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Sunday, October 25, 2026

MEWAR 2024 : DESURI & HILO KI ODI

 

 मेवाड़ की ऐतिहासिक यात्रा पर - वर्ष 2024 

भाग 3 - देसुरी और हिलो की ओदी ( एक शिकारगाह )


   चारभुजानाथ जी के दर्शन करने के बाद अब मैं रणकपुर की ओर रवाना हो गया था। यह सफर मेवाड़ की धरती से मारवाड़ को जोड़ता है क्योंकि रणकपुर, मारवाड़ प्रान्त में पाली जिले में स्थित है और अभी हम मेवाड़ प्रान्त के राजसमंद जिले में खड़े हैं। गढ़बोर से आगे बढ़ने पर 'देसूरी की नाल' नामक स्थान आता है। यह कोई बड़ा बाजार नहीं था और नाही इस नाम से कोई गाँव या क़स्बा ही यहाँ था। यह अरावली शृंखला को पार करने के लिए एक घाट सेक्शन है जिसे देसूरी की नाल कहा जाता है अर्थात आप मेवाड़ की ऊंचाई से मारवाड़ की निचली धरती की तरफ बढ़ रहे होते हैं। 

घना जंगल और अरावली के पर्वतों को पार करने के बाद मैं पाली जिले में प्रवेश कर गया और इसका पहला स्थान देसूरी के नाम से आया। मेवाड़ की सीमा रेखा पर, मारवाड़ के पाली जिले का यह अंतिम क़स्बा है और एक मुख्य चौराहा है जहाँ से पाली, जोधपुर और मरुस्थलीय भूमि में जाने का मार्ग खुलता है और साथ ही रणकपुर की तरफ जो रास्ता गया है वहां से सीधे जालोर और आबू पर्वत भी जाया जा सकता है। देसूरी एक बड़ा बाजार है और मारवाड़ प्रान्त का अंतिम क़स्बा है। यहाँ रूककर मैंने थोड़ा रेस्ट लिया और एक कोल्ड्रिंक पी। 

देसूरी  के नजदीक एक बीहड़ स्थान पर हिलो की ओदी नामक एक शिकारगाह है, यह एक ऐतिहासिक इमारत है जो एक सुनसान जंगली इलाके में बनी हुई है। इसके बारे में जब से मैंने सुना था तब से इसे देखने का मन बना लिया था और आज अंततः मुझे इसके नजदीक तक पहुँचने का मौका तो मिल गया था किन्तु कोई व्यवस्थित या वैकल्पिक मार्ग नहीं मिल रहा था। इस ओदी तक पहुँचने का कोई सुगम मार्ग उपलब्ध नहीं था। मारवाड़ की इस धरती पर, मैं कँटीले वृक्षों और कच्चे रास्तों के बीच बाइक लेकर इस ओदी तक पहुंचा। 

इस ओदी से पहले एक छोटी सी नदी दिखाई देती है, यह नदी बाइक से पार नहीं हो सकती थी इसलिए मैंने अपनी बाइक को इसके एक किनारे ही खड़ा कर दिया और पैदल पैदल ही ओदी तक पहुंचा। यहाँ कोई पुरातत्व विभाग का बोर्ड नहीं था बस एक देसूरी पंचायत का इस ऐतिहासिक महत्त्व वाले स्थान को सुरक्षित रखने की चेतावनी से लिखा बोर्ड अवश्य दिखाई दिया था। जब तक मैंने इस ओदी को पूर्ण रूप से नहीं देखा था तब तक मैं इसके बारे में कुछ भी नहीं समझ पाया था, कि आखिर यह क्या है। 

किन्तु जब मैं इस ओदी के नजदीक पहुंचा और इसे गौर से देखा तो पाया कि यह एक पत्थरों से बनी एक छोटी घुमावदार संरचना है जो दो से तीन मंजिला है और इसमें एक कमरे जितनी जगह है किन्तु इसके चारों ओर खुली हुई खिड़किया सी हैं। पूर्ण रूप से इसका अवलोकन करने के बाद और इसकी खिड़कियों से चारों तरफ के दृश्यों को देखने के बाद मेरी समझ में आ गया था कि यह एक शिकारगाह है जहाँ कभी राजशाही लोग इस ओदी में सुरक्षित छिपकर जंगली जानवरों का शिकार करते होंगे। 

इस वियावान और सुनसान स्थान पर कोई राजा, महल या किला तो नहीं बनवाएगा और मैंने ऐसा महल या किला पहले कभी नहीं देखा था। यह किला तो हो नहीं सकता था और इसकी संरचना इसके महल होने का कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं करती है। एक गोल घुमावदार संरचना जो तीन मंजिला है यह प्राचीन शिकारगाह ही हो सकती है। जिसप्रकार एक किसान अपने खेतों के किनारे पर एक या दो मंजिला मचान खड़ा करता है यह ठीक, वैसी ही थी। 

मैं काफी देर इस ओदी के पास घूमता रहा, वर्तमान में यहाँ समाज के अराजकतत्व इसमें शरण लेते हैं और अपने शाही शौकों को पूरा करते हैं जिनके साक्ष्य शराब की टूटी पड़ी बोतलों और शीशियों के रूप में यहाँ दिखाई दे रहे थे। कुछ मोहब्बत के परवानों ने यहाँ अपना और अपनी प्रेमिका नाम भी इस ओदी की दीवारों पर तीर वाले दिल की आकृति के बीच में लिखा हुआ था। इसके अलावा कबाड़ बीनने वालों ने इसमें लगे लौह तत्वों को निकालने की भी पूरी कोशिस की लगती दिखाई देती है। 

मैंने इस ओदी के नजदीक खड़े होकर और इसकी तीनों मंजिलों से खड़े होकर इसके आसपास के दृश्यों को देखा और कल्पना की, कि प्राचीन समय के लोग या राजा, महाराजा जब अपने शिकार के शौक को पूरा करने के लिए इस ओदी में आते होंगे तो वह इस ओदी में छिपकर और आराम से बैठकर जंगली जानवरों का शिकार करते होंगे जो इस ओदी के सामने बहती नदी में पानी पीने आते होंगे। यह ओदी बहुत सोच समझकर एक ऐसे स्थान पर बनाई गई है जहाँ से जंगली जंतुओं का शिकार करना काफी आसान रहता होगा। 

यहाँ आकर मुझे तेज धूप और प्यास लग आई थी, इसलिए इसे देखने के बाद मैं पुनः देसूरी की तरफ वापस चला आया और देसूरी के बाजार में आकर मैंने पुनः एक कोल्ड्रिंक ली। राजस्थान में पानी के पाउचों की कोई आवश्यकता नहीं होती क्योंकि यहाँ जगह जगह पर बड़े बड़े घड़ों  में ठंडा पानी आज भी राजगीरों के लिए मुफ्त में उपलब्ध रहता है। 

चूँकि देसूरी, मारवाड़ प्रान्त का आखिरी क़स्बा है और यह मेवाड़ - मारवाड़ की सीमा पर स्थित है इसलिए मारवाड़ के शासकों ने यहाँ एक पहाड़ी पर देसूरी के किले का निर्माण भी करवाया था। यह किला मुझे एक ऊँची चोटी पर स्पष्ट रूप से नजर आ रहा था किन्तु समयाभाव के कारण मैंने इस किले तक जाना उचित नहीं समझा क्योंकि मेरा लक्ष्य आज सिर्फ रणकपुर ही था और वह अभी यहाँ से क़ाफी दूर था। देसूरी  में कुछ समय रुकने के बाद मैं रणकपुर की ओर रवाना हो चला।      







हिलो की ओदी

हिलो की ओदी





हिलो की ओदी

हिलो की ओदी















हिलो की ओदी






अगली यात्रा : - रणकपुर के जैन मंदिरों की ओर