जम्मू और कश्मीर एक प्राचीन बौद्ध स्थल - अम्बारां
21 OCT 2023,
अखनूर किले से निकलने के बाद हम कुछ ही दूरी पर स्थित एक प्राचीन बौद्ध स्थल पर पहुंचे। यह चिनाब नदी के ठीक किनारे पर स्थित है। यहाँ प्राचीन बौद्ध स्तूप होने के प्रमुख प्रमाण मिले है और पुरातत्व विभाग द्वारा यहाँ उत्खनन कराये जाने के बाद इसके प्राचीन बौद्ध स्थल होने की पुष्टि हुई है। जम्मू कश्मीर राज्य का सबसे पहला बौद्ध स्थल होने की पुष्टि।
अखनूर के नजदीक ही अम्बारां नामक स्थान है जहाँ चिनाब नदी के दाहिने तट पर एक प्राचीन स्थल होने के प्रमाण मिले। वर्ष 1973 - 74 के बीच भारतीय पुरातत्व विभाग के श्रीनगर मंडल द्वारा यहाँ प्रथम बार सीमित उत्खनन कराया गया परन्तु वर्ष 1999 - 2001 एवं 2008 - 09 में इसके पुनः उत्खनन के पश्चात यहाँ एक प्राचीन बौद्ध स्तूप होने के प्रमाण मिले। विस्तृत उत्खनन के पश्चात यह पूर्ण रूप से एक प्राचीन बौद्ध विहार के रूप में विश्व के समक्ष उजागर हुआ। यहाँ हुए उत्खनन के पश्चात इसके सांस्कृतिक महत्त्व के चार अलग अलग काल खंडों का पता चला है।
प्रथम काल खंड, दूसरी - पहली शताब्दी ईसा पूर्व का है जिसके फलस्वरूप यहाँ उत्खनन से प्राप्त हुए इस काल के धूसर मृदभांडों के टुकड़े प्राप्त हुए जिसने अंदाजा लगाया जा सकता है कि यहाँ पहली और दूसरी शताब्दी में कोई प्राचीन बस्ती रही होगी।
द्वितीय काल खंड एक महत्वपूर्ण काल खंड है क्योंकि यह कुषाण कालीन है क्योंकि पहली से तीसरी सदी ईस्वी के मध्य यहाँ बौद्ध स्तूप और विहार का निर्माण हुआ और साथ ही यहाँ से कुषाणकालीन सम्राट कनिष्क और हुविष्क के ताँवे के सिक्के भी प्राप्त हुए हैं।
इस काल के सही अवशेषों में सबसे प्रमुख है एक स्तूप का अधिष्ठान जो 6 X 6 मीटर वर्गाकार है और इसमें सादी अलंकृत ईंटों का प्रयोग किया गया गया है। इसके मध्य भाग में नदी के छोटे छोटे पत्थर, मिटटी के साथ गारे में लगाए गए हैं जिनेक ऊपर स्तूप का अण्ड एवं हर्मिका आदि रहे होंगे, जिनके ध्वंशावशेष उत्खनन से प्राप्त हुए हैं।
इसके अलावा यहाँ अन्य छोटे छोटे स्तूप भी मिले हैं जिनका निर्माण कुषाणकाल या उत्तर कुषाणकाल के दौरान किया गया होगा।
तृतीय कालखंड, गुप्त काल का माना जाता है जिसकी संभावित तिथि चौथी और पांचवीं सदी ईस्वी हो सकती है, इस काल में इस बौद्ध विहार की दीवारों को और अधिक मजबूत और सुदृढ़ किया गया था, इसके साथ ही इन दीवारों सुन्दर मृण्मूर्तियों को भी अलंकृत किया गया था जिनके अवशेष इस स्थान से प्राप्त हुए हैं और जिनका निर्माण गुप्तकाल के दौरान हुआ था।
चतुर्थ काल खंड लगभग छटवीं और सातवीं ईस्वी के मध्य का है जिसे गुप्तोत्तर काल भी कहा जाता है। इस काल में बौद्ध विहार की दीवारों का जीर्णोद्धार करवाया गया और इसे सुरक्षित रखने की पूर्ण कोशिश की गई। गुप्तोत्तर काल के पश्चात भारत भूमि से बौद्ध धर्म का पतन होना शुरू हो गया जिसके फलस्वरूप इस बौद्ध विहार को कोई संरक्षण प्राप्त नहीं हो सका और यह नदी में आई बाढ़ के कारण अधिकांश रूप से नष्ट हो गया।
यहाँ लगे पुरातत्व बोर्ड के अनुसार जानकारी मिलती है कि इस स्तूप के उत्खनन से एक ताम्र मंजूषा प्राप्त हुई जिसके अंदर रजत मंजूषा और उसके अंदर भगवान बुद्ध के पवित्र अस्थि अवशेष सहित स्वर्ण मंजूषा प्राप्त हुई जिसके अंदर कुछ स्वर्ण एवं रजत पत्र, मोती, मनके और ताम्र मुद्राएं आदि प्राप्त हुईं।
प्रसिद्ध बौद्ध गुरु दलाई लामा ने 16 नवंबर 2011 को इस ऐतिहासिक और प्राचीन बौद्ध स्थल का दौरा किया था। अपनी यात्रा के दौरान दलाई लामा ने इस प्राचीन मठ परिसर को देखकर कहा था कि अंबारन में मिलने वाले अवशेष इतने महत्वपूर्ण हैं कि इनके अध्ययन से बौद्ध इतिहास के कुछ पहलुओं को फिर से लिखने की आवश्यकता पड़ सकती है। उनकी इस ऐतिहासिक यात्रा के बाद ही यह स्थान वैश्विक स्तर पर चर्चा में आया और इसे अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध मानचित्र पर एक विशेष पहचान मिली।
काफी देर मैंने इस परिसर को निहारा और प्राचीन कला विधियों को देखा। इस बौद्ध विहार के परिसर में एक छोटा सा संग्रहालय भी है जिसमें इसके उत्खनन से संबंधित अनेकों जानकारियां और चित्र देखने को मिलते हैं, यहाँ से जो कुछ भी प्राप्त हुआ वह देश के अलग अलग संग्रहालयों में सुरक्षित रखवा दिए गए हैं।
हमारे अनुरोध पर यहाँ कार्यरत गार्ड ने हमारे लिए म्यूजियम का गेट खोल दिया और हमने इस संग्रहालय में यहाँ उत्खनन से प्राप्त हुई सामग्री और इस स्थान के विभिन्न समयों पर हुई खुदाई के बारे में विस्तृत जानकारी ली। इसके पश्चात हम यहाँ से वापस जम्मू की ओर रवाना हो गए।
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| इसी पुल के नीचे अम्बारां का प्राचीन बौद्ध विहार है। |
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| प्राचीन बौद्ध विहार का प्रवेश द्वार |
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| अपनी बाइक खड़ी करता साहिल |
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| पुरास्थल अम्बारां का ऐतिहासिक पटल |
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| इंग्लिश में भी उपलब्ध है। |
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| प्राचीन बौद्ध स्तूप का अवशेष |
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| अन्य लघु स्तूपों के अवशेष |
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| प्राचीन बौद्ध स्तूप के अवशेष जहाँ से स्वर्ण मंजूषा प्राप्त हुई। |
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| अन्य लघु स्तूप |
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| संग्रहालय में रखी प्राचीन बौद्ध स्तूप की प्रति |
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| 2011 में अम्बारां बौद्ध विहार की यात्रा करते प्रसिद्ध बौद्ध गुरु दलाई लामा |
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| इस चित्र स्वर्ण मंजूषा की प्राप्ति का वर्णन देता है |
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| इस स्थल से प्राप्त हुए मृदभांड और उनके अवशेष |
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| दूसरी - पहली सदी ईसापूर्व के प्राचीन अवशेष |
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| इस बौद्ध स्थल की विस्तृत जानकारी |
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| बौद्ध विहार परिसर स्थित एक लघु संग्रहालय |
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| बौद्ध विहार के नजदीक बहती चिनाब नदी |
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| अम्बारां बौद्ध विहार से वापसी |
इस यात्रा की मुख्य और अंतिम कड़ी :- अन्नू की शादी में जम्मू की एक शाम