Tuesday, September 17, 2024

AGRA : LODI MOSQUE & TOMB

 

आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 12

लोदी काल की मस्जिद और मक़बरा 




🖍 - 17 सितम्बर 2024, 

आगरा, मध्यकालीन भारत का ऐतिहासिक नगर है, इस शहर को मुग़लकालीन राजधानी होने का गौरव प्राप्त है इसलिए यहाँ मुग़ल काल से जुड़े हुए अनेकों भव्य स्मारक मौजूद हैं, जिसका सबसे बड़ा उदाहरण ताजमहल है जिसके कारण आगरा को दुनिया भर में पहचान मिली है। नूरजहां के पिता एत्माउद्दौला का मकबरा, चीनी का रोजा, आगरा किला, जामामस्जिद, फतेहपुर सीकरी और सिकंदरा ये सभी आगरा की प्रमुख मुगलकालीन स्मारक हैं। 

 यूँ तो आगरा शहर की स्थापना 1504 ईसवी में सिकंदर लोदी ने की थी। आगरा से कुछ दूर दिल्ली मार्ग पर उसने सिकंदराबाद नामक शहर बसाया था जो कालांतर में सिकंदरा ने नाम से आज भी स्थित है। परन्तु यह सिकंदरा आज सिकंदर लोदी के कारण नहीं बल्कि मुग़ल सम्राट अकबर के मकबरे के कारण विश्व भर में विख्यात है। 

आगरा शहर की स्थापना का श्रेय सिकंदर लोदी को जाता है किन्तु आगरा शहर को पहचान मुग़ल शासक अकबर के शासनकाल में ही मिली, उसने इसे अपनी राजधानी बनाया और आगरा किला का निर्माण कराया। अकबर ने अपनी मृत्यु से पूर्व ही अपने मकबरे का भी निर्माण भी आगरा में ही कराया था।  

AGRA : SADIK KHAN & SALAWAT KHAN TOMB


आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 11

 सादिक खान और सलाबत खान का मकबरा


सादिक खान और उनके पुत्र सलाबत खान, मुगल काल के प्रमुख रईस थे और बादशाह जहांगीर एवं शाहजहाँ के अधीन उच्च पदस्थ अधिकारी थे। सलाबत खान, बादशाह शाहजहाँ के मुग़ल दरबार में मीर बख्शी (कोषाध्यक्ष) थे, जो 1644 में आगरा किले में अमर सिंह राठौर द्वारा मारे गए थे  जबकि उनके पिता सादिक खान की मृत्यु 1633 में ही हो गई थी। दोनों पिता पुत्र मुग़ल दरबार में क्रमशः बादशाह जहांगीर और शाहजहां के कार्यकाल के दौरान नियुक्त थे। 

AGRA : AKBAR TOMB



आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 10

जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर का मक़बरा  


17 सितम्बर  2024,

जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर का मकबरा आगरा के सिकंदरा में स्थित एक भव्य मुगलकालीन स्मारक है, जिसे उनके पुत्र जहांगीर ने 1605-1613 के बीच बनवाया था। लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर से निर्मित यह 119 एकड़ में फैली एक अनूठी पिरामिडनुमा संरचना है, जो इस्लामी, हिंदू और बौद्ध वास्तुकला का मिश्रण है।

 मुख्य मकबरे का प्रवेश द्वार बुलंद दरवाजे की शैली में बनाया गया है और जटिल नक्काशी से सजाया गया है।इस मकबरे की चारों कोनों पर सफेद संगमरमर की मीनारें हैं।

औरंगजेब के समय में इस मकबरे को जाटों द्वारा लूटा गया था, माना जाता है कि उन्होंने इस मकबरे से बादशाह अकबर के शरीर के अवशेषों को निकालकर उनका दाह संस्कार कर दिया। ब्रिटिश काल में अंग्रेजों (लॉर्ड कर्जन) ने इसकी मरम्मत कराई थी।

Thursday, August 8, 2024

AGRA : FIROZ KHAN TOMB

 

आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 9


फिरोज खान का मकबरा / FIROZ KHAN TOMB



  • फिरोज खान के मकबरे का निर्माण 17वीं शताब्दी में मुगल बादशाह शाहजहां के शासनकाल के दौरान हुआ था, जब फिरोज खान दीवान-ए-कुल के पद पर थे। फिरोज खान शाहजहां के एक विश्वसनीय अधिकारी थे, जो शाही हरम के प्रभारी के रूप में काम करते थे। उनकी मृत्यु 1637 में हुई थी।

फिरोज खान शाहजहां के शाही हरम के प्रभारी और दीवान-ए-कुल थे। 

लाल बलुआ पत्थर से निर्मित यह दो मंजिला मकबरा मुगलकालीन वास्तुकला का उदाहरण है।
  • यह मकबरा लाल बलुआ पत्थर से बना है और अष्टकोणीय (octagonal) आकार का है। यह दो मंजिला इमारत है।
  •  यह स्मारक एएसआई (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) द्वारा संरक्षित है, लेकिन यह एत्माद्दौला के मकबरे की तुलना में बहुत कम प्रसिद्ध और उपेक्षित है।
  • यह मकबरा आगरा शहर से लगभग 5 किमी दूर आगरा-ग्वालियर रोड पर स्थित है।

Friday, March 22, 2024

AGRA : ETMAUDDOULA


आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 7

एत्माउद्दौला का मक़बरा 


एत्माउद्दौला का मक़बरा, नूरजहाँ के पिता मिर्ज़ा ग्यासबेग़ का मकबरा है जिसे नूरजहाँ ने 1622-1628 के बीच अपने पिता मिर्ज़ा ग़ियासबेग की याद में बनवाया था। इसे 'बेबी ताज' या 'छोटा ताजमहल' भी कहा जाता है, क्योंकि यह पूरी तरह से सफेद संगमरमर से बना पहला मुगल मकबरा है और इसमें पित्रदुरा (कीमती पत्थरों की जड़ाई) का उत्कृष्ट काम किया गया है।

यह मकबरा मुगल साम्राज्ञी नूरजहाँ ने अपने पिता मिर्ज़ा ग़ियासबेग (जिन्हें जहाँगीर ने एतमादुद्दौला की उपाधि दी थी) की स्मृति में बनवाया था।

यह पूरी तरह से सफेद संगमरमर से निर्मित पहली मुगल इमारत है।

यह उत्तर प्रदेश के आगरा शहर में यमुना नदी के पूर्वी तट पर स्थित है और यह भारत में पूरी तरह सफेद संगमरमर से बने पहले मकबरों में से एक है।

मिर्ज़ा गियास बेग ( 1546 - 1621)

जिन्हें उनके शीर्षक एतिमाद-उद-दौला के नाम से भी जाना जाता है , मुग़ल साम्राज्य में एक महत्वपूर्ण अधिकारी थे। 


अपनी गर्भवती पत्नी इस्मत बेगम और तीन बच्चों के साथ वे भारत आ बसे। वहाँ मुगल सम्राट अकबर ने उन्हें अपनी सेवा में नियुक्त कर लिया। अकबर के शासनकाल में, मिर्ज़ा ग़ियास बेग को काबुल प्रांत का कोषाध्यक्ष नियुक्त किया गया 

अकबर के पुत्र और उत्तराधिकारी जहांगीर के शासनकाल में उनकी किस्मत और भी चमक उठी। 1611 में जहांगीर ने उनकी पुत्री नूरजहाँ से विवाह किया और मिर्ज़ा गियास बेग को अपना प्रधानमंत्री नियुक्त किया। 1615 तक, मिर्ज़ा गियास बेग का रुतबा और भी बढ़ गया, जब उन्हें 6,000 सैनिकों का दर्जा दिया गया और उन्हें ध्वज और ढोल भेंट किए गए, जो कि आमतौर पर विशिष्ट राजकुमारों को ही प्राप्त होता था।

सन 1621 में मिर्ज़ा ग्यासबेग की मृत्यु हो गई। 

मिर्ज़ा ग्यासबेग का भारत आगमन 

केवल दो खच्चरों को साथ लेकर, मिर्ज़ा गियासबेग, अपनी गर्भवती पत्नी और अपने तीन बच्चे (मोहम्मद-शरीफ, आसफ खान और एक बेटी) को अपनी भारत की यात्रा के लिए बारी-बारी से खच्चरों पर सवार होकर निकल पड़े। कंधार में असमत बेगम ने अपनी दूसरी बेटी को जन्म दिया। यात्रा का खर्च और गरीबी के चलते अब इन्हें अपनी चौथी संतान की चिंता सताने लगी और कंधार की मस्जिद में खुदा से सलामती की दुआ मांगी। 

कुछ समय बाद मिर्ज़ा ग्यासबेग और उनके परिवार को  एक व्यापारी मलिक मसूद के नेतृत्व वाले एक कारवां  शरण दी, जिसने बाद में गियास बेग को सम्राट अकबर की सेवा में नौकरी दिलाने में मदद की। यह मानते हुए कि बच्ची ने परिवार के भाग्य में बदलाव का संकेत दिया है, उसका नाम मिहर-उन-निस्सा रखा गया, जिसका अर्थ है "महिलाओं में सूर्य"। गियास बेग अपने परिवार का पहला सदस्य नहीं था जो भारत आया था, उसके चचेरे भाई आसफ खान जाफर बेग और असमत बेगम के चाचा, मिर्जा गियासुद्दीन अली आसफ खान, अकबर के प्रांतीय कार्यभारों में नामांकित थे। 

भारत पहुँचने के बाद अकबर ने मिर्ज़ा ग़ियास बेग का स्वागत किया और बाद में उन्हें काबुल प्रांत का दीवान (कोषाध्यक्ष) नियुक्त किया गया। व्यापार संचालन में अपनी कुशल क्षमता के कारण वे शीघ्र ही उच्च प्रशासनिक पदों पर पदोन्नत हो गए। उनके उत्कृष्ट कार्य के लिए सम्राट ने उन्हें 'इतिमद-उद-दौला' ('राज्य का स्तंभ') की उपाधि से सम्मानित किया। 

अपने कार्यों और पदोन्नति के फलस्वरूप, ग़ियास बेग ने मेहरुननिसा  (नूरजहाँ) को ने सर्वोत्तम शिक्षा दिलवाई। वह अरबी और फ़ारसी भाषाओँ के साथ कलासाहित्यसंगीत और नृत्य में भी निपुण हुईं 

गियास की बेटी, मिहर-उन-निस्सा बेगम ( नूर जहाँ ) ने 1611 में अकबर के बेटे जहांगीर से शादी की, और उनके बेटे अब्दुल हसन आसफ खान ने जहांगीर के सेनापति के रूप में और उनके उत्तराधिकारी शाहजहाँ के प्रधान वज़ीर के रूप में कार्य किया ।

ग़ियास, मुमताज़ महल (मूल नाम अर्जुमंद बानू, अब्दुल हसन आसफ़ खान की पुत्री) के दादा भी थे, जो सम्राट शाहजहाँ की पत्नी थीं। जहाँगीर के बाद उनके पुत्र शाहजहाँ शासक बने और अब्दुल हसन, शाहजहाँ के सबसे करीबी सलाहकारों में से एक थे। शाहजहाँ ने अब्दुल हसन की पुत्री अर्जुमंद बानू बेगम (मुमताज़ महल) से विवाह किया, जो उनके चार पुत्रों की माता थीं, जिनमें उनके उत्तराधिकारी औरंगज़ेब भी शामिल थे। शाहजहाँ ने मुमताज़ महल के मकबरे के रूप में ताजमहल का निर्माण करवाया।

 1621 में मिर्ज़ा ग्यास बेग की मृत्यु कांगड़ा के नजदीक हुई । उनके शरीर को आगरा लाया गया और यमुना नदी के बाएं किनारे पर दफनाया गया , जिसे आज एत्माउद्दौला का मकबरा कहते हैं। 





 NEAREST RAILWAY STATION : - YAMUNA BRIDGE, AGRA ( NCR )

आगरा में अन्य मुग़ल कालीन स्मारक 

Thursday, October 19, 2023

JAMMU 2023 : MTJ TO JAT BY KOTA EXPRESS



मथुरा से जम्मू - अन्नू की शादी में 


19 OCT 2023, 

अक्टूबर का महीना है, इस समय मौसम बदलता है और त्योहारों का समय चल रहा है। अभी नवरात्री हैं और कुछ समय बाद दीपावली का महापर्व भी आएगा। यह एक ऐसा समय होता है जब मेरा कार्य जोरों शोरों से चलता है और मुझे खाना खाने तक की भी फुर्सत नहीं मिल पाती है। इसी बीच मेरे परम मित्र कुमार भाटिया का मुझे कॉल आता है और वह मुझसे तुरंत जम्मू चलने के लिए बोलता है। दरअसल एक दो दिन बाद कुमार की छोटी बहिन अन्नू की शादी है, और इसके लिए वह अपने परिवार और रिश्तेदारों के साथ जम्मू जा रहा है। 

उसने अपने परिवार और रिश्तेदारों की सभी कन्फर्म टिकट कोटा एक्सप्रेस में बुक कर रखे हैं। आज यात्रा का दिन है और उसके साथ सिवाय उसके परिवार के जाना वाला कोई नहीं था, उसकी अधिकांश सीटें खाली जा रही हैं क्योंकि उसके अधिकतर रिश्तेदार अपनी पारवारिक जिम्मेवारियों के बीच जम्मू नहीं जा रहे हैं। चूँकि उसकी ट्रेन मथुरा से शाम को जाने वाली है इसलिए उसने मुझे फोन करके अपने साथ चलने को कहा, बिना सोचे समझे मैंने उसे हाँ बोल दिया। आखिर वो मित्र है और मैं उसकी सहायता के लिए हमेशा तत्पर रहता हूँ। 

मैंने ऑफिस में सर से इमरजेंसी में तीन दिन का अवकाश लिया जो कि सर ने स्वीकृत नहीं किया क्योंकि यह मेरी कंपनी का मुख्य सीजन का समय था किन्तु मेरे लिए मेरा कार्य प्रतिदिन का है, परन्तु अभी सिर्फ मित्रता निभाने का समय है और यही सोचकर मैं कुमार के साथ जम्मू के लिए रवाना हो चला। अपनी माँ से आज्ञा और आशीर्वाद लेकर मैं मथुरा रेलवे स्टेशन पहुंचा और कुछ ही समय बाद आगरा से कुमार भी अपने परिवार सहित मथुरा स्टेशन आ पहुंचा। मुझे देखकर वह अत्यंत ही प्रसन्न हुआ। जल्द ही कोटा एक्सप्रेस से हम जम्मू के लिए रवाना हो चले। 

अगली सुबह हम पठानकोट के नजदीक पहुँच चुके थे, यह वह स्थान है जहां से मैं अपनी कुलदेवी माता बज्रेश्वरी के दर्शन करने नगरकोट अर्थात कांगड़ा जाता हूँ। यहाँ आकर मुझे अपनी पुरानी यात्रायें याद आ गईं। पठानकोट से आगे निकलने के बाद ट्रैन जम्मू कश्मीर राज्य की सीमा में प्रवेश करती है, और कुछ समय बाद हम जम्मू रेलवे स्टेशन पहुँच गए। ट्रेन से हमारी यात्रा यहीं तक थी 

कुमार मेरा बचपन का मित्र है और वर्तमान में भारतीय रेलवे में कार्यरत हैं। उसकी दो छोटी बहिने हैं जिनमे से एक की शादी हो चुकी है और दूसरी है अन्नू, जिसकी दो दिन बाद शादी है और हम इसी वजह से जम्मू आये हैं। अभी कुमार, अपनी माँ, पत्नी और अपने बच्चों के साथ जम्मू आया है, और साथ में अब मैं भी हूँ। लड़के वाले जम्मू के ही रहने वाले हैं और उन्होंने हमें स्टेशन से रिसीव करने के लिए अपनी एक गाडी भेज दी है। हम उस गाडी से मैरिज होम की तरफ रवाना हो चुके हैं। 

शीघ्र ही हम अखनूर रोड पर स्थित N N RESORT पहुंचे। जहाँ हमारे ठहरने का इंतज़ाम वर पक्ष की ओर से किया गया था। 






मथुरा स्टेशन पर कुमार से भेंट 

चक्की बैंक के पास एक रेल पुल 







जम्मू की ओर जाती हुई हमारी ट्रेन 



हिमालय के सुन्दर दृश्य को कैमरे में रिकॉर्ड करता एक यात्री 




दो मित्र और जम्मू तवी रेलवे स्टेशन 




जम्मूतवी रेलवे स्टेशन 

हमारा लगेज 


NN रिसोर्ट की तरफ 

 
AT RESORT

Thursday, October 12, 2023

AGRA : ROMAN CATHOLIC CEMETERY


आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 6

 रोमन कैथोलिक कब्रिस्तान


आगरा में रोमन कैथोलिक कब्रिस्तान का निर्माण 1550 ई. में हुआ था और इसका इस्तेमाल सबसे पहले उन अर्मेनियाई ईसाइयों को दफनाने के लिए किया गया था, जो अकबर के शासनकाल के दौरान इस शहर में आकर बस गए थे। इनके बाद, जैसे-जैसे इस इलाके में दूसरे लोग आकर बसते गए, वैसे-वैसे अन्य ईसाई संप्रदायों के लोगों को भी यहाँ दफनाया जाने लगा।


इस कब्रिस्तान में सबसे पुरानी कब्र जॉन मिल्डेनहॉल की है। जॉन मिल्डेनहॉल एक अंग्रेज व्यापारी थे, जिनकी मृत्यु 1614 में हुई थी। कहा जाता है कि वह पहले ऐसे अंग्रेज थे, जिन्होंने "अकबर को आमने-सामने देखा था"। लेकिन यहाँ कुछ और कब्रें भी हैं, जो ध्यान देने लायक हैं न सिर्फ उन लोगों से जुड़ी कहानियों की वजह से, बल्कि उन कब्रों की वास्तुकला की वजह से भी।

Saturday, September 23, 2023

DELHI 2023 : ASHOKA EDICT


दिल्ली में सम्राट अशोक का शिलालेख 


सन 1966 में जब राजधानी दिल्ली में आवासीय प्रसार अपने चरम पर था तभी आवासीय कॉलोनी बनाने वाले एक ठेकेदार की नजर एक ऐसी ऐतिहासिक चट्टान पर पड़ी जिस पर कुछ चिन्हों की भाषा उत्कीर्ण थी जो अपठनीय थी। उसने तुरंत इसकी सूचना सम्बंधित अधिकारी को दी और इसके बाद पुरातत्ववेत्ताओं इस चट्टान की  जाँच की। इस जांच में उन्होंने पाया कि यह भाषा प्राचीन समय की है और यह प्राकृत अथवा ब्राह्मी लिपि थी। इस भाषा के अक्षर,  इससे पूर्व दिल्ली में पाए गए अशोक स्तम्भों से मेल खाती थी, साथ ही बैराट स्थित शिलालेख से इसकी समानता प्रतीत होती थी, इससे यह स्पष्ट हो गया कि यह शिलालेख सम्राट अशोक द्वारा ही उत्कीर्ण है और बाद में जब इस भाषा का अनुवाद किया गया तो फिर इसमें कोई संदेह ही नहीं बचा कि यह सम्राट अशोक का ही शिलालेख है। वर्तमान में भारतीय पुरातत्व विभाग ने इसे सम्राट अशोक के लघु शिलालेख की श्रेणी में रखा है। 

तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व जब भारत भूमि पर मौर्य साम्राज्य स्थापित था तब मौर्य वंश के महान शासक सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध के पश्चात बौद्ध धर्म अपना लिया था और सम्पूर्ण राज्य में अपने हृदय और धर्म परिवर्तन के बाद महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं को शिलालेखों पर उत्कीर्ण करवाया था जिससे उनके बाद आने वाली पीढ़ियां इन्हें पढ़कर अपने जीवन को सही मार्गदर्शन दे सकें और बौद्ध धर्म के नियमों का पालन कर सकें। मौर्य साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र में थी और दिल्ली, उस समय उत्तर भारत में तक्षशिला जाने वाले प्रमुख व्यापारिक अथवा प्रांतीय मार्ग पर स्थित थी। 

सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध के पश्चात बौद्ध धर्म अपनाया था और इसके बाद उन्होंने 256 दिनों तक बौद्ध धर्म के प्रमुख स्थलों की यात्रा की थी। इन्हीं स्थानों के आसपास और अपने साम्राज्य के अनेकों स्थानों पर उन्होंने बौद्ध धर्म की शिक्षाओं को खरोष्ठी और ब्राह्मी लिपि में चट्टानों पर उत्कीर्ण करवाया था। 

दिल्ली में मिला यह शिलालेख अत्यंत ही प्राचीन है और आज भी स्पष्ट रूप से अनुवादित नहीं है, किन्तु इसका जितना अनुवाद किया गया है उसके अनुसार यह शिलालेख बतलाता है कि देवताओं के प्रिय (अशोक) ने इस प्रकार कहा: "मुझे एक गृहस्थ उपासक बने हुए ढाई वर्ष से अधिक समय हो गया है। शुरुआत में मैंने कोई विशेष प्रयास नहीं किया, लेकिन पिछले एक वर्ष में मैं बौद्ध संघ के और करीब आया हूँ; मैंने पूरी लगन से प्रयास किया है और दूसरों को भी देवताओं के साथ जुड़ने के लिए प्रेरित किया है।

 यह लक्ष्य केवल महान लोगों के लिए ही सीमित नहीं है कि वे ही प्रयास करें, बल्कि एक साधारण मनुष्य भी, यदि वह प्रयास करता है, तो स्वर्ग प्राप्त कर सकता है। यह घोषणा निम्नलिखित उद्देश्य से की गई है: ताकि साधारण और महान, दोनों प्रकार के लोग प्रयास करने के लिए प्रेरित हों, और जो लोग साम्राज्य की सीमाओं से बाहर रहते हैं, उन्हें भी इस बारे में पता चले। इस नेक कार्य के लिए किया गया प्रयास सदैव जारी रहना चाहिए, और यह लोगों के बीच और अधिक फैलना चाहिए, ताकि इसकी वृद्धि डेढ़ गुना हो जाए।

वर्तमान में इस स्थान को पुरातत्व विभाग ने संरक्षित किया हुआ है। राजधानी दिल्ली के व्यस्ततम और घनी आबादी के बीच यह एक शांत और प्राकृतिक वातावरण से भरपूर स्थान है। असामाजिक तत्व, शिलालेख को क्षतिग्रस्त ना करें इसलिए पुरातत्व विभाग ने इसे लकड़ी और काँच के बंद कमरे में सुरक्षित किया है। इस शिलालेख को दूर से देखने की ही अनुमति है। देश की इन ऐतिहासिक धरोहरों को सहेजना ना केवल पुरातत्व विभाग की जिम्मेवारी है बल्कि यह देश  के समस्त नागरिकों की भी जिम्मेदारी है। 

मैं आज सुबह ही दिल्ली पहुंचा और ओखला रेलवे स्टेशन पर उतर गया। सब्जी मंडी में से होते हुए मैं इस स्थान तक पैदल ही पहुँच गया और सबसे पहले आज दिल्ली के इस सबसे प्राचीन ऐतिहासिक स्थान को देखा। दिल्ली में मौर्य काल का यह एकमात्र ऐतिहासिक स्थल है जो सम्राट अशोक से सम्बंधित है। चूँकि दिल्ली में सम्राट अशोक के दो प्रमुख स्तम्भ भी स्थित है किन्तु यह मूल रूप से दिल्ली में स्थापित नहीं थे, सल्तनत काल के दौरान इन्हें टोपरा और मेरठ से यहाँ लाकर स्थापित किया गया है किन्तु यह शिलालेख मूलरूप से उसी स्थान पर है जहाँ इसे उकेरा गया था, अतः यह दिल्ली में मौर्य काल का सबसे प्राचीन स्थल है। 

अशोक के शिलालेख को देखने के बाद मैं दिल्ली स्थित इस्कॉन मंदिर पहुंचा जिसका विवरण मैं अपने अगले लेख में प्रकाशित करूँगा। 




















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 NEAREST RAILWAY STATION : - OKHALA (NR)

DELHI 2023 : LOTUS TEMPLE


बहाई उपासना मंदिर - दिल्ली 


19 वीं सदी में ईरान में एक प्रमुख संत बहाउल्लाह द्वारा बहाई धर्म की स्थापना की गई थी जो सभी धर्मों के मूल महत्त्व और मानव - एकता की शिक्षा देता है। शुरुआत में यह ईरान और पश्चिमी एशिया के कुछ हिस्सों में विकसित हुआ और अंत में यह भारत में भी विकसित होने लगा। बहाई धर्म में कोई पुरोहित नहीं होता, यह केवल ईश्वरीय प्रार्थना पर निर्भर है। 

भारत में राजधानी दिल्ली में कालकाजी के संमीप स्थित कमल मंदिर बहाई धर्म का एक मुख्य केंद्र अथवा प्रार्थना स्थल है। सफ़ेद संगमरमर से बनी 9 पंखुड़ियों वाले इस कमल मंदिर की शोभा ना सिर्फ भारत देश में अपितु समूचे विश्व भर में प्रसिद्ध है। 

बहाई कमल मंदिर सभी धर्मों के लोगों के लिए खुला है, यहाँ बिना किसी भेदभाव के, किसी भी धर्म या जाति के  लोग आसानी से प्रवेश कर सकते हैं और शांत वातावरण के बीच ईश्वर की प्रार्थना कर सकते हैं। बहाई धर्म, एक ईश्वर, एक धर्म और एक मानवता के जोर पर बल देता है। 

इस्कॉन मंदिर देखने के बाद एक पार्क में से होकर मैं शीघ्र ही कमल मंदिर पहुंचा। यह कालकाजी मेट्रो स्टेशन के नजदीक ही स्थित है। मैंने यहाँ कालकाजी माता के दर्शन हेतु अनेकों लोगों की लम्बी लाइन को लगे हुए देखा था। किन्तु मुझे तो आज कमल मंदिर देखना था इसलिए मैं कमल मंदिर की तरफ बढ़ चला। 

कमल मंदिर एक विस्तृत क्षेत्र में बना हुआ है। यहाँ का शांत और हरा भरा वातावरण अनायास ही मन को शीतलता प्रदान करता है। मैंने दूर से ही कमल की पंखुड़ियों वाले इस मंदिर को देखा किन्तु इसके अंदर प्रवेश नहीं किया अतः मैं नहीं जान सका कि इस मंदिर के अंदर कोई मूर्ति है अथवा यहाँ किसकी पूजा होती है। 

दरअसल मैं कभी किसी अन्य धर्म के धार्मिक स्थल के गर्भगृह में प्रवेश नहीं करता हूँ किन्तु यहाँ मिली जानकारी के अनुसार मैंने इतना तो जान ही लिया था कि यहाँ कोई मूर्ति, वेदी अथवा चित्र नहीं है, मंदिर में केवल प्रार्थना कक्ष है और यहाँ सभी धर्मों के लोग शांति से बैठकर ध्यान और मूक प्रार्थना करते हैं।  

मंदिर में कमल की पंखुड़ियों की आकृति में निर्मित 9 दरवाजे हैं जो शांति और एकता का प्रतीक हैं। 




































 


NEAREST RAILWAY STATION : - OKHALA ( NR )