Saturday, October 21, 2023

JAMMU 2023 : AMBARAN - A BUDDHIST SITE IN JAMMU


जम्मू और कश्मीर एक प्राचीन बौद्ध स्थल - अम्बारां 



21 OCT 2023,

अखनूर किले से निकलने के बाद हम कुछ ही दूरी पर स्थित एक प्राचीन बौद्ध स्थल पर पहुंचे। यह चिनाब नदी के ठीक किनारे पर स्थित है। यहाँ प्राचीन बौद्ध स्तूप होने के प्रमुख प्रमाण मिले है और पुरातत्व विभाग द्वारा यहाँ उत्खनन कराये जाने के बाद इसके प्राचीन बौद्ध स्थल होने की पुष्टि हुई है। जम्मू कश्मीर राज्य का सबसे पहला  बौद्ध स्थल होने की पुष्टि। 

अखनूर के नजदीक ही अम्बारां नामक स्थान है जहाँ चिनाब नदी के दाहिने तट पर एक प्राचीन स्थल होने के प्रमाण मिले। वर्ष 1973 - 74 के बीच भारतीय पुरातत्व विभाग के श्रीनगर मंडल द्वारा यहाँ प्रथम बार सीमित उत्खनन कराया गया परन्तु वर्ष 1999 - 2001 एवं 2008 - 09 में इसके पुनः उत्खनन के पश्चात यहाँ एक प्राचीन बौद्ध स्तूप होने के प्रमाण मिले। विस्तृत उत्खनन के पश्चात यह पूर्ण रूप से एक प्राचीन बौद्ध विहार के रूप में विश्व के समक्ष उजागर हुआ। यहाँ हुए उत्खनन के पश्चात इसके सांस्कृतिक महत्त्व के चार अलग अलग काल खंडों का पता चला है। 

प्रथम काल खंड, दूसरी - पहली शताब्दी ईसा पूर्व का है जिसके फलस्वरूप यहाँ उत्खनन से प्राप्त हुए इस काल के धूसर मृदभांडों के टुकड़े प्राप्त हुए जिसने अंदाजा लगाया जा सकता है कि यहाँ पहली और दूसरी शताब्दी में कोई प्राचीन बस्ती रही होगी। 

द्वितीय काल खंड एक महत्वपूर्ण काल खंड है क्योंकि यह कुषाण कालीन है क्योंकि पहली से तीसरी सदी ईस्वी के मध्य यहाँ बौद्ध स्तूप और विहार का निर्माण हुआ और साथ ही यहाँ से कुषाणकालीन सम्राट कनिष्क और हुविष्क के ताँवे के सिक्के भी प्राप्त हुए हैं। 

इस काल के सही अवशेषों में सबसे प्रमुख है एक स्तूप का अधिष्ठान जो 6 X 6 मीटर वर्गाकार है और इसमें सादी अलंकृत ईंटों का प्रयोग किया गया गया है। इसके मध्य भाग में नदी के छोटे छोटे पत्थर, मिटटी के साथ गारे में लगाए गए हैं जिनेक ऊपर स्तूप का अण्ड एवं हर्मिका आदि रहे होंगे, जिनके ध्वंशावशेष उत्खनन से प्राप्त हुए हैं। 
इसके अलावा यहाँ अन्य छोटे छोटे स्तूप भी मिले हैं जिनका निर्माण कुषाणकाल या उत्तर कुषाणकाल के दौरान किया गया होगा। 

तृतीय कालखंड, गुप्त काल का माना जाता है जिसकी संभावित तिथि चौथी और पांचवीं सदी ईस्वी हो सकती है, इस काल में इस बौद्ध विहार की दीवारों को और अधिक मजबूत और सुदृढ़ किया गया था, इसके साथ ही इन दीवारों सुन्दर मृण्मूर्तियों को भी अलंकृत किया गया था जिनके अवशेष इस स्थान से प्राप्त हुए हैं और जिनका निर्माण गुप्तकाल के दौरान हुआ था। 

चतुर्थ काल खंड लगभग छटवीं और सातवीं ईस्वी के मध्य का है जिसे गुप्तोत्तर काल भी कहा जाता है। इस काल में बौद्ध विहार की दीवारों का जीर्णोद्धार करवाया गया और इसे सुरक्षित रखने की पूर्ण कोशिश की गई। गुप्तोत्तर काल के पश्चात भारत भूमि से बौद्ध धर्म का पतन होना शुरू हो गया जिसके फलस्वरूप इस बौद्ध विहार को कोई संरक्षण प्राप्त नहीं हो सका और यह नदी में आई बाढ़ के कारण अधिकांश रूप से नष्ट हो गया। 

यहाँ लगे पुरातत्व बोर्ड के अनुसार जानकारी मिलती है कि इस स्तूप के उत्खनन से एक ताम्र मंजूषा प्राप्त हुई जिसके अंदर रजत मंजूषा और उसके अंदर भगवान बुद्ध के पवित्र अस्थि अवशेष सहित स्वर्ण मंजूषा प्राप्त हुई जिसके अंदर कुछ स्वर्ण एवं रजत पत्र, मोती, मनके और ताम्र मुद्राएं आदि प्राप्त हुईं। 

प्रसिद्ध बौद्ध गुरु दलाई लामा ने 16 नवंबर 2011 को इस ऐतिहासिक और प्राचीन बौद्ध स्थल का दौरा किया था। अपनी यात्रा के दौरान दलाई लामा ने इस प्राचीन मठ परिसर  को देखकर कहा था कि अंबारन में मिलने वाले अवशेष इतने महत्वपूर्ण हैं कि इनके अध्ययन से बौद्ध इतिहास के कुछ पहलुओं को फिर से लिखने की आवश्यकता पड़ सकती है। उनकी इस ऐतिहासिक यात्रा के बाद ही यह स्थान वैश्विक स्तर पर चर्चा में आया और इसे अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध मानचित्र पर एक विशेष पहचान मिली।


काफी देर मैंने इस परिसर को निहारा और प्राचीन कला विधियों को देखा। इस बौद्ध विहार के परिसर में एक छोटा सा संग्रहालय भी है जिसमें इसके उत्खनन से संबंधित अनेकों जानकारियां और चित्र देखने को मिलते हैं, यहाँ से जो कुछ भी प्राप्त हुआ वह देश के अलग अलग संग्रहालयों में सुरक्षित रखवा दिए गए हैं। 

हमारे अनुरोध पर यहाँ कार्यरत गार्ड ने हमारे लिए म्यूजियम का गेट खोल दिया और हमने इस संग्रहालय में यहाँ उत्खनन से प्राप्त हुई सामग्री और इस स्थान के विभिन्न समयों पर हुई खुदाई के बारे में विस्तृत जानकारी ली। इसके पश्चात हम यहाँ से वापस जम्मू की ओर रवाना हो गए।   


इसी पुल के नीचे अम्बारां का प्राचीन बौद्ध विहार है। 

प्राचीन बौद्ध विहार का प्रवेश द्वार 

अपनी बाइक खड़ी करता साहिल 


पुरास्थल अम्बारां का ऐतिहासिक पटल 

इंग्लिश में भी उपलब्ध है। 



प्राचीन बौद्ध स्तूप का अवशेष 

अन्य लघु स्तूपों के अवशेष 

प्राचीन बौद्ध स्तूप के अवशेष जहाँ से स्वर्ण मंजूषा प्राप्त हुई। 













अन्य लघु स्तूप 




संग्रहालय में रखी  प्राचीन बौद्ध स्तूप की प्रति 



 2011 में अम्बारां बौद्ध विहार की यात्रा करते प्रसिद्ध बौद्ध गुरु दलाई लामा 

इस चित्र स्वर्ण मंजूषा की प्राप्ति का वर्णन देता है 



इस स्थल से प्राप्त हुए मृदभांड और उनके अवशेष 

दूसरी - पहली सदी ईसापूर्व के प्राचीन अवशेष 




इस बौद्ध स्थल की विस्तृत जानकारी 



बौद्ध विहार परिसर  स्थित एक लघु संग्रहालय 



बौद्ध विहार के नजदीक बहती चिनाब नदी 

अम्बारां बौद्ध विहार से वापसी 


इस यात्रा की मुख्य और अंतिम कड़ी :- अन्नू की शादी में जम्मू की एक शाम 
 

JAMMU 2023 : AKHNOOR FORT & CHINAB RIVER


 अख़नूर का किला, चिनाब नदी और पांडव गुफा 


21 अक्टूबर 2023

     भारत के जम्मू कश्मीर राज्य में जम्मू शहर से 28 किमी दूर, चिनाब नदी के दाहिने तट पर स्थित अखनूर का किला, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण स्थल माना जाता है। यह किला एक प्राचीन स्थल पर स्थित है जिसे स्थानीय रूप से मांडा के नाम से जाना जाता है जो कि सिंधु घाटी सभ्यता का सबसे उत्तरी छोर कहलाता है। यहाँ हुई खुदाई में तीन काल की संस्कृतियों के साक्ष्य मिले हैं—हड़प्पा कालीन बर्तन, आरंभिक ऐतिहासिक वस्तुएं और कुषाण काल के अवशेष।

यह कभी हड़प्पा कालीन नगर था जो कि आस्किन नदी के किनारे स्थित था। आस्किन नदी को वर्तमान में चिनाब नदी कहते है एवं इसका एक नाम चंद्रभागा भी है। किले के अंदर हुए उत्खनन से प्राप्त अवशेषों से ही इसके प्राचीन तीन संस्कृतियों के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। 

मध्यकाल में इस किले का निर्माण 1762 ईसवीं में महाराजा तेज सिंह ने करवाया था, और उनके पश्चात उनके उत्तराधिकारी, राजा आलम सिंह ने 1802 ईस्वी में इसे पूर्ण करवाया। 17 जून 1822 को इसी किले के पास चिनाब नदी के जिया पोता घाट पर महाराजा रणजीत सिंह ने महाराजा गुलाब सिंह का राज्याभिषेक भी किया था।

'अखनूर' नाम के बारे में कहा जाता है कि मुगल सम्राट जहाँगीर की आँखों में संक्रमण हो गया था। यहाँ की ठंडी हवा और वातावरण से उनकी आँखों की रोशनी में सुधार हुआ, जिसके बाद इसे 'आँख-का-नूर' कहा गया जो बाद में अखनूर बन गया।

ऐसा भी माना जाता है कि अखनूर महाभारत काल की प्रसिद्ध विराट नगरी है। यहाँ पास में ही एक प्राचीन गुफा स्थित है जिसे पांडव गुफा के नाम से जाना जाता है, गुफा के अंदर पाँचो पांडवों सहित राजा विराट और महर्षि वेदव्यास जी की प्रतिमा दर्शनीय है। 

Friday, October 20, 2023

JAMMU 2023 : A NIGHT IN A VILLAGE OF JAMMU


जम्मू और कश्मीर के गांव की एक रात 



20 - 21 अक्टूबर 2023 

शाम को साहिल के साथ मैं रिसोर्ट से उसके गाँव की तरफ रवाना हो चला। मेरे लिए यह पहला मौका था जब मैं जम्मू कश्मीर राज्य के किसी गाँव को देखूंगा और साथ ही एक रात वहां ठहरूंगा। जम्मू से अखनूर जाने वाला राजमार्ग बहुत ही शानदार था, सर्दियों की शुरुआत हो चुकी थी इसलिए साहिल की बाइक पर मुझे हलकी हलकी ठण्ड सी भी लग रही थी। इसी रास्ते से दूर कहीं पहाड़ों में माता वैष्णोंदेवी का धाम भी नजर आ रहा था, जो कि पहाड़ पर जलती बत्तियों की रौशनी से स्पष्ट पहचान में आ रहा था। मुझे साहिल ने ही बताया था कि यह माता वैष्णों देवी का मंदिर है और यह साहिल के गाँव और उसके घर की छत से भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। 

JAMMU 2023 : BAHU FORT & TEMPLE

अन्नू की शादी में 

जम्मू शहर की एक यात्रा 


20 अक्टूबर 2023 

अगली सुबह हम जम्मू रेलवे स्टेशन पहुँच चुके थे। काफी देर प्रतीक्षा कराने के बाद अंततः लड़के वालों की ओर से एक गाडी आई और हम सभी उसमें सवार होकर अखनूर रोड पर स्थित जम्मू के N N रिसोर्ट पहुंचे। यह रिसोर्ट मुख्य राजमार्ग से थोड़ा सा अंदर था। रिसोर्ट में ही एक बड़ा हॉल था जिसमें हमारे रुकने की व्यवस्था की गई थी। यहीं हम सभी नहा धोकर तैयार हो गए। रिसोर्ट को शादी के लिए सजाने का कार्य चल रहा था, जो कि तीन दिन बाद ही थी। 

अक्टूबर माह की सुबह सुबह की गुनगुनी धुप बहुत ही शानदार लगती है। यह मौसम सर्दियों का आगाज होता है और मौसम ठंडा होने की कगार पर होता है। आज यहाँ हमारा कोई विशेष काम नहीं था इसलिए मैं कुमार से पूछकर जम्मू शहर घूमने के  लिए निकल गया। रिसोर्ट से राजमार्ग तक मैं पैदल पहुंचा और पहुँचते ही मुझे जम्मू शहर जाने वाली मिनी बस मिल गई जो कि जम्मू की नगरीय बस कहलाती हैं। 

जल्द ही बस ने मुझे जम्मू के एक मुख्य चौक पर उतार दिया। यहाँ एक बाहु नामक प्रसिद्ध किला है जहाँ बाहु वाली माता का विशाल मंदिर है। यह मंदिर जम्मू के एक  ऊँचे स्थान पर हैं जहाँ जाने के लिए अनेकों छोटी बसें चलती है। एक ऐसी ही बस द्वारा मैं बाहु वाली माता के मंदिर पहुँचा। चूँकि अभी नवरात्री चल रही हैं इसलिए मुझे यहाँ बहुत रोल चोल देखने को मिली। बाहु माता का मंदिर किले के बीच भाग में है, यहाँ देवी माता के महाकाली के रूप में दर्शन हैं। मैं माता के दर्शन करने के लिए लाइन में लग गया। 

Thursday, October 19, 2023

JAMMU 2023 : MTJ TO JAT BY KOTA EXPRESS



मथुरा से जम्मू - अन्नू की शादी में 


19 OCT 2023, 

अक्टूबर का महीना है, इस समय मौसम बदलता है और त्योहारों का समय चल रहा है। अभी नवरात्री हैं और कुछ समय बाद दीपावली का महापर्व भी आएगा। यह एक ऐसा समय होता है जब मेरा कार्य जोरों शोरों से चलता है और मुझे खाना खाने तक की भी फुर्सत नहीं मिल पाती है। इसी बीच मेरे परम मित्र कुमार भाटिया का मुझे कॉल आता है और वह मुझसे तुरंत जम्मू चलने के लिए बोलता है। दरअसल एक दो दिन बाद कुमार की छोटी बहिन अन्नू की शादी है, और इसके लिए वह अपने परिवार और रिश्तेदारों के साथ जम्मू जा रहा है। 

उसने अपने परिवार और रिश्तेदारों की सभी कन्फर्म टिकट कोटा एक्सप्रेस में बुक कर रखे हैं। आज यात्रा का दिन है और उसके साथ सिवाय उसके परिवार के जाना वाला कोई नहीं था, उसकी अधिकांश सीटें खाली जा रही हैं क्योंकि उसके अधिकतर रिश्तेदार अपनी पारवारिक जिम्मेवारियों के बीच जम्मू नहीं जा रहे हैं। चूँकि उसकी ट्रेन मथुरा से शाम को जाने वाली है इसलिए उसने मुझे फोन करके अपने साथ चलने को कहा, बिना सोचे समझे मैंने उसे हाँ बोल दिया। आखिर वो मित्र है और मैं उसकी सहायता के लिए हमेशा तत्पर रहता हूँ। 

मैंने ऑफिस में सर से इमरजेंसी में तीन दिन का अवकाश लिया जो कि सर ने स्वीकृत नहीं किया क्योंकि यह मेरी कंपनी का मुख्य सीजन का समय था किन्तु मेरे लिए मेरा कार्य प्रतिदिन का है, परन्तु अभी सिर्फ मित्रता निभाने का समय है और यही सोचकर मैं कुमार के साथ जम्मू के लिए रवाना हो चला। अपनी माँ से आज्ञा और आशीर्वाद लेकर मैं मथुरा रेलवे स्टेशन पहुंचा और कुछ ही समय बाद आगरा से कुमार भी अपने परिवार सहित मथुरा स्टेशन आ पहुंचा। मुझे देखकर वह अत्यंत ही प्रसन्न हुआ। जल्द ही कोटा एक्सप्रेस से हम जम्मू के लिए रवाना हो चले। 

Thursday, October 12, 2023

AGRA : ROMAN CATHOLIC CEMETERY


आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 6

 रोमन कैथोलिक कब्रिस्तान


आगरा में रोमन कैथोलिक कब्रिस्तान का निर्माण 1550 ई. में हुआ था और इसका इस्तेमाल सबसे पहले उन अर्मेनियाई ईसाइयों को दफनाने के लिए किया गया था, जो अकबर के शासनकाल के दौरान इस शहर में आकर बस गए थे। इनके बाद, जैसे-जैसे इस इलाके में दूसरे लोग आकर बसते गए, वैसे-वैसे अन्य ईसाई संप्रदायों के लोगों को भी यहाँ दफनाया जाने लगा।


इस कब्रिस्तान में सबसे पुरानी कब्र जॉन मिल्डेनहॉल की है। जॉन मिल्डेनहॉल एक अंग्रेज व्यापारी थे, जिनकी मृत्यु 1614 में हुई थी। कहा जाता है कि वह पहले ऐसे अंग्रेज थे, जिन्होंने "अकबर को आमने-सामने देखा था"। लेकिन यहाँ कुछ और कब्रें भी हैं, जो ध्यान देने लायक हैं न सिर्फ उन लोगों से जुड़ी कहानियों की वजह से, बल्कि उन कब्रों की वास्तुकला की वजह से भी।

Saturday, September 23, 2023

DELHI 2023 : ASHOKA EDICT


दिल्ली में सम्राट अशोक का शिलालेख 


सन 1966 में जब राजधानी दिल्ली में आवासीय प्रसार अपने चरम पर था तभी आवासीय कॉलोनी बनाने वाले एक ठेकेदार की नजर एक ऐसी ऐतिहासिक चट्टान पर पड़ी जिस पर कुछ चिन्हों की भाषा उत्कीर्ण थी जो अपठनीय थी। उसने तुरंत इसकी सूचना सम्बंधित अधिकारी को दी और इसके बाद पुरातत्ववेत्ताओं इस चट्टान की  जाँच की। इस जांच में उन्होंने पाया कि यह भाषा प्राचीन समय की है और यह प्राकृत अथवा ब्राह्मी लिपि थी। 

इस भाषा के अक्षर,  इससे पूर्व दिल्ली में पाए गए अशोक स्तम्भों से मेल खाती थी, साथ ही बैराट स्थित शिलालेख से इसकी समानता प्रतीत होती थी, इससे यह स्पष्ट हो गया कि यह शिलालेख सम्राट अशोक द्वारा ही उत्कीर्ण है और बाद में जब इस भाषा का अनुवाद किया गया तो फिर इसमें कोई संदेह ही नहीं बचा कि यह सम्राट अशोक का ही शिलालेख है। वर्तमान में भारतीय पुरातत्व विभाग ने इसे सम्राट अशोक के लघु शिलालेख की श्रेणी में रखा है। 

DELHI 2023 : LOTUS TEMPLE


बहाई उपासना मंदिर - दिल्ली 


19 वीं सदी में ईरान में एक प्रमुख संत बहाउल्लाह द्वारा बहाई धर्म की स्थापना की गई थी जो सभी धर्मों के मूल महत्त्व और मानव - एकता की शिक्षा देता है। शुरुआत में यह ईरान और पश्चिमी एशिया के कुछ हिस्सों में विकसित हुआ और अंत में यह भारत में भी विकसित होने लगा। बहाई धर्म में कोई पुरोहित नहीं होता, यह केवल ईश्वरीय प्रार्थना पर निर्भर है। 

भारत में राजधानी दिल्ली में कालकाजी के संमीप स्थित कमल मंदिर बहाई धर्म का एक मुख्य केंद्र अथवा प्रार्थना स्थल है। सफ़ेद संगमरमर से बनी 9 पंखुड़ियों वाले इस कमल मंदिर की शोभा ना सिर्फ भारत देश में अपितु समूचे विश्व भर में प्रसिद्ध है। 

बहाई कमल मंदिर सभी धर्मों के लोगों के लिए खुला है, यहाँ बिना किसी भेदभाव के, किसी भी धर्म या जाति के  लोग आसानी से प्रवेश कर सकते हैं और शांत वातावरण के बीच ईश्वर की प्रार्थना कर सकते हैं। बहाई धर्म, एक ईश्वर, एक धर्म और एक मानवता के जोर पर बल देता है। 

DELHI 2023 : ISCON TEMPLE

 

इस्कॉन मंदिर - दिल्ली 

23 SEP 2023

दिल्ली के पूर्वी कैलाश में श्री कृष्णा हिल्स में दिल्ली का इस्कॉन मंदिर स्थित है। इस मंदिर को श्री श्री राधा पार्थसारथी मंदिर कहते हैं क्योंकि मंदिर के गर्भगृह में भगवान श्री कृष्ण के साथ राधा रानी की प्रतिमा स्थापित है। इस मंदिर का उद्घाटन 5 अप्रैल 1998 को भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी जी ने किया था। यह भारत के सबसे बड़े मंदिरों में से एक है। मंदिर में अनेकों कक्ष और सभागार हैं। 

इस मंदिर की सबसे मुख्य विशेषता है कि यहाँ विश्व की सबसे बड़ी पुस्तक अद्भुत भगवत गीता रखी हुई है जो इटली में मुद्रित हुई थी और जिसका वजन अनुमानित 800 किलोग्राम है। इसका अनावरण 26 फ़रवरी 2019 को भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा किया गया था। 

मैं आज सुबह ही यहाँ पहुँच गया और मंदिर के बाहर अपने जूते खोलकर दर्शन की लाइन में लग गया। अनेको दिल्लीवासी लोग यहाँ प्रभु के दर्शनों हेतु लाइन में लगे हुए थे और कुछ ही समय बाद मुझे भी ईश्वर के दर्शन हो गए। मंदिर काफी बड़ा है, अनेकों फुवारे मंदिर की शोभा को बढ़ाते हैं। सुरक्षा के लिए यहाँ हरसमय सुरक्षा कर्मी तैनात रहते हैं। 

Friday, September 1, 2023

KURUKSHETRA 2023 : SRI KRISHNA MUSEUM

 

श्री कृष्ण संग्रहालय - कुरुक्षेत्र 


ज्योतिसर धाम देखने के बाद मैं वापस कुरुक्षेत्र आ गया। मैं श्री कृष्ण संग्रहालय के नजदीक ही बस से उतरा था, यहाँ आकर मुझे भगवान श्री कृष्ण से जुडी समस्त लीलाओं को एक छत के नीचे देखने की इच्छा  हुई इसलिए मैंने 30 रूपये का टिकट लेकर संग्रहालय में प्रवेश किया और ईश्वर के अलग अलग स्वरूपों के साथ साथ उनकी दिव्य लीलाओं के दर्शन किये। 

हालांकि मैं ब्रजवासी हूँ और मथुरा नगर में रहता हूँ जहाँ साक्षात् भगवान श्री कृष्ण ने जन्म लिया था, किन्तु भगवान श्री कृष्ण के नाम से इस तरह का कोई भी संग्रहालय मथुरा अथवा वृन्दावन में नहीं है। अपने आराध्य के नाम से आज मुझे कुरुक्षेत्र की भूमि पर इस तरह का संग्रहालय देखने को मिला अन्यथा मैंने आज तक या तो ऐतिहासिक संग्रहालय देखे थे या फिर रेल संग्रहालय देखे हैं। 

इसी संग्रहालय के नजदीक ही कुरुक्षेत्र पैनोरमा और विज्ञानं केंद्र भी स्थित है। किन्तु मेरे पास अब समय का आभाव था और मुझे शीघ्र ही कुरुक्षेत्र रेलवे स्टेशन पहुंचना था। वहां से साढ़े तीन बजे मुझे गीता जयंती एक्सप्रेस पकड़नी है जिससे मैं मथुरा पहुँच सकूँ। 

KURUKSHETRA 2023 : JYOTISAR TIRTH

 

ज्योतिसर तीर्थ - कुरुक्षेत्र 



ब्रह्म सरोवर देखने और यहाँ स्नान करने के पश्चात मैं ज्योतिसर तीर्थ के लिए रवाना हुआ जो कि यहाँ से लगभग 15 से 20 किमी दूर था। ब्रह्म सरोवर के बाहर से ही मुझे हरयाणा की एक रोडवेज बस मिल गई और मैं जल्द ही ज्योतिसर तीर्थ पहुँच गया। 

माना जाता है कि ज्योतिसर ही वह प्रमुख स्थान है जहाँ महाभारत के युद्ध के दौरान भगवान् श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था और यहीं उन्हें अपने विराट स्वरुप के दर्शन कराये थे। अतः यह बहुत ही पावन तीर्थ स्थल है और सुन्दर स्थान है। कुरुक्षेत्र के मैदान से यह थोड़ी दूरी पर स्थित है। इस पावन स्थल पर वट वृक्ष लगे हुए हैं और यहाँ हाल ही मैं भगवान् श्री कृष्ण के विराट स्वरुप की एक दिव्य प्रतिमा भी लगाईं गई है। शाम के समय यहाँ लाइट एंड साऊंड शो की व्यवस्था भी है। 

यहाँ के सभी पावन मंदिरों और स्थलों के दर्शन करने के पश्चात मैं कुछ देर ज्योतिसर ग्राम में भी घूमा और इस पावन धरा को प्रणाम किया। 

KURUKSHETRA 2023 : STHANESHWAR TEMPLE & BHADRA KALI TEMPLE, DEVIKUP


स्थानेश्वर महादेव मंदिर एवं देवीकूप धाम 


कुरुक्षेत्र की भूमि, ना केवल पौराणिक ग्रंथों में विशेष महत्त्व रखती है बल्कि इसका भारत के प्राचीन इतिहास में भी महत्वपूर्ण स्थान रहा है। छटवीं शताब्दी में यहाँ पुष्यभूति वंश के महान सम्राट हर्षवर्धन का शासन रहा है जिनकी राजधानी कुरुक्षेत्र में स्थित थानेश्वर में ही थी। थानेश्वर शब्द, यहाँ स्थित स्थानेश्वर का ही अपभ्रंश है जो कि भगवान शिव का निवास माना जाता है।  

स्थानेश्वर मंदिर अत्यंत ही प्राचीन है और वर्धन काल में पुष्यभूति वंश के सम्राटों के कुलदेवता के रूप में विद्यमान हैं। ऐतिहासिक साक्ष्यों में हर्षवर्धन के पिता प्रभाकरवर्धन द्वारा इस मंदिर में पूजा का उल्लेख है। 

KURUKSHETRA 2023 : HARSH KA TEELA


 सम्राट हर्षवर्धन का टीला - थानेश्वर 



शेख़ चिल्ली के मकबरे के ठीक पीछे सम्राट हर्षवर्धन का टीला दिखाई देता है। छटवीं शताब्दी में यहाँ पुष्यभूति वंश के राजा हर्षवर्धन की राजधानी थी जिसे थानेश्वर के नाम से जाना जाता था, उसी राजधानी के अवशेष वर्तमान में यहाँ टीले में दबे हुए दिखाई देते हैं। 

 7वीं शताब्दी के वर्धन साम्राज्य के राजा हर्षवर्धन की राजधानी रहे इस स्थान पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की खुदाई में कुषाण काल से लेकर मुगल काल तक (1-19वीं शताब्दी) की बस्तियों के अवशेष मिले हैं। यह स्थल, जो लगभग 1 किमी लंबा और 750 मीटर चौड़ा है, शेख चिल्ली के मकबरे के पास स्थित है और यहाँ खुदाई में प्राचीन महलों और संरचनाओं के अवशेष प्राप्त हुए हैं।

KURUKSHETRA : SHEIKH CHILLI TOMB


शेख़ चिल्ली का मक़बरा 


 

हरियाणा के कुरुक्षेत्र के थानेसर में स्थित शेख चिल्ली का मकबरा, मुगल बादशाह शाहजहाँ के सबसे बड़े बेटे दारा शिकोह ने लगभग 1650 ईस्वी में बनवाया था। यह मकबरा दारा शिकोह के आध्यात्मिक गुरु और प्रसिद्ध सूफी संत शेख चिल्ली की याद में निर्मित है, जिसे 'हरियाणा का ताजमहल' भी कहा जाता है।

यह मकबरा सूफी संत शेख चिल्ली (अब्दुल करीम) की याद में बनवाया गया था। जिसमें फारसी शैली, सफेद संगमरमर और पीले बलुआ पत्थर का उपयोग किया गया है।  यह मकबरा एक ऊंचे चबूतरे पर बना है और इसके परिसर में एक मदरसा और संग्रहालय भी स्थित है। 

शेखचिल्ली एक प्रसिद्ध मुस्लिम सूफ़ी संत थे।  माना जाता है कि वह 17वीं सदी में मुगल राजकुमार दारा शिकोह के गुरु थे, जिनका वास्तविक नाम अब्द-उर-रजाक या अब्द-उर-रहीम था। हरियाणा के थानेसर में स्थित उनका मकबरा भी उनके मुस्लिम सूफी परंपरा से जुड़ा होने का प्रमाण है।

KURUKSHETRA 2023 : BRAHM SAROVAR

 

ब्रह्म सरोवर 


कुरुक्षेत्र में स्थित ब्रह्म सरोवर, आध्यात्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऐसा माना जाता है कि सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा ने यहीं प्रथम यज्ञ किया था, जो सृष्टि की उत्पत्ति का प्रतीक है। ब्रह्म सरोवर का शांत और दिव्य वातावरण, तीर्थयात्रियों और पर्यटकों को आकर्षित करता है, सूर्य ग्रहण और धार्मिक त्योहारों के दौरान  इसके जल में स्नान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। 

अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव के दौरान भी यह स्थान आकर्षण का केंद्र बन जाता है , जब हजारों भक्त भगवद् गीता की शाश्वत शिक्षाओं को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए एकत्रित होते हैं। सुंदर ढंग से सजाए गए घाट, संध्या आरती और सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ इस अवसर की भव्यता को और बढ़ा देती हैं। वर्षों से, ब्रह्म सरोवर सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के केंद्र के रूप में विकसित हुआ है, जो पवित्रता, शांति और भारत की शाश्वत आध्यात्मिक विरासत का प्रतीक है।