MY AGRA TRIPS IN 2025
📅10 FEB' 25
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आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 12
लोदी काल की मस्जिद और मक़बरा
आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 11
सादिक खान और सलाबत खान का मकबरा
सादिक खान और उनके पुत्र सलाबत खान, मुगल काल के प्रमुख रईस थे और बादशाह जहांगीर एवं शाहजहाँ के अधीन उच्च पदस्थ अधिकारी थे। सलाबत खान, बादशाह शाहजहाँ के मुग़ल दरबार में मीर बख्शी (कोषाध्यक्ष) थे, जो 1644 में आगरा किले में अमर सिंह राठौर द्वारा मारे गए थे जबकि उनके पिता सादिक खान की मृत्यु 1633 में ही हो गई थी। दोनों पिता पुत्र मुग़ल दरबार में क्रमशः बादशाह जहांगीर और शाहजहां के कार्यकाल के दौरान नियुक्त थे।
आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 10
जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर का मक़बरा
17 सितम्बर 2024,
जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर का मकबरा आगरा के सिकंदरा में स्थित एक भव्य मुगलकालीन स्मारक है, जिसे उनके पुत्र जहांगीर ने 1605-1613 के बीच बनवाया था। लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर से निर्मित यह 119 एकड़ में फैली एक अनूठी पिरामिडनुमा संरचना है, जो इस्लामी, हिंदू और बौद्ध वास्तुकला का मिश्रण है।
यह एक पांच-मंजिला संरचना है जो पूरी तरह से बलुआ पत्थर से बनी है, जिसके शीर्ष पर एक सफेद संगमरमर का मंडप है। यह फारसी चारबाग शैली में निर्मित है। मुख्य मकबरे का प्रवेश द्वार बुलंद दरवाजे की शैली में बनाया गया है और जटिल नक्काशी से सजाया गया है।इस मकबरे की चारों कोनों पर सफेद संगमरमर की मीनारें हैं।
औरंगजेब के समय में इस मकबरे को जाटों द्वारा लूटा गया था, माना जाता है कि उन्होंने इस मकबरे से बादशाह अकबर के शरीर के अवशेषों को निकालकर उनका दाह संस्कार कर दिया। ब्रिटिश काल में अंग्रेजों (लॉर्ड कर्जन) ने इसकी मरम्मत कराई थी।
आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 9
फिरोज खान का मकबरा / FIROZ KHAN TOMB
फिरोज खान शाहजहां के शाही हरम के प्रभारी और दीवान-ए-कुल थे।
मिर्ज़ा गियास बेग ( 1546 - 1621)
जिन्हें उनके शीर्षक एतिमाद-उद-दौला के नाम से भी जाना जाता है , मुग़ल साम्राज्य में एक महत्वपूर्ण अधिकारी थे।
अपनी गर्भवती पत्नी इस्मत बेगम और तीन बच्चों के साथ वे भारत आ बसे। वहाँ मुगल सम्राट अकबर ने उन्हें अपनी सेवा में नियुक्त कर लिया। अकबर के शासनकाल में, मिर्ज़ा ग़ियास बेग को काबुल प्रांत का कोषाध्यक्ष नियुक्त किया गया ।
अकबर के पुत्र और उत्तराधिकारी जहांगीर के शासनकाल में उनकी किस्मत और भी चमक उठी। 1611 में जहांगीर ने उनकी पुत्री नूरजहाँ से विवाह किया और मिर्ज़ा गियास बेग को अपना प्रधानमंत्री नियुक्त किया। 1615 तक, मिर्ज़ा गियास बेग का रुतबा और भी बढ़ गया, जब उन्हें 6,000 सैनिकों का दर्जा दिया गया और उन्हें ध्वज और ढोल भेंट किए गए, जो कि आमतौर पर विशिष्ट राजकुमारों को ही प्राप्त होता था।
सन 1621 में मिर्ज़ा ग्यासबेग की मृत्यु हो गई।
मिर्ज़ा ग्यासबेग का भारत आगमन
केवल दो खच्चरों को साथ लेकर, मिर्ज़ा गियासबेग, अपनी गर्भवती पत्नी और अपने तीन बच्चे (मोहम्मद-शरीफ, आसफ खान और एक बेटी) को अपनी भारत की यात्रा के लिए बारी-बारी से खच्चरों पर सवार होकर निकल पड़े। कंधार में असमत बेगम ने अपनी दूसरी बेटी को जन्म दिया। यात्रा का खर्च और गरीबी के चलते अब इन्हें अपनी चौथी संतान की चिंता सताने लगी और कंधार की मस्जिद में खुदा से सलामती की दुआ मांगी।
कुछ समय बाद मिर्ज़ा ग्यासबेग और उनके परिवार को एक व्यापारी मलिक मसूद के नेतृत्व वाले एक कारवां शरण दी, जिसने बाद में गियास बेग को सम्राट अकबर की सेवा में नौकरी दिलाने में मदद की। यह मानते हुए कि बच्ची ने परिवार के भाग्य में बदलाव का संकेत दिया है, उसका नाम मिहर-उन-निस्सा रखा गया, जिसका अर्थ है "महिलाओं में सूर्य"। गियास बेग अपने परिवार का पहला सदस्य नहीं था जो भारत आया था, उसके चचेरे भाई आसफ खान जाफर बेग और असमत बेगम के चाचा, मिर्जा गियासुद्दीन अली आसफ खान, अकबर के प्रांतीय कार्यभारों में नामांकित थे।
भारत पहुँचने के बाद अकबर ने मिर्ज़ा ग़ियास बेग का स्वागत किया और बाद में उन्हें काबुल प्रांत का दीवान (कोषाध्यक्ष) नियुक्त किया गया। व्यापार संचालन में अपनी कुशल क्षमता के कारण वे शीघ्र ही उच्च प्रशासनिक पदों पर पदोन्नत हो गए। उनके उत्कृष्ट कार्य के लिए सम्राट ने उन्हें 'इतिमद-उद-दौला' ('राज्य का स्तंभ') की उपाधि से सम्मानित किया।
अपने कार्यों और पदोन्नति के फलस्वरूप, ग़ियास बेग ने मेहरुननिसा (नूरजहाँ) को ने सर्वोत्तम शिक्षा दिलवाई। वह अरबी और फ़ारसी भाषाओँ के साथ कला, साहित्य, संगीत और नृत्य में भी निपुण हुईं ।
गियास की बेटी, मिहर-उन-निस्सा बेगम ( नूर जहाँ ) ने 1611 में अकबर के बेटे जहांगीर से शादी की, और उनके बेटे अब्दुल हसन आसफ खान ने जहांगीर के सेनापति के रूप में और उनके उत्तराधिकारी शाहजहाँ के प्रधान वज़ीर के रूप में कार्य किया ।
ग़ियास, मुमताज़ महल (मूल नाम अर्जुमंद बानू, अब्दुल हसन आसफ़ खान की पुत्री) के दादा भी थे, जो सम्राट शाहजहाँ की पत्नी थीं। जहाँगीर के बाद उनके पुत्र शाहजहाँ शासक बने और अब्दुल हसन, शाहजहाँ के सबसे करीबी सलाहकारों में से एक थे। शाहजहाँ ने अब्दुल हसन की पुत्री अर्जुमंद बानू बेगम (मुमताज़ महल) से विवाह किया, जो उनके चार पुत्रों की माता थीं, जिनमें उनके उत्तराधिकारी औरंगज़ेब भी शामिल थे। शाहजहाँ ने मुमताज़ महल के मकबरे के रूप में ताजमहल का निर्माण करवाया।
1621 में मिर्ज़ा ग्यास बेग की मृत्यु कांगड़ा के नजदीक हुई । उनके शरीर को आगरा लाया गया और यमुना नदी के बाएं किनारे पर दफनाया गया , जिसे आज एत्माउद्दौला का मकबरा कहते हैं।
आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 6
रोमन कैथोलिक कब्रिस्तान
आगरा में रोमन कैथोलिक कब्रिस्तान का निर्माण 1550 ई. में हुआ था और इसका इस्तेमाल सबसे पहले उन अर्मेनियाई ईसाइयों को दफनाने के लिए किया गया था, जो अकबर के शासनकाल के दौरान इस शहर में आकर बस गए थे। इनके बाद, जैसे-जैसे इस इलाके में दूसरे लोग आकर बसते गए, वैसे-वैसे अन्य ईसाई संप्रदायों के लोगों को भी यहाँ दफनाया जाने लगा।
इस कब्रिस्तान में सबसे पुरानी कब्र जॉन मिल्डेनहॉल की है। जॉन मिल्डेनहॉल एक अंग्रेज व्यापारी थे, जिनकी मृत्यु 1614 में हुई थी। कहा जाता है कि वह पहले ऐसे अंग्रेज थे, जिन्होंने "अकबर को आमने-सामने देखा था"। लेकिन यहाँ कुछ और कब्रें भी हैं, जो ध्यान देने लायक हैं न सिर्फ उन लोगों से जुड़ी कहानियों की वजह से, बल्कि उन कब्रों की वास्तुकला की वजह से भी।
श्री कृष्ण संग्रहालय - कुरुक्षेत्र
ज्योतिसर धाम देखने के बाद मैं वापस कुरुक्षेत्र आ गया। मैं श्री कृष्ण संग्रहालय के नजदीक ही बस से उतरा था, यहाँ आकर मुझे भगवान श्री कृष्ण से जुडी समस्त लीलाओं को एक छत के नीचे देखने की इच्छा हुई इसलिए मैंने 30 रूपये का टिकट लेकर संग्रहालय में प्रवेश किया और ईश्वर के अलग अलग स्वरूपों के साथ साथ उनकी दिव्य लीलाओं के दर्शन किये।
हालांकि मैं ब्रजवासी हूँ और मथुरा नगर में रहता हूँ जहाँ साक्षात् भगवान श्री कृष्ण ने जन्म लिया था, किन्तु भगवान श्री कृष्ण के नाम से इस तरह का कोई भी संग्रहालय मथुरा अथवा वृन्दावन में नहीं है। अपने आराध्य के नाम से आज मुझे कुरुक्षेत्र की भूमि पर इस तरह का संग्रहालय देखने को मिला अन्यथा मैंने आज तक या तो ऐतिहासिक संग्रहालय देखे थे या फिर रेल संग्रहालय देखे हैं।
इसी संग्रहालय के नजदीक ही कुरुक्षेत्र पैनोरमा और विज्ञानं केंद्र भी स्थित है। किन्तु मेरे पास अब समय का आभाव था और मुझे शीघ्र ही कुरुक्षेत्र रेलवे स्टेशन पहुंचना था। वहां से साढ़े तीन बजे मुझे गीता जयंती एक्सप्रेस पकड़नी है जिससे मैं मथुरा पहुँच सकूँ।
ज्योतिसर तीर्थ - कुरुक्षेत्र
ब्रह्म सरोवर देखने और यहाँ स्नान करने के पश्चात मैं ज्योतिसर तीर्थ के लिए रवाना हुआ जो कि यहाँ से लगभग 15 से 20 किमी दूर था। ब्रह्म सरोवर के बाहर से ही मुझे हरयाणा की एक रोडवेज बस मिल गई और मैं जल्द ही ज्योतिसर तीर्थ पहुँच गया।
माना जाता है कि ज्योतिसर ही वह प्रमुख स्थान है जहाँ महाभारत के युद्ध के दौरान भगवान् श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था और यहीं उन्हें अपने विराट स्वरुप के दर्शन कराये थे। अतः यह बहुत ही पावन तीर्थ स्थल है और सुन्दर स्थान है। कुरुक्षेत्र के मैदान से यह थोड़ी दूरी पर स्थित है। इस पावन स्थल पर वट वृक्ष लगे हुए हैं और यहाँ हाल ही मैं भगवान् श्री कृष्ण के विराट स्वरुप की एक दिव्य प्रतिमा भी लगाईं गई है। शाम के समय यहाँ लाइट एंड साऊंड शो की व्यवस्था भी है।
यहाँ के सभी पावन मंदिरों और स्थलों के दर्शन करने के पश्चात मैं कुछ देर ज्योतिसर ग्राम में भी घूमा और इस पावन धरा को प्रणाम किया।
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| महाभारत महाकाव्य के रचियिता और लेखक |
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