Friday, March 30, 2012

AJMER 2012

UPADHYAY TRIPS PRESENT'S


अजमेर की एक यात्रा 




       मैंने अपनी शादी के बाद अजमेर और उदयपुर जाने का प्लान बनाया, हालांकि मैंने पहले ही सियालदाह-अजमेर एक्सप्रेस में रिजर्वेशन करवा रखा था, जिसका समय आगरा फोर्ट पर रात को आठ बजे है किन्तु आज यह ट्रेन अपने सही समय से काफी लेट हो गई और सुबह चार बजे आगरा फोर्ट पहुंची। आज हमारी पूरी रात इस ट्रेन के इंतजार में खराब हो गयी। 

मैं आज पहली बार अपनी पत्नी के साथ यात्रा कर रहा था, एक अजीब सी ख़ुशी मेरे दिल में थी, किन्तु हमारी इस  यात्रा की शुरुआत ही विलम्ब से शुरू हुई। ट्रैन आने के बाद हम अपनी सीट पर पहुंचे और सारी रात जगे और थके होने के कारण तुरंत ही अपनी सीट पर नींद के आगोश में समां गए। 



    अगली सुबह एक्सप्रेस जयपुर पहुंचकर तक़रीबन खाली हो चुकी थी, यहाँ से करीब एक घंटे बाद हम अजमेर पहुँच गए। सबसे पहले मैंने क्लॉक रूम पर अपना सामान जमा कराया और सामान से मुक्त होकर हम अजमेर नगर घूमने के लिए चल दिए, यहाँ ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह है जिसकी आजकल विशेष मान्यता है। 

यूँ तो दरगाह के लिए स्टेशन के ठीक सामने से ही रास्ता जाता है, पर मेरा मन अभी दरगाह जाने के लिए नहीं था। हम पैदल पैदल ही अजमेर में स्थित अकबर के किले में पहुंचे, यहाँ सिवाय सन्नाटे के देखने को कुछ भी नहीं था, इस किले में आज अजमेर की कोतवाली बन गई है।

    किले के बाद हम पैदल पैदल ही अनासागर झील पहुंचे, यह झील ही अजमेर की सुन्दरता का मुख्य आकर्षण है, झील के किनारे संगमरमर का आलिशान प्लेटफार्म बना हुआ है और एक काफी बड़ा बगीचा भी है जिसमे एक टॉय ट्रेन भी चलती है, यह टॉयट्रेन केवल बच्चों के मनोरंजन के लिए ही है। झील में काफी बड़ी बड़ी मछलियाँ मुझे देखने को मिलीं। इसी झील में नौका विहार की सुविधा भी उपलब्ध है, कल्पना का मन नाव में बैठने को था इसलिए मैंने एक नौका किराए पर ली और कल्पना को आनासागर झील की सैर कराई। कल्पना की ख़ुशी को देखकर मुझे काफी प्रशन्नता हो रही थी।

   झील से लौटकर हम बाहर सड़क पर आये, यहाँ से पुष्कर जाने के लिए हमें एक बस मिल गई और थोड़े ही समय में हम पुष्कर पहुँच गए। पुष्कर की यात्रा को पढने के लिए यहाँ क्लिक करें ।

    पुष्कर से लौटते हुए हमें शाम हो गई, ट्रेन के लेट हो जाने की वजह से हमारा तारागढ़ जाने का विचार कैंसिल हो गया था जिससे दिलीप को काफी दुःख हुआ, वह पृथ्वीराज के इस किले को देखना चाहता था, यह अजमेर का मुख्य किला है जो अजमेर के बीचों बीच एक पहाड़ पर स्थित है। पुष्कर से लौटकर हम रेलवे स्टेशन पहुंचे और यहाँ के वेटिंग रूम में नहा धोकर सीधे दरगाह की ओर रवाना हो लिए ।

     दरगाह में कोई ज्यादा भीड़भाड़ नहीं थी, यह ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह है जो 1162 ई. में मोहम्मद गौरी की सेना के साथ ईरान से भारत आये थे और अजमेर में ही बस गए थे। कुछ समय पश्चात् ख्वाजा का इंतकाल होने के बाद उन्हें यहीं दफना दिया गया। मांडू के सुल्तान गयासुद्दीन खिलजी ने 1464 ई. में इनकी दरगाह तथा गुम्बज बनबाये थे ।
 
   दरगाह की प्रसिद्धी अकबर के शासनकाल में हुई, इस दरगाह में अकबर ने मस्जिद, बुलंद दरवाजा तथा महफ़िल खाने का निर्माण कराया तथा शाहजहाँ ने सफ़ेद संगमरमर से जामा मस्जिद व् रोजे के ऊपर गुम्बज बनबाये थे। प्रतिवर्ष देख - विदेश से लाखों यात्री यहाँ जिय़ारत करने आते हैं ।

     दरगाह से वापस हम रेलवे स्टेशन पहुंचे और क्लॉक रूम से अपना सामान वापस लिया। यहाँ से हमारा अगला रिजर्वेशन अनन्या एक्सप्रेस में उदयपुर सिटी के लिए था, स्टेशन पर पहुंचकर कल्पना को आइस क्रीम खाने का मन बना, मैंने लाने से मना कर दिया इसलिए वो नाराज हो गई, पर मैं उसे खुद से नाराज होते कैसे देख सकता था, मैं बिना बताये ही स्टेशन से बाहर आया और दोनों के लिए चार आइस क्रीम ले आया। ट्रेन भी आ चुकी थी, मेरी नीचे की साइड वाली सीट थी, वैसे ट्रेन पूरी खाली ही पड़ी थी। मैं आज काफी पैदल चला था इसलिए मेरे पैरों में अब दर्द भी होने लगा था, कल्पना को समझते देर नहीं लगी और वह काफी देर तक  मेरे पैर दबाती रही और उसके बाद वह अपनी सीट पर जाकर सो गई।

थोड़ी देर बाद ही टिकट चेंकिंग करने वाली एक टीम आई और उन्होंने हमारी टिकटें चेक की। हमारी तीनों टिकट स्लीपर कोच की थीं और कन्फर्म थीं। वैसे ट्रैन का यह कोच भी लगभग खाली ही पड़ा था। 

कल्पना उपाध्याय 

अकबर का अजमेर स्थित किला 
दिलीप उपाध्याय 


मैं और दिलीप 

मैं और मेरी पत्नी कल्पना 

अनासागर में नौकाविहार कल्पना के साथ 

ख्वाज़ा ग़रीब नवाज की दरगाह 
 

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