Friday, September 1, 2023

KURUKSHETRA 2023 : BRAHM KUND

 

ब्रह्म सरोवर 


कुरुक्षेत्र में स्थित ब्रह्म सरोवर, आध्यात्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऐसा माना जाता है कि सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा ने यहीं प्रथम यज्ञ किया था, जो सृष्टि की उत्पत्ति का प्रतीक है। ब्रह्म सरोवर का शांत और दिव्य वातावरण, तीर्थयात्रियों और पर्यटकों को आकर्षित करता है, सूर्य ग्रहण और धार्मिक त्योहारों के दौरान  इसके जल में स्नान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। 

अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव के दौरान भी यह स्थान आकर्षण का केंद्र बन जाता है , जब हजारों भक्त भगवद् गीता की शाश्वत शिक्षाओं को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए एकत्रित होते हैं। सुंदर ढंग से सजाए गए घाट, संध्या आरती और सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ इस अवसर की भव्यता को और बढ़ा देती हैं। वर्षों से, ब्रह्म सरोवर सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के केंद्र के रूप में विकसित हुआ है, जो पवित्रता, शांति और भारत की शाश्वत आध्यात्मिक विरासत का प्रतीक है।

हरियाणा के कुरुक्षेत्र में स्थित प्रसिद्ध ब्रह्मसरोवर लगभग 3600 फीट लंबा और 1500 फीट चौड़ा है। यह विशाल मानव निर्मित सरोवर लगभगके क्षेत्र में फैला हुआ है। इसकी गहराई लगभग 45 फीट है और यह एशिया के सबसे बड़े सरोवरों में से एक माना जाता है।

थानेसर स्टेशन से ब्रह्म सरोवर बहुत ही नजदीक है, इसलिए मैं पैदल ही यहाँ पहुँच गया और इसकी विशालता को देखकर ठहर सा गया। माना जाता है इसी सरोवर के निकट ही महाभारत के युद्ध का मैदान था जहाँ यह युद्ध लड़ा गया था। महाभारतकालीन अनेकों अवशेष यहाँ से प्राप्त होते रहे हैं। मैंने इस सरोवर में स्नान किया और फिर मैं आगे घूमने बढ़ चला। सरोवर के मध्य में भगवान् शिव का प्राचीन मंदिर है जिसे सर्वेश्वर मंदिर के नाम से जाना जाता है। भगवन शिव के दर्शन करने के पश्चात मैं आगे बढ़ चला। 

भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन का रथ, इस स्थान के महत्त्व को और बढ़ा देते हैं। यह देखने में सचमुच का ही प्रतीत होता है। रथ को देखकर ही महाभारत के युद्ध का आभास सा होने लगता है, हजारों वीर योद्धाओं से सजी यह धरती उस समय कैसी रही होगी,  इसकी सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है। 

यही से कुछ दूरी पर प्राचीन भवन के अवशेष दिखाई देते हैं, इसे द्रोपदी कुआँ के नाम से जाना जाता है। यहाँ एक प्राचीन कुआँ है जिसके बारे में मान्यता है कि युद्ध के पश्चात द्रोपदी ने यहीं इसी कुए के जल से अपने केशों को धोया था। इसके बराबर में ही खाटू श्याम जी का मंदिर है, खाटू श्याम जी महाभारत के बर्बरीक थे जिन्होंने अपना शीश काटकर भगवान श्री कृष्ण को भेंट किया था।  














































इस यात्रा के अन्य भाग 


Thursday, August 31, 2023

MATHURA TO THANESAR : KURUKSHETRA 2023

 मथुरा से थानेश्वर - एक रेल यात्रा 


सितम्बर का महीना चल रहा है जिसका मतलब ना अधिक सर्दी है और ना अधिक गर्मी है और अब बरसात भी थम सी चुकी है। यह यात्रा करने का सर्वोत्तम समय है इसलिए मैंने इस बार हरियाणा की यात्रा को महत्त्व देते हुए कुरक्षेत्र की यात्रा का मन बनाया। यहाँ प्रसिद्ध रणभूमि है जहाँ महाभारत का विशाल युद्ध हुआ था, यहीं भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को श्रीमद भगवद गीता का ज्ञान दिया था। इस पुण्य स्थान की यात्रा मेरे ब्लॉग में होनी चाहिए थे इसलिए मैंने इस यात्रा को पूर्ण किया। 

शाम को मैं मथुरा रेलवे स्टेशन पहुंचा और आगरा छावनी से होशियारपुर जाने वाली ट्रैन में बैठा। रात बारह एक बजे अम्बाला पहुँच गया क्योंकि यह ट्रैन कुरुक्षेत्र पर नहीं रुकी। अम्बाला से कुरक्षेत्र वापसी के लिए मैं कालका मेल में बैठा जिसमे टिकट चल दस्ते वालों ने मुझसे मेरा टिकट माँगा। चूँकि मैं सिर्फ कुरुक्षेत्र तक जा रहा था, इसलिए स्टाफ बोलकर उनसे बैठने की रिक्वेस्ट की। उन्होंने मुझसे कुछ नहीं कहा। 

मैं कुरुक्षेत्र उतरगया, अभी सुबह होने में काफी समय था इसलिए यहीं प्लेटफॉर्म पर एक बेंच पर सो गया। अगली सुबह जब उठा तो कैथल जाने वाली पैसंजर तैयार खड़ी हुई थी। इसी ट्रेन से मैं थानेसर आ गया जो ब्रह्म कुंड के बिलकुल नजदीक था। 


















अगला भाग - ब्रह्म सरोवर 

इस यात्रा के अन्य भाग 

Saturday, August 12, 2023

AGRA : KAFUR MOSQUE & STONE HORSE


आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 5


  काफूर की मस्जिद और पत्थर के घोड़े की प्रतिमा 



आगरा-मथुरा हाईवे (सिकंदरा) पर स्थित काफूर की मस्जिद (या इतिबारी खां की मस्जिद) के पास एक रहस्यमयी पत्थर का घोड़ा (लाल बलुआ पत्थर की मूर्ति) स्थित है। 
1605-1623 ईस्वी के बीच निर्मित यह स्थल, जहांगीर के वफादार दरबारी इतिबारी खां द्वारा संत ख्वाजा काफूर के सम्मान में बनवाया गया था, जहां घोड़े की मूर्ति को अकबर के प्रिय घोड़े का स्मारक माना जाता है।

AGRA : JASWANT SINGH CHHATRI

आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 4

जसवंत सिंह की छतरी

 


जसवंत सिंह की छतरी 

 राजस्थानी वास्तुकला की एक विशिष्ट शैली में निर्मित गुंबददार स्तंभों वाला मंडपनुमा स्मारक है, जिसका निर्माण लगभग 1644-58 ईस्वी में जसवंत सिंह राठौर ने अपने बड़े भाई अमर सिंह राठौर की पत्नी रानी हाड़ा की स्मृति में करवाया था। यह छतरी आगरा में यमुना नदी के किनारे राजवाड़ा, बलकेश्वर में स्थित है । अब इसका संरक्षण भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा राष्ट्रीय महत्व के स्मारक के रूप में किया जाता है।


यह मुगलिया स्थापत्य के बीच हिंदू-राजपूत कला (लाल बलुआ पत्थर) का प्रतीक है, जिसका संबंध अमर सिंह राठौड़ से है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित, यह स्थान कभी मनोहर बाग का हिस्सा था

 यह स्मारक राजा जसवंत सिंह द्वारा बनवाया गया था और इसका इतिहास वीर अमर सिंह राठौड़ से जुड़ा है, जिन्होंने शाहजहाँ के दरबार में मीर बख्शी सलाबत खां को मार गिराया था। 

यह लाल बलुआ पत्थर से निर्मित है और इसमें हिंदू-मुगल मिश्रित वास्तुकला की झलक मिलती है, जिसमें बुर्ज, सुंदर छतरियां, और नाजुक जाली वर्क शामिल है। 

यह एएसआइ द्वारा संरक्षित है, लेकिन अब उपेक्षित है और इसके आसपास अवैध निर्माण हो चुके हैं।

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यहाँ अमर सिंह राठौड़ की पत्नी सती हुई थीं, और स्थानीय महिलाएँ यहाँ पूजा करने आती हैं।

AGRA : CHINI KA ROZA

 आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 3

चीनी का रोज़ा


इसे चाइना टॉम्ब के नाम से भी जाना जाता है, यह अफजल खान का मकबरा है जो जहांगीर के शासनकाल में एक फारसी कवि थे, बाद में वे शाहजहाँ के शासनकाल में वज़ीर बने। अफजल खान की मृत्यु 1639 में लाहौर में हुई और उन्हें आगरा में यहीं दफनाया गया। यह मकबरा मक्का शहर की ओर मुख करके बनाया गया है 

मुल्ला शुक्रुल्लाह शिराज़ी (1570–1639), जिन्हें 'अफ़ज़ल ख़ान' के शाही ख़िताब से जाना जाता था, जहाँगीर और शाहजहाँ के शासनकाल के दौरान मुग़ल दरबार के एक दरबारी थे।उन्होंने एक विद्वान के रूप में ख्याति अर्जित की और 1628–1639 की अवधि के दौरान मुग़ल साम्राज्य के 'वज़ीर-ए-आज़म' (Grand Vizier) के पद तक पहुँचे।

अफ़ज़ल खान का जन्म सफ़वी ईरान के शिराज़ में हुआ था, जहाँ उनके पिता फ़ार्स में एक छोटे राजस्व संग्राहक थे। उनके पिता के दो भाई ईरान में वित्तीय पदों पर कार्यरत थे, जबकि दो अन्य ईरान और भारत के बीच व्यापार में लगे हुए थे। 

अफ़ज़ल खान का एक भाई था, जिसका नाम अमानत खान था; वह बाद में उनके साथ भारत आया और ताजमहल पर सुलेखन (calligraphy) के रूप में लिखे गए अभिलेखों को डिज़ाइन करने के लिए प्रसिद्ध हुआ। अफ़ज़ल खान ने लेखन-कला से संबंधित विषयों, जैसे कि सुलेख, लेखा-जोखा और गद्य-रचना में शिक्षा प्राप्त की थी। उनके शुरुआती शिक्षकों में से एक विद्वान तक़ी अल-दीन मुहम्मद शिराज़ी थे।

AGRA : MEHTAB BAGH & ELEVEN STAIRES




आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 2 

मेहताब बाग़ और ताजमहल का एक दृश्य 

       यूँ तो मैं बचपन से ही आगरा शहर में रहा किन्तु कभी ताजमहल को यमुना के दूसरी पार से देखने का मौका नहीं मिला, कारण था इस स्थान की दूरी, और यहाँ जाने वाला रास्ता जिसके बारे में मुझे कोई विशेष जानकारी नहीं थी। जब कभी ताजमहल देखने का मन होता था तो इसके मुख्य द्वार से ही इसे जाकर देख आता था। किन्तु आगरा शहर छोड़ने के अनेक वर्षों बाद अपने पुराने शहर को घूमने की इच्छा मन में जाग्रत हुई और मैं अपनी बाइक उठकर निकल चला आगरा की ऐतिहासिक यात्रा पर। 

    इस यात्रा के तहत मैंने आगरा के उन स्थानों को चिन्हित किया जो मैंने पहले कभी नहीं देखे थे। इसलिए सबसे पहले मैं पहुंचा यमुना नदी के दूसरी पार, जहाँ आगरा की विभिन्न मध्यकालीन ऐतिहासिक इमारतें देखीं जा सकती थीं। 

    इन सभी स्थलों में सबसे मुख्य था मेहताब बाग़, जो मुगलकाल का एक शानदार बगीचा था। इसका निर्माण औरंगजेब ने अपने शासनकाल के दौरान कराया था। इस बगीचे से ताजमहल का बहुत ही शानदार दृश्य दिखाई देता है बिलकुल वैसे ही, जैसे हम इसे ताज के परिसर में प्रवेश करने के बाद देखते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि मेहताब बाग़ से आप सिर्फ ताजमहल को निहार सकते हैं, इसके ख़ूबसूरती को महसूस कर सकते हैं, यमुना नदी के जल में इसका प्रतिबिम्ब देख सकते हैं किन्तु आप इसे छू नहीं सकते, इसके नजदीक नहीं जा सकते हैं क्योंकि मेहताब बाग़ और ताजमहल के बीच यमुना नदी है और यहाँ इसे पार करने की इजाजत नहीं है। 

AGRA : AGRA FORT


आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 1 

आगरा किला 



 आगरा किले का इतिहास


माना जाता है कि आगरा किले का निर्माण मुग़ल शासक अकबर ने करवाया था किन्तु उससे पूर्व भी आगरा किले के अस्तित्व में होने के कुछ उदाहरण मिलते हैं जिनके बाद स्पष्ट हो जाता है कि अकबर ने इस किले का निर्माण नहीं बल्कि इसके स्थान पर बने पुराने किले की मरम्मत कराकर इसे एक नया रूप दिया था। 

इससे पूर्व यह एक ईंटों का किला था, जो सिकरवार वंश के राजपूतों के पास था। इसका प्रथम विवरण 1080 ई० में आता है जब महमूद गजनवी की सेना ने इस पर कब्ज़ा किया था। 

सिकंदर लोदी (1487-1517), दिल्ली सल्तनत का प्रथम सुल्तान था जिसने आगरा की यात्रा की तथा इस किले की मरम्म्त 1504 ई० में करवायी और इस किले को अपने निवास के रूप में चुना। सिकंदर लोदी ने इसे 1506 ई० में राजधानी बनाया और यहीं से देश पर शासन किया। उसकी मृत्यु भी इसी किले में 1517 में हुई थी। 

बाद में उसके पुत्र इब्राहिम लोदी ने भी नौ वर्षों तक इस किले से राज्य किया, जब तक वो पानीपत के प्रथम युद्ध (1526) में बाबर द्वारा मारा नहीं गया। उसने अपने काल में यहां कई स्थान, मस्जिदें व कुएं बनवाये जो आज भी आगरा में विभिन्न स्थानों पर दृष्टिगोचर होते हैं। 

पानीपत के युद्ध के बाद मुगलों ने इस किले पर कब्ज़ा कर लिया साथ ही इसकी अगाध सम्पत्ति पर भी। इस सम्पत्ति में ही एक हीरा भी था जो कि बाद में कोहिनूर हीरा के नाम से प्रसिद्ध हुआ। तब इस किले में इब्राहिम के स्थान पर बाबर आया। उसने यहां एक बावली बनवायी। 

सन 1530 में आगरा किले में हुमायुं का राजतिलक भी हुआ। हुमायुं इसी वर्ष बिलग्राम में शेरशाह सूरी से हार गया व किले पर उसका कब्ज़ा हो गया। इस किले पर अफगानों का कब्ज़ा पांच वर्षों तक रहा, जिन्हें अन्ततः मुगलों ने 1556 में पानीपत का द्वितीय युद्ध में हरा दिया।

Sunday, July 30, 2023

MANDU : A Historical Empire of Malwa

 MANDU - A CAPITAL OF MALWA

मालवा की प्राचीन और मध्य कालीन राजधानी - माण्डू 


मालवा प्रान्त के विंध्याचल पर्वतमाला की गोद में स्थित मांडू प्राकृतिक रूप से बहुत ही सुन्दर स्थान है। इसके शांत वातावरण और आश्चर्य चकित कर देने वाले प्राकृतिक दृश्यों की वजह से यह अनेकों भारतीय राजाओं का पसंदीदा स्थल रहा है। मानसून के समय यहाँ फैली हरियाली और सुगन्धित वायु, अनायास ही मन को मोह लेती है। इसके अलावा विंध्य पर्वतों के बीच स्थित होने के कारण यह सुरक्षा की दृष्टि से भी सक्षम स्थान है इसीलिए प्राचीन काल से लेकर मध्य काल तक यह अनेकों राजवंशो की शरण स्थली और राजधानी रहा है। 

दसवीं शताब्दी में यहाँ परमार वंश के शासकों का शासन रहा, जिनमें मुंज राज, सिद्धराज और राजा भोज का नाम प्रमुख है। हालाँकि इन शासकों की राजधानी धारा नगरी थी जो वर्तमान में धार जिला है, फिर भी उन्होने मांडू को भी अपना मुख्य राजनितिक केंद्र बनाये रखा था। 

MAHESHWAR FORT


 MAHESHWAR FORT AND GHAT'S

महेश्वर किला और घाट 


30 JUL 2023

    नर्मदा नदी के किनारे बसा महेश्वर एक अत्यंत ही सुन्दर पौराणिक नगर है। पुराणों के अनुसार यह प्राचीन काल में महिष्मती के नाम से विख्यात था और पौराणिक शासक सहस्त्रार्जुन की राजधानी था। इसके पश्चात सत्रहवीं शताब्दी में इसे मालवा की द्वितीय राजधानी होने का गौरव प्राप्त हुआ जब यहाँ महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने शासन किया। उन्होंने यहाँ अनेकों प्राचीन मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया और साथ अनेक नए मंदिरों का निर्माण कराया। माँ नर्मदा  के किनारे एक विशाल किले के साथ ही सुन्दर रमणीक घाटों का निर्माण कराया। इस किले और घाटों का प्रतिबिम्ब नर्मदा नदी के जल में एक अलग ही आकर्षण के रूप में दिखाई देता है। 

     महेश्वर में माँ नर्मदा का स्वछन्द और शीतल जल मन को अति आनंदित करने वाला है, इसके किनारे के घाट यहाँ आने वाले सभी आगंतुकों का मन मोह लेते हैं। घाटों के किनारे स्थित नवीन एवं प्राचीन मंदिरों की श्रंखलाएं सनातन धर्म की महान व्याख्या का गुणगान करती हुई दिखालाई पड़ती हैं। यहाँ के मंदिरों में  सुबह शाम होने वाली आरतियां और घंटे घड़ियालों की आवाजें रोम रोम में धार्मिक आस्था का भाव पैदा करती हैं। प्राचीन काल से ही महेश्वर धार्मिक गतिविधियों का केंद्र रहा है और वर्तमान में भी यह महेश्वर धाम के नाम से अपनी पहचान बनाये हुए है। 

Saturday, July 29, 2023

JAM GATE

 

JAM GATE

जाम गेट 

29 JUL 2023

पातालपानी जलप्रपात और चोरल बांध देखने के बाद हम महू - मंडलेश्वर मार्ग पर आ गए थे। पूरा रास्ता जंगली वनों से घिरा हुआ था।  यह रास्ता मालवा को निमाड़ प्रान्त से जोड़ने का कार्य करता है। अभी हम विंध्याचल पर्वतमाला के उच्च पठारी भाग में थे। रास्ते में छोटी जाम के नाम से एक गाँव आया जहाँ हमने कुछ समय रुकने के लिए एक दुकान पर ठहरे।  दुकानदार ने हमारे घूमने के उद्देश्य को जानकर बतलाया कि इस गांव में जाम किला है उसे आप देखकर आ सकते हो। यह किला हमें सड़क से स्पष्ट दिखाई दे रहा था। हम बिना देर किये इस किले की तरफ बढ़ चले। 

इस किले को छोटी जाम के नाम से जाना जाता है। किले से थोड़ी दूर प्रसिद्ध पर्यटक स्थल जाम गेट है जिसका निर्माण इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने सन 1791 में कराया था। महेश्वर स्थित अपने किले से वह जब भी पालकी द्वारा इंदौर आया करती थीं तो यह जाम किला ही उनका रात्रि विश्राम स्थल हुआ करता था। जाम किले अथवा गांव से थोड़ी दूर जाम गेट एक भव्य दरवाजा है जहाँ से पर्वतों की तराई में स्थित सम्पूर्ण निमाड़ प्रान्त का विहंगम दृश्य देखा जा सकता है। 

PATALPANI WATERFALL

पातालपानी जलप्रपात 

PATALPANI WATERFALL

29 JUL 2023

    मालवा प्रान्त में इंदौर के निकट एक बहुत ही खूबसूरत जलप्रपात है। यह पातालपानी ग्राम के निकट है इसलिए इसे पातालपानी जलप्रपात कहते हैं। चोरल नदी जब यहाँ 300 फ़ीट की ऊँचाई से नीचे गिरती है तो यह एक प्राकृतिक सुन्दर जलप्रपात का निर्माण करती है। वर्तमान में यह ट्रैकिंग और पिकनिक स्थल के रूप में पर्यटकों का एक पसंदीदा स्थल बनकर उभरा है। 

    ब्रिटिश काल के दौरान इस जलप्रपात के नजदीक से अंग्रेजों ने रेल ट्रेक का निर्माण किया और इसी जलप्रपात के नाम से रेलवे स्टेशन का भी निर्माण कराया। वर्तमान में यह रेलवे स्टेशन जलप्रपात से थोड़ी दूर स्थित है किन्तु जब यहाँ से ट्रैन गुजरती थी तब ट्रेन से भी इस जलप्रपात को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता था। 

    मैं और सोहन भाई इंदौर के रशिया ढाबे से खाना खाकर और मोबाइल चार्ज करने के बाद महू क्षेत्र में पहुंचे। यूँ तो महू, डॉ. भीमराव अम्बेडकर का जन्मस्थान है साथ ही यह इंदौर नगर का छावनी क्षेत्र भी है। छावनी क्षेत्र से निकलकर हम जाम गेट की तरफ बढ़ रहे थे कि अचानक सोहन भाई को पातालपानी जलप्रपात की तरफ जाने वाला एक एक मार्गसूचक पट दिखाई दिया, भाई ने गाडी पातालपानी की तरफ घुमा दी और बहुत ही शानदार रास्तों से होकर शीध्र ही हम पातलपानी जलप्रपात की तरफ पहुंचे। 

UJJAIN CITY AND KSHIPRA RIVER

 अवंतिका से मालवा की एक मानसूनी यात्रा - भाग 1 

उज्जैन में रामघाट पर क्षिप्रा स्नान 

यात्रा दिनाँक : - 29 जुलाई 2023 

    मानसून का मौसम यात्रा करने के लिए सबसे उपयुक्त और बेहद सुहावना मौसम होता है। मानसून के दौरान किसी भी स्थान की सुंदरता अपने पूर्ण चरम पर होती है और यही सुंदरता एक सैलानी के मन को यात्रा के दौरान उत्साह और आनंद से भर देती है। हम इसी मानसून में गत माह कोंकण और मालाबार की यात्रा पर गए थे जहाँ हमने केरला की राजधानी तिरुवनंतपुरम तक की यात्रा पूर्ण की थी, 

इसी यात्रा में वापसी के दौरान हम केरल के मालाबार तट, पुडुचेरी के माहे नगर, कर्नाटक के मुरुदेश्वर, गोवा की राजधानी पणजी और ओल्ड गोवा एवं कोंकण रेलवे की यात्रा पूर्ण करके घर वापस लौटे थे। किन्तु मानसून अभी भी बरक़रार था और यह हमें फिर से उत्साहित कर रहा था एक और नई यात्रा करने के लिए। 

...  

   मैं पिछले कई वर्षों से मानसून के दौरान प्राचीन राज्य मालवा और इसकी मध्यकालीन राजधानी मांडू की यात्रा करना चाहता था। ऑफिस में बैठे बैठे मैंने इस यात्रा का प्लान तैयार किया और अपने सहकर्मी सोहन भाई को इस यात्रा में अपना सहयात्री चुना। सोहन भाई इस यात्रा के लिए तुरंत तैयार हो गए और हमारा यात्रा प्लान अब कन्फर्म हो गया। 

मैंने इस यात्रा को प्राचीन अवन्ति, अर्थात उज्जैन से शुरू करके इंदौर, महेश्वर और मांडू तक पूरा करने का निर्णंय लिया जिसमें अधिकांश मालवा का भाग शामिल था। वर्तमान में यह मध्य प्रदेश कहलाता है, और प्राकृतिक सुंदरता से परिपूर्ण एवं  अनुपम दृश्यों से भरपूर है। 

Saturday, July 1, 2023

KERLA SAMPARK KRANTI EXP : MAO TO MTJ

 UPADHYAY TRIPS PRESENT'S

 कोंकण V मालाबार की मानसूनी यात्रा पर - भाग 15 

केरला संपर्क क्रांति एक्सप्रेस - मडगांव से मथुरा 

1 जुलाई 2023 

हम शाम होने तक मडगांव रेलवे स्टेशन आ गए थे। यहाँ से हमारा रिजर्वेशन मंगला लक्षद्वीप एक्सप्रेस में था, जो रात को दो बजे के लगभग यहाँ आएगी। अभी रात के नौ बजे हैं, हम प्लेटफॉर्म पर बने खानपीन की स्टॉल पर गए और यहाँ कुछ इडली और डोसा खाकर हमने अपने रात्रिभोज को पूर्ण किया, इसके बाद क्लॉक रूम से अपना बैग लेकर अब घर लौटने की तैयारी करने लगे। अब हम अपनी यात्रा के अंतिम चरण में थे, और गोवा आकर हमारी यात्रा पूर्ण हो चुकी थी, अब वापसी यात्रा की बारी थी। 

तभी रेलवे से सन्देश प्राप्त हुआ कि मंगला एक्सप्रेस में हमारी सीट आरएसी में ही रह गई थी। अब ट्रेन बदलने की प्लानिंग मेरे दिमाग में और तेज हो गई। दरअसल मंगला एक्सप्रेस में मुझे RAC सीट मिली जो मेरे लिए पर्याप्त नहीं थी, मंगला एक्सप्रेस वाया भुसावल, भोपाल होकर मथुरा आती है, इस वजह से यह एक लम्बी यात्रा करती है जिसमें समय भी बहुत अधिक लगता है। 

मैंने मोबाइल में रेलवे ऍप्स क्रिस पर यहाँ से दिल्ली जाने वाली गाड़ियों के बारे में जानकारी ली जिसमें मुझे पता चला रात को साढ़े बारह बजे तक केरला संपर्क क्रांति एक्सप्रेस आ रही है जो सीधे दिल्ली जाने के लिए एक सुपरफास्ट ट्रेन है। इसका चार्ट बन चुका था, इसलिए इसमें तत्काल में भी रिजर्वेशन करना संभव नहीं था। 

अतः एप्प में मैने ट्रेन की कोच पोजीशन देखी, जिसमें ट्रेन के अंत में अनेकों सामान्य कोच थे, और इसके बाद इस ट्रेन का शेडूअल देखा। मैंने दो सामान्य टिकट कोटा स्टेशन तक के लिए ले ली, क्योंकि कि इस ट्रेन का स्टॉप कोटा के बाद सीधे निजामुद्दीन ही था, यह मथुरा नहीं रुकने वाली ट्रेन है। इसलिए मैंने इस ट्रेन से कोटा तक आने का विचार किया था, उसके बाद वहाँ से तो मथुरा की अनेकों ट्रेनें हैं, कोई न कोई तो मिल ही जाएगी। मंगला एक्सप्रेस की टिकट कैंसल कर दी और अब केरल संपर्क क्रांति एक्सप्रेस से हमारी यात्रा निश्चित हो गई। 

ST. AUGUSTIN CHURCH

 UPADHYAY TRIPS PRESENT'S

 कोंकण V मालाबार की मानसूनी यात्रा पर - भाग 14 

सेंट ऑगस्टीन गिरिजाघर और उसके खंडहर - ओल्ड गोवा 

1 JULY 2023

प्राचीन मंदिर और उनके खंडहरों के अवशेष तो मैंने अब तक अपनी अनेकों यात्राओं में देखे थे, किन्तु आज पहलीबार मैंने अपनी इस गोवा की एक दिवसीय यात्रा के दौरान एक पुरानी चर्च के खंडहरों और उसके अवशेषों को देखा। यह चर्च ओल्ड गोवा में एक ऊँचे टीले पर स्थित थी, जब मैं यहाँ पहुंचा तो जाना यह सेंट ऑगस्टीन चर्च थी जो प्रकृति के कहर और पुर्तगाली शासन की उपेक्षाओं का शिकार हुई। 

इस चर्च का निर्माण सोलहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में सेंट ऑगस्टीन भिक्षुओं ने करवाया था, वर्तमान में यह जिस टीले पर स्थित है, उस टीले को पवित्र पहाड़ी माना जाता है। अठाहरवीं शताब्दी में शहर में महामारी फैलने के बाद पूरा शहर वीरान हो गया, शहर के साथ साथ तत्कालीन सरकार और यहाँ के लोगों ने इस चर्च को भी त्याग दिया जिसके बाद बिना देख रेख के यह जीर्ण अवस्था को प्राप्त होने लगी, अंतत सन 1931 में इसका मुख्य द्वार आधी मीनार के साथ ध्वस्त हो गया। इसके ध्वस्त होने से पूर्व ही यहाँ लगी घंटी को पणजी की आवर लेडी ऑफ़ था इमेक्यूलेट कॉन्सेप्शन चर्च में स्थानांतरित कर दिया गया था जो वर्तमान में उपलब्ध है। 

GOA TRIP 2023 : MADGAON TO PANJIM


गोवा में एक दिवसीय यात्रा 

1 JULY 2023         

मडगांव से पोंडा - बस यात्रा 

    तेज बारिश के बीच गत रात्रि मडगांव स्टेशन पर सोने के बाद, अगली सुबह हम गोवा घूमने के लिए तैयार थे। यह गोवा में हमारी पहली यात्रा थी। मडगाव स्टेशन के क्लॉक रूम में अपना बैग जमा करने के बाद, हम बतौर सामान स्वतंत्र थे, और फिर स्टेशन के बाहर निकले। 

  कोंकण रेलवे का मडगाव स्टेशन गोवा का एक मुख्य रेलवे जंक्शन स्टेशन है। बारिश के मौसम में स्टेशन के बाहर का दृश्य बहुत ही सुहावना लग रहा था। मुझे जानकारी थी कि यहाँ घूमने के लिए आसानी से बाइक किराये पर मिल जाती हैं। मैं एक ऐसी ही बाइक की तलाश में था, किन्तु स्टेशन के बाहर मुझे कोई बाइक नहीं मिली। 

  स्टेशन के बाहर ही एक बस स्टॉप था जहाँ हम काफी देर तक खड़े रहे किन्तु कोई भी बस नहीं आई। बस की प्रतीक्षा करते हुए, बारिश अवश्य आ गई, इसलिए बिना देर किये एक ऑटो द्वारा हम गोवा के सेंट्रल बस स्टैंड पहुंचे। बस स्टैंड पहुँचने से पूर्व ऑटो वाले ने हमें दो तीन बाइक रेंट वाली दुकानों पर भी मिलवाया किन्तु वे लोग बतौर एक दिन किराये पर बाइक देने के लिए तैयार नहीं थे। बारिश के मौसम और अनजान शहर को देखकर हमने किराये की बाइक लेने का निर्णय त्याग दिया। 

Friday, June 30, 2023

MATSAYGANDHA EXPRESS : MRDW TO MAO

UPADHYAY TRIPS PRESENT'

 कोंकण V मालाबार की मानसूनी यात्रा पर - भाग 12  

मत्सयगंधा एक्सप्रेस और मडगांव स्टेशन पर एक रात  

30 जून 2023 

मैंने मत्सयगंधा एक्सप्रेस में मुर्देश्वर से मडगांव तक शयनयान कोच में आरक्षण करा रखा था। मुर्देश्वर स्टेशन शाम को साढ़े पांच बजे हम इस ट्रेन में सवार हुए, हमारी सीट साइड लोअर और साइड उपर थी, जोकि हमारे आगमन तक हमें खाली ही मिली। यह पहलीबार था जब मुझे मेरी साइड लोअर सीट खाली मिली हो अन्यथा अधिकतर यात्रियों में मुझे मेरी सीट पर कोई ना कोई बैठा अवश्य मिलता है। यह ट्रेन मंगलुरु सेंट्रल से चलकर मुंबई के लोकमान्य तिलक टर्मिनल जा रही थी, हमारे आसपास बैठी सभी सवारियां मुंबई ही जा रही थीं। 

मुर्देश्वर से निकलने के बाद मौसम में भी काफी परिवर्तन हो गया। यहां काफी तेज बारिश थी और बाहर का सबकुछ दिखना लगभग बंद सा हो गया था। शाम का समय और उसपर जोरदार बारिश हो उस समय एक कप चाय मिल जाये तो उसके आनंद ही अलग होते हैं। ट्रेन में ही एक वेंडर से मैंने दो कप चाय लीं, एक कल्पना को दी और एक मैंने पी। आज के इस मत्सयगंधा एक्सप्रेस की यात्रा के एक अलग ही आनंद थे। 

MURDESHWAR TEMPLE

UPADHYAY TRIPS PRESENT'

 कोंकण V मालाबार की मानसूनी यात्रा पर - भाग 11 

 श्री मुर्देश्वर मंदिर - समुद्री तट पर अलौकिक शिव धाम  

30 जून 2023 

     कर्नाटक के उत्तरी कन्नड़ जिले में, अरब सागर के तट पर कंडूका नामक पहाड़ी है जहाँ आज वर्तमान में भगवान शिव का एक शानदार मंदिर बना हुआ है। यहाँ 123 फ़ीट ऊँची भगवान शिव की एक विशाल प्रतिमा है जो बहुत दूर से ही दिखाई देती है। यह दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी शिव प्रतिमा है, इसी प्रतिमा के नीचे भगवान का प्राचीन मंदिर है जहाँ शिव लिंग रूप में धरती से 2 फ़ीट नीचे विराजमान हैं। मंदिर परिसर के प्रमुख द्वार के समीप ही बहुत ऊँचा राजगोपुरम बना हुआ है जिसके सबसे ऊपरी शिखर से मंदिर, समुद्र और आसपास का विहंगम नजारा देखा जा सकता है। 

     मैं और कल्पना आज एक पैसेंजर ट्रेन से सुबह मंगलौर से चलकर मुर्देश्वर पहुँचे। मुर्देश्वर स्टेशन पर पहुंचकर हमने यहाँ क्लॉक रूम देखा जो उपलब्ध तो था किन्तु इसका चार्ज हमें समय की अपेक्षा ज्यादा ही लगा इसलिए हमने अपना बैग यहाँ जमा नहीं किया। रेलवे स्टेशन से मुर्देश्वर मंदिर के बीच की दूरी लगभग तीन किमी है, स्टेशन के बाहर ही मंदिर जाने के लिए ऑटो तैयार मिलते हैं और समय अंतराल पर बसें भी चलती हैं। हम एक ऑटो द्वारा मंदिर के लिए रेलवे स्टेशन से प्रस्थान कर गए। जल्द ही हम मंदिर के सामने थे। 

     हम मंगलुरु स्टेशन से  नहाधोकर तैयार होकर निकले थे, इसलिए हमनें यहाँ रुकने की कोई व्यवस्था नहीं देखी। मंदिर के सामने एक प्रसाद की दुकान से प्रसाद लिया और यहीं अपना बैग भी कुछ घंटों के लिए रख दिया। यहीं पास में ही कर्नाटक की कुछ महिलाएं दक्षिण भारत का प्रसिद्ध सुगन्धित फूलों का गजरा बेच रहीं थीं। मैंने भी यहाँ पहलीबार कल्पना के लिए यह गजरा ख़रीदा और कल्पना के बालों में लगाया। गजरा लगने के बाद कल्पना सुन्दर तो लग ही रही थी साथ ही वह अब उत्तर भारतीय से ज्यादा दक्षिण भारतीय महिला लग रही थी। 

KONKAN RAILWAY : MANGALURU CENTRAL TO MURDESHWAR

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 कोंकण V मालाबार की मानसूनी यात्रा पर - भाग 10

मंगलूरु सेन्ट्रल से मुर्देश्वर : कोंकण रेलवे में पैसेंजर रेल यात्रा 


30 JUN 2023

मंगलुरु सेंट्रल स्टेशन पर रात्रि विश्राम के बाद हम अगली सुबह प्लेटफॉर्म न 2 पर पहुंचे। यहाँ मंगलुरु - मडगांव पैसेंजर तैयार खड़ी हुई थी। यह सुबह साढ़े पांच बजे यहाँ से प्रस्थान करेगी। इस ट्रेन से यात्रा करने का हमारा एक मुख्य कारण था क्योंकि यह मंगलुरु से निकलने के बाद कोंकण रेलवे क्षेत्र से होकर गुजरती है, और यह कोंकण का वह क्षेत्र है जो रात के अँधेरे की वजह से इसे हम यहाँ आते समय नहीं देख सके थे। 

सही साढ़े पांच बजे ट्रेन मंगलुरु सेंट्रल से रवाना हो गई, अभी दिन निकला नहीं था और अभी बहार अँधेरा ही था। हम जिस कोच में बैठे थे वो पूरी तरह से खाली पड़ा हुआ था। फ़िलहाल इस कोच में यात्रा करने वाले केवल हम दो ही यात्री थे। मंगलुरु नगर के मध्य से गु जरती हुई यह ट्रेन मेंगलुरु जंक्शन रेलवे स्टेशन पहुंची। 

मंगलुरु जंक्शन, मंगलुरु नगर का एक मुख्य जंक्शन रेलवे स्टेशन है। अधिकतर ट्रेनें यहीं होकर गुजरती हैं, यह केरल से दिल्ली रेलवे लाइन पर स्थित है और यहाँ से एक रेलवे लाइन पश्चिमी घाटों के पर्वतों को पार करती हुई मैसूर निकट हासन जंक्शन के लिए भी जाती है। मैंने अभी इस रेल लाइन पर यात्रा नहीं की है किन्तु इस रेल लाइन मुझे एकबार अवश्य ही यात्रा करनी है। इस स्टेशन से कुछ सवारियां हमारे कोच में सवार हुईं किन्तु अभी भी हमारा वाला कूपा खाली ही पड़ा था। कल्पना ने यहाँ चाय की इच्छा व्यक्त की तो मैं स्टेशन की स्टाल से दो चाय ले आया। जल्द ट्रेन यहाँ से रवाना हो चली। 

Thursday, June 29, 2023

A NIGHT AT MANGLURU RAILWAY STATION

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 कोंकण V मालाबार की मानसूनी यात्रा पर - भाग 9

मंगलुरु सेंट्रल रेलवे स्टेशन पर एक रात 


यात्रा दिनाँक :- 29 जून 2023

शाम के 5 बजे के आसपास हम माहे रेलवे स्टेशन पर थे। हमें यहाँ से मंगलौर जाना था और आज रात मंगलौर में ही रुककर कल सुबह पुनः कोंकण रेलवे की यात्रा आरम्भ करेंगे। माहे से हमारा रिजर्वेशन परसुराम एक्सप्रेस में था जिसकी आने की उदघोषणा हमें अब सुनाई देने लगी थी।

 जल्द ही ट्रेन प्लेटफॉर्म पर आ भी गई, इस ट्रेन में कुर्सीयान कोच था, हमारी सीट खिड़की के तरफ वाली थी जिस पर पहले से ही कुछ सवारियां बैठीं थीं। हमारे सीट पर पहुँचते ही वे लोग बिना कहे ही उठ गए और हमारे लिए सीट खाली कर दी। यह देखकर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई कि यहाँ लोग नियम और दूसरों की आवश्यकताओं का कितना ध्यान रखते हैं, हमारे उत्तर भारत में ऐसा नहीं होता, खासतौर पर हमारे उत्तर प्रदेश में। 

वहां तो आपकी सीट पर अगर कोई बैठा है तो वो आसानी से नहीं उठेगा जब तक आप उसे चार खरी खोटी सुना नहीं दोगे और मुश्किल से जब वो उठ भी जायेगा तो बेवजह की बड़बड़ाहट करता हुआ उठेगा। 

खैर यह केरल प्रदेश है, साक्षरता में यूँहीं भारत में प्रथम स्थान पर नहीं है। यहाँ के पुरुष की अपेक्षा यहाँ की महिलाएं अत्यधिक साक्षर हैं जोकि उत्तर भारत में सामान्य तौर पर कदापि नहीं हैं। ट्रेन माहि रेलवे स्टेशन से रवाना हो चली है और अब हम मालाबार के इस क्षेत्र में मानसून की इस रेल यात्रा का आनंद उठा रहे हैं। 

मालाबार का यह रेल क्षेत्र भी कुछ कुछ कोंकण रेलवे जैसा ही दिखाई देता है क्योंकि कोंकण की तरह ही यहाँ एक तरफ समुद्र है और दूसरी तरफ पश्चिमी घाट की पर्वत माला, इसके अलावा यहाँ अनेकों नदियां हैं जिनके पुलों से होकर ट्रेन बार बार गुजरती है, किन्तु यहाँ सुरंगें नहीं हैं। कोंकण रेलवे में सुरंगों की भरमार है किन्तु मालाबार में नदियों की। 

MAHE - A BEUTIFULL CITY OF WEST PUDUCHERRY

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 कोंकण V मालाबार की मानसूनी यात्रा पर - भाग 8

 माहे - पश्चिमी पुडुचेरी का एक सुन्दर नगर 


 यात्रा दिनाँक :- 29 जून 2023 

     सोलहवीं शताब्दी में फ्रांसीसियों ने भारत के पूर्वी तट पर अपनी बस्तियां और औद्योगिक इकाइयां स्थापित की। उन्होंने पांडिचेरी नाम का एक नया नगर बसाया। प्राचीन काल में पांडिचेरी का नाम वेदपुरी था, जहाँ के बारे में जनश्रुति है कि यहाँ अगस्त ऋषि का आश्रम था। पूर्वी तट के बाद भारत के पश्चिमी तट पर स्थित मालाबार के कुछ क्षेत्र को भी फ्रांसीसियों ने अपने व्यापार के लिए चुना और यहाँ अपनी बस्तियां स्थापित की। यही स्थान आज माहि कहलाता है जो एक ओर से समुद्र, और बाकी ओर से केरल राज्य के जिलों से घिरा हुआ है। इस जिले का नाम यहाँ बहने वाली माहि नदी के नाम पर रखा गया है। 

दोपहर के आसपास हम एरनाड एक्सप्रेस से माहे रेलवे स्टेशन पहुंचे। यहाँ घूमने के लिए हमारे पास अभी शाम तक का समय था क्योंकि यहाँ से आगे की यात्रा के लिए हमारा रिजर्वेशन परशुराम एक्सप्रेस में था जो यहाँ शाम को छः बजे के बाद आएगी। 

माहि मालाबार के तट पर केंद्रशासित राज्य पुडुचेरी का यह एक छोटा सा नगर है जिसका क्षेत्रफल कुल 9 किमी का है। माहे रेलवे स्टेशन एक छोटा रेलवे स्टेशन है, हमें यहाँ अपना बैग जमा करने के लिए क्लॉक रूम की सुविधा नहीं मिली। हम जैसे ही स्टेशन से बाहर निकले, तो हमें ऑटो वालो ने घेर लिया और वह मलयालम भाषा में पता नहीं कहाँ जाने की कह रहे थे। 

हमें माहे में कहाँ घूमना था, यहाँ क्या देखना था, इसके बारे में हमें कुछ भी ज्ञात नहीं था, बस इतना पता था कि यहाँ समुद्र है और अवश्य ही यहाँ बीच भी होगा। इसके अलावा हमारे यहाँ आने का मुख्य कारण था, कि मैं पुडुचेरी के इस छोटे से नगर की यात्रा करके इसे अपनी यात्रा सूची में शामिल करना चाहता था, क्योंकि इसके बाद पुडुचेरी के बाकी तीन नगर और शेष बचेंगे जो भारत के पूर्वी तट यानी कि बंगाल की खाड़ी के किनारे थे। एक आंध्र प्रदेश में और बाकि तमिलनाडू राज्य की सीमा के आसपास। 

NIL TO MAHE : MANSOON RAILWAY TRIP 2023

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 कोंकण V मालाबार की मानसूनी यात्रा पर - भाग 7 

 निलंबूर रोड से माही - केरला में एक रेल यात्रा 


सन 1840 में, अंग्रेजों ने  लकड़ी की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए नीलांबुर में सागौन का बागान बनाया। 1923 में, साउथ इंडियन रेलवे कंपनी, जो मद्रास-शोरानूर-मैंगलोर लाइन का संचालन करती थी, को मद्रास प्रेसीडेंसी द्वारा नीलांबुर से शोरानूर तक रेलमार्ग बनाने का अनुबंध दिया गया था ताकि इन जंगलों से मैदानी इलाकों तक और  बंदरगाहों  के लिए लकड़ी का आसान परिवहन सुनिश्चित किया जा सके। 

कंपनी ने तीन चरणों में इस रेलमार्ग का निर्माण पूर्ण किया। शोरानूर से अंगदिप्पुरम रेल खंड 3 फरवरी 1927 को, अंगदिप्पुरम से वानियम्बलम 3 अगस्त 1927 को खोला गया और शोरानूर से नीलांबुर तक का पूरा खंड 26 अक्टूबर 1927 को खोला गया। 1941 में इस लाइन का अस्तित्व समाप्त हो गया। देश की स्वतंत्रता पश्चात, जनता के दबाव के बाद, भारतीय रेलवे ने रेलवे लाइन का पुनर्निर्माण इसके मूल संरेखण के अनुसार किया। शोरनूर-अंगदिपुरम लाइन 1953 में फिर से खोली गई और अंगदिपुरम-नीलांबुर 1954 में। यह कुल 66 किमी का रेल खंड है। 

नीलांबुर रोड केरला का एकमात्र टर्मिनल रेलवे स्टेशन है।  

Wednesday, June 28, 2023

TVC TO NIL : KERLA RAIL TRIP 2023

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 कोंकण V मालाबार की मानसूनी यात्रा पर - भाग 6

तिरुवनंतपुरम से निलंबूर रोड - केरल में रेल यात्रा 


श्री अनंत पद्यनाभ स्वामी मंदिर के दर्शन करने के पश्चात, हम पैदल ही मंदिर से रेलवे स्टेशन की तरफ रवाना हो गए जोकि यहाँ से ज्यादा दूर नहीं था। रास्ते में बस स्टैंड के समीप एक फलमंडी भी दिखाई दी जहाँ से सोहन भाई ने कुछ फल और आम खरीदे। स्टेशन पहुंचकर हमने क्लॉकरूम से अपने अपने बैग वापस लिए। अब यहाँ से आगे की यात्रा सोहन भाई और मुझे अलग अलग करनी थी।

यहाँ से अब हमारी घर की ओर वापसी की यात्रा शुरू होनी थी, जबकि सोहन भाई अब यहाँ से आगे अपनी तमिलनाडू यात्रा पर प्रस्थान करने वाले थे। हमें यहाँ से वापसी की राह पर निलंबूर रोड स्टेशन जाना था जो केरल के मालाबार प्रान्त के समीप मन्नार पर्वतमाला की तलहटी में स्थित एक छोटा सा नगर है। हमारा रिजर्वेशन कोचुवेली से था और कोचुवेली यहाँ से आगे तीसरा स्टेशन है। 

तिरुवनंतपुरम से कोच्चुवेली जाने वाली डीएमयू ट्रेन का अब समय हो चला था। हमने बड़े भारी मन से सोहन भाई और उनके परिवार से विदा ली। रास्ते के लिए कुछ आम सोहन भाई की माँ ने मुझे भी दे दिए। घर से इतनी दूर आकर अपने मित्र और उनके परिवार से अलग होते समय मेरा दिल भर आया और आँखों में आंसू भी आ गए। सोहन भाई से बिछड़ने के बाद अब एक अजीब सा डर भी मेरे मन में घर कर गया। 

SRI ANANT PADAMNABH SWAMY TEMPLE : TIRUVANANTPURAM 2023

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 कोंकण V मालाबार की मानसूनी यात्रा पर - भाग 5 

 श्री अनंत पद्यनाभस्वामी मंदिर - तिरुवनंतपुरम 

28 जून 2023 

केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम का नाम यहाँ स्थित श्री अनंत पद्नाभस्वामी मंदिर के नाम से लिया गया है। तिरुवनंतपुरम में तिरु अर्थात श्री विष्णु, अनंत अर्थात शेषनाग और पुरम अर्थात नगरी, श्री विष्णु और शेष नाग जी का धाम। मान्यता है कि पृथ्वी पर सर्वप्रथम भगवान श्री विष्णु की मूर्ति यहीं पाई गई थी। अतः शेष शैया पर लेटे हुए भगवान विष्णु की इस विशाल मूर्ति को प्राचीन काल में उसी स्थान पर स्थापित किया जहाँ आज वर्तमान में है। 

श्री अनंत पद्नाभ स्वामी का मंदिर केरल और द्रविड़ शैली का मिश्रित रूप है। यहाँ का गोपुरम द्रविड़ शैली में निर्मित है और मुख्य मंदिर केरल शैली का एक अनुपम उदाहरण है। मंदिर के अंदर अष्टधातु के स्तम्भ हैं जिनपर सुन्दर कारीगरी देखने को मिलती है। 

हजारों जलते हुए दीपों से मंदिर की रौशनी बनी रहती है और मंदिर के गर्भगृह में शेष शैय्या पर लेटे हुए भगवान श्री विष्णु के दिव्य दर्शन होते हैं। मंदिर में सिर्फ हिन्दू  लोगों का प्रवेश ही मान्य है इसके अलावा यहाँ पुरुष और महिलाओं के लिए सिर्फ धोती पहनकर ही दर्शन करने की परंपरा है। 

मंदिर का निर्माण तो प्राचीन काल से है किन्तु समय समय पर इस मंदिर की देख रेख होने के वजह से आज यह केरल राज्य का मुख्य तीर्थ स्थान है। सत्रहवीं शताब्दी में त्रावणकोर के महाराज श्री मार्तण्ड वर्मा ने इस मंदिर का पुनः जीर्णोद्धार करवाया था। वर्तमान में भी त्रावणकोर राज परिवार के लोग ही इस मंदिर की देख रेख करते हैं।  

इस मंदिर की महत्ता यहीं समाप्त नहीं होती, वर्तमान में कुछ साल पहले इस मंदिर के तहखानों से लाखों करोड़ों रूपये का खजाना मिला है। माना जाता है कि मंदिर के नीचे सात तहखाने हैं जिनमें से एक तहखाना खुलना बाकी है क्योंकि उसपर भारतीय सर्वोच्च न्यायलय ने रोक लगा दी है। 

SHANGUMUGHAM BEACH : TIRUVANANTPURAM 2023

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 कोंकण V मालाबार की मानसूनी यात्रा पर - भाग 4

शंखुमुखम बीच - तिरुवनंतपुरम का एक सुन्दर समुद्री किनारा 


28 जून 2023 

तिरुवनंतपुरम रेलवे स्टेशन के वेटिंग रूम में नहाधोकर हम तैयार गए, यहाँ हमने कोई होटल नहीं लिया क्योंकि आज शाम को हमें अपनी अपनी मंजिलों पर रवाना होना था। सोहन भाई  यहाँ के बाद, अपने परिवार सहित कन्याकुमारी जाएंगे और मैं कल्पना के साथ निलंबूर रोड रेल यात्रा पर। इसलिए तिरुवनंतपुरम रेलवे स्टेशन के क्लॉक रूम में हमने अपने अपने बैग जमा करा दिए। 

आज हमें यहाँ के प्रसिद्द अनंत पद्यनाभ स्वामी मंदिर के दर्शन करने थे। इसलिए हम मंदिर की दिशा की तरफ बढ़ चले, जो स्टेशन से थोड़ी ही दूरी पर था। स्टेशन के बाहर निकलते ही एक शानदार सा मॉल दिखाई दिया जिसके सामने खड़े होकर हमने कुछ फोटो लिए और एक बस द्वारा हम सेंट्रल बस स्टैंड पहुंचे जो मंदिर के नजदीक ही है। बस स्टैंड पहुंचकर हमें ज्ञात हुआ कि इस समय तो मंदिर बंद हो चुका है अतः हमने यहाँ से समुद्री बीच जाने का निर्णय लिया। 

MANGLORE TO TRIVENDRAM : MALABAR RAIL TRIP 2023

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 कोंकण V मालाबार की मानसूनी यात्रा पर - भाग 3

मैंगलोर से तिरुवनंतपुरम - केरला रेल यात्रा 



28 JUN 2023

     केरल, भारत देश का एक छोटा और सुन्दर प्रदेश है। भारत के अन्य प्रांतों की अपेक्षा यहाँ के लोग अत्यंत बुद्धिमान, पढ़े लिखे और उद्यमी होते हैं। यहाँ की साक्षरता का स्तर हमेशा से ही उच्च रहा है। सम्पूर्ण केरल प्रदेश में नदियां, नारियल और खजूर के वृक्ष, इलायची एवं अन्य मसालों की खेती के साथ साथ पर्वतीय क्षेत्रों में चाय के बागान भी देखने को मिलते हैं। ओणम यहाँ का प्रमुख त्यौहार है एवं मलयालम यहाँ की प्रमुख भाषा है।  

1 नवंबर 1956 को त्रावणकोर, कोचीन और मालाबार के सम्पूर्ण भूभाग को मिलाकर केरल राज्य का गठन किया गया था। इससे पूर्व केरल राज्य में केवल त्रावणकोर और कोचीन के भूभाग को शामिल किया गया था, मालाबार के तटीय क्षेत्र को इसमें बाद में शामिल किया गया था क्योंकि मालाबार उस समय मद्रास प्रोविन्स का एक भाग था और 1956 में एक एक्ट के तहत यह केरला का एक भाग बन गया। प्राचीन समय में यहाँ चेरों का शासन था। 

रात्रि में मंगलौर पहुँचने के बाद हमारी कोंकण की रेल यात्रा समाप्त हो गई। ट्रेन मध्य रात्रि के आसपास मंगलौर पहुंची थी और मंगलौर से चलकर, कर्नाटक की सीमा से निकलकर अब यह अपने अंतिम प्रदेश केरला में चल रही थी। चूँकि यह रात्रि का समय था इसलिए हमारी यह यात्रा नींद के समय पूरी हुई। अगली सुबह जब मेरी आँख खुली तो देखा ट्रैन एर्नाकुलम से भी आगे आ चुकी है और जल्द ही यह केरला के कायकुलम रेलवे स्टेशन पहुंची।  

नारियल के वृक्षों से आच्छादित इस प्रदेश को प्रकृति ने अपने अनुपम उपहारों से सुसज्जित किया है। केले और कटहल के वृक्ष भी यहाँ बहुतायत मात्रा में देखने को मिलते हैं। एक स्टेशन आया  करूनागपल्ली। 

Tuesday, June 27, 2023

ROHA TO MANGLURU : KONKAN RAIL TRIP 2023

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 कोंकण V मालाबार की मानसूनी यात्रा पर - भाग 2

कोंकण रेलवे की एक यात्रा 


27 जून 2023 

    भारत के सुंदर प्राकृतिक क्षेत्रों में कोंकण क्षेत्र का प्रमुख स्थान है। इस क्षेत्र के अंतर्गत महाराष्ट्र, गोवा और कर्नाटक कुछ भाग शामिल हैं। कोंकण में एक तरफ अथाह समुद्र है तो वहीँ दूसरी ओर पश्चिमी घाटों के ऊँचे ऊँचे पहाड़ हैं, इन पहाड़ों से निकलने वाली नदियाँ और झरने, इसकी प्राकृतिक सुंदरता को एक अविस्मरणीय अनोखा रूप देते हैं। 

    मुख्यतः कोंकण क्षेत्र के वनों में अनेक किस्मों के पेड़ पौधे देखने को मिलते हैं जिनसे अनेकों प्रकार की दुर्लभ जड़ीबूटियां भी प्राप्त होती हैं। मानसून के समय में कोंकण क्षेत्र की सुंदरता अपने उच्चतम शिखर पर होती है जिसे एकबार देखने वाला, जीवनपर्यन्त उसे भुला नहीं पाता। 

   प्राचीन समय में कोंकण के घने वनों और पहाड़ों के मध्य आवागमन बहुत ही दुर्लभ था, किन्तु वर्तमान में यहाँ सड़कों के साथ साथ रेल मार्ग भी सुचारु है। यह रेलमार्ग समुद्र और पश्चिमी घाटों के पर्वतों के मध्य से होकर गुजरता है। जिसपर अनेकों सुरंगें और छोटे बड़े पुल दिखाई देते हैं। 

   इस रेलमार्ग का सञ्चालन भारतीय रेलवे की एक शाखा 'कोंकण रेलवे' करती है जो भारत के 19 रेलवे जोनों में से एक है। कोंकण रेलमार्ग की कुल लम्बाई 756 किमी है और यह महाराष्ट्र, गोवा और कर्नाटक तीन राज्यों को आपस में जोड़ता है। यह महाराष्ट्र के रोहा से शुरू होकर कर्नाटक के ठोकूर स्टेशन पर समाप्त होता है। 

Monday, June 26, 2023

MATHURA TO PANVEL : KERLA RAIL TRIP 2023

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 कोंकण V मालाबार की मानसूनी यात्रा पर - भाग 1 

मथुरा से पनवेल - तिरूवनंतपुरम सुपरफ़ास्ट एक्सप्रेस 


26 जून 2023 

    मानसून के समय में देश के पश्चिमी घाट, कोंकण क्षेत्र, गोवा और केरला की प्राकृतिक सुंदरता अपने चरम पर होती है। देश में सबसे पहले मानसून भी केरल में ही अपनी दस्तक देता है। अतः बरसात का यहाँ अनोखा रूप देखने को मिलता है। कोंकण क्षेत्र और पश्चिमी घाटों की सुंदरता की अलग ही छटा देखते बनती है। 

इसके अलावा इन सब नजारों और प्राकृतिक सौंदर्य को दिखाने के लिए कोंकण रेलवे अपनी अहम् भूमिका निभाती है। मानसून में कोंकण रेलवे की यात्रा, हर मनुष्य के जीवन में एक ऐसा यादगार अनुभव छोड़ती है जिसे शायद ही जीवन पर्यन्त भुलाया जा सके।  

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काफी वर्ष पहले मैंने भी कोंकण रेलवे के इन शानदार नजारों के बारे में सुन रखा था तथा इसके बारे में थोड़ी बहुत जानकारी भी एकत्रित की हुई थी। उस समय हम आगरा में रहते थे, और मेरे पिताजी आगरा कैंट रेलवे स्टेशन पर  रेलवे में नौकरी किया करते थे, तब मैंने जाना था कि यहाँ से गुजरने वाली 'मंगला लक्षद्वीप एक्सप्रेस' एक ऐसे मार्ग से होकर अपनी यात्रा करती है जिसके नज़ारे और सुंदरता का एक अलग ही अलौलिक वर्णन है। 

आगरा होकर जाने वाली यह एक मात्र ट्रेन थी जो कोंकण रेलवे से होकर गुजरती थी अतः शुरू से ही इसमें यात्रा करने का मन बना लिया था, कि एक बार तो अवश्य इसमें यात्रा करनी है किन्तु ऐसा अवसर मुझे अबतक प्राप्त ही नहीं हो पाया था। किन्तु अब ईश्वर की कृपा से ऐसा अवसर मिला है कि कोंकण रेलवे की यात्रा करने का स्वपन, साकार होने जा रहा है। 

आगरा के बाद हम लोग मथुरा आ गए और यहीं इस ब्रजभूमि में अपना स्थाई निवास स्थान बनाया। अब ये ब्रजभूमि ही अपना निवास स्थान है और अपनी कर्मभूमि भूमि भी। सम्पूर्ण देश में अनेकों यात्राएं करने के बाद प्रत्येक मानसून में मुझे कोंकण यात्रा याद आती ही अतः इसबार मैंने मथुरा से केरल के तिरुवनंतपुरम नगर की यात्रा का विचार बनाया। 

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