Saturday, April 10, 2021

ANNIGERI : KARNATAKA 2021

 UPADHYAY TRIPS PRESENT'S

कर्नाटक की ऐतिहासिक यात्रा पर, भाग - 12 

अन्निगेरी का अमृतेश्वर शिव मंदिर 

TRIP DATE - 06 JAN 2021

इस यात्रा को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक कीजिये। 

सल्तनतों से बाहर निकलकर अब मैं अपनी प्राचीन सांस्कृतिक धरोहरों की ओर रवाना हो चुका था जिन्हें खोजने और देखने की लालसा लिए ही मैं कर्नाटक की इस यात्रा पर आया था। बीजापुर की इस्लामिक छवि देखने के बाद अब मुझे उस महान साम्राज्य की तरफ बढ़ना था जिसे मिटाने के लिए इस्लाम की चार सल्तनतों को मिलकर एकजुट होना पड़ा था, तब जाकर कहीं वह विजय नगर जैसे अकेले महान हिन्दू साम्राज्य का मुकाबला कर सके थे। परन्तु विजय नगर पहुँचने से पूर्व मुझे कुछ मुख्य ऐतिहासिक हिन्दू मंदिर भी देखने थे जिनमें सर्वप्रथम मैंने धारवाड़ जिले में अन्निगेरी के अमृतेश्वर शिव मंदिर को चुना। 

मेरी ट्रेन सुबह चार बजे ही गदग स्टेशन पहुँच चुकी थी। इस ट्रेन के सामान्य श्रेणी के सभी कोच लगभग खाली से ही पड़े थे। यह ट्रेन गदग से अब अपने आखिरी गंतव्य हुबली की तरफ जाने को तैयार थी। गदग से हुबली की तरफ जाने पर अगला स्टेशन अन्निगेरी ही था, जहाँ के लिए मेरा रिजर्वेशन इस ट्रेन में था। जनवरी के माह की इस खुशनुमा सुबह में, मैं इस ट्रेन के जरिये गदग को पीछे छोड़ चुका था और जल्द ही अन्निगेरी के छोटे से स्टेशन पर उतर गया। 


अन्निगेरी, गदग से 10 किमी और हुबली से 35 किमी दूर एक छोटा सा शहर है। अन्निगेरी का ऐतिहासिक महत्त्व, कल्याणी के चालुक्य शासकों की वजह से है जिन्होंने कुछ समय के लिए इसे अपनी राजधानी के रूप में चुना था। इसके अलावा यह प्रसिद्ध कन्नड़ कवि पम्पा का जन्म स्थान भी है। सबसे महत्वपूर्ण यहाँ स्थित अमृतेश्वर मंदिर है जिसे देखने के लिए ही मैं यहाँ तक आया हूँ। 

स्टेशन से निकलकर और अपने ट्रॉली बैग को हाथ में लिए मैं पैदल ही मंदिर की तरफ बढ़ चला। गूगल मैप में मंदिर की लोकेशन देखते हुए और दूसरे हाथ से ट्रॉली बैग को खींचते हुए मैं अन्निगेरी की गलियों से होकर मंदिर की तरफ बढ़ता ही जा रहा था। कुछ समय बाद गूगल मैप के अनुसार चलते हुए मैं मंदिर का रास्ता भटक गया, पता नहीं जो रास्ता मुझे आगे दिख नहीं रहा वह गूगल को कैसे दिख रहा था। अब अपनी पुरानी तकनीक ही यहाँ काम आई और मैं यहाँ के लोगों से रास्ता पूछते हुए मंदिर तक पहुंचा। ट्रॉली बैग को हाथ में लिए और जुबान पर हिंदी भाषा लिए इस परदेसी को देखकर अन्निगेरी के लोग आश्चर्य चकित थे और अपनी भाषा में पूछ भी रहे थे - कहाँ से आये हो ? मैंने मुस्कुराकर कहा - जी मथुरा से। वे बोले - यूपी से हो। 

अन्निगेरी का एक दृश्य 


कुछ समय बाद मैं मंदिर के नजदीक पहुँच गया। मंदिर के बाहर काठ से बना एक बड़ा रथ खड़ा था। ऐसा ही रथ मैंने बेंगलुरु के श्री सोमेश्वर स्वामी के मंदिर में भी देखा था। कर्नाटक में इन रथों का विशेष महत्त्व होता है, प्राचीन काल से चली आ रही परमपराओं के अनुसार एक उत्सव के तहत इन रथों में भगवान को बिठाकर नगर का भ्रमण कराया जाता है। उड़ीसा की पुरी में तो जगन्नाथ भगवान् की रथ यात्रा विश्व प्रसिद्ध है जिसमें देश विदेश के हजारों लाखों लोग शामिल होते हैं। अन्निगेरी में यह कार्यक्रम अभी हाल ही में संपन्न हुआ था इसलिए यह चमकता दमकता हुआ रथ अभी मंदिर के बाहर ही खड़ा हुआ था। 





 मंदिर के प्रवेश द्वार पर एक बड़ा स्तम्भ इस प्रकार लगा हुआ था जिसकी वजह से प्रत्येक इंसान को मंदिर में झुककर इस स्तम्भ के नीचे से निकलकर ही प्रवेश करना पड़ता है। ऐसा किसलिए है - कह पाना मुश्किल है। शायद उत्सव के दौरान होने वाली भीड़ को काबू करने के लिए। मैं मंदिर पहुंचा और अपना बैग बाहर रखकर, हाथ मुँह धोकर मैंने भगवान् अमृतेश्वर जी के दर्शन के किये। मंदिर में भगवान शिव का प्राचीन शिवलिंग स्थापित है और गर्भगृह के ठीक सामने नंदी की प्रतिमा, जैसा कि दक्षिण भारत में प्रत्येक जगह देखने को मिलता है। 



भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर का निर्माण कल्याणी के चालुक्यों द्वारा 1050 ई. के लगभग तब कराया गया था जब अन्निगेरी उनके प्रान्त का एक प्रमुख हिस्सा था। यह मंदिर काले ग्रेनाइट के साबुनी पत्थरों द्वारा बना हुआ है जो कि दक्षिण भारत की द्रविड़ शैली में निर्मित है। मंदिर की बाहरी दीवारों पर अनेकों देवताओं की मूर्तियों को उकेरा गया है। इतिहास की इस महान मूर्तिकला को अन्निगेरी जैसे एक छोटे से गाँव या नगर में देखकर मुझे एक अलग ही ख़ुशी मिली और मैंने इसे अपनी इस कर्नाटक की ऐतिहासिक यात्रा ने शामिल किया। 

मंदिर के पुजारी से मैंने बातचीत करने की कोशिश की, किन्तु पूर्ण रूप से कन्नड़ बोलने वाले इन पुजारी जी की भाषा मेरे पल्ले नहीं पड़ रही थी। पुजारी जी ने टूटी फूटी हिंदी भाषा में बोलने की कोशिश की किन्तु यह मेरे लिए उतनी पर्याप्त नहीं थी। यहाँ कन्नड़ भाषा में लगा ASI का बोर्ड भी लगा हुआ था जिस पर इस मंदिर का इतिहास लिखा हुआ था किन्तु यह मेरी समझ से परे था और इन सबके अलावा यहाँ प्राचीन काल के शासकों के अभिलेख भी सुरक्षित रखे हुए थे जिन पर उस समय के सम्राट को भगवान शिव की स्तुति करते हुए दर्शाया गया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार इनमें से एक अभिलेख बादामी के आखिरी चालुक्य राजा कीर्तिवर्मन II का भी है जो लगभग 7 वीं शताब्दी का है। 

अन्य अभिलेखों में यहाँ एक बीजापुर के आदिलशाही शासकों का भी अभिलेख मिलता है जिससे ज्ञात होता है कि पंद्रहवीं शताब्दी में अन्निगेरी बीजापुर सल्तनत का एक भाग थी। मंदिर के चारों ओर घूमने के बाद मैं वापस रेलवे स्टेशन की तरफ रवाना हो गया। कुछ समय बाद हुबली से बल्लारी जाने वाली पैसेंजर ट्रेन आई जिसके द्वारा मैं अपने अगले गंतव्य गदग की और रवाना हो चला।   

अमृतेश्वर शिव मंदिर - अन्निगेरी 

AMRITESHWAR TEMPLE

AMRITESHWAR TEMPLE


AMRITESHWAR TEMPLE


AMRITESHWAR TEMPLE - ANNIGERI


AMRITESHWAR TEMPLE - ANNIGERI

AMRITESHWAR TEMPLE - ANNIGERI

AMRITESHWAR TEMPLE - ANNIGERI


बादामी के शासक कीर्तिवर्मन II का अभिलेख 


प्राचीन अभिलेख 

AMRITESHWAR TEMPLE - ANNIGERI


SUDHIR UPADHYAY AT AMRITESHWAR TEMPLE

NEAR ANNIGERI

ANNIGERI TEMPLE

AMRITESHWAR TEMPLE - ANNIGERI

UBL - SOLAPUR PASSENGER

ANNIGERI RAILWAY STATION

ANNIGERI RAILWAY STATION


कर्नाटक यात्रा से सम्बंधित यात्रा विवरणों के मुख्य भाग :-

 
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1 comment:

  1. श्रीमान जी आपने अप्रत्यक्ष रूप से कर्नाटका राज्य की सुंदर सैर कराई इसका आपके को धन्यवाद. प्राचीन कॉलिंग भव्य भगवान शिव को समर्पित मंदिरों के दर्शन कराने हेतु आपको कोटि-कोटि साधुवाद

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