NEAREST RAILWAY STATION : - THANESAR ( NR )
इस यात्रा के अन्य भाग
- ब्रह्म सरोवर
- शेख चिल्ली का मकबरा
- हर्ष का टीला
- स्थानेश्वर महादेव और देवीकूप धाम
- ज्योतिसर तीर्थ
- श्री कृष्णा संग्रहालय
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इस यात्रा के अन्य भाग
मथुरा से थानेश्वर - एक रेल यात्रा
सितम्बर का महीना चल रहा है जिसका मतलब ना अधिक सर्दी है और ना अधिक गर्मी है और अब बरसात भी थम सी चुकी है। यह यात्रा करने का सर्वोत्तम समय है इसलिए मैंने इस बार हरियाणा की यात्रा को महत्त्व देते हुए कुरक्षेत्र की यात्रा का मन बनाया। यहाँ प्रसिद्ध रणभूमि है जहाँ महाभारत का विशाल युद्ध हुआ था, यहीं भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को श्रीमद भगवद गीता का ज्ञान दिया था। इस पुण्य स्थान की यात्रा मेरे ब्लॉग में होनी चाहिए थे इसलिए मैंने इस यात्रा को पूर्ण किया।
शाम को मैं मथुरा रेलवे स्टेशन पहुंचा और आगरा छावनी से होशियारपुर जाने वाली ट्रैन में बैठा। रात बारह एक बजे अम्बाला पहुँच गया क्योंकि यह ट्रैन कुरुक्षेत्र पर नहीं रुकी। अम्बाला से कुरक्षेत्र वापसी के लिए मैं कालका मेल में बैठा जिसमे टिकट चल दस्ते वालों ने मुझसे मेरा टिकट माँगा। चूँकि मैं सिर्फ कुरुक्षेत्र तक जा रहा था, इसलिए स्टाफ बोलकर उनसे बैठने की रिक्वेस्ट की। उन्होंने मुझसे कुछ नहीं कहा।
मैं कुरुक्षेत्र उतरगया, अभी सुबह होने में काफी समय था इसलिए यहीं प्लेटफॉर्म पर एक बेंच पर सो गया। अगली सुबह जब उठा तो कैथल जाने वाली पैसंजर तैयार खड़ी हुई थी। इसी ट्रेन से मैं थानेसर आ गया जो ब्रह्म कुंड के बिलकुल नजदीक था।
अगला भाग - ब्रह्म सरोवर
इस यात्रा के अन्य भाग
आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 5
काफूर की मस्जिद और पत्थर के घोड़े की प्रतिमा
आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 3
यूँ तो मैं बचपन से ही आगरा शहर में रहा किन्तु कभी ताजमहल को यमुना के दूसरी पार से देखने का मौका नहीं मिला, कारण था इस स्थान की दूरी, और यहाँ जाने वाला रास्ता जिसके बारे में मुझे कोई विशेष जानकारी नहीं थी। जब कभी ताजमहल देखने का मन होता था तो इसके मुख्य द्वार से ही इसे जाकर देख आता था। किन्तु आगरा शहर छोड़ने के अनेक वर्षों बाद अपने पुराने शहर को घूमने की इच्छा मन में जाग्रत हुई और मैं अपनी बाइक उठकर निकल चला आगरा की ऐतिहासिक यात्रा पर।
इस यात्रा के तहत मैंने आगरा के उन स्थानों को चिन्हित किया जो मैंने पहले कभी नहीं देखे थे। इसलिए सबसे पहले मैं पहुंचा यमुना नदी के दूसरी पार, जहाँ आगरा की विभिन्न मध्यकालीन ऐतिहासिक इमारतें देखीं जा सकती थीं।
इन सभी स्थलों में सबसे मुख्य था मेहताब बाग़, जो मुगलकाल का एक शानदार बगीचा था। इसका निर्माण औरंगजेब ने अपने शासनकाल के दौरान कराया था। इस बगीचे से ताजमहल का बहुत ही शानदार दृश्य दिखाई देता है बिलकुल वैसे ही, जैसे हम इसे ताज के परिसर में प्रवेश करने के बाद देखते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि मेहताब बाग़ से आप सिर्फ ताजमहल को निहार सकते हैं, इसके ख़ूबसूरती को महसूस कर सकते हैं, यमुना नदी के जल में इसका प्रतिबिम्ब देख सकते हैं किन्तु आप इसे छू नहीं सकते, इसके नजदीक नहीं जा सकते हैं क्योंकि मेहताब बाग़ और ताजमहल के बीच यमुना नदी है और यहाँ इसे पार करने की इजाजत नहीं है।
आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 1
आगरा किला
आगरा किले का इतिहास
माना जाता है कि आगरा किले का निर्माण मुग़ल शासक अकबर ने करवाया था किन्तु उससे पूर्व भी आगरा किले के अस्तित्व में होने के कुछ उदाहरण मिलते हैं जिनके बाद स्पष्ट हो जाता है कि अकबर ने इस किले का निर्माण नहीं बल्कि इसके स्थान पर बने पुराने किले की मरम्मत कराकर इसे एक नया रूप दिया था।
इससे पूर्व यह एक ईंटों का किला था, जो सिकरवार वंश के राजपूतों के पास था। इसका प्रथम विवरण 1080 ई० में आता है जब महमूद गजनवी की सेना ने इस पर कब्ज़ा किया था।
सिकंदर लोदी (1487-1517), दिल्ली सल्तनत का प्रथम सुल्तान था जिसने आगरा की यात्रा की तथा इस किले की मरम्म्त 1504 ई० में करवायी और इस किले को अपने निवास के रूप में चुना। सिकंदर लोदी ने इसे 1506 ई० में राजधानी बनाया और यहीं से देश पर शासन किया। उसकी मृत्यु भी इसी किले में 1517 में हुई थी।
बाद में उसके पुत्र इब्राहिम लोदी ने भी नौ वर्षों तक इस किले से राज्य किया, जब तक वो पानीपत के प्रथम युद्ध (1526) में बाबर द्वारा मारा नहीं गया। उसने अपने काल में यहां कई स्थान, मस्जिदें व कुएं बनवाये जो आज भी आगरा में विभिन्न स्थानों पर दृष्टिगोचर होते हैं।
पानीपत के युद्ध के बाद मुगलों ने इस किले पर कब्ज़ा कर लिया साथ ही इसकी अगाध सम्पत्ति पर भी। इस सम्पत्ति में ही एक हीरा भी था जो कि बाद में कोहिनूर हीरा के नाम से प्रसिद्ध हुआ। तब इस किले में इब्राहिम के स्थान पर बाबर आया। उसने यहां एक बावली बनवायी।
सन 1530 में आगरा किले में हुमायुं का राजतिलक भी हुआ। हुमायुं इसी वर्ष बिलग्राम में शेरशाह सूरी से हार गया व किले पर उसका कब्ज़ा हो गया। इस किले पर अफगानों का कब्ज़ा पांच वर्षों तक रहा, जिन्हें अन्ततः मुगलों ने 1556 में पानीपत का द्वितीय युद्ध में हरा दिया।
MANDU - A CAPITAL OF MALWA
मालवा की प्राचीन और मध्य कालीन राजधानी - माण्डू

मालवा प्रान्त के विंध्याचल पर्वतमाला की गोद में स्थित मांडू प्राकृतिक रूप से बहुत ही सुन्दर स्थान है। इसके शांत वातावरण और आश्चर्य चकित कर देने वाले प्राकृतिक दृश्यों की वजह से यह अनेकों भारतीय राजाओं का पसंदीदा स्थल रहा है। मानसून के समय यहाँ फैली हरियाली और सुगन्धित वायु, अनायास ही मन को मोह लेती है। इसके अलावा विंध्य पर्वतों के बीच स्थित होने के कारण यह सुरक्षा की दृष्टि से भी सक्षम स्थान है इसीलिए प्राचीन काल से लेकर मध्य काल तक यह अनेकों राजवंशो की शरण स्थली और राजधानी रहा है।
दसवीं शताब्दी में यहाँ परमार वंश के शासकों का शासन रहा, जिनमें मुंज राज, सिद्धराज और राजा भोज का नाम प्रमुख है। हालाँकि इन शासकों की राजधानी धारा नगरी थी जो वर्तमान में धार जिला है, फिर भी उन्होने मांडू को भी अपना मुख्य राजनितिक केंद्र बनाये रखा था।
महेश्वर किला और घाट
30 JUL 2023
नर्मदा नदी के किनारे बसा महेश्वर एक अत्यंत ही सुन्दर पौराणिक नगर है। पुराणों के अनुसार यह प्राचीन काल में महिष्मती के नाम से विख्यात था और पौराणिक शासक सहस्त्रार्जुन की राजधानी था। इसके पश्चात सत्रहवीं शताब्दी में इसे मालवा की द्वितीय राजधानी होने का गौरव प्राप्त हुआ जब यहाँ महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने शासन किया। उन्होंने यहाँ अनेकों प्राचीन मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया और साथ अनेक नए मंदिरों का निर्माण कराया। माँ नर्मदा के किनारे एक विशाल किले के साथ ही सुन्दर रमणीक घाटों का निर्माण कराया। इस किले और घाटों का प्रतिबिम्ब नर्मदा नदी के जल में एक अलग ही आकर्षण के रूप में दिखाई देता है।
महेश्वर में माँ नर्मदा का स्वछन्द और शीतल जल मन को अति आनंदित करने वाला है, इसके किनारे के घाट यहाँ आने वाले सभी आगंतुकों का मन मोह लेते हैं। घाटों के किनारे स्थित नवीन एवं प्राचीन मंदिरों की श्रंखलाएं सनातन धर्म की महान व्याख्या का गुणगान करती हुई दिखालाई पड़ती हैं। यहाँ के मंदिरों में सुबह शाम होने वाली आरतियां और घंटे घड़ियालों की आवाजें रोम रोम में धार्मिक आस्था का भाव पैदा करती हैं। प्राचीन काल से ही महेश्वर धार्मिक गतिविधियों का केंद्र रहा है और वर्तमान में भी यह महेश्वर धाम के नाम से अपनी पहचान बनाये हुए है।
JAM GATE
जाम गेट
29 JUL 2023
पातालपानी जलप्रपात और चोरल बांध देखने के बाद हम महू - मंडलेश्वर मार्ग पर आ गए थे। पूरा रास्ता जंगली वनों से घिरा हुआ था। यह रास्ता मालवा को निमाड़ प्रान्त से जोड़ने का कार्य करता है। अभी हम विंध्याचल पर्वतमाला के उच्च पठारी भाग में थे। रास्ते में छोटी जाम के नाम से एक गाँव आया जहाँ हमने कुछ समय रुकने के लिए एक दुकान पर ठहरे। दुकानदार ने हमारे घूमने के उद्देश्य को जानकर बतलाया कि इस गांव में जाम किला है उसे आप देखकर आ सकते हो। यह किला हमें सड़क से स्पष्ट दिखाई दे रहा था। हम बिना देर किये इस किले की तरफ बढ़ चले।
इस किले को छोटी जाम के नाम से जाना जाता है। किले से थोड़ी दूर प्रसिद्ध पर्यटक स्थल जाम गेट है जिसका निर्माण इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने सन 1791 में कराया था। महेश्वर स्थित अपने किले से वह जब भी पालकी द्वारा इंदौर आया करती थीं तो यह जाम किला ही उनका रात्रि विश्राम स्थल हुआ करता था। जाम किले अथवा गांव से थोड़ी दूर जाम गेट एक भव्य दरवाजा है जहाँ से पर्वतों की तराई में स्थित सम्पूर्ण निमाड़ प्रान्त का विहंगम दृश्य देखा जा सकता है।
पातालपानी जलप्रपात
PATALPANI WATERFALL
29 JUL 2023
मालवा प्रान्त में इंदौर के निकट एक बहुत ही खूबसूरत जलप्रपात है। यह पातालपानी ग्राम के निकट है इसलिए इसे पातालपानी जलप्रपात कहते हैं। चोरल नदी जब यहाँ 300 फ़ीट की ऊँचाई से नीचे गिरती है तो यह एक प्राकृतिक सुन्दर जलप्रपात का निर्माण करती है। वर्तमान में यह ट्रैकिंग और पिकनिक स्थल के रूप में पर्यटकों का एक पसंदीदा स्थल बनकर उभरा है।
ब्रिटिश काल के दौरान इस जलप्रपात के नजदीक से अंग्रेजों ने रेल ट्रेक का निर्माण किया और इसी जलप्रपात के नाम से रेलवे स्टेशन का भी निर्माण कराया। वर्तमान में यह रेलवे स्टेशन जलप्रपात से थोड़ी दूर स्थित है किन्तु जब यहाँ से ट्रैन गुजरती थी तब ट्रेन से भी इस जलप्रपात को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता था।
मैं और सोहन भाई इंदौर के रशिया ढाबे से खाना खाकर और मोबाइल चार्ज करने के बाद महू क्षेत्र में पहुंचे। यूँ तो महू, डॉ. भीमराव अम्बेडकर का जन्मस्थान है साथ ही यह इंदौर नगर का छावनी क्षेत्र भी है। छावनी क्षेत्र से निकलकर हम जाम गेट की तरफ बढ़ रहे थे कि अचानक सोहन भाई को पातालपानी जलप्रपात की तरफ जाने वाला एक एक मार्गसूचक पट दिखाई दिया, भाई ने गाडी पातालपानी की तरफ घुमा दी और बहुत ही शानदार रास्तों से होकर शीध्र ही हम पातलपानी जलप्रपात की तरफ पहुंचे।
अवंतिका से मालवा की एक मानसूनी यात्रा - भाग 1
उज्जैन में रामघाट पर क्षिप्रा स्नान
यात्रा दिनाँक : - 29 जुलाई 2023
मानसून का मौसम यात्रा करने के लिए सबसे उपयुक्त और बेहद सुहावना मौसम होता है। मानसून के दौरान किसी भी स्थान की सुंदरता अपने पूर्ण चरम पर होती है और यही सुंदरता एक सैलानी के मन को यात्रा के दौरान उत्साह और आनंद से भर देती है। हम इसी मानसून में गत माह कोंकण और मालाबार की यात्रा पर गए थे जहाँ हमने केरला की राजधानी तिरुवनंतपुरम तक की यात्रा पूर्ण की थी,
इसी यात्रा में वापसी के दौरान हम केरल के मालाबार तट, पुडुचेरी के माहे नगर, कर्नाटक के मुरुदेश्वर, गोवा की राजधानी पणजी और ओल्ड गोवा एवं कोंकण रेलवे की यात्रा पूर्ण करके घर वापस लौटे थे। किन्तु मानसून अभी भी बरक़रार था और यह हमें फिर से उत्साहित कर रहा था एक और नई यात्रा करने के लिए।
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मैं पिछले कई वर्षों से मानसून के दौरान प्राचीन राज्य मालवा और इसकी मध्यकालीन राजधानी मांडू की यात्रा करना चाहता था। ऑफिस में बैठे बैठे मैंने इस यात्रा का प्लान तैयार किया और अपने सहकर्मी सोहन भाई को इस यात्रा में अपना सहयात्री चुना। सोहन भाई इस यात्रा के लिए तुरंत तैयार हो गए और हमारा यात्रा प्लान अब कन्फर्म हो गया।
मैंने इस यात्रा को प्राचीन अवन्ति, अर्थात उज्जैन से शुरू करके इंदौर, महेश्वर और मांडू तक पूरा करने का निर्णंय लिया जिसमें अधिकांश मालवा का भाग शामिल था। वर्तमान में यह मध्य प्रदेश कहलाता है, और प्राकृतिक सुंदरता से परिपूर्ण एवं अनुपम दृश्यों से भरपूर है।
UPADHYAY TRIPS PRESENT'S
कोंकण V मालाबार की मानसूनी यात्रा पर - भाग 15
केरला संपर्क क्रांति एक्सप्रेस - मडगांव से मथुरा
1 जुलाई 2023
हम शाम होने तक मडगांव रेलवे स्टेशन आ गए थे। यहाँ से हमारा रिजर्वेशन मंगला लक्षद्वीप एक्सप्रेस में था, जो रात को दो बजे के लगभग यहाँ आएगी। अभी रात के नौ बजे हैं, हम प्लेटफॉर्म पर बने खानपीन की स्टॉल पर गए और यहाँ कुछ इडली और डोसा खाकर हमने अपने रात्रिभोज को पूर्ण किया, इसके बाद क्लॉक रूम से अपना बैग लेकर अब घर लौटने की तैयारी करने लगे। अब हम अपनी यात्रा के अंतिम चरण में थे, और गोवा आकर हमारी यात्रा पूर्ण हो चुकी थी, अब वापसी यात्रा की बारी थी।
तभी रेलवे से सन्देश प्राप्त हुआ कि मंगला एक्सप्रेस में हमारी सीट आरएसी में ही रह गई थी। अब ट्रेन बदलने की प्लानिंग मेरे दिमाग में और तेज हो गई। दरअसल मंगला एक्सप्रेस में मुझे RAC सीट मिली जो मेरे लिए पर्याप्त नहीं थी, मंगला एक्सप्रेस वाया भुसावल, भोपाल होकर मथुरा आती है, इस वजह से यह एक लम्बी यात्रा करती है जिसमें समय भी बहुत अधिक लगता है।
मैंने मोबाइल में रेलवे ऍप्स क्रिस पर यहाँ से दिल्ली जाने वाली गाड़ियों के बारे में जानकारी ली जिसमें मुझे पता चला रात को साढ़े बारह बजे तक केरला संपर्क क्रांति एक्सप्रेस आ रही है जो सीधे दिल्ली जाने के लिए एक सुपरफास्ट ट्रेन है। इसका चार्ट बन चुका था, इसलिए इसमें तत्काल में भी रिजर्वेशन करना संभव नहीं था।
अतः एप्प में मैने ट्रेन की कोच पोजीशन देखी, जिसमें ट्रेन के अंत में अनेकों सामान्य कोच थे, और इसके बाद इस ट्रेन का शेडूअल देखा। मैंने दो सामान्य टिकट कोटा स्टेशन तक के लिए ले ली, क्योंकि कि इस ट्रेन का स्टॉप कोटा के बाद सीधे निजामुद्दीन ही था, यह मथुरा नहीं रुकने वाली ट्रेन है। इसलिए मैंने इस ट्रेन से कोटा तक आने का विचार किया था, उसके बाद वहाँ से तो मथुरा की अनेकों ट्रेनें हैं, कोई न कोई तो मिल ही जाएगी। मंगला एक्सप्रेस की टिकट कैंसल कर दी और अब केरल संपर्क क्रांति एक्सप्रेस से हमारी यात्रा निश्चित हो गई।
UPADHYAY TRIPS PRESENT'S
कोंकण V मालाबार की मानसूनी यात्रा पर - भाग 14
सेंट ऑगस्टीन गिरिजाघर और उसके खंडहर - ओल्ड गोवा
1 JULY 2023
प्राचीन मंदिर और उनके खंडहरों के अवशेष तो मैंने अब तक अपनी अनेकों यात्राओं में देखे थे, किन्तु आज पहलीबार मैंने अपनी इस गोवा की एक दिवसीय यात्रा के दौरान एक पुरानी चर्च के खंडहरों और उसके अवशेषों को देखा। यह चर्च ओल्ड गोवा में एक ऊँचे टीले पर स्थित थी, जब मैं यहाँ पहुंचा तो जाना यह सेंट ऑगस्टीन चर्च थी जो प्रकृति के कहर और पुर्तगाली शासन की उपेक्षाओं का शिकार हुई।
इस चर्च का निर्माण सोलहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में सेंट ऑगस्टीन भिक्षुओं ने करवाया था, वर्तमान में यह जिस टीले पर स्थित है, उस टीले को पवित्र पहाड़ी माना जाता है। अठाहरवीं शताब्दी में शहर में महामारी फैलने के बाद पूरा शहर वीरान हो गया, शहर के साथ साथ तत्कालीन सरकार और यहाँ के लोगों ने इस चर्च को भी त्याग दिया जिसके बाद बिना देख रेख के यह जीर्ण अवस्था को प्राप्त होने लगी, अंतत सन 1931 में इसका मुख्य द्वार आधी मीनार के साथ ध्वस्त हो गया। इसके ध्वस्त होने से पूर्व ही यहाँ लगी घंटी को पणजी की आवर लेडी ऑफ़ था इमेक्यूलेट कॉन्सेप्शन चर्च में स्थानांतरित कर दिया गया था जो वर्तमान में उपलब्ध है।
गोवा में एक दिवसीय यात्रा
1 JULY 2023
मडगांव से पोंडा - बस यात्रा
तेज बारिश के बीच गत रात्रि मडगांव स्टेशन पर सोने के बाद, अगली सुबह हम गोवा घूमने के लिए तैयार थे। यह गोवा में हमारी पहली यात्रा थी। मडगाव स्टेशन के क्लॉक रूम में अपना बैग जमा करने के बाद, हम बतौर सामान स्वतंत्र थे, और फिर स्टेशन के बाहर निकले।
कोंकण रेलवे का मडगाव स्टेशन गोवा का एक मुख्य रेलवे जंक्शन स्टेशन है। बारिश के मौसम में स्टेशन के बाहर का दृश्य बहुत ही सुहावना लग रहा था। मुझे जानकारी थी कि यहाँ घूमने के लिए आसानी से बाइक किराये पर मिल जाती हैं। मैं एक ऐसी ही बाइक की तलाश में था, किन्तु स्टेशन के बाहर मुझे कोई बाइक नहीं मिली।
स्टेशन के बाहर ही एक बस स्टॉप था जहाँ हम काफी देर तक खड़े रहे किन्तु कोई भी बस नहीं आई। बस की प्रतीक्षा करते हुए, बारिश अवश्य आ गई, इसलिए बिना देर किये एक ऑटो द्वारा हम गोवा के सेंट्रल बस स्टैंड पहुंचे। बस स्टैंड पहुँचने से पूर्व ऑटो वाले ने हमें दो तीन बाइक रेंट वाली दुकानों पर भी मिलवाया किन्तु वे लोग बतौर एक दिन किराये पर बाइक देने के लिए तैयार नहीं थे। बारिश के मौसम और अनजान शहर को देखकर हमने किराये की बाइक लेने का निर्णय त्याग दिया।