हरिद्धार यात्रा - 2015
जून 2015,
मेरे पिताजी के स्वर्गवास के बाद मैं उनकी अस्थियों को लेकर हरिद्वार जाना चाहता था। हरिद्वार, वही स्थान है जहाँ मैं बचपन से ही अपने माता पिता के साथ गया था और उन्हीं के साथ मैंने गंगा के तट और इसकी धार्मिक महिमा को समझा था। मैंने कभी नहीं सोचा था कि जीवन में मुझे हरिद्वार की एक ऐसी भी यात्रा करनी पड़ेगी जिसमें मेरे पिताजी सशरीर ना होकर केवल अस्थियों के रूप में होंगें और यह मेरे पिताजी के साथ मेरी अंतिम यात्रा होगी।
मेरे बड़े भाई धर्मेंद्र भरद्वाज जी इस यात्रा में मेरे सहयात्री के रूप में मेरे साथ थे। नईदिल्ली से देहरादून चलने वाली नंदादेवी एक्सप्रेस में विनोद जी ने हमारा हरिद्वार तक आरक्षण करा रखा था। शाम को मैं और भैया, पिताजी की अस्थियां लेकर नईदिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंचे। वहां विनोद जी हमें मिले और उन्होंने काउंटर से कराई गई ट्रेन की टिकट हमें दी और फिर हम हरिद्वार के लिए निकल पड़े। हमारी टिकट कन्फर्म नहीं हुई थी इसलिए हमें कोई सीट नहीं मिली थी। पूरी रात का यह सफर हमने खड़े खड़े ही पूरा किया गनीमत थी कि यह AC कोच था, अन्यथा गर्मी कोई कसर नहीं छोड़ रही थी।
अगली सुबह हम हरिद्वार पहुंचे, यहाँ पहुंचकर अनायास ही मेरी आँखों में आंसू आ गए, रेलवे स्टेशन के बाहरी परिसर को देखकर मुझे मेरी बीती हरिद्वार की यात्रा की याद आ गई जिसमें अब तक मेरे पिताजी मेरे साथ थे किन्तु आज वह मेरे साथ मौजूद नहीं थे, बस उसके फूल मेरे साथ थे। भैया ने मेरे दुःख को समझ लिया और वह मुझे एक चाय नाश्ते के दुकान पर लेकर गए। हरिद्वार में सुबह की चाय पीने के बाद हम हरि की पैडी की ओर रवाना हो चले।
...
हरि की पैडी पर पहुंचकर माँ गंगा को नमन करके मैंने अपने पिता जी की अस्थियां गंगा जी में विसर्जित कीं और फिर गंगा स्नान के पश्चात अपने पिताजी को नमन करते हुए उनसे अंतिम विदा ली और वापस स्टेशन की ओर प्रस्थान किया। यह क्षण मेरे लिए अत्यंत ही भावुक थे और सहज ही ना सम्भलने वाले थे, परन्तु भैया मेरे साथ थे जिनकी वजह से मुझमे हौंसला भी था और हिम्मत भी, इन दुख्नों के क्षणों को ग्रहण करने की। मेरा हृदय यह स्वीकार ही नहीं कर पा रहा था कि मेरे सिर से मेरे पिता का साया हट चुका है, मैंने अपने पिता को खो दिया है।
...
पिता की याद मन में बसाये आँखों में आंसू लिए मैं, भैया के साथ रेलवे स्टेशन की ओर रवाना हो चला। मार्ग में एक पुलिस स्टेशन के नजदीक लगे एक बड़े पोस्टर को मैंने पढ़ा, जिसमें जीवन और मृत्यु से सम्बंधित कुछ महत्वपूर्ण बातें लिखी हुईं थीं। इसमें एक पिता और पुत्र के दायित्वों का भी विशेष विवरण दिया हुआ था। इसे पढ़कर मुझे एहसास हुआ कि एक पिता का अपने पुत्र के जीवन में कितना महत्वपूर्ण योगदान रहता है।
...
एक भोजनालय पर भोजन करने के बाद हम रेलवे स्टेशन पहुंचे। यहाँ से हमारा वापसी का आरक्षण नहीं था, इसलिए सामान्य श्रेणी की टिकट लेकर हम ट्रेन में सवार हो गए। कोच में सीट तो कोई भी खाली नहीं थी, इसलिए दरवाजे के पास ही खड़े होकर हमने यात्रा की। पिताजी के जीवन काल में मैंने कभी जनरल कोच में यात्रा नहीं की थी, मेरे पिताजी के पास स्लीपर का पास था, जिससे मैं किसी भी ट्रैन के स्लीपर कोच में यात्रा कर सकता था बिना किसी मूल्य के। आज उनके जाने बाद मैं सामान्य श्रेणी का मुसाफिर बन चुका हूँ।
![]() |
| IN DELHI METRO |
![]() |
| HARIDWAR ARRIVED AT 4 AM |
.
![]() |
| MY BIG BROTHER DHARMENDRA BHARDWAJ |
![]() |
| HARI KI PAIRI |
![]() |
| HARI KI POURI, HARIDWAR |
![]() |
| GANGA RIVER |
![]() |
| GANGA RIVER |






























No comments:
Post a Comment
Please comment in box your suggestions. Its very Important for us.