Sunday, December 31, 2023

A VILLAGE TRIP : DHORPUR 2023

वर्ष 2023 में मेरी पैतृक गाँव धौरपुर की यात्रा 


मकर सक्रांति पर अपने गाँव धौरपुर में एक रात 

यूँ तो प्रत्येक वर्ष, मैं होली और दीपावली जैसे प्रमुख त्योहारों पर अपने पिताजी के अर्थात अपने गांव धौरपुर जाता हूँ। मेरा यह गाँव उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले में है। मेरे गांव का सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन हाथरस जंक्शन अथवा हाथरस रोड है। यहाँ से मेरे गांव की  कुल दूरी एक किमी के आसपास है। जब कभी कोई साधन नहीं मिलता तो मैं पैदल ही अपने गांव पहुँच जाता हूँ। मेरे गाँव में मेरे चाचा जी और मेरे चचेरे भाई रहते हैं। दादा दादी के गुजर जाने के बाद बस चाचाजी से ही मिलने गाँव आना जाना लगा रहता है और साथ ही साल के इन प्रमुख त्योहारों पर अपने पूवजों और उनके थानों को पूजकर उनसे आशीर्वाद ले लेता हूँ। 

इस बार, मैं मकर सक्रांति पर अपने रिश्तों के सफर पर था, इसलिए मेरा धौरपुर जाना भी हुआ। हाथरस जंक्शन क्षेत्र में अपनी मौसी और बुआजी के गाँव जाकर उनसे मिलने के बाद देर शाम में अपने गाँव धौरपुर पहुंचा। जनवरी का महीना है इसलिए सर्दी जोरों पर थी और वैसे भी मैं आज सुबह से ही बाइक यात्रा कर रहा हूँ, इसलिए घर आते आते और भी ठण्ड में जकड गया हूँ। 

जाते ही मुझे मेरी भाभी ने गर्मागर्म चाय लाकर दी और मैं अगहाने के निकट बैठकर गर्मागर्म चाय का आनद लेता रहा और अपने चाचाजी से बतयाता रहा। अगहाना हमारे गांव में अलाप को कहते हैं अलाप मतलब जलती हुई आग का एक ढेर। 


मेरे चाचाजी भी मेरे पिताजी की तरह भारतीय रेलवे से रिटायर्ड हैं, और मेरे दादाजी भी भारतीय रेलवे में ही कार्यरत थे। मैंने काफी देर तक चाचाजी से बातें की, इस बीच भाभी जी ने मेरे लिए गर्मागर्म भोजन लाकर दिया। इनसे पूर्व मेरी चाची भी मुझे इसी तरह प्रेम  परोसती थीं, किन्तु दो वर्ष पूर्व वह हम सभी से दूर गोलोक को प्रस्थान कर गईं। किन्तु आज भी जब कभी मैं अपने गाँव आता हूँ उन्हें अवश्य याद करता हूँ। 

 शाम का भोजन पाकर मैं अपने भाई और बचपन के दोस्त नीटू के साथ गाँव के बाहर घूमने चला गया। यह हमारी बचपन से ही आदत रही है, मैं जब भी अपने गाँव आता हूँ, हमेशा अपने भाई नीटू के साथ गांव और अपने खेतों की तरफ घूमने निकल जाता हूँ। 

हमारे गाँव के नजदीक से दिल्ली - हावड़ा रेल लाइन गुजरती है। हम इस रेलवे लाइन तक ही घूमने आते हैं, इस बीच में हमारे पूर्वजों के थान भी आते हैं, हम उन्हें भी प्रणाम कर लेते हैं। वापस घर लौटने के पश्चात मैं देर रात चाचाजी से बात करते हुए सो गया। अगली सुबह चाचाजी और भाई भाई से विदा लेकर मैं वापस मथुरा लौट आया।      






APRIL 2023

माँ के साथ धौरपुर यात्रा 


अगली बार मैं अपनी माँ और पत्नी के साथ अपने गाँव धौरपुर गया। मेरी माँ पिछले कई दिनों से मुझसे गाँव जाने की बोल चुकी थीं, क्योंकि चाची जी के जाने बाद, दो वर्ष से वह धौरपुर नहीं गई थी, इसबार उनका इरादा पक्का था अतः मेरा उनके साथ जाना आवश्यक हो गया और फिर मैं अपनी माँ और पत्नी के साथ गाँव के लिए रवाना हो गया। 

हमारे गाँव में दुर्गे माता का एक मंदिर हैं, आज वहां श्रीमद्भागवत कथा का समापन और प्रसाद का भंडारा था। माँ के पास इसका निमंत्रण पहले ही आ चुका था अतः आज भगवान् का प्रसाद भी गाँव में खाने को मिलने वाला था।  

सुबह 11 बजे वाली पैसेंजर ट्रेन से हम मथुरा से अपने गाँव के लिए निकले और शीघ्र ही हाथरस रोड स्टेशन पहुंचे। 
यहाँ से हमारा गाँव एक किमी दूर है, हमें एक बैटरी रिक्शा मिल गया जिसके जरिये हम अपने गाँव अपने घर पहुंचे। 
माँ और कल्पना से मिलकर चाचाजी और मेरे भैया भाभी बहुत खुश हुए। काफी  देर तक माँ और चाचा जी आपस में बातें करते रहे। नीटू और रचना भाभी अभी यहाँ नहीं थीं वो सब ग्वालियर गए हुए थे। 

मैं शाम को चाचाजी के साथ भंडारा खाने दुर्गे माता के मंदिर पर गया। भंडारे का प्रसाद सर्वदा ही स्वादिष्ट होता है, जितना भी खाओ मन नहीं भरता। भंडारे में प्रसाद स्वरूप हमें माल पुआ, आलू की मिक्स सब्जी और खीर का भोग प्राप्त हुआ। मनभर प्रसाद पा लेने के बाद हम और चाचाजी श्रीमद्भागवत जी और दुर्गे माता को प्रणाम कर वापस अपने घर पहुंचे। 

अब मेरा मथुरा वापस लौटने का समय हो गया था, मैंने माँ से वापस चलने के लिए पूछा तो उन्होंने मना कर दिया, वो अभी यहाँ कुछ और दिन रहना चाहती थीं। इसलिए मैं और कल्पना ही माँ और चाचाजी से विदा लेकर वापस मथुरा की और रवाना हो गए।   


दुर्गे माता के मंदिर की तरफ जाते मेरे चाचा जी 


मेरी माँ के साथ, मेरी कल्पना और मेरी नीलम भाभी 

























MAY  2023

माँ को पांच दिन पहले मैं अपने गाँव धौरपुर छोड़ गया था, वो यहाँ रहना चाहती थीं, इनकी इस प्रबल इच्छा को देखते हुए मैं उन्हें यहीं छोड़ गया था।  इस बीच मेरा भाई नीटू और रचना भाभी भी ग्वालियर से वापस आ गए और उन्होंने माँ की खूब सेवा की। आज पांच दिन बाद, ओफ्फिसऑफिस  से ड्यूटी ख़त्म कर बाइक से माँ को लेने गाँव पहुंचा। मुझे गाँव तक पहुँचने में रात हो गई। यहाँ मुझे मेरा भाई नीटू मिला तो सही किन्तु हम दोनों के बीच कोई गहरी बात नहीं हुई। 

अगली सुबह नीटू अपने विद्यालय की ओर निकल गया और मैं रेलवे पटरियों की और। सुबह सबेरे अपने खेतों के बीच घूमते हुए,  बम्बा के किनारे किनारे रेल पटरियों तक आना बहुत अच्छा लगता है। वैसे तो हमेशा मैं और नीटू ही यहाँ एक साथ आते हैं किन्तु समयाभाव के कारण आज वो मेरे साथ नहीं था। कुछ देर रेल पटरियों के पास समय गुजारकर मैं वापस घर की तरफ चल दिया इस बीच हमारे थान और पीपल बाबा को मैं प्रणाम करना नहीं भूला। 

मैं, माँ को साथ लेकर अब अपनी बुआ जी के गाँव अमोखरी के लिए निकल गया। लगभग तीन चार घंटे अमोखरी में बुआ जी के पास रुककर माँ वापस मथुरा को चल दी। माँ, बाइक पर कम्फर्टेबले नहीं थीं इसलिए हाथरस पहुंचकर मैंने अपने जान पहचान वाले एक सज्जन की गाडी में उन्हें बैठा दिया जिससे वह मथुरा तक आसानी से पहुँच गईं। इस प्रकार मेरी माँ की यह धौरपुर यात्रा भी पूर्ण हो गई जोकि अंत में जाकर यह उनकी अंतिम धौरपुर यात्रा बनकर रह गई। 


सुबह सबेरे एक ट्रैन दिल्ली की तरफ जाते हुए 

सुबह सबेरे गाँव के बाहर का एक दृश्य 

हमारे गाँव का बम्बा 

हावड़ा - दिल्ली रेल मार्ग 


वो सामने पीपल के पेड़ के नीचे हमारे पूर्वजों का स्थान है। 


NOVEMBER 2023

और इस वर्ष अंतिम बार मैं दीपावली पर आपने गया जहाँ मैंने अपने चाचा जी के साथ अपने पूर्वजों के थान की पूजा की और उनका आशीर्वाद प्राप्त किया। 









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