Saturday, October 24, 2026

MEWAR 2024 : SRI CHARBHUJA JI TEMPLE

 

श्री चार भुजा नाथ मंदिर - गढ़बोर 


राजसमंद किले से लौटने के बाद मैं और अभिषेक घर लौटे। घर पहुंचकर देखा तो जीतू अपनी माइंस पर जाने के लिए बिल्कुल तैयार था। आज मुझे जीतू की बाइक लेकर कुम्भलगढ़ और रणकपुर की तरफ घूमने जाना था लगभग यहाँ से 80 किमी दूर था। जीतू की पत्नी सुगंधा मेरे लिए स्वादिष्ट नाश्ता लगाकर ले आई जिसे ग्रहण कर, मैं जीते के साथ उसकी माइंस की तरफ रवाना हो चला। जीतू की माइंस संगमरमर की एक खान है जो अरावली की खदानों में से एक है। जीतू इस माइंस में क्रेन ऑपरेटर हैं। 

राजसमंद से कुछ दूर आकर हम संगमरमर के डम्पिंग यार्ड के नजदीक पहुंचे। यहाँ दूर दूर तक सफ़ेद रंग की धरती नजर आती है जिसे देखकर एक बार को ऐसा लगता है जैसे हम किसी बर्फीले क्षेत्र में आ गए हों किन्तु यह बर्फ नहीं थी बल्कि मार्बल की खदानों से निकलने वाला कचरा यहाँ एकत्र किया गया था जो अब एक सुन्दर सफ़ेद क्षेत्र में परिवर्तित हो गया है। यहाँ लोग प्री वीडिंग शूट करने और रील बनाने के लिए आते हैं। 

जल्द ही मैं जीते की माइंस पर पहुंचा। जीतू ने मुझे अपनी बाइक दे दी और वह अपनी माइंस पर अपनी ड्यूटी करने चला गया। मैं उसकी बाइक लेकर गढ़बोर स्थित चार भुजा नाथ मंदिर की तरफ बढ़ चला।

मेवाड़ के गढ़बोर में स्थित श्री चार भुजा नाथ मंदिर, भगवान विष्णु को समर्पित है। इस मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु की काले रंग की बेसाल्ट पत्त्थर से निर्मित चार हाथों वाली प्रतिमा है जिसमे उनके प्रत्येक हाथ में शंख, पदम्, गदा और चक्र धारण किये हैं। चार हाथ होने के कारण ही इसे चार भुजा नाथ मंदिर कहते हैं। वर्तमान में इस मंदिर की देखभाल राजस्थान की गुर्जर समुदाय की जाति के लोग करते हैं। 

दरअसल इस मंदिर का इतिहास वैदिक कालीन है जो महाभारत के पांचो पांडवों से जुड़ा है। भगवान् श्री कृष्ण ने अपने गोलोक प्रस्थान से पूर्व पांचों पांडवों को अपनी चार भुजा रूपी एक प्रतिमा पांडवों को भेंट की थी। पांचों पांडव नित्य प्रतिदिन इस प्रतिमा की पूजा अर्चना किया करते थे। पांडवों के पृथ्वी लोक गमन के बाद भी सैकड़ों वर्षों तक इस प्रतिमा की पूजा अर्चना होती रही। 

किन्तु मध्यकाल के दौरान जब मेवाड़ पर इस्लामिक आक्रमण हुए तो इस प्रतिमा को गढ़बोर के निकट एक कुंड में विसर्जित कर दिया गया ताकि आक्रमणकारी इस प्राचीन और आध्यात्मिक प्रतिमा को नष्ट ना कर दें। अनेकों वर्षों तक यह प्रतिमा उस कुंड में जलमग्न रही और सुरक्षित रही। कुछ सालों के पश्चात गुर्जर जाति के सुरा नामक एक चरवाहे को यह प्रतिमा दिखाई दी। माना जाता है कि सुरा नामक उस चरवाहे जो स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने सपने में आकर इस प्रतिमा को कुंड से निकालने का आदेश दिया था। सुरा ने इस प्रतिमा को जलकुंड से निकालकर एक ऊँचे स्थान पर स्थापित किया और पूरी भक्ति के साथ इस प्रतिमा की पूजा अर्चना करना प्रारम्भ की। 

इसके कुछ समय पश्चात यहाँ के शासक गंगदेव को भी भगवान् श्री कृष्ण ने स्वप्न में आकर दर्शन दिए और इस प्रतिमा के लिए एक मंदिर का निर्माण करने को कहा। चौदहवीं शताब्दी में राजा गंगदेव ने श्री चारभुजानाथ जी का एक विशाल सुन्दर मंदिर का निर्माण करवाया।  चूँकि सुरा नामक चरवाहा गुर्जर समुदाय से था और उसी ने इस प्रतिमा को खोजा था इसलिए इस प्रतिमा की पूजा और अर्चना तथा मंदिर के देख रेख वर्तमान में भी गुर्जर समुदाय के लोगों द्वारा ही संपन्न होती है। 

मंदिर के अंदर उपलब्ध शिलालेखों के अनुसार, वर्तमान मंदिर का निर्माण और जीर्णोद्धार 15वीं शताब्दी (लगभग 1444 ईस्वी) में हुआ था। उस समय इस क्षेत्र को 'बद्री' और मंदिर को 'बद्रीनाथ' के नाम से भी जाना जाता था।

मंदिर का निर्माण उत्तर भारत की नागर शैली में हुआ है। इसके गर्भगृह की दीवारें रंग-बिरंगे कांच और दर्पण की कलाकारी से सुसज्जित हैं, और मंदिर के कपाट चांदी से ढके हुए हैं। प्रतिमा में भगवान चारभुजा रूप में शंख, चक्र, गदा, पद्म के अलावा तलवार और ढाल से भी सुसज्जित हैं।

श्री चारभुजानाथ जी के मंदिर के प्रवेश द्वार पर दो विशाल हाथियों की प्रतिमाये भी देखने को मिलती है। सफ़ेद संगमरमर से निर्मित यह राजस्थान के मेवाड़ प्रान्त के चार प्रमुख मंदिरों में से एक है। 

हर साल भाद्रपद शुक्ल एकादशी (जलझूलनी एकादशी) पर यहां एक विशाल और प्रसिद्ध 'लखी मेला' भरता है, जिसमें भगवान के चलायमान स्वरूप को पालकी में बैठाकर गाजे-बाजे और गुलाल के साथ तालाब तक स्नान के लिए ले जाया जाता है।  

वर्ष 2013 में भी मैं एकबार इस मंदिर में दर्शन कर चुका था किन्तु तब मुझे इस मंदिर के इतिहास की कोई विस्तृत जानकारी नहीं थी। 


गढ़बोर जाने वाले रास्ते में एक मंदिर 

गढ़बोर द्वार 


श्री चारभुजा नाथ मंदिर 


मंदिर का प्रवेश द्वार 

श्री चारभुजानाथ जी के विग्रह दर्शन 

प्राचीन मंदिर की वास्तुकला 
















मंदिर के नजदीक भीम कुंड 






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