Thursday, October 12, 2023

AGRA : ROMAN CATHOLIC CEMETERY


 रोमन कैथोलिक कब्रिस्तान


आगरा में रोमन कैथोलिक कब्रिस्तान का निर्माण 1550 ई. में हुआ था और इसका इस्तेमाल सबसे पहले उन अर्मेनियाई ईसाइयों को दफनाने के लिए किया गया था, जो अकबर के शासनकाल के दौरान इस शहर में आकर बस गए थे। इनके बाद, जैसे-जैसे इस इलाके में दूसरे लोग आकर बसते गए, वैसे-वैसे अन्य ईसाई संप्रदायों के लोगों को भी यहाँ दफनाया जाने लगा।


इस कब्रिस्तान में सबसे पुरानी कब्र देख सकते हैं (हालाँकि उस पर लगा पत्थर काफी नया है), वह जॉन मिल्डेनहॉल की है। जॉन मिल्डेनहॉल एक अंग्रेज व्यापारी थे, जिनकी मृत्यु 1614 में हुई थी। कहा जाता है कि वह पहले ऐसे अंग्रेज थे, जिन्होंने "अकबर को आमने-सामने देखा था"। लेकिन यहाँ कुछ और कब्रें भी हैं, जो ध्यान देने लायक हैंन सिर्फ उन लोगों से जुड़ी कहानियों की वजह से, बल्कि उन कब्रों की वास्तुकला की वजह से भी।

जॉन विलियम हेसिंग का मक़बरा 

इस कब्रिस्तान में सबसे बेहतरीन, सबसे प्रभावशाली और वास्तव में सबसे मशहूर मकबरा जॉन विलियम हेसिंग का है। यह एक छोटा, लेकिन बेहद सुगठित 'उत्तर-मुगलकालीन' मकबरा है, जिसमें कई ऐसी विशेषताएं हैं जो अक्सर कहीं अधिक विशाल मकबरों में देखने को मिलती हैं। लाल बलुआ पत्थर से निर्मित और अपनी स्पष्ट समानताओं के कारण, इसे आज आमतौर पर "लाल ताज" के नाम से जाना जाता है।

जॉन विलियम हेसिंग का जन्म 5 नवंबर 1739 को उट्रेक्ट में हुआ था, और 1757 में वे डच ईस्ट इंडिया कंपनी की सेवा में सीलोन (श्रीलंका) आए। पाँच साल बाद वे नीदरलैंड्स लौट गए, लेकिन 1763 में फिर भारत आ गए; इस बार उन्होंने हैदराबाद के निज़ाम की सेवा स्वीकार की। 1784 तक, वे मराठा सरदार महादजी सिंधिया की सेवा में थे।

उन्होंने सिंधिया के लिए कई लड़ाइयाँ लड़ीं और कई बार घायल भी हुए, लेकिन एक अच्छे इंसान और बहादुर सिपाही के तौर पर अपनी पहचान बनाई। सिंधिया की सेना के फ्रांसीसी कमांडर, बेनोइट डी बोइग्ने के साथ मतभेद के कारण उन्हें अपने पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा।

हालाँकि, महादजी उन्हें पसंद करने लगे थे और उन्होंने उन्हें अपने "खास रिसाला" या निजी अंगरक्षकों का प्रमुख बना दिया। यह पद उन्होंने 1794 में महादजी की मृत्यु तक संभाला, लेकिन उनके उत्तराधिकारी, दौलत राव सिंधिया के अधीन भी वे काम करते रहे।

इस दौरान, हेसिंग ने करडला की लड़ाई में 3,000 नियमित मराठा सैनिकों की कमान संभाली, जहाँ 12 मार्च 1795 को मराठा सेनाओं ने हैदराबाद के निज़ाम को पराजित किया। 1798 में उन्हें कर्नल का पद प्राप्त हुआ और तत्पश्चात वे आगरा किले के कमांडेंट बन गए।

21 जुलाई 1803 को, जॉन हेसिंग आगरा किले को अंग्रेजों से बचाने वाली मराठा सेना की कमान संभालते हुए युद्ध में मारे गए; यह घटना दूसरे आंग्ल-मराठा युद्ध का एक हिस्सा थी। उस समय उनकी आयु 64 वर्ष थी।


उनकी विधवा, ऐनी ने 1,00,000 रुपये (£1,000) की लागत से यह शानदार मकबरा बनवाया; उन दिनों यह एक बहुत बड़ी रकम थी, जो आज के 1,01,000 पाउंड के बराबर है। इतनी भारी लागत के बावजूद, दुख की बात है कि वह इस मकबरे को पूरी तरह से बनवाने के लिए और पैसे नहीं जुटा पाईं।

मकबरे के मूल डिज़ाइन में चार मीनारें शामिल थीं; आप उनके आधार तो देख सकते हैं, लेकिन ऐनी के पास पैसे खत्म हो जाने के कारण वे कभी पूरी नहीं हो पाईं। इस समस्या का हल यह निकाला गया कि उन मीनारों को पूरा न करके, उनके बजाय चारों कोनों पर चार गुंबद बना दिए जाएँ। ऐनी हेसिंग का 28 साल बाद, 1831 में बैरकपुर में निधन हो गया।

इस कब्रिस्तान में आना एक थोड़ा-सा अवास्तविक अनुभव है—न सिर्फ़ 'लाल ताज' की वजह से, बल्कि इसलिए भी कि इतने सारे यूरोपीय लोगों ने अपनी समाधियों के लिए राजस्थानी शैली की छतरियों को अपनाया, और फिर उनके शिखर पर एक क्रॉस लगा दिया!





















समरू का मकबरा

हेसिंग के मकबरे के पास ही वाल्टर रेनहार्ड्ट का मकबरा है, जिन्हें 'सोम्ब्रे' या 'समरू' के नाम से जाना जाता था। वह एक यूरोपीय भाड़े का सैनिक और साहसी व्यक्ति था, जिसने 18वीं सदी के आखिर में इस क्षेत्र में हुई अशांति का फ़ायदा उठाया और उससे काफ़ी दौलत कमाई। उसे आम तौर पर एक 'गद्दार' (turncoat) माना जाता था, जो किसी भी संघर्ष में अपने फ़ायदे और मुनाफ़े के लिए पाला बदल लेता था।

अंततः वह मुग़ल मंत्री नज़फ़ ख़ान के अधीन हो गए, और 4 मई 1782 को 53 वर्ष की आयु में आगरा में उनका निधन हो गया। उनकी विशाल संपत्ति उनकी भारतीय पत्नी, बेगम समरू को मिली, जो अंतिम मुग़ल सम्राटों के दौर में दिल्ली की एक काफ़ी मशहूर हस्ती बन गईं।

यह मकबरा काफी बारीकी से तराशा गया है, और इस पर मुग़ल काल के अंतिम दौर का एक प्रभावशाली, गुंबददार शिखर बना हुआ है। जैसा कि अक्सर होता है, इसका भीतरी हिस्सा कहीं अधिक सादा था।

कब्रिस्तान की चारदीवारी के ठीक बाहर भारी ट्रैफिक के शोर के बावजूद, आगरा में स्थित रोमन कैथोलिक कब्रिस्तान एक बहुत ही शांत और अच्छी तरह से रखा गया स्थान है। यह उत्तरी भारत का सबसे पुराना ईसाई कब्रिस्तान भी है, और यदि आप शहर घूमने आए हैं, तो यहाँ आना निश्चित रूप से सार्थक होगा।















Saturday, August 12, 2023

AGRA : MEHTAB BAGH & ELEVEN STAIRES




आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 1 

मेहताब बाग़ और ताजमहल का एक दृश्य 

       यूँ तो मैं बचपन से ही आगरा शहर में रहा किन्तु कभी ताजमहल को यमुना के दूसरी पार से देखने का मौका नहीं मिला, कारण था इस स्थान की दूरी, और यहाँ जाने वाला रास्ता जिसके बारे में मुझे कोई विशेष जानकारी नहीं थी। जब कभी ताजमहल देखने का मन होता था तो इसके मुख्य द्वार से ही इसे जाकर देख आता था। किन्तु आगरा शहर छोड़ने के अनेक वर्षों बाद अपने पुराने शहर को घूमने की इच्छा मन में जाग्रत हुई और मैं अपनी बाइक उठकर निकल चला आगरा की ऐतिहासिक यात्रा पर। 

    इस यात्रा के तहत मैंने आगरा के उन स्थानों को चिन्हित किया जो मैंने पहले कभी नहीं देखे थे। इसलिए सबसे पहले मैं पहुंचा यमुना नदी के दूसरी पार, जहाँ आगरा की विभिन्न मध्यकालीन ऐतिहासिक इमारतें देखीं जा सकती थीं। 

    इन सभी स्थलों में सबसे मुख्य था मेहताब बाग़, जो मुगलकाल का एक शानदार बगीचा था। इसका निर्माण औरंगजेब ने अपने शासनकाल के दौरान कराया था। इस बगीचे से ताजमहल का बहुत ही शानदार दृश्य दिखाई देता है बिलकुल वैसे ही, जैसे हम इसे ताज के परिसर में प्रवेश करने के बाद देखते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि मेहताब बाग़ से आप सिर्फ ताजमहल को निहार सकते हैं, इसके ख़ूबसूरती को महसूस कर सकते हैं, यमुना नदी के जल में इसका प्रतिबिम्ब देख सकते हैं किन्तु आप इसे छू नहीं सकते, इसके नजदीक नहीं जा सकते हैं क्योंकि मेहताब बाग़ और ताजमहल के बीच यमुना नदी है और यहाँ इसे पार करने की इजाजत नहीं है। 

    मेहताब बाग़ ऐतिहासिक बगीचा है, खुदाई के दौरान यहाँ लाल ईंटों की एक विशाल मोटी दीवार के अवशेष प्राप्त हुए हैं जो इसे यमुना के जल से क्षतिग्रस्त  होने से बचाती थी। शाहजहां ने यहाँ एक काला ताजमहल का निर्माण करने का विचार किया था, वह इसे स्वयं के लिए काले संगमरमर के पत्थरों से बनाना चाहता था किन्तु सत्ता परिवर्तन और औरंगजेब द्वारा नजरबन्द किये जाने के कारण उसका यह ख्वाब पूरा न हो सका और फिर इस स्थान पर औरंगजेब एक शानदार बगीचे का निर्माण कराया। मेहताब बाग़ को चाँदनी बाग़ भी कहा जाता है।  

    वर्तमान में मेहताब बाग़ को देखने के लिए ताजमहल के ही समान पुरातत्व विभाग द्वारा टिकट दिया जाता है, इससे होने वाली आय से ही बगीचे का रख रखाव होता है। आज भी अनेकों पर्यटक मेहताब बाग़ से ताजमहल का दीदार करते हैं। अनेकों फिल्मों की शूटिंगें मेहताब बाग़ में हुईं हैं और इनमें ताजमहल को एक अलग ही रूप से दिखाया जाता है। मेहताब बाग में अनेकों किस्म के पेड़ पौधे हैं जिनमें बहुत ही सुन्दर सुन्दर फूल खिलते हैं, इन फूलों की सुगंध से मेहताब बाग़ और भी खिल उठता है, फूलों की सुंगधित महक और ताज महल का दीदार हमने एक पल के लिए मुग़ल काल में ले जाती हैं। 

   मेहताब बाग़ में ना केवल फूलों की सुगंध महकती थी बल्कि इसमें लगे विशेष तकनीकों से बने फुब्बारे भी इसे अधिक खूबसूरत बनाते थे। माना जाता है कि मुग़ल काल के दौरान इन फुब्बारों से जल की विभिन्न तरह के धाराएं तो मन को मोह ही लेती थीं साथ ही फुब्बारों से निकलने वाला जल भी रंगीन किस्म का होता था। फुब्बारों से निकलने वाला जल विभिन्न तरह के रंगों में परिवर्तित होता रहता है, इसलिए इसे रंगीन फुब्बारा भी कहा जाता था। मुगल शासकों को बगीचे और फुब्बारे बनाने का शौक शुरू से ही रहा है। 

   मेहताब बाग़ जाने के लिए आगरा के रामबाग चौराहे से सीधा रास्ता गया है। इसी रास्ते पर अनेकों मुगलकालीन ऐतिहासिक इमारत भी देखने को मिलते हैं जिनमें सबसे मुख्य ईमारत है नूरजहां के पिता का मकबरा जिसे वर्तमान में एत्माउद्दौला कहते हैं। यह भी एक शानदार ईमारत है, इसकी चर्चा हम अगले भाग में करेंगे। 

      मेहताब बाग़ के निकट मुगलकालीन लाल पत्थरों से निर्मित एक सीढ़ी दिखाई देती है, इसे ग्यारह सीढ़ी कहा जाता है क्योंकि इस सीढ़ी में कुल ग्यारह स्टेप हैं, यह भी मुगलकालीन धरोहर है और इसे देखकर लगता है कि मुगलकाल में इसका प्रयोग यमुना नदी से जल को खींचने के लिए किया जाता होगा, बिलकुल एक कुएं की तरह, अथवा ये भी हो सकता है कि शाही परिवार के लोग इस सीढ़ी से चढ़कर ताजमहल का दीदार करते होंगे। 

   किन्तु जब मैंने यहाँ के स्थानीय निवासियों से इस ग्यारह सीढ़ी संरचना के बारे में विस्तार से जानकारी ली तो मुझे पता चला कि यह एक प्राचीन खगोलीय वेधशाला का एक भाग है जिसका निर्माण द्वितीय मुग़ल बादशाह हुमांयू के समय में हुआ था और यह खगोलीय जानकारी प्राप्त करने हेतु निर्मित की गई थी। इसके साथ इस वेधशाला की और भी संरचनाएं थीं जो यमुना नदी में आई बाढ़ के कारण क्षतिग्रस्त हो गईं, बस वर्तमान में यह ग्यारह सीढ़ी ही यहाँ दिखाई देती है। 

   आज के इस ब्लॉग में हमने आगरा के मेहताब बाग़ और ग्यारह सीढ़ी के बारे में जानकारी दी है जो मुगलकाल के शासक क्रमशः हुमांयु, शाहजहां और औरंगजेब द्वारा निर्मित ऐतिहासिक स्थलों को देखा। जल्द ही अगले ब्लॉग में हम आगरा शहर के अन्य ऐतिहासिक स्थलों को उजागर करेंगे। आइये अब चित्र दीर्धा देखते हैं। 

मेहताब बाग़ जाने वाले रास्ते से आगरा किले का एक दृश्य यमुना पार दिखाई देता हुआ 

मेहताब बाग़ की विस्तृत जानकारी देता एक सुचना पट्ट