UPADHYAY TRIPS PRESENT'S
राजगीर या राजगृह - एक पर्यटन यात्रा
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मेरी ट्रेन सुबह ही राजगीर पहुँच गई थी, जनरल कोच की ऊपर वाली सीट पर मैं सोया हुआ था, एक बिहारिन आंटी ने मुझे नींद से उठाकर बताया कि ट्रेन अपने आखिरी स्टेशन पर खड़ी है। मैं ट्रेन से नीचे उतरा तो देखा एक बहुत ही शांत और खूबसूरत जगह थी ये, सुबह सुबह राजगीर की हवा मुझे एक अलग ही एहसास दिला रही थी कि मैं रात के चकाचौंध कर देने वाले गया और पटना जैसे शहरों से अब काफी दूर आ चुका था। हर तरफ हरियाली और बड़ी बड़ी पहाड़ियाँ जिनके बीच राजगीर स्थित है। यूँ तो राजगीर का इतिहास बहुत ही शानदार रहा है, पाटलिपुत्र ( पटना ) से पूर्व मगध साम्राज्य की राजधानी गिरिबज्र या राजगृह ही थी जिसका कालान्तर में नाम राजगीर हो गया।
मगध साम्राज्य
छटी शताब्दी ई.पू. में मगध एक छोटा सा साम्राज्य था किन्तु मगध पर शासन करने वाले राजा अत्यन्य ही महत्वकांक्षी थे अतः उन्होंने अपने पड़ोसी राज्यों पर आक्रमण कर मगध साम्राज्य का विस्तार किया और भारत का सबसे शक्तिशाली राज्य बनाया। मगध साम्राज्य की स्थापना का श्रेय महाभारत कालीन बृहद्रथ को जाता है। बृहद्रथ, चेदिराज बसु के पुत्र थे जिन्होंने अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर बृहद्रथ वंश की नींव रखी, और मगध की राजधानी राजगृह को बनाया। बृहद्रथ के बाद इस वंश का सबसे प्रतापी राजा जरासंध था जो भगवान श्री कृष्ण का घोर शत्रु था तथा कंस का ससुर था।
जरासंध
जरासंध का जन्म दो टुकड़ों में हुआ था इसकारण महाराज बृहद्रथ ने इसे शमशान में फिंकवा दिया। राजगृह के जंगलों में उनदिनों जरा नामकी राक्षसी विचरण करती हुई शमशान में पहुंची, उसने उन दोनों टुकड़ों को अपने तप और तंत्र की शक्ति से आपस में जोड़ दिया और महाराज बृहद्रथ के पास पहुंचा दिया और साथ ही यह घोषणा भी कि यही बड़ा होकर इस मगध राज्य का सबसे प्रतापी और शक्तिशाली राजा बनेगा जिसके बाजुओं में बारह हजार हाथियों का बल होगा। जरासंध ने मथुरा पर सत्रह बार आक्रमण किया और भगवान कृष्ण को मथुरा छोड़कर द्वारिका जाने पर विवश कर दिया। वह भगवान कृष्ण को ललकारने के लिए राजगृह से एक ढेला घुमाकर फेंकता था जो वृन्दावन - मथुरा में जाकर गिरता था और उसी ढेले से मथुरावासियों के घर तबाह हो जाते थे। अंत में भीम द्वारा जरासंध का वध उसे दो टुकड़ों में विभाजित करके हुआ और ये दोनों टुकड़े भीम द्वारा विपरीत दिशाओं में फेंके जाने पर जरासंध की मृत्यु हुई।
जरासंध की मृत्यु के बाद मगध पर अनेक शासकों ने राज किया किन्तु बृहद्रथ वंश का अंतिम शक्तिशाली शासक रिपुंजय था जिसकी हत्या उसी के मंत्री पुलिक ने कर दी और अपने पुत्र को मगध का शासक बनाया। भट्टिय नामक वीर महत्वकांक्षी सामंत ने पुलिक के पुत्र का वध करवा दिया और अपने पुत्र को मगध का सम्राट घोषित किया। इसी का नाम बिम्बिसार था जिसे हर्यक वंश का संस्थापक माना जाता है।
बिम्बिसार
सिंहासन पर आसीन होने के बाद बिम्बिसार ने अनेक वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किये और साथ ही अंग के साम्राज्य को मगध में मिलाया। अंग, दानवीर कर्ण का राज्य था जो महाभारत के समय अपने चरम पर था।
बिम्बिसार के शासनकाल में मगध की सीमायें दुगनी हो गई , माना जाता है कि बिम्बिसार के शासनकाल में मगध का विस्तार 300 योजन तक था। राजगृह में महात्मा बुद्ध का आगमन बिम्बिसार के समय में ही हुआ, बिम्बिसार ने बौद्धधर्म ग्रहण कर महात्मा बुद्ध की काफी सेवा की। 'जीवक' नामक राजवैध भी बिम्बिसार के शासनकाल में ही थे जिन्होंने सच्ची निष्ठां से भगवान महात्मा बुद्ध का उपचार किया था। 492 ई. पू. बिम्बिसार की मृत्यु हो गई।
अजातशत्रु
बिम्बिसार की मृत्यु के बाद उसका पुत्र अजातशत्रु मगध का शासक बना। इतिहास में अजातशत्रु को पितृहन्ता कहा जाता है जिसने राज्य के लालच में अपने पिता की हत्या की। परन्तु जैन अनुश्रुतियों में उसे पिता का हत्यारा नहीं माना जाता है। जो भी हो इतना तो अवश्य सत्य है कि वह एक महान योद्धा और साम्राज्य विस्तारवाद नीति का समर्थक था। उसने अपने बाहु और बुद्धि बल द्वारा मगध की सीमाओं में काफी वृद्धि की।
प्रथम बौद्ध संगीति का आयोजन वैभारगिरि पर्वत पर जिसे राजगीर पर्वत भी कहा जाता है, स्थित सप्तपर्णी गुफा में अजातशत्रु के शासनकाल में ही संपन्न हुआ।
अजातशत्रु के बाद उसका पुत्र उदयभद्र भी इस वंश का प्रतापी और योग्य शासक हुआ जिसने मगधपर 33 वर्षों तक राज्य किया इसके बाद अनेक उत्तराधिकारी इस वंश में हुए परन्तु बिम्बिसार, अजातशत्रु और उदयभद्र के समान साम्राज्यवादी और महत्वकांक्षी नहीं थे। हर्यक वंश समाप्त होने के बाद मगध में शिशुनाग वंश का उदय हुआ और इस वंश का प्रतापी राजा शिशुनाग ही था जिसने मगध की राजधानी राजगृह से हटाकर वैशाली स्थानांतरित की। इस प्रकार राजगीर की भूमि का इतिहास जरासंध, बिम्बिसार, अजातशत्रु तक ही सीमित होकर रह गया।
आज राजगीर की भूमि पर प्राचीन मगध के कुछ अवशेष थे जो निम्न प्रकार हैं।
- अजातशत्रु का किला
- ब्रह्मकुंड और सूर्यकुंड - गर्म पानी के झरने
- वैभारगिरि पर्वत या राजगीर पर्वत
- सप्तपर्णी गुफा
- ज़रा देवी और जरासंध का मंदिर
- सोनभंडार गुफा - बिम्बिसार का सोने का खजाना
- जरासंध का अखाडा
- मनियर मठ
- विश्व शांति स्तूप
- बिम्बिसार की जेल
- वेणुवन - महात्मा बुद्ध का विहार स्थल
- जीवक का दवाखाना
इसके अलावा जापानी मंदिर, जैन धर्म के अन्य मंदिर और पर्वतमालाएं, मखदूम कुंड भी दर्शनीय हैं।
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RAJGIR RAILWAY |
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RAJGIR RAILWAY STATION |
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IN RAJGIR RAILWAY STATION |
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RAJGIR RAILWAY STATION |
अजातशत्रु का किला
राजगीर रेलवे स्टेशन से बाहर निकलकर मैं राजगीर शहर में आया, सुबह सुबह ही पैदल अजातशत्रु के किले तक पहुंच गया । यह किला, गया - मोकामा राजमार्ग 82 पर स्थित है। यह किला पूर्ण रूप से ध्वस्त हो चुका है अब केवल इसकी बाहरी दीवारों के अवशेष ही शेष हैं, किले के अंदर जहाँ किसी ज़माने में राज महल हुआ करते थे उस जगह अब केवल वर्तमान में मैदान ही बचे हैं किसी भी राजमहल के अवशेष अब यहाँ देखने को नहीं मिलते हैं। किले के रूप में इसकी चारदीवारी ही शेष बची है जो इसके किसी समय में विशालकाय होने का संकेत देती है।
मैंने इस किले को पूर्ण रूप से देखा, मुझे ऐसा एहसास हुआ कि हो न हो इस किले के खंडहर आज भी जमीन के नीचे जरूर होंगे, पुरातत्व विभाग अगर इसकी खुदाई करता है तो इस किले के मैदान के नीचे अवश्य और भी ऐतिहासिक धरोहर निकलने की संभावना है। आज इस किले में केवल खेल का मैदान है। मैं आज उस किले के अंदर खड़ा था जहाँ कभी मगध के विशाल साम्राज्य की राजधानी हुआ करती थी, जरासंध, बिम्बिसार और अजातशत्रु का यह किला अपने अंदर इतिहास की हजारों यादों को समेटे हुए वक़्त के ढेरे के साथ ढह चुका है।
किले से थोड़ा आगे बढ़ने पर अजातशत्रु का स्तूप मौजूद है , पांच छः पिलरों के साथ बना यह स्तूप अजातशत्रु का स्तूप कहलाता है जो गिद्धकूट पर्वत के समीप स्थित है यहाँ से एक रास्ता राजगीर सिटी के लिए भी जाता है। राजगीर सिटी ही मगध की प्राचीन राजधानी गिरिवज्र अथवा राजगृह थी। यहाँ एक नौलखा मंदिर स्थित है जिसे मैंने देखा तो था परन्तु बैटरी न होने कारण मैं इसके फोटोग्राफ नहीं ले पाया था।
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AJATSHATRU FORT |
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AJATSHATRU STUP |
ब्रह्मकुंड - गर्मपानी का कुंड
अजातशत्रु के किले से थोड़ा आगे चलने पर राजगीर पर्वत दिखाई देता है, यह पर्वत गिद्धकूट पर्वत के ठीक सामने है। राजगीर पर्वत को वैभारगिरि पर्वत भी कहते हैं। राजगीर में ऐसे पांच पर्वत हैं जो जैनियों के धार्मिक स्थल हैं। महावीर स्वामी और जैनधर्म के अन्य अनुयायिओं से जुड़े यह पर्वत आज भी जैन धर्म की व्याख्या करते नजर आते हैं। राजगीर पर्वत के नीचे ही गरमपानी के कुंड हैं। इन्हे ब्रह्मकुंड कहा जाता है। हिन्दू धर्म में इस कुंड का अत्यधिक महत्त्व है। अभ्रक, गंधक से युक्त ब्रह्मकुंड का पानी गर्म होता है और चर्मरोग में काफी लाभदायक होता है।
मैं कल रोहतास में नदी में नहाया था आज इस गरमपानी के कुंड में नहाने का मौका मिला। अधिक मात्रा में बिहार के अधिकांश लोग इस कुंड में नहा रहे थे। यहाँ गर्मजल राजगीर पर्वत से सप्तधाराओं से निकलता है। सप्तधाराओं में स्नान करने के बाद ही लोग ब्रह्मकुंड में स्नान करते हैं। इस कुंड का जल अत्यधिक गर्म होता है परन्तु एक बार कुंड में उतरजाने के बाद यह इतना गर्म नहीं लगता है। वैसे कहा जाए तो यहाँ के निवासिओं की सर्दी के मौसम में मौज ही रहती होंगी। न गर्म पानी करने की जरुरत और नहीं शरीर के किसी रोग डर।
ब्रह्मकुंड के बाहर एक ठन्डे पानी का कुंड भी है, यह एक शानदार कुंड है और नया बना हुआ है। इस कुंड में नहाने और इसे देखने के लिए यहाँ टिकट लगता है। इसके अलावा सूर्यकुंड और मखदूम कुंड भी यहाँ दर्शनीय हैं। समयावधि के कारण मैं इन दोनों कुंडों को नहीं देख पाया था।
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BRAHMKUND, RAJGIR |
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BRAHMKUND , RAJGIR |
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BRAHMKUND, RAJGIR |
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BRAHMKUND, RAJGIR |
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एक ऐतिहासिक ईमारत, राजगीर |
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ब्रह्मकुंड, राजगीर |
मनियार मठ
जरादेवी मंदिर आगे चलकर सोन भंडार गुफा की तरफ जाते वक़्त रास्ते में मनियार मठ पड़ता है। यूँ तो यह आज एक बौद्धिक स्थल है परन्तु इसका इतिहास आजतक स्पष्ट नहीं हो सका है। जैन धर्म के अनुसार यह विदेह ( वैशाली ) की राजकुमारी और अजातशत्रु की माँ रानी चेलन्ना का कुंआ है जो उस समय में निर्माण कूप कहलाता है। इसका निर्माण गोलाकार ईंटों से हुआ है। कुछ ग्रंथों में इसे बुद्ध का स्तूप भी कहा जाता है परन्तु यह इसे देखने के बाद सच नहीं लगता क्योंकि इसकी सरंचना एक कुएँ के प्रकार की है और वास्तव में यह एक कुँआ ही है।
महाभारत के अनुसार यह मणि नागाओं के रहने का स्थान था जो भगवान शिव की आराधना में लीन रहते थे। इन्ही मणिनागाओं को मणिमाल भी कहा जाता है इसी मणिमाल शब्द से इसका नाम कालांतर में मनियार हो गया और बौद्धिक धर्मात्माओं ने इस स्थान को मठ का नाम दे दिया। माना जाता है कि यह स्थान नागा शालिभद्र की याद में बनाया गया है। यह कहा जाता है की उसने अपने खजाने को इस कुएँ में दफ़न कर दिया था।
1861-62 में, जनरल कनिंघम ने इस जगह का उत्खनन किया। खुदाई में, कई मूर्तियां 1 9 फीट की गहराई में मिलीं। इतिहासकारों का मानना है कि ये मूर्तियां 1 से 6 वीं सदी के समय के थे। पली स्क्रिप्चर, "संयुक्ता निकये" ने इसे 'मानिमालय-चैत्य' के रूप में वर्णित किया है, जहां भगवान बुद्ध मनीभाषा यक्ष के साथ एक संवाद था।
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MANIYAR MATH, RAJGIR
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बिम्बिसार की जेल तथा जीवक का दवाखाना
सोनभंडार से एक रास्ता जरासंध की रणभूमि की तरफ भी गया है जो यहाँ से 2 किमी की दूरी पर है। ताँगे वाले बाबा मुझे यहाँ नहीं लेकर गए और इसे बिना देखे ही मैं आगे नई मंजिल की तरफ बढ़ चला। गया मोकामा रोड पर कुछ किमी चलने के बाद बिम्बिसार की जेल आती है। कहा जाता है कि यही वो स्थान है जहाँ अजातशत्रु ने अपने पिता बिम्बिसार को कैद करके रखा था। यह स्थान स्वयं बिम्बिसार ने चयन किया था क्योंकि बिम्बिसार की महात्मा बुद्ध के प्रति विशेष आस्था थी और जहाँ यह जेल बानी थी उसके ठीक पीछे गिद्धकूट पर्वत है जिसपर महात्माबुद्ध अपने अनुयायियों के साथ निवास करते थे।
इस जेल की खिड़कियों से राजा बिम्बिसार प्रतिदिन महात्मा बुद्ध के दर्शन करते थे और परम शांति का अनुभव करते थे। कहते हैं कि अपने पिता का राज्य हड़पने के लिए अजातशत्रु ने राजा बिम्बिसार को जेल में कैद कर रखा था। अपनी माँ से अपने पिता के प्रति स्नेह के कुछ शब्द सुनने के बाद उसमे पिता के प्रति दया और सहानभूति ने जन्म लिया और वो अपने हाथ में कुल्हाड़ी लेकर अपने पिता के बेड़ियाँ काटने के लिए निकल पड़ा।
हाथ में कुल्हाड़ी लाते देख बिम्बिसार ने सोचा की मेरा पुत्र अत्यंत ही निर्दयी है और वह मुझे मारने के इरादे से कुल्हाड़ी लेकर आ रहा है, उन्होंने अपनी अंगूठी में जड़े हुए विष का सेवन कर बिस्तर पर ही अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली।
विश्व शांति स्तूप की तरफ चलने पर बाईं तरफ एक प्राचीन स्मारक के अवशेष देखने को मिलते हैं। यह जीवक का दवाखाना कहलाता है, बिम्बिसार के शासनकाल के दौरान जीवक एक महान चिकित्सक थे जिन्होंने महात्मा बुद्ध का उपचार किया था। जीवक का नाम मगध के राजवैध के रूप में भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में निर्मित है।
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बिम्बिसार कारागार
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बिहार यात्रा के भाग
- अबकी बार - बिहार
- बिहार की तरफ एक रेल यात्रा
- माँ ताराचंडी शक्तिपीठ धाम
- शेरशाह सूरी और उसका मकबरा
- रोहतासगढ़ की तरफ एक यात्रा
- बुद्ध पूर्णिमा एक्सप्रेस
- राजगीर या राजगृह
- वैभारगिरि पर्वत और सप्तपर्णी गुफा
- जरासंध और जरा देवी मंदिर
- सोनभंडार गुफा
- विश्व शांति स्तूप, राजगीर
- मगध एक्सप्रेस - इस्लामपुर से नईदिल्ली
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ऐतिहासिक यात्रा कराता लेख..
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