Thursday, November 5, 2026

MEWAR 2024 : RANAKPUR JAIN TEMPLE'S


 मेवाड़ की ऐतिहासिक यात्रा पर - वर्ष 2024 

भाग 4 - रणकपुर जैन मंदिर समूह और सूर्य मंदिर 

 

21 मार्च 2024 

देसूरी से निकलने के बाद अब मैं रणकपुर के प्रसिद्ध जैन मंदिरों की ओर बढ़ चला था। मारवाड़ का यह रास्ता बहुत शानदार था जिसमें सड़क के एक ओर तो अरावली पर्वत शृंखला दिखाई दे रही थी और दूसरी ओर पाली जिले का खुला मैदान और मारवाड़ी गाँवों के दृश्य स्पष्ट दिखाई दे रहे थे। चूँकि राजस्थान क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत का सबसे बड़ा राज्य है, जनसँख्या की दृष्टि से नहीं। इसलिए यहाँ सड़क पर ज्यादा भीड़भाड़ तो नहीं थी किन्तु रास्ता अत्यधिक लम्बा प्रतीत होता है। 

देसूरी के बाद, मैंने सीधे सादड़ी जाकर ही रुका। यह एक बड़ा क़स्बा और बाजार है  जो सादड़ी और सुकरी नदियों के संगम पर स्थित है। अगर यहाँ एक रेलवे स्टेशन होता तो अवश्य ही वह एक जंक्शन होता। क्योंकि यहाँ से राजस्थान के अलग अलग मुख्य शहरों के लिए राते जाते हैं। एक रास्ता यहाँ से फालना होते हुए सीधे जालौर के लिए जाता है वहीँ दूसरा रास्ता आबू पर्वत होते हुए गुजरात के पाटन और मेहसाणा के लिए चला जाता है। इसके अलावा तीसरा रास्ता गोगुन्दा होते हुए उदयपुर के लिए आता है। इसी तीसरे रास्ते पर रणकपुर के प्रसिद्ध जैन मंदिर दिखाई देते हैं जो अब यहाँ से चार - पांच किमी दूर थे। 

सादड़ी से निकलने के बाद ही जंगली मार्ग शुरू हो जाता है जो सकरी नदी के बराबर चलता है। यह घने वनों से होकर गुजरता है। शीघ्र ही मैं रणकपुर के प्रसिद्ध मंदिरों पर पहुँच गया और मंदिर में प्रवेश करने वाला एक विशाल द्वार अब मेरे सामने था। यहाँ बने पार्किंग स्थल पर मैंने अपनी बाइक खड़ी की और में बने एक जलस्त्रोत से हाथ मुँह धोकर मैंने मंदिर परिसर में प्रवेश किया। अरावली पर्वतमाला की तलहटी में बसे रणकपुर की एक अलग ही प्राकृतिक छटा है जो मन को मोह लेती है और यहाँ आने वाला प्रत्येक राहगीर अपनी सारी थकान भूलकर इस दिव्य वातावरण में मुग्ध हो जाता है। 

रणकपुर जैन मंदिर का इतिहास

15वीं शताब्दी में मेवाड़ के एक समृद्ध जैन व्यापारी और मंत्री धरण शाह ने रात में एक दिव्य स्वप्न देखा। उन्होंने सपने में स्वर्ग के एक दिव्य वाहन 'नलिनीगुल्मा विमान' के दर्शन किए और उसी स्वरूप पर आधारित एक भव्य मंदिर बनाने का संकल्प लिया। 

धरण शाह ने अपने इस विचार को मेवाड़ के तत्कालीन राजा महाराणा कुंभा के सामने रखा। महाराणा कुंभा ने न केवल मंदिर के लिए भूमि प्रदान की, बल्कि इसके पास एक नगर बसाने की भी अनुमति दी। राजा के नाम पर ही इस स्थान का नाम रणकपुर पड़ा।

इस मंदिर का निर्माण विक्रम संवत 1446 (लगभग 1439 ईस्वी) में शुरू हुआ और इसे पूरा होने में 50 वर्षों से अधिक का समय लगा। इस भव्य मंदिर के मुख्य वास्तुकार (शिल्पी) देपाक  थे, जिन्होंने धरण शाह के सपने को धरातल पर उतारा।

रणकपुर मंदिर वास्तुकला, शिल्प और धर्म का एक बेजोड़ संगम है, जिसकी प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं:मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसके 1,444 संगमरमर के स्तंभ (खंभे) हैं। कमाल की बात यह है कि कोई भी दो खंभे एक जैसे नहीं हैं। हर खंभे पर अलग और अनोखी नक्काशी की गई है।
शिल्पकार देपाक की कलात्मक दूरदर्शिता का प्रमाण यह है कि इन 1444 खंभों में से कोई भी खंभा इस तरह नहीं बनाया गया जो मुख्य गर्भगृह में विराजित भगवान आदिनाथ की प्रतिमा के दर्शन में बाधा उत्पन्न करे। आप मंदिर के किसी भी कोने से प्रतिमा को स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। 

मुख्य मंदिर को 'चतुर्मुख धारणा विहार' भी कहा जाता है। मंदिर के मुख्य भाग में भगवान आदिनाथ की चार विशाल संगमरमर की मूर्तियाँ स्थापित हैं, जो चारों दिशाओं (उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम) की ओर उन्मुख हैं। यह इस बात का प्रतीक है कि भगवान का शासन संसार की चारों दिशाओं पर है। 

मंदिर पूरी तरह से हल्के रंग के उत्कृष्ट संगमरमर से बना है। इसमें 29 हॉल (मंडप) और 80 गुंबद हैं। छतों और मेहराबों पर की गई बारीक ज्यामितीय और पुष्प आकृतियों की नक्काशी देखने योग्य है। एक ही संगमरमर के पत्थर पर उकेरी गई भगवान पार्श्वनाथ की 1008 सर्प फणों वाली आकृति यहाँ की अद्भुत कलाकृतियों में से एक है।

भविष्य में मुगलों या अन्य आक्रमणकारियों के संकट को भांपते हुए निर्माताओं ने मंदिर के नीचे 9 गुप्त तहखाने भी बनवाए थे, जहाँ विषम परिस्थितियों में मूर्तियों को सुरक्षित छुपाया जा सके।


रणकपुर की ओर 


रणकपुर द्वार 




















  • भगवान नेमिनाथ जी का मंदिर 

नेमिनाथ मंदिर का निर्माण भी 15वीं शताब्दी (लगभग 1439 ईस्वी के आस-पास) में मुख्य मंदिर के निर्माण काल के दौरान ही हुआ था।ऐतिहासिक दस्तावेजों और मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण सोमल पोरवाल नामक व्यक्ति ने करवाया था, जो मुख्य मंदिर बनवाने वाले सेठ धरण शाह के मुनीम या सहयोगी थे। इसे भी मेवाड़ के तत्कालीन शासक महाराणा कुंभा के काल में ही शाही संरक्षण के तहत तैयार किया गया था।

यह मंदिर एक ऊंचे चबूतरे  पर बना हुआ है, जहाँ कुछ सीढ़ियाँ चढ़कर पहुँचा जाता है। इसके अग्रभाग में सुंदर नक्काशीदार खंभों से सजा एक छोटा खुला प्रांगण है। भले ही यह मंदिर आकार में मुख्य आदिनाथ मंदिर से छोटा है, लेकिन इसकी बाहरी दीवारों पर की गई नक्काशी अत्यंत बारीक और उच्च स्तर की है।

इस मंदिर की बाहरी दीवारों पर उकेरी गई कुछ मूर्तियाँ और कामुक कलाकृतियाँ  विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। ये कलाकृतियाँ जैन इतिहास के प्रसिद्ध आचार्य स्थूलीभद्र (दीक्षा लेने से पहले के उनके सांसारिक जीवन) और कोशा वैश्या की कथाओं तथा उनके जीवन के प्रसंगों को जीवंत करती हैं।

मुख्य मंदिर में पर्यटकों और श्रद्धालुओं की भारी भीड़ रहती है, जबकि नेमिनाथ मंदिर परिसर का वातावरण बेहद शांत और ध्यान लगाने के लिए उत्तम माना जाता है। यहाँ बैठकर आप शांति से प्राचीन शिल्पकला को निहार सकते हैं।













  • श्री पार्श्वनाथ जी का मंदिर 

यह मंदिर जैन धर्म के 7वें तीर्थंकर भगवान सुपार्श्वनाथ को समर्पित है। इस मंदिर की बनावट भी काफी आकर्षक है और इसकी दीवारों पर बनी कामुक कलाकृतियाँ और बारीक नक्काशी खजुराहो की शैली की याद दिलाती हैं।

 यह मंदिर मुख्य चतुर्मुख (ऋषभदेव) मंदिर के ठीक उत्तर दिशा में स्थित है और स्थापत्य कला तथा मूर्तिकला का एक बेजोड़ नमूना माना जाता है। 
 इस मंदिर का निर्माण भी 15वीं शताब्दी (लगभग 1439 ईस्वी के आस-पास) में मुख्य चौमुख विहार के निर्माण के दौरान ही किया गया था। 
 मेवाड़ के तत्कालीन प्रतापी राजा महाराणा कुंभा के शासनकाल में जैन आचार्य सोमसुंदरसूरी जी की प्रेरणा और संरक्षण में इस मंदिर का निर्माण हुआ था।
यह मंदिर वास्तुकला की दृष्टि से मुख्य मंदिर से थोड़ा छोटा हो सकता है, लेकिन कलात्मकता के मामले में यह अद्वितीय है:
  • 1008 सर्प फणों वाली चमत्कारी मूर्ति: इस मंदिर का सबसे बड़ा आकर्षण भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा है। एक ही अखंड संगमरमर की शिला (Single Marble Slab) पर उकेरी गई इस मूर्ति के सिर पर 1008 सर्प फण (सांप के सिर) बने हुए हैं, जो छत्र की तरह फैले हैं। इस प्रतिमा में सांप की अनगिनत पूंछों को इस जटिलता से तराशा गया है कि उनका अंत कहाँ होता है, यह ढूँढ पाना नामुमकिन है।
अष्टपद और दिव्य चित्रण: प्रतिमा के दोनों ओर चंवरधारी, यक्ष-यक्षिणी (जो आधे मानव और आधे सर्प के रूप में दिखते हैं) और भगवान का अभिषेक करते हुए दो हाथियों को बहुत सुंदरता से दर्शाया गया है। मंदिर में पवित्र 'अष्टपद' का भी एक उत्कृष्ट चित्रण है, जिसमें एक ही पंक्ति में आठ तीर्थंकरों सहित गिरनार और नंदीश्वर द्वीप की रचना दिखाई गई है। 

इस मंदिर की बाहरी दीवारों और खंभों पर बहुत ही तीक्ष्ण और बारीक नक्काशी की गई है। यहाँ विद्या की देवियों, सिंहासन देवियों, यक्षिणियों और विभिन्न मुद्राओं में स्त्रियों के श्रृंगार-प्रधान सुंदर चित्रों को उकेरा गया है, जो मारू-गुर्जर (सोलंकी) स्थापत्य शैली की श्रेष्ठता को दिखाते हैं।









  • पुगलिया माता जी का मंदिर 
यहीं नजदीक में एक पुराना सा मंदिर भी था जिसे पुगलिया माता का मंदिर कहते हैं। एक ऊँचे और निर्जन स्थान पर यह मंदिर बना है। 




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सूर्य मंदिर (Sun Temple): 

मुख्य जैन मंदिर के पास ही स्थित यह 13वीं शताब्दी का एक प्राचीन सूर्य मंदिर है, जिसका जीर्णोद्धार बाद में 15वीं शताब्दी में महाराणा कुंभा के काल में कराया गया। यह मंदिर अपनी वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है। इसके गर्भगृह और बाहरी दीवारों पर उत्तम नक्काशी की गई है, जिसमें भगवान सूर्य को सात घोड़ों वाले रथ पर सवार दिखाया गया है। यह मंदिर जैन संस्कृति के साथ-साथ सनातनी कला के सुंदर समन्वय को दर्शाता है।

यहाँ कोई पुरातत्व विभाग का बोर्ड नहीं था क्योंकि यह मंदिर भगवान एकलिंग जी ट्रस्ट के संरक्षण में है और निजी समपत्ति में  शामिल है। थोड़ी देर इस मंदिर को देखने के बाद मैं वापस देसूरी की तरफ बढ़ चला।  


















परशुराम महादेव की गुफा तक जाने वाला मार्ग 

परशुराम महादेव द्वार 




देसूरी किला 

 देसूरी किला गेट 

पहाड़ी पर स्थित देसूरी किला 


देसूरी की नाल 


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