मेवाड़ की ऐतिहासिक यात्रा पर - वर्ष 2024
भाग 2 -
राजसमंद का किला और रूठी रानी का महल
एक ऐतिहासिक धरोहर से वर्षों बाद हुआ आत्मीय साक्षात्कार

वर्षों बाद राजसमंद की धरती पर
कांकरोली स्टेशन से अपने भतीजे अभिषेक के साथ मैं राजसमंद स्थित अपने छोटे भाई जीतू के घर पहुँचा। मुझे अचानक अपने बीच पाकर जीतू और उसकी पत्नी सुगंधा अत्यंत प्रसन्न हुए। दोनों ने बड़े ही प्रेम, आत्मीयता और आदर के साथ मेरा स्वागत किया। अपनों के बीच पहुँचकर मन को जो सुकून मिलता है, वह किसी अन्य स्थान पर कहाँ! यात्रा की थकान जैसे उनके स्नेहिल व्यवहार के सामने स्वतः ही तिरोहित हो गई।
राजसमंद आए मुझे काफी लंबा अरसा बीत चुका था। समय के साथ नगर का स्वरूप बहुत बदल गया था। कुछ स्थान ऐसे थे जिन्हें देखकर लगता था कि मानो उन्हें पहचानने के लिए स्मृतियों के पुराने पन्ने पलटने पड़ेंगे, जबकि कुछ स्थान आज भी अपने पुराने रूप में दिखाई दे रहे थे। परिचित गलियों, इमारतों और रास्तों को देखते हुए मन में बीते वर्षों की अनेक स्मृतियाँ एक-एक करके उभरने लगीं। समय कितना भी क्यों न बदल जाए, कुछ स्थान हमारे भीतर वैसे ही बसे रहते हैं, जैसे हमने उन्हें वर्षों पहले देखा था।
जीतू मार्बल माइंस में काम करता है। उसके कार्यस्थल पर जाने का समय हो रहा था, इसलिए वह अपनी ड्यूटी पर जाने की तैयारी में लग गया। मैं भी अधिक देर घर पर बैठकर समय बिताने के पक्ष में नहीं था। राजसमंद की ऐतिहासिक धरोहरों को एक बार फिर देखने की इच्छा मेरे मन में जाग उठी थी। सो, मैंने अभिषेक के साथ राजसमंद का किला देखने जाने का निश्चय किया।
पहाड़ी पर बसा राजनगर का किला
अभिषेक की एक्टिवा स्कूटर पर सवार होकर हम राजसमंद के ऐतिहासिक किले की ओर चल पड़े। ऊँची पहाड़ियों के बीच से गुजरते हुए जब हम किले के निकट पहुँचे, तो सबसे पहले मेरी दृष्टि वहाँ तक पहुँचने के लिए बनी पक्की सड़क पर गई। अब इस ऐतिहासिक स्थल तक निजी वाहन से आसानी से पहुँचा जा सकता है।
यह देखकर मुझे अपने पुराने दिनों की याद आ गई। लगभग दस-पंद्रह वर्ष पहले जब मैं यहाँ आया था, तब किले तक पहुँचने के लिए पैदल ही पहाड़ी पर चढ़ना पड़ता था। उस समय यह चढ़ाई यात्रा का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा हुआ करती थी। रास्ते की कठिनाई के बावजूद ऐतिहासिक स्थलों को देखने की उत्सुकता कदमों को आगे बढ़ाती रहती थी। आज सड़क बन जाने से यह यात्रा कहीं अधिक सुगम हो गई थी।
समय के साथ केवल रास्ते ही नहीं बदलते, बल्कि किसी स्थान तक पहुँचने का हमारा अनुभव भी बदल जाता है। जहाँ पहले दुर्गम पहाड़ी पर चढ़ना अपने आप में एक चुनौती थी, वहीं अब वाहन से कुछ ही समय में वहाँ पहुँचा जा सकता था। इस बदलाव को देखकर मन में प्रसन्नता भी हुई और पुराने समय की स्मृतियाँ भी ताजा हो उठीं।
अभिषेक की एक्टिवा पर हम किले के निकट स्थित रूठी रानी के महल की ओर बढ़े। इस महल को देखने की मेरी इच्छा बहुत पुरानी थी। पिछली बार जब मैं राजसमंद के किले पर आया था, तब इस महल को दूर से खंडहरों के रूप में देखा था। उस समय यह किले से अलग दूसरी पहाड़ी पर स्थित था और इसके आसपास पर्वतीय जंगल तथा कँटीली झाड़ियों का ऐसा फैलाव था कि वहाँ तक पहुँचने का कोई सुगम रास्ता दिखाई नहीं देता था।
मैंने उस समय भी इस महल तक पहुँचने का प्रयास किया था, लेकिन मार्ग की कठिनाइयों के कारण मेरी इच्छा अधूरी रह गई थी। मन में कहीं न कहीं यह कसक बनी हुई थी कि किले को तो देख लिया, लेकिन उसके सामने की पहाड़ी पर स्थित उस रहस्यमयी महल को निकट से नहीं देख पाया।
इस बार दृश्य बिल्कुल अलग था। पुरातत्व विभाग और राजसमंद जिला प्रशासन के प्रयासों से महल के आसपास काफी परिवर्तन हो चुका था। इसके जीर्णोद्धार और पर्यटन की दृष्टि से किए गए विकास ने इसके स्वरूप को सँवार दिया था। अब यहाँ तक सड़कमार्ग से आसानी से पहुँचा जा सकता था। वर्षों पहले जिस महल तक पहुँचने की कल्पना भी कठिन लगती थी, आज उसी के सामने खड़े होने का अवसर मिल रहा था।
मेरे लिए यह केवल किसी पुराने महल को देखने की यात्रा नहीं थी। यह अपनी एक अधूरी इच्छा को पूरा करने और अतीत से पुनः साक्षात्कार करने का अवसर था।
राजसमंद और उसके गौरवशाली अतीत की स्मृतियाँ
राजसमंद का इतिहास मेवाड़ के गौरवशाली अतीत से जुड़ा हुआ है। महाराणा राजसिंह प्रथम ने सत्रहवीं शताब्दी में राजनगर को विकसित कराया और यहाँ के क्षेत्र को एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक पहचान प्रदान की। इसी काल में राजसमंद झील का निर्माण कराया गया, जो आज भी राजस्थान की प्रमुख ऐतिहासिक जल संरचनाओं में गिनी जाती है।
राजसमंद झील का निर्माण वर्ष 1662 से 1676 ईस्वी के बीच कराया गया था। गोमती, केलवा और ताली नदियों के जल को एकत्रित करके बनाई गई इस विशाल झील का उद्देश्य जल-संग्रह के साथ-साथ क्षेत्र की आवश्यकताओं की पूर्ति करना भी था। इसके तट पर बनी ऐतिहासिक संरचनाएँ और आसपास का प्राकृतिक परिवेश मेवाड़ के तत्कालीन शासकों की दूरदर्शिता तथा स्थापत्य-रुचि की याद दिलाते हैं।
राजनगर के किले और आसपास की पहाड़ियों को देखते हुए सहज ही कल्पना की जा सकती है कि कभी यह क्षेत्र राजकीय गतिविधियों, सामरिक महत्त्व और प्राकृतिक सौंदर्य का अनूठा संगम रहा होगा। ऊँचाई पर स्थित दुर्ग से आसपास के क्षेत्र पर दृष्टि रखी जा सकती थी। दूसरी पहाड़ी पर स्थित रूठी रानी का महल इस ऐतिहासिक परिवेश में एक अलग ही आकर्षण जोड़ता है।
किले के सामने दूसरी पहाड़ी पर स्थित इस महल के बारे में एक रोचक लोककथा प्रचलित है। कहा जाता है कि जब एक रानी अपने राजा से रुष्ट हो गईं, तो उन्होंने मुख्य दुर्ग से दूर अपने लिए अलग महल बनवाया और वहीं रहने लगीं। इसी कारण इस महल को रूठी रानी का महल कहा जाने लगा।
राजस्थान में रूठी रानी के नाम से प्रसिद्ध अन्य महलों के साथ भी ऐसी ही कथाएँ जुड़ी हुई हैं। उदयपुर के निकट जयसमंद क्षेत्र और अजमेर की पहाड़ियों में भी इस नाम से जुड़े महलों अथवा उनके अवशेषों का उल्लेख मिलता है। इन कथाओं में इतिहास, लोकविश्वास और मानवीय भावनाओं का ऐसा सम्मिश्रण दिखाई देता है, जो पुराने महलों को केवल पत्थरों से बनी इमारतें नहीं रहने देता, बल्कि उन्हें जीवंत स्मृतियों में बदल देता है।
रूठी रानी का महल — एक अधूरी इच्छा की पूर्ति
अंततः वह क्षण आ ही गया, जब मैं वर्षों से देखने की इच्छा सँजोए इस महल के सामने खड़ा था।
महल के प्रवेश-द्वार पर ताला लगा हुआ था। भीतर जाने का रास्ता बंद देखकर कुछ क्षणों के लिए असमंजस हुआ, लेकिन इतने वर्षों बाद यहाँ तक पहुँचने का अवसर मिला था, इसलिए मैं इसे बिना देखे लौटना नहीं चाहता था। मैंने रेलिंग पार की और महल को निकट से देखने के लिए भीतर पहुँच गया।
महल का स्वरूप मेरी पुरानी स्मृतियों से बिल्कुल अलग था। वर्षों पहले किले से इसे देखने पर यह खंडहरों का एक उजड़ा हुआ समूह प्रतीत होता था। आसपास की झाड़ियाँ, दुर्गम रास्ता और वीरान वातावरण इसे रहस्यमयी बना देते थे। आज इसके जीर्णोद्धार के बाद इसका रूप कहीं अधिक व्यवस्थित और आकर्षक दिखाई दे रहा था।
मैं कुछ देर वहाँ खड़ा होकर इस ऐतिहासिक इमारत को निहारता रहा। मन में एक संतोष था कि जिस स्थान तक पहुँचने की इच्छा वर्षों पहले अधूरी रह गई थी, आज वह पूरी हो गई है। यात्रा में ऐसे क्षण विशेष महत्त्व रखते हैं। कई बार हम किसी स्थान पर केवल उसे देखने नहीं जाते, बल्कि अपने अतीत से जुड़ी किसी स्मृति को पूरा करने जाते हैं। मेरे लिए रूठी रानी का महल ऐसा ही एक स्थान था।
महल की दीवारों और उसके आसपास के वातावरण को देखते हुए मन में बार-बार यह विचार आता रहा कि इन पत्थरों ने न जाने कितने युगों को गुजरते देखा होगा। कभी यहाँ जीवन रहा होगा, लोगों की आवाजाही रही होगी और किसी राजपरिवार की निजी स्मृतियाँ इन दीवारों से जुड़ी रही होंगी। आज समय की धूल के बीच खड़ा यह महल उस बीते हुए संसार की एक झलक भर प्रस्तुत करता है।
रानी उमादे और भारमली की कथा
महल में लगे पुरातात्त्विक विवरण-पट्ट पर इसे रानी उमादे से संबंधित बताया गया है। रानी उमादे का विवाह सोलहवीं शताब्दी में मारवाड़ के शासक राव मालदेव के साथ हुआ था। उनके जीवन से जुड़ी कथा राजस्थान के इतिहास और लोकस्मृतियों में विशेष स्थान रखती है।
प्रचलित कथा के अनुसार, रानी उमादे के पिता ने विवाह के समय उनके साथ कई दासियाँ भेजी थीं। इनमें भारमली नामक एक दासी अत्यंत सुंदर बताई जाती है। कहा जाता है कि राव मालदेव उसकी सुंदरता से आकर्षित हो गए और विवाह की पहली रात रानी उमादे के पास जाने के स्थान पर भारमली के साथ समय बिताते रहे।
जब रानी उमादे को इस घटना का पता चला, तो उन्होंने इसे अपने सम्मान और आत्मगौरव के विरुद्ध माना। वे अपने पति के इस व्यवहार से इतनी आहत हुईं कि उन्होंने उनसे जीवनभर बात न करने का निश्चय कर लिया। लोककथा के अनुसार, इसी रूठने के बाद वे राजमहल से अलग रहने लगीं और उनसे जुड़ा यह महल रूठी रानी के महल के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
इस कथा में एक स्त्री के आत्मसम्मान, आहत भावनाओं और अपने निर्णय पर अडिग रहने की झलक दिखाई देती है। राजदरबारों के इतिहास में प्रायः युद्धों, संधियों, विजय-अभियानों और राजकीय उपलब्धियों का वर्णन मिलता है, लेकिन ऐसी कथाएँ हमें राजपरिवारों के निजी जीवन की भावनात्मक जटिलताओं से परिचित कराती हैं।
हालाँकि, इस कथा के अलग-अलग रूप लोकपरंपराओं में प्रचलित हैं। इसलिए इसके प्रत्येक विवरण को निर्विवाद ऐतिहासिक तथ्य मानने के बजाय परंपरागत आख्यान के रूप में देखना अधिक उचित है। फिर भी, रानी उमादे का नाम राजस्थान की लोकस्मृति में जिस दृढ़ता से जीवित है, वह अपने आप में उल्लेखनीय है।
महल को देखते हुए मेरे मन में इस कथा के अनेक प्रसंग उभरते रहे। कल्पना कीजिए, यदि वास्तव में किसी रानी ने अपने आत्मसम्मान की रक्षा के लिए राजमहल का वैभव छोड़कर एकांत में रहने का निर्णय लिया होगा, तो उसके मन में कितनी पीड़ा और कितनी दृढ़ता रही होगी! इतिहास की ऐसी कहानियाँ समय बीत जाने के बाद भी मनुष्य के हृदय को छूती हैं, क्योंकि प्रेम, सम्मान, विश्वास और अपमान जैसी भावनाएँ किसी एक युग तक सीमित नहीं होतीं।
ऐतिहासिक धरोहर से एक आत्मीय विदाई
पुरातत्व विभाग ने इस महल का जीर्णोद्धार कर इसे पर्यटन की दृष्टि से विकसित किया है। इसे पर्यावरण चेतना केंद्र के रूप में विकसित किए जाने का भी उल्लेख मिलता है। आसपास के प्राकृतिक परिवेश के बीच स्थित यह ऐतिहासिक धरोहर राजसमंद की सांस्कृतिक और स्थापत्य विरासत का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है।
महल के आसपास घूमते हुए मुझे बार-बार अपने पुराने दौरे की याद आती रही। उस समय दूर से दिखाई देने वाला यह खंडहर मेरे लिए एक रहस्य की तरह था। आज उसी स्थान पर खड़े होकर उसकी दीवारों और स्थापत्य को निकट से देख पाना एक सुखद अनुभव था। समय ने इस स्थल का स्वरूप बदला था, रास्तों को सुगम बनाया था और इसे लोगों के लिए अधिक सुलभ कर दिया था।
ऐतिहासिक धरोहरों का संरक्षण केवल पुराने भवनों की मरम्मत कर देना नहीं है। यह उन स्मृतियों, परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान को बचाए रखने का प्रयास भी है, जो किसी क्षेत्र को उसकी विशिष्टता प्रदान करती हैं। जब कोई पुराना महल खंडहर से सँवरकर फिर लोगों के सामने आता है, तो उसके साथ उस अतीत को जानने और समझने की संभावनाएँ भी जीवित हो उठती हैं।
रूठी रानी के महल की यात्रा ने मुझे यह अनुभव कराया कि यात्राएँ केवल नए स्थानों को देखने का माध्यम नहीं होतीं। कई बार वे हमें वर्षों पीछे ले जाती हैं, हमारी पुरानी इच्छाओं को पूरा करती हैं और उन स्मृतियों को फिर से जीवंत कर देती हैं, जिन्हें हम समय के साथ कहीं पीछे छोड़ आए होते हैं।
अभिषेक के साथ की गई यह छोटी-सी यात्रा मेरे लिए ऐसी ही एक यादगार यात्रा बन गई। राजसमंद की धरती पर लौटना, अपने छोटे भाई जीतू और सुगंधा का स्नेह पाना, पुराने परिचित परिवेश में बदलाव देखना और अंततः रूठी रानी के महल को निकट से देखने की वर्षों पुरानी इच्छा पूरी करना—इन सभी अनुभवों ने इस दिन को विशेष बना दिया।
महल से लौटते समय मन में संतोष था। वर्षों पहले जो स्थान मेरे लिए केवल दूर से दिखाई देने वाला खंडहर था, आज वह अपनी ऐतिहासिक गरिमा के साथ मेरी स्मृतियों का हिस्सा बन चुका था।
समय आगे बढ़ता रहता है। रास्ते बदलते हैं, नगरों का विस्तार होता है और पुराने भवन नए रूप में सामने आते हैं। लेकिन किसी स्थान से जुड़ी हमारी स्मृतियाँ समय की इन परतों के नीचे सुरक्षित रहती हैं। जब हम वर्षों बाद वहाँ लौटते हैं, तो वर्तमान के साथ-साथ अपना अतीत भी फिर से देख लेते हैं।
राजसमंद के किले और रूठी रानी के महल की यह यात्रा मेरे लिए केवल एक ऐतिहासिक स्थल का भ्रमण नहीं थी, बल्कि स्मृतियों, इतिहास और आत्मीय अनुभूतियों से भरा एक ऐसा अनुभव थी, जिसे मैं लंबे समय तक याद रखूँगा।
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| रूठी रानी का महल |
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| रूठी रानी का महल |
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| रूठी रानी का महल |
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| RAJSAMAND LAKE |
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| RAJSAMAND LAKE |
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| राजगढ़ किला |
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