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Saturday, September 23, 2023

DELHI 2023 : ASHOKA EDICT


दिल्ली में सम्राट अशोक का शिलालेख 


सन 1966 में जब राजधानी दिल्ली में आवासीय प्रसार अपने चरम पर था तभी आवासीय कॉलोनी बनाने वाले एक ठेकेदार की नजर एक ऐसी ऐतिहासिक चट्टान पर पड़ी जिस पर कुछ चिन्हों की भाषा उत्कीर्ण थी जो अपठनीय थी। उसने तुरंत इसकी सूचना सम्बंधित अधिकारी को दी और इसके बाद पुरातत्ववेत्ताओं इस चट्टान की  जाँच की। इस जांच में उन्होंने पाया कि यह भाषा प्राचीन समय की है और यह प्राकृत अथवा ब्राह्मी लिपि थी। 

इस भाषा के अक्षर,  इससे पूर्व दिल्ली में पाए गए अशोक स्तम्भों से मेल खाती थी, साथ ही बैराट स्थित शिलालेख से इसकी समानता प्रतीत होती थी, इससे यह स्पष्ट हो गया कि यह शिलालेख सम्राट अशोक द्वारा ही उत्कीर्ण है और बाद में जब इस भाषा का अनुवाद किया गया तो फिर इसमें कोई संदेह ही नहीं बचा कि यह सम्राट अशोक का ही शिलालेख है। वर्तमान में भारतीय पुरातत्व विभाग ने इसे सम्राट अशोक के लघु शिलालेख की श्रेणी में रखा है। 

Sunday, December 22, 2019

SANCHI AND CANCER TROPIC


साँची के स्तूप और कर्करेखा 



इस यात्रा को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। 

    अपनी कलिंग विजय के दौरान जब सम्राट अशोक ने रणभूमि में भयंकर रक्तपात देखा, दोनों ओर की सेनाओं के वीर सैनिकों के शव और चारों ओर मची शोकभरी चीत्कार सुनकर उसका हृदय काँप उठा और मानसिक रूप से विचलित हो उठा। भयंकर रक्तपात और नरसंहार ने उसका सुकून छीन सा लिया था। एक राजा के लिए युद्ध लड़ना आवश्यक नहीं बल्कि उसकी मजबूरी होता है फिर चाहे वो युद्ध साम्राज्य वाद के लिए हो, अपने राज्य की रक्षा के लिए हो या फिर किसी राज्य को लूटने के उद्देश्य से हो परन्तु सम्राट अशोक के लिए इस युद्ध के पीछे क्या कारण था यह अज्ञात है किन्तु इस युद्ध के बाद उसका हृदय परिवर्तित हो गया और उसने हिंसा का मार्ग छोड़कर अहिंसा का मार्ग अपनाया और जिस धर्म ने उसे अहिंसा का मार्ग दिखलाया वह था बौद्ध धर्म। जिसकी शुरआत सम्राट अशोक ने साँची का स्तूप बनवाकर की।