MAHESHWAR FORT AND GHAT'S
महेश्वर किला और घाट
नर्मदा नदी के किनारे बसा महेश्वर एक अत्यंत ही सुन्दर पौराणिक नगर है। पुराणों के अनुसार यह प्राचीन काल में महिष्मती के नाम से विख्यात था और पौराणिक शासक सहस्त्रार्जुन की राजधानी था। इसके पश्चात सत्रहवीं शताब्दी में इसे मालवा की द्वितीय राजधानी होने का गौरव प्राप्त हुआ जब यहाँ महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने शासन किया। उन्होंने यहाँ अनेकों प्राचीन मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया और साथ अनेक नए मंदिरों का निर्माण कराया। माँ नर्मदा के किनारे एक विशाल किले के साथ ही सुन्दर रमणीक घाटों का निर्माण कराया। इस किले और घाटों का प्रतिबिम्ब नर्मदा नदी के जल में एक अलग ही आकर्षण के रूप में दिखाई देता है।
महेश्वर में माँ नर्मदा का स्वछन्द और शीतल जल मन को अति आनंदित करने वाला है, इसके किनारे के घाट यहाँ आने वाले सभी आगंतुकों का मन मोह लेते हैं। घाटों के किनारे स्थित नवीन एवं प्राचीन मंदिरों की श्रंखलाएं सनातन धर्म की महान व्याख्या का गुणगान करती हुई दिखालाई पड़ती हैं। यहाँ के मंदिरों में सुबह शाम होने वाली आरतियां और घंटे घड़ियालों की आवाजें रोम रोम में धार्मिक आस्था का भाव पैदा करती हैं। प्राचीन काल से ही महेश्वर धार्मिक गतिविधियों का केंद्र रहा है और वर्तमान में भी यह महेश्वर धाम के नाम से अपनी पहचान बनाये हुए है।
महेश्वर धाम सिर्फ एक तीर्थ स्थल ही नहीं बल्कि औद्योगिक रूप से भी प्रसिद्ध हैं। यहाँ की साड़ियां विश्व भर में पसंद की जाती हैं और यह भारत के प्रसिद्ध साड़ी निर्माण के नगरों में से एक है। माता अहिल्याबाई होल्कर ने गुजरात के प्रसिद्ध वस्त्र कारीगरों और बुनकरों को महेश्वर में बसाया और महेश्वर के निवासियों के लिए रोजगार सुलभ कराया। तभी से महेश्वर की साड़ियां देश विदेशों में प्रसिद्ध हुईं और यह वर्तमान में भी अपनी प्रसिद्धि कायम रखे हुए है।
महेश्वर के दर्शनीय स्थलों में सबसे प्रमुख नर्मदा नदी के किनारे पर स्थित यहाँ के घाट हैं इसके अलावा प्राचीन काल के मंदिर जिनमें राज राजेश्वर अथवा सहस्त्रार्जुन महादेव मंदिर, काशी विश्वेश्वर मंदिर, विष्णु मंदिर और अन्य छोटे मंदिर हैं। महेश्वर का किला भी ऐतिहासिक रूप से प्रसिद्ध है और दर्शनीय है। नर्मदा नदी के किनारे होल्कर वंश के शासकों की छतरियां भी दर्शनीय हैं जिनमें सबसे प्रमुख माता अहिल्याबाई होल्कर की छतरी है। महेश्वर से कुछ दूरी पर सहस्त्रधारा नामक स्थान है नर्मदा नदी में स्थित है यहाँ नर्मदा का जल विभिन्न प्रकार से अलग अलग धाराओं के रूप में बहता है।
हमारी यात्रा
जाम गेट देखने के बाद मैं और सोहन भाई अपनी बाइक द्वारा विंध्याचल पर्वत से धीरे धीरे नीचे उतरने लगे। हम अब मालवा की सीमा से निकलकर निमाड़ प्रान्त की सीमा में प्रवेश करने जा रहे थे, जल्द ही घाट समाप्त हो गए और हम पर्वतीय मार्गों से निकलकर मैदानी क्षेत्र में आ गए। अब वनों और जंगलों के स्थान पर चारों तरफ हरे भरे खेत दिखाई देने लगे थे रास्ता बिल्कुल समतल था और जल्द ही हम महेश्वर की सीमा के निकट पहुंचे।
अब शाम भी हो चली थी, रास्ते में एक दुकान पर हम कुछ देर के लिए रुके और यहाँ हमने जाम 'ए' शाम का आनंद लिया। दुकानदार ने हमें यहाँ मिलने वाली ताड़ी के बारे में बताया। सोहन भाई पहली बार ताड़ी का स्वाद चखना चाहते थे इसलिए उन्होंने दुकानदार से ताड़ी लाने की मांग की। दुकानदार ने यहाँ के एक निवासी को हमारी बाइक देकर पास के गाँव में ताड़ी लाने के लिए भेजा किन्तु कुछ समय बाद वह खाली हाथ लौटा।
यहाँ मिलने वाली ताड़ी, नजदीकी गाँव में ही भट्टी पर तैयार होती है पर उन भट्टी वालों ने उसे ताड़ी नहीं दी। इसबार सोहन भाई उस आदमी के साथ उसी गाँव में पहुंचे और वापस ताड़ी लेकर ही लौटे। ताड़ी एक नशीला तरल द्रव्य पदार्थ होता है जो यहाँ के पेड़ों से प्राप्त किया जाता है। इसमें किसी भी व्यक्ति को मदहोश करने की क्षमता होती है इसी वजह से इसका अधिकतर लोगों द्वारा सेवन किया जाता है।
रात होने तक हम महेश्वर पहुँच चुके थे, पूरे दिन की थकान और ताड़ी के प्रभाव ने हमें नींद के वशीभूत कर दिया था किन्तु भूख अभी तक हमें नींद के आगोश में समाने से रोक रही थी। इसलिए हमने सबसे पहले यहाँ ठहरने की व्यवस्था देखी। महेश्वर के मुख्य चौराहे के नजदीक ही अजंता लॉज बना है, यहीं हमने 250 \- का कमरा लिया और हाथ मुंह धोकर खाना खाने के लिए निकल गए। चौराहे के नजदीक अनेकों भोजनालय और होटल थे, एक सरदार जी के होटल में हम स्वादिष्ट खाना खाकर अपने लॉज लौट आये और यही रात्रि विश्राम किया। इस लॉज में ही एक सिनेमा हॉल भी था जिसमें अभी अखण्डा मूवीज चल रही थी। हमने अपनी बाइक इसी हॉल की पार्किंग में खड़ी कर दी।
अगली सुबह पांच बजे मैं और सोहन भाई नहा धोकर तैयार हो गए और महेश्वर घाट और नर्मदा दर्शन हेतु पैदल पैदल ही नदी की और निकल पड़े। सर्वप्रथम हमें महेश्वर किले का मुख्य द्वार दिखाई दिया और इसमें प्रवेश करते ही हम महेश्वर किले के अंदर आ गये। यह किला आवासीय किला है और इसमें अनेकों घर मकान बने हुए थे। घरों के अलावा किले के परिसर में प्राचीन मंदिर भी दिखलाई देते हैं। किले के ठीक पीछे नर्मदा नदी बहती है, हम किले में घूमते घूमते प्राचीन मंदिर राजराजेश्वर के निकट पहुंचे।
यह महेश्वर का सबसे प्राचीन शिव मंदिर है, इसे सहस्त्रार्जुन मंदिर भी कहते हैं क्योंकि यहाँ प्राचीन काल में हैहय वंश के महाप्रतापी शासक माहिष्मती नरेश कार्तवीर्य अर्जुन ने भगवान शिव की पूजा अर्चना की है। कार्तवीर्य अर्जुन को सहस्त्र भुजाओं का वरदान प्राप्त था इसलिए उन्हें सहस्त्रबाहु अथवा सहस्त्रार्जुन भी कहा जाता है।
इसी मंदिर के प्रांगण में और भी अनेकों सुन्दर मंदिर बने हुए हैं, हमने यहाँ सभी मंदिरों के दर्शन किये और यहाँ से थोड़ा सा आगे काशी विश्वेश्वर मंदिर पहुंचे। इस मंदिर का जीर्णोद्धार माता अहिल्याबाई होल्कर ने करवाया था। मंदिर की वास्तुकला में होल्कर स्थापत्य शैली स्पष्ट रूप से दिखलाई देती है। मंदिर के प्रांगण से नर्मदा नदी के सुन्दर दर्शन होते हैं।
इस मंदिर को देखने के बाद हम महेश्वर के घाटों पर आ गए, किले के दरवाजे से नर्मदा नदी के किनारे तक पत्थरों की शानदार सीढ़ियां निर्मित हैं। माँ नर्मदा के सुबह सुबह हमने दर्शन करके हम कुछ देर घाटों का भ्रमण करते रहे। इन्हीं घाटों पर प्रसिद्ध अभिनेता अक्षय कुमार की पैड मैन फिल्म की शूटिंग हुई थी। फिल्म में महेश्वर के इन्हीं घाटों को दिखाया गया है।
घाटों पर कुछ देर सैर करने के बाद हम महेश्वर के बाजारों में पहुंचे और हमने यहाँ विभिन्न तरह की दुकानें देखीं। बाजार अभी खुला ही था, चौराहे पर पहुंचकर हमने सुबह का हल्का फुल्का नाश्ता किया और वापस लॉज पहुंचे। कमरा समर्पण करने के बाद हमने पार्किंग से अपनी बाइक उठाई तो देखा इसका अगला पहिया फिर से पंचर हो चुका था, इससे पहले यह इंदौर में पंचर हुआ था।
खैर, चौराहे पर हामिद मियां की पंचर की दुकान थी, वहां पहुंचे। हामिद मियां ने ट्यूब की हालत देखकर नया ट्यूब डलवाने की सलाह दी। इस ट्यूब में पहले से ही काफी पंचर थे, हालांकि यह बाइक हमारी नहीं थीं किन्तु इस बाइक से अभी हमें मांडू की यात्रा भी करनी थी और उसके बाद वापस इंदौर होते हुए उज्जैन तक पहुंचना था। इसलिए बिना कोई संकोच किये सोहन भाई ने नए ट्यूब को डलवाने पर अपनी सहमति दे दी। 300 रूपये का नया ट्यूब डलवाने के बाद हम पंचर की टेंशन से मुक्त हो गए और अपनी अगली यात्रा पर बढ़ चले, किन्तु उससे पूर्व हम सहस्त्रधारा पहुंचे जहाँ हमने माँ नर्मदा को अनेकों धाराओं में विभक्त रूप से बहते हुए देखा।








































































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