Saturday, August 12, 2023

AGRA : KAFUR MOSQUE & STONE HORSE


आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 5


  काफूर की मस्जिद और पत्थर के घोड़े की प्रतिमा 



आगरा-मथुरा हाईवे (सिकंदरा) पर स्थित काफूर की मस्जिद (या इतिबारी खां की मस्जिद) के पास एक रहस्यमयी पत्थर का घोड़ा (लाल बलुआ पत्थर की मूर्ति) स्थित है। 
1605-1623 ईस्वी के बीच निर्मित यह स्थल, जहांगीर के वफादार दरबारी इतिबारी खां द्वारा संत ख्वाजा काफूर के सम्मान में बनवाया गया था, जहां घोड़े की मूर्ति को अकबर के प्रिय घोड़े का स्मारक माना जाता है।

यहाँ लगे पुरातत्व विभाग के बोर्ड पर दी गई जानकारी के अनुसार,  इस परिसर का निर्माण 1672 में इतिबार खान ने सूफी संत ख्वाजा काफूर के लिए करवाया था। तीन मेहराबों वाली इस छोटी मस्जिद के पीछे कुछ कमरे थे जो अब मलबे से भर गए हैं, साथ ही पास में स्थित कुआँ भी मलबे में तब्दील हो गया है।

मस्जिद के ठीक पश्चिम में एक मकबरा है जिस पर फारसी भाषा में शिलालेख अंकित है। इसमें दर्ज है कि जहांगीर के शासनकाल में कुलीन वर्ग के इतिबार खान ने आगरा से दिल्ली जाने वाली सड़क पर ख्वाजा काफूर के लिए मस्जिद का निर्माण करवाया था।

सन् 1622 में इतिबार खान आगरा के राज्यपाल थे और सन् 1623 में जब विद्रोही राजकुमार शाहजहाँ ने शहर पर कब्जा करने का प्रयास किया, तब वे आगरा किले और खजाने की रक्षा के प्रभारी थे। उन्होंने शाहजहाँ को सफलतापूर्वक खदेड़ दिया और इस प्रयास के लिए उन्हें "मुमताज खान" की नई उपाधि से सम्मानित किया गया। इतिबार की अटूट वफादारी की बहुत प्रशंसा की गई और जहाँगीर ने अपनी आत्मकथा में भी कई बार उसकी प्रशंसा की है। 

मकबरे पर खुदे शिलालेख के आधार पर साबित होता है कि यह मकबरा सूफी संत ख्वाजा काफूर का है हालांकि इसमें केवल मस्जिद का उल्लेख मिलता है। 

इस स्थल से जुड़ा रहस्य मस्जिद और मकबरे के बीच बने चबूतरे पर खड़ी घोड़े की एक विचित्र और कुछ हद तक यथार्थवादी दिखने वाली पत्थर की मूर्ति है, जिसके पैर गायब हैं। 

 हो सकता है की यह मूर्ति, काफूर के पालतू घोड़े का स्मारक (या समाधि) है। किन्तु भारतीय पुरातत्व विभाग  अनुसार इसकी एक दूसरी कहानी भी दृष्टिगोचर होती है। 

कहा जाता है कि एक दिन सम्राट अकबर अपने पसंदीदा घोड़े पर सवार होकर दिल्ली से आगरा की ओर लौट  रहे थे, और इस स्थान के पास आकर ही उनका घोड़ा गिर पड़ा और मर गया।

घोड़ा जहाँ गिरा था, उसे वहीं दफना दिया गया और अकबर ने उसकी कब्र पर यह मूर्ति स्थापित की। इस मूर्ति की तिथि 1580 से 1605 के बीच मानी जाती है, जो मस्जिद के निर्माण से कम से कम 65 वर्ष पूर्व की है।

 यह मूर्ति मूल रूप से वर्तमान स्थल की सीमा से कुछ ही दूरी पर एक रेलवे लाइन के पास पाई गई थी, और इसे 1922 में स्थानांतरित करके इसके वर्तमान स्थान पर स्थापित किया गया था।













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