Sunday, April 18, 2021

ITTAGI : KARNATAKA 2021

 UPADHYAY TRIPS PRESENT'S

कर्नाटक की ऐतिहासिक यात्रा पर भाग - 16 

इत्तगि का महादेवी मंदिर 

6 JAN 2021

इस यात्रा को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक कीजिये। 

लकुण्डी के मंदिर देखने के बाद अपना बैग लेकर मैं बस स्टैंड पर पहुँच गया। अब मेरी अगली यात्रा इत्तगि गाँव की ओर होनी थी जहाँ ऐतिहासिक महादेवी का मंदिर मुझे देखना था, इसके लिए मैंने अपने नजदीक बैठी सवारी से  इत्तगि जाने वाली बस के बारे में पूछा, तो उसने कहा इत्तगि की बस आएगी। काफी देर तक इत्तगि जाने वाली कोई बस नहीं आई तो गुजरते वक़्त को देखकर मेरे मन में शंका उत्पन्न होने लगी और अब बार बार यही ख्याल आने लगा था कि क्या मैं आज इत्तगि पहुँच पाउँगा। मैं कर्नाटक यात्रा का जैसा कार्यक्रम बनाकर चला था क्या उसमें से इत्तगि की यात्रा पूर्ण हो पायेगी। मुझे इस बस स्टैंड पर कोई भी संतोष जनक जवाब नहीं मिल रहा था। 


अब मेरे पास उस हिंदी समझने वाले व्यक्ति की बात पर भरोसा करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था। मैं बड़ी बेसब्री से इत्तगि जाने वाली बस की राह देख रहा था। इस बीच जो भी बस लकुण्डी के बस स्टैंड पर आती थी मैं उसके पास जाकर कंडक्टर से पूछता था कि ये बस इत्तगि जाएगी या नहीं और जब कंडकटर मना कर देता तो वापस जाकर बेंच पर बैठ जाता था। आज मुझे भूख प्यास कुछ भी नहीं लग रही थी, बस दिल में एक ही आस थी कि कब इत्तगि जाने की बस आये और मैं अपनी आगे की यात्रा को अंजाम दे सकूँ। 

बस स्टैंड पर बैठे मेरे नजदीकी उसी यात्री ने मेरी बेचैनी को समझते हुए कहा कि आप चिंता ना करें। मुझे खुद कुकनूर जाना है और कुकनूर जाने वाली बस ही इत्तगि होकर जाएगी। उसकी इस बात को सुनकर मेरी सारी व्यथाएँ दूर हो गईं और मैं अब सब्र के साथ बस का इंतज़ार करने लगा। शाम के तीन बज चुके थे, अब दिन ढलने में मात्र ढाई से तीन घंटे ही शेष बचे थे और मैं अब भी इत्तगि से काफी दूर था और अभी कुकनूर जाने वाली कोई बस लकुण्डी नहीं पहुंची थी। आज शाम को ही मुझे हम्पी भी पहुंचना था जहाँ नागराज द्वारा बताये मयूरी होटल में मैंने डोरमेट्री में बिस्तर भी बुक कर रखा था। 

अब मेरे मन में मेरी बीते दिनों की गईं सभी यात्रायें एक एक करके घूमने लगी थीं, एक तरफ मुझे घर की भी याद आने लगी थी क्योंकि आज घर से निकले मुझे आठ दिन पूरे हो चुके थे। इन सब के बीच सबसे मुख्य था मेरा इत्तगि पहुँचने का जूनून, जिसने मुझे अकेला और इतनी दूर होने के बाबजूद भी उम्मीद के सहारे हौंसलेमंद बनाये रखा था। कुछ ही समय में एक फुल भरी हुई बस आई और मेरे नजदीक में बैठा वह व्यक्ति ख़ुशी बस की तरफ इशारा करते हुए बोला - ये आ गई कुकनूर जाने वाली बस, इसी में बैठ जाओ। यही तुम्हें इत्तगि ले जाएगी। उसकी बात सुनकर मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा, शायद भगवान् भी ऊपर से बैठे हुए मेरी यात्राओं को देख रहा था और वह नहीं चाहता था कि मेरा कर्नाटक की इस ऐतिहासिक यात्रा का कोई भाग अधूरा रहे। 

मैंने उस व्यक्ति से कहा - आप नहीं चल रहे, आपको भी तो कुकनूर जाना था ना। मेरी बात सुनकर उसने जवाब दिया - मुझे कहीं नहीं जाना, मैंने तो बस आपको परेशान होते देख बस यूँही आपको सब्र देने के लिए बोल दिया था। मैं तो यहीं लकुण्डी में रहता हूँ, मेरा कोई रिश्तेदार बस से आने वाला है इसलिए उन्हीं का ही इंतज़ार कर रहा हूँ। उस व्यक्ति की बातें सुनकर मेरी आँखें भर आई और मैंने तहे दिल से उसका धन्यवाद किया और अपना बैग लेकर बस में पहुंचा। यह बस सवारियों से फुल भरी हुई थी, बैठने के लिए कोई सीट भी खाली नहीं थी इसलिए मैं, बैग को खिसकाते हुए ड्राइवर के नजदीक वाले भाग में पहुंचा और इंजन के साइड में लगी रेलिंग पर बैठ गया। 

बस में बैठने के बाद मैंने फिर से उसी व्यक्ति की तरफ देखा जो बस स्टैंड पर बैठा हुआ था और मुझे बस के आने की उम्मीद दे रहा था। परन्तु अब वह मुझे वहां नजर नहीं आया, जिस सीट पर वह बैठा था वह बिल्कुल खाली पड़ी थी। मैंने बस में और बस स्टैंड के चारों तरफ निगाह दौड़ाई किन्तु वह कहीं भी नजर नहीं आया। बस लकुण्डी से रवाना हो चली थी। मेरे लिए यह विशेष आश्चर्य की बात हो गई कि आख़िरकार मेरे बस में बैठने तक वह इंसान कहाँ गायब हो गया। वह मुझे फिर क्यों नहीं नजर आया। आखिर उसका रिश्तेदार कौन सी बस से आ रहा था जो अब तक लकुण्डी नहीं आ पाई थी। 

मेरे पास कंडक्टर साब आये तो मैंने उनसे इत्तगि की एक टिकट मांगी। उसने मुझे पहले ही बता दिया कि यह बस इत्तगि नहीं जाएगी बल्कि इत्तगि से दो किमी दूर अवश्य उतार देगी। मैंने बिना कुछ सोचे समझे कंडक्टर की बात मान ली थी और टिकट ले लिया। कुकनूर जाने वाली यह बस एक मात्र बस थी जो मुझे समय से इत्तगि पहुंचा सकती थी। मुझे बार बार उसी व्यक्ति का ख्याल आ रहा था जिसने मुझे इत्तगि पहुँचने वाली इस बस के बारे में बताया था। मैंने अपने गूगल मैप को ऑन कर लिया था और देखने लगा था कि यह बस कैसे कैसे होकर इत्तगि पहुँचेगी। 

लकुण्डी के बाद बस अपने अगले स्टॉप हरलापुर पहुंची, हाइवे से थोड़ा अलग हटकर हरलापुर एक गाँव था जिसके बीच में हरलापुर बस स्टैंड बना हुआ था जहाँ कुछ देर के लिए यह बस रुकी और आगे बढ़ चली। बस गदग से कोप्पल जाने वाले उस राष्ट्रीय राजमार्ग को छोड़ चुकी थी जिसपर होकर आसानी से इत्तगि पहुंचा जा सकता था। कर्नाटक के गाँवों के लिए बने इस संकीर्ण रोड पर यह बस हरलापुर रेलवे स्टेशन के नजदीक से होते हुए कर्नाटक के अन्य गाँवों की और बढ़ चली। मैं गूगल मैप में देखकर समझ चुका था कि आखिर यह इत्तगि क्यों नहीं जाएगी। क्योंकि यह बस कर्नाटक के इन गाँवों में से होकर सीधे कुकनूर जा रही थी और जो इसका मार्ग था वहां से इत्तगि थोड़ा दूर स्थित था। 

रेलवे लाइन को पार करने के बाद इस बस ने मुझे कर्नाटक की वह यात्रा करवाई जो शायद मैं अपनी इस यात्रा में कभी नहीं कर सका था। बस में भीड़ को देखकर लग रहा था कि अब लोगों को कोरोना जैसी महामारी का कोई डर नहीं रह गया था। ना मास्क और ना ही दो गज की दूरी इस बस में कहीं बची थी। कई गाँव निकलने के बाद आखिरकार बस, मण्डलगिरि नामक गाँव में पहुंची। मेरा सफर इस बस में यहीं तक था, बस के कंडकटर ने मुझे उतरने का इशारा देते हुए कहा, यहीं से थोड़ी दूर इत्तगि है, आप चाहो तो पैदल भी पहुँच सकते हो। 

मण्डलगिरि गाँव के एक चौराहे पर बस मुझे उतार कर चली गई। इस चौराहे पर बड़े बड़े पीपल और बरगद के वृक्ष लगे हुए थे जिन्हें देखकर मुझे अपने उत्तर प्रदेश की याद आ गई क्योंकि ऐसे वृक्षदार चौराहे उत्तर प्रदेश में अधिकांश मिल जाते हैं किन्तु यहाँ लगे नारियल के वृक्ष मुझे एहसास कराते रहे कि मैं दक्षिण भारत में हूँ। चौराहे पर स्थित एक दुकान पर जाकर मैंने इत्तगि के बारे में पुछा किन्तु मुझे कन्नड़ भाषा में जबाब मिला जिसे समझना मेरे वश की बात नहीं थी इसलिए गूगल मैप का ही सहारा लिया जिसके अनुसार इत्तगि अभी यहाँ से दो किमी दूर था। 

पैर की मोच और इस बड़े बैग को लेकर पैदल इत्तगि पहुँचने की मेरी हिम्मत नहीं थी। कोई ऑटो - रिक्शा यहाँ से इत्तगि जाने के लिए उपलब्ध नहीं था। मजबूरन मुझे बाइक वालों से लिफ्ट मांगने का विचार मन में आया और एक दो बाइक वालों से मैंने लिफ्ट मांगने की कोशिश की, किन्तु सफलता हाथ नहीं लगी। अंततः काफी देर इंतज़ार करने के बाद एक टाटा मजिक मुझे मिली जो इत्तगि जा रही थी। यूँ तो यह एक लोडिंग गाडी थी किन्तु इसमें भी तनिक भर जगह बैठने के लिए नहीं थी। फिर भी गाड़ी के ड्राइवर ने मुझे इसकी शटर पर जगह बनाकर बैठा दिया और बैग हाथ में ले लिया। मेरे दोनों पर नीचे सड़क की ओर लटके हुए थे और मेरा मुंह, गाडी के चलने की विपरीत दिशा में था। अगल बगल में और भी लोग इसी तरह बैठे हुए थे। 

दो किमी के इस सफर को मैंने बड़ी ही मुश्किल के साथ काटा। गाडी वाले ने मुझे इत्तगि के उसी ऐतिहासिक मंदिर के पास उतारा, जिसे देखने के लिए मैं मुश्किलें उठाकर यहाँ तक पहुंचा था। सड़क से थोड़ी दूरी पर यह भव्य मंदिर एक तालाब के किनारे स्थित है। कल्याणी के चालुक्यों द्वारा निर्मित यह मंदिर मेरी कर्नाटक यात्रा की आखिरी कड़ी थी। इसके बाद मुझे सीधे विजय नगर साम्राज्य मतलब हम्पी पहुंचना ही था जो अब यहाँ से ज्यादा दूर नहीं रह गया था। 

इत्तगि का महादेव अथवा महादेवी मंदिर का वर्णन भारतीय इतिहास की किताब में मिलता है जिसके बारे में प्रचलित है कि दशवीं से बारहवीं शताब्दी के बीच कल्याणी के चालुक्य राजाओं ने इसका निर्माण करवाया था। उन्होंने यहाँ अलग अलग बारह ज्योतिर्लिंग के मंदिरों का निर्माण करवाया था जिनके अवशेष आज भी यहाँ देखे जा सकते हैं। इतना ही नहीं, मंदिर के पीछे वाले भाग में और इन बारह ज्योतिर्लिंगों के समीप एक पुष्करिणी भी दिखाई देती है जिसकी सरंचना बहुत ही सुन्दर प्रतीत होती है। 

इसके अलावा इस मंदिर के समीप एक ऐतिहासिक धर्मशाला भी बनी हुई है जो तीर्थ यात्रियों के रुकने के उद्देश्य से बनबाई गई थी। मंदिर के अनेक ध्वंशावशेष इस मंदिर के इर्द गिर्द और तालाब के चारों ओर बिखरे पड़े हैं जिनसे साबित होता है बारहवीं शताब्दी में इत्तगि एक महत्वपूर्ण केंद्र था। इत्तगि के महादेवी मंदिर की संरचना बहुत ही भव्य है इसका शिखर सफ़ेद पत्थरों से निर्मित है जिससे यह और भी सुन्दर लगता है। नागर शैली में बने इस मंदिर की सुंदरता सबसे अलग है जो इत्तगि आने वाले यात्रियों को दिल से खुश कर देती है।  

 माना जाता है यहाँ और भी मंदिर बने हुए थे जो समय के प्रभाव के चलते अथवा विजय नगर पर हुए उस महाविनाश  ध्वस्त हो गए हैं। मंदिर के साथ साथ इस तालाब को भी पुरातत्व विभाग ने अपने अधीन किया हुआ है जिसका मतलब है कि इन मंदिरों की मूर्तियां और उनके अवशेष आज भी इस तालाब में दबे हुए हैं। पुरातत्व विभाग ने अब यहाँ खुदाई पर रोक लगा रखी है अन्यथा इत्तगि, लकुण्डी की तरह ही महान ऐतिहासिक सम्पदा से भरपूर ग्राम साबित हो सकेगा। इत्तगि की इस ऐतिहासिक धरोहर को देखने के बाद मेरी आज की यह यात्रा पूर्ण हो गई। 

अब मुझे यहाँ से हम्पी की ओर रवाना होना था जिसके लिए मैं मंदिर से पैदल मुख्य रोड पर आया जो कि अभी सुनसान अवस्था में था। दिन ढलने की कगार पर था और मैं शहरों की चकाचौंध से दूर कर्नाटक के एक छोटे से गाँव में था जहाँ से किसी भी शहर को पहुँचने के लिए, किसी भी तरह के साधन के मिलने के कोई आसार नजर नहीं आ रहे थे। परन्तु मुझे अपने भगवान पर पूरा भरोसा था, जिन्होंने मुझे इत्तगि तक पहुंचा दिया अब वही आगे भी पहुंचाएंगे। अपना बैग हाथ में लिए मैं इत्तगि के मुख्य रास्ते पर किसी गाडी का इंतज़ार करने लगा। 

अब दिन पूर्ण रूप से ढलने ही वाला था कि एक लोडिंग ऑटो मुझे कुकनूर जाने के लिए मिल गया। इस लोडिंग ऑटो में पीछे की तरफ लकड़ी के बड़े बड़े तख्ते सवारियों के बैठने के लिए लगे हुए थे। अब जो भी हो मुझे कुकनूर जाने का साधन मिल ही गया था और अँधेरा होते होते मैं कुकनूर पहुँच गया। 

मण्डलगिरि का चौराहा 

मंदिर के नजदीक रथ 

इत्तगि का महादेवी मंदिर 

MAHADEVI TEMPLE OF ITTAGI - KARNATAKA


MAHADEVI TEMPLE OF ITTAGI - KARNATAKA





A RUINS OF ITTAGI TEMPLES

A RUINS OF ITTAGI TEMPLES


A RUINS OF ITTAGI TEMPLES


A RUINS OF ITTAGI TEMPLES






इत्तगि स्थित तालाब 

इत्तगि का महादेवी मंदिर 





इत्तगि मंदिर का प्रवेश द्वार 







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