जनवरी के घने कोहरे के बीच लोहागढ़ किले की एक यात्रा
16 JAN 2024,
बीती रात वृन्दावन से लौटने के बाद हम अपने घर पर आराम से सोये और अगली सुबह हम बाइक से आज भरतपुर जाने के लिए तैयार हो गए। आज , कल की अपेक्षा ठण्ड अत्यधिक थी और कोहरा भी बहुत घना था। दिन निकल आया है ऐसा प्रतीत ही नहीं हो रहा था। सौरभ भाई के अनुसार उन्हें उत्तर भारत की इस भयंकर सर्दी का एहसास नहीं था, इस कोहरे का उन्हें तनिक भी आभास नहीं था अन्यथा वह इस यात्रा को जनवरी में प्लान नहीं करते।
हम बाइक से भरतपुर मार्ग पर पहुंचे, शीतलहर चल रही थी और सड़क पर घने कोहरे का साम्राज्य था। आज मथुरा से भरतपुर की यह 30 किमी की छोटी सी दूरी भी बहुत लम्बी प्रतीत हो रही थी। मेरे पास मफलर देखकर सौरभ भाई के मित्रों ने मुझसे इसके बारे में पूछा और कल रात ही अपने लिए एक नया मफलर खरीद लिया था। आज की इस यात्रा में इस मफलर ने उन्हें बहुत राहत पहुंचाई।
रास्ते में एक दुकान पर हमने रूककर गर्मागर्म चाय पी और उनके पश्चात पुनः भरतपुर की ओर रवाना हो गए।
भरतपुर में जाट शासकों द्वारा निर्मित एक भव्य किला है जिसे लोहागढ़ के नाम से जाना जाता है। इस किले का निर्माण जाट वंश के महाराजा सूरजमल ने 19 फरवरी 1733 को शुरू करवाया था। इसे 'लोहागढ़' इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसकी दीवारें इतनी मजबूत थीं कि ब्रिटिश सेना 13 बार आक्रमण करने के बाद भी इसे भेद नहीं पाई थी। इस किले की दीवारें पत्थर या लोहे की नहीं, बल्कि दोहरी मिट्टी की बनी हैं। तोप के गोले मिट्टी में धंस जाते थे और बेअसर हो जाते थे।
किले के चारों ओर एक गहरी खाई है, जिसमें मोती झील से सुजानगंगा नहर का पानी भरा रहता था। किले में प्रवेश के लिए दो मुख्य द्वार हैं—उत्तर में अष्टधातु द्वार (जिसे महाराजा जवाहर सिंह 1765 में दिल्ली से लाए थे) और दक्षिण में चौबुर्झा द्वार।
सर्वप्रथम हम किले के अंदर स्थित जवाहर बुर्ज पहुंचे। मुगलों पर विजय की स्मृति में महाराजा जवाहर सिंह ने इसका निर्माण कराया था। यहाँ कुछ इमारतें है और एक लौहस्तम्भ है जो दर्शनीय है।
इसके पश्चात हम किले के अंदर स्थित राजकीय संग्रहालय पहुंचे। मैं इसे पहले भी देख चुका हूँ इसलिए मैं बाहर ही रुक गया और सौरभ भाई अपने मित्रों के साथ संग्रहालय देखने गए। इस संग्रहालय में प्राचीन हथियार, सिक्के और ऐतिहासिक वस्तुएं रखी हैं।
शीघ्र ही हम किले के अंदर किशोरी महल पहुंचे। यह किले का मुख्य महल है और राजा सूरजमल जी का निवास स्थान है। किशोरी महल के बाहर ही महाराजा सूरजमल की अश्वारूढ़ एक भव्य प्रतिमा है जो उनकी वीरता और कुशलता का एहसास कराती है।
कुछ देर किला घूमने के बाद हम पुनः मथुरा की ओर वापस लौट गए।
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