इस यात्रा में पहली बार ही देखा था। यहाँ ज्यादा देर ना रूककर मैं इस मंदिर से बस स्टैंड की ओर रवाना हो चला। काफी देर इंतज़ार करने के बाद मुझे होसपेट जाने के लिए एक बस मिल गई, मैं बस में बैठा ही था कि धीमी धीमी बरसात शुरू हो गई। मैंने बस के कंडक्टर से हम्पी जाने के लिए टिकट माँगा तो उसने कहा कि यह बस कोप्पल तक ही जाएगी। कोप्पल, इस क्षेत्र का सबसे बड़ा शहर था, कुकनूर और इत्तगि कोप्पल जिले के ही एक भाग थे। मैंने कोप्पल के बारे में काफी जानकारी की थी जिसके अनुसार यहाँ पहाड़ी पर एक किला स्थित है और इसी के नजदीक सम्राट अशोक के शिलालेख भी यहाँ देखने को मिलते हैं।
करीब एक से डेढ़ घंटे के अंतराल के पश्चात मैं कोप्पल पहुंचा। कोप्पल एक बहुत बड़ा शहर था और इसका बस स्टैंड भी बहुत बड़ा था जहाँ कर्नाटक के अन्य भागों में जाने के लिए अनेकों बसें खड़ी हुईं थी। मैंने यहाँ हम्पी जाने वाली बस के बारे में जानकारी की तो पता चला कि हम्पी की कोई बस यहाँ से नहीं जाती है। हम्पी जाने के लिए केवल होसपेट से बस मिलेगी। इसलिए बेंगलोर जा रही एक बस में मैंने होसपेट जाने की टिकट ले ली। हुबली से होस्पेट और बल्लारी जाने वाली रेलवे लाइन भी अब हमारे साथ साथ हो चली थी।
रात का अँधेरा हो चुका था, दस बज चुके थे और मैं जनवरी की बरसात भरी इस रात में होसपेट के लिए सफर पर निकल चुका था।
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माता लक्ष्मी, महामाया और हरिहर जी की प्रतिमाएं |
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कुकनूर का नवलिङ्ग मंदिर |
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महामाया मंदिर - कुकनूर |
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