मथुरा से योगनगरी ऋषिकेश - एक रेल यात्रा
प्राचीन काल से ही माँ गंगा के पावन तट पर बसी ऋषिकेश नगरी, साधु - संतो और ऋषि मुनियों की तपोस्थली रही है। यहाँ का सुरम्य वातावरण मन को मोह लेता है, यहाँ आकर मन को असीम शांति प्राप्त होती है और शरीर एक नई ऊर्जा को अनुभव करने लगता है। शाम के समय माँ गंगा के घाट पर बैठकर गंगा आरती देखने का एक अलग ही आनंद है, मन आध्यत्मिक रूप से प्रफुल्लित हो उठता है ईश्वर का गुणगान करने लगता है। यहाँ आकर आध्यात्म की अनुभूति होना आम बात है।
ऋषिकेश में लक्ष्मण झूला एक प्राचीन स्थल है। गंगा नदी के ऊपर बना तारों का एक झूला है जिसे हम बचपन से ही देखते और इसपर गुजरते हुए आ रहे है। लक्ष्मण झूला के आसपास अनेकों मंदिर हैं। यहीं से कुछ दूर गंगाजी के किनारे चलते हुए राम झूला के निकट पहुँच जाते है। लक्ष्मण झूला के बाद राम झूला का निर्माण हुआ था। अब वर्तमान में जानकी झूला का निर्माण होने के बाद यह ऋषिकेश का मुख्य सेतु बन गया है।
राम झूला और जानकी झूला के मध्य प्रसिद्ध गीता भवन है, यहाँ साधु संतो के ठहरने का अच्छा प्रबंध है। आम यात्रियों को यहाँ ठहरने की आज्ञा नहीं है। गीता भवन में सुबह और शाम अत्यंत ही स्वदिष्ट और सात्विक भोजन मिलता है।
इस बार मन बना लिया था कि इस अमावस्या पर गंगा स्नान हेतु ऋषिकेश ही जाऊंगा। ईश्वर की कृपा रही और मैंने मई के महीने में एक शानदार यात्रा प्लान की। यह यात्रा कश्मीर की यात्रा थी जिसमें हमने श्रीमाता वैष्णोंदेवी और श्रीनगर जाने का प्लान बनाया। इस यात्रा में मेरी ममेरी बहिन साधना और उसका परिवार, मेरा दोस्त, कुमार अपने परिवार सहित जाने के लिए तैयार थे।
यात्रा से एक दिन पहले अमावस्या थी, इसलिए मैंने अपनी यात्रा एक दिन पहले शुरू की और मैं अपनी पत्नी कल्पना सहित मथुरा से ऋषिकेश के लिए रवाना हो चला था। शुक्रवार की शाम हम मथुरा जंक्शन रेलवे स्टेशन पहुंचे, यहाँ से सहारनपुर तक हमारा रिजर्वेशन इंदौर - ऊना हिमाचल एक्सप्रेस में था। सही समय पर ट्रेन भी आ चुकी थी और हम अपनी सीट पर पहुंचे।
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हमारी सीट पर एक अति स्मार्ट महिला बैठी हुई थी, हम उसके बराबर में जैसे ही बैठे, उसने तुरंत हमसे टिप्पणी की, कि इस पर हमारे अन्य लोग बैठे हैं आप आगे देख लीजिये। हमने बड़ी नम्रता से उसे जवाब दिया कि महोदया यह हमारी ही आरक्षित सीट है, कृपया अब आप आगे देख लो।
महिला थोड़ी सपकपा गई और तुरंत ही उसने जवाब दिया कि हमें तो फरीदाबाद उतरना है। फरीदाबाद आने में अभी लगभग डेढ़ घंटा था मैंने उससे कुछ नहीं कहा और वह हमारी सीट पर ही खिड़की को घेरे बैठी ही रही। जल्द ही ट्रेन के सिग्नल जो गए और ट्रेन प्रस्थान करने लगी, इसी बीच एक मारवाड़ी महिला, प्लॅटफॉम की स्टॉल से कुछ सामान खरीदते हुए रह गई और इधर ट्रेन ने स्पीड पकड़ ली, अतः वो ट्रेन में चढ़ नहीं सकी।
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उनके साथ जो अन्य सहयात्री थे उन्होंने गाडी की चेन खींच दी और ट्रैन पुनः स्टेशन पर रुक गई। ट्रैन की चैन खेंचने के बाद ट्रेन के कोच का एयर प्रेशर समाप्त हो जाता है और ट्रैन आगे नहीं बढ़ पाती तब तक, जब तक उसमें पुनः प्रेशर नहीं आ जाता और इसी क्रम में लगभग 20 मिनट और ज्यादा ट्रेन प्लेटफार्म पर खड़ी रही। आरपीएफ के जवान तुरंत सक्रीय हो गए और चेन खींचने वालों को ढूंढने लगे किन्तु किसी भी यात्री ने उन्हें उनकी पहचान नहीं बताई । आखिरकार कुछ समय बाद ट्रेन मथुरा जंक्शन से रवाना हो चली।
हमारी सीट पर बैठी महिला का गंतव्य फरीदाबाद था और कुछ समय बाद वो अपने गंतव्य पर उतर गई। यहाँ ट्रेन काफी खाली हो चुकी थी और थोड़ी देर खड़ी भी रही थी। हमारे स्लीपर कोच के पीछे ही जनरल कोच भी थे, फरीदाबाद पर जब ट्रैन खडी थी तो मैं पीछे जनरल कोच का हाल देखने गया। यह सामान्यतः खाली ही थे, और इसमें अधिकतर यात्री सीटों पर आराम से सो रहे थे।
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अगला स्टेशन हजरत निजामुद्दीन था, जल्द ही यह ट्रैन यहाँ पहुंची, यहाँ इसका बीस मिनट का ठहराव है। इस बीच हमने प्लेटफॉर्म न 1 पर बने रेलवे के रेस्टोरेंट से कुछ खाने पीने की चीजें ली, यहीं मुझे पता चला कि रेल नीर की बोतल अब 14 रुपए की हो गई है जो अब तक 15 रूपये की थी। थोड़ी देर बाद ट्रेन आगे रवाना हो चली।
19808 इंदौर - ऊना हिमाचल एक्सप्रेस एक सामान्य ट्रेन है और यह सप्ताह में दो दिन अपने गंतव्यों पर पहुँचती है। मथुरा जंक्शन के बाद फरीदाबाद, हजरत निजामुद्दीन, मेरठ और सहारनपुर इसके मुख्य ठहराव हैं इस बीच इनके अलावा इसका किसी अन्य स्टेशन पर कोई ठहराव नहीं है अतः यह अपने मुकाबले सुपरफास्ट ट्रेनों से भी बेहतर ट्रेन है। गाजियाबाद पर बिना रुके ही यह ट्रैन सीधे निकल गई।
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अगली सुबह हम सहारनपुर स्टेशन पहुंचे। मैं काफी सालों के बाद इस स्टेशन पर आया था। हमें यहाँ से ऋषिकेश के लिए ट्रेन बदलनी थी इसलिए हम यहीं उतर गए। सुबह चार बजे के लगभग श्री माता वैष्णोंदेवी कटरा से चलकर योग नगरी ऋषिकेश जाने वाली हेमकुंट एक्सप्रेस भी आ पहुंची, चूँकि इस ट्रेन में हमारा कोई रिजर्वेशन नहीं था इसलिए हमें इसके जनरल कोच में जगह लेनी पड़ी जो कि पूरी तरह से भरा हुआ था।
इसमें सीधे खड़े होने की भी जगह नहीं थी किन्तु जैसे तैसे हमने हरिद्वार तक इस सफर को बमुश्किल पूरा किया। हरिद्वार पहुंचने के बाद यह ट्रैन लगभग खाली हो गई, जो कोच अभी तक भूसे की तरह भरा पड़ा था वह लगभग खाली हो चूका था और कल्पना बिना देर गंवाए पूरी सीट पर आराम से सो गई।
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ट्रेन योगनगरी ऋषिकेश के लिए रवाना हो चली थी। योग नगरी ऋषिकेश रेलवे स्टेशन अभी हाल ही में निर्मित हुआ है और यह पहला मौका था जब मैं योग नगरी ऋषिकेश स्टेशन की यात्रा कर रह रहा था इससे पूर्व मैं केवल रिष्केष के पुराने रेलवे स्टेशन तक ही गया हूँ। पुराना रेलवे स्टेशन शहर के मध्य में स्थित है और इससे आगे रेलवे लाइन निकलना असंभव था इसलिये रेलवे ने एक नया रेलवे स्टेशन का निर्माण कराया और इसे योग नगरी ऋषिकेश नाम दिया क्योंकि ऋषिकेश को मुख्यतः योग स्थल के लिए विश्व भर में पहचान मिली हुई है।
योग नगरी ऋषिकेश रेलवे स्टेशन शहर की भीड़भाड़ से दूर एक शांत वातावरण में स्थित है, इसका मुख्य कारण है कि भविष्य में ऋषिकेश से आगे पर्वतीय क्षेत्र में रेल को ले जाना, यानी कि भविष्य में योग नगरी ऋषिकेश से कर्णप्रयाग के मध्य रेल लाइन बिछाए जाने का कार्य जोरों से चल रहा है। योग नगरी ऋषिकेश पर ट्रेंनों के मेंटिनेंस और उनके रखरखाव हेतु बड़ी जगह में यार्ड बनाया गया है।
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योग नगरी ऋषिकेश रेलवे स्टेशन एक साफ़ सुथरा और बहुत ही सुन्दर रेलवे स्टेशन है। यह आधुनिक सुविधाओं से पूरी तरह से सुसज्जित है और यहाँ का वातावरण अत्यंत ही शांत और रमणीक है। ट्रेन से उतरकर हम यहाँ बने वेटिंग रूम में पहुंचे और सुबह सबेरे की नित्यक्रिया से निर्वृत होकर हमने अपना बैग अमानती सामान गृह में जमा करा दिया और फिर हम गंगा स्नान हेतु ऋषिकेश नगर की तरफ प्रस्थान कर गए।
अगली यात्रा : - अमावस्या पर ऋषिकेश में गंगा स्नान
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| मथुरा जंक्शन पर मैं, कल्पना और उसका भाई राम |
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| हमारी आज की ट्रैन |
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| फरीदाबाद पर एक सेल्फी |
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| सहारनपुर सुबह चार बजे |
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| सहारनपुर रेलवे स्टेशन |
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| योगनगरी ऋषिकेश में पहली सेल्फी |


















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