UPADHYAY TRIPS PRESENTS
नगरकोट धाम 2013
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बैजनाथ से आखिरी ट्रेन पकड़कर हम शाम तलक काँगड़ा मंदिर स्टेशन पहुंचे, यह नगरकोट धाम का स्टेशन है, यहाँ से नगरकोट मंदिर तीन चार किमी दूर है, स्टेशन से बाहर निकल कर एक नदी पड़ती है जिसपर अंग्रेजों के समय का रस्सी का पुल बना है जो हिलाने पर जोर से हिलता भी है , यहाँ से आगे टेम्पू खड़े मिलते है जो दस रुपये प्रति सवारी के हिसाब से मंदिर के दरवाजे तक छोड़ देते हैं, और यहाँ से बाजार युक्त गलियों में होकर मंदिर तक पहुंचते हैं, यह माँ बज्रेश्वरी देवी का मंदिर है, और एक प्रख्यात शक्तिपीठ धाम है, यह उत्तर प्रदेश की कुलदेवी हैं कहलाती हैं, भक्त यहाँ ऐसे खिचे चले आते हैं जैसे चुम्बक से लोहा खिंचा चला आता है। मंदिर में आने पर एक अलग ही अनुभव सा होता है ।
मंदिर के ठीक सामने एक सरकारी सराय है जिसमे इसबार भी मुझे कोई कमरा खाली नहीं मिला, मंदिर के नजदीक ही कौशल्या माई की गद्दी है, यहाँ अधिकतर श्रद्धालु देवी माँ की जात करने के लिए आते हैं, कौशल्या माई उन सभी को जात करवाती हैं, और ठहरने के लिए स्थान भी उपलब्ध करवाती हैं, यहाँ मुझे वर्षों पुराने रजिस्टर देखने को मिले जिनमे हमारे पूर्वजों के नाम भी शामिल हैं, आज इस रजिस्टर में मेरी पत्नी कल्पना का नाम भी शामिल हो गया था और देवी जी की कृपा से हमें रात गुजारने के लिए एक कमरा भी मिल गया ।
कमरा मिलने के पश्चात् हम देवी माँ के मंदिर में गए, देवी के दर्शन के लिए काफी लम्बी लाइन लगी हुई थी, इसलिए मैं मंदिर के पीछे बने लंगर भवन में खाना खाने गया, यहाँ सालभर दाल चावल ही मिलते हैं, लेकिन बड़े ही स्वादिष्ट। लंगर में भोजन खाकर मैंने देवी माँ के दर्शन किये, मंदिर लगभग खाली हो चुका था, रात के दस बज गए थे, यहीं पर एक लाल भैरव जी का मंदिर है जिसके बाहर एक स्लेट पर लिखा हुआ है कि जब भी कोई बड़ी विपदा काँगड़ा पर आती है तो इनके शरीर से पसीना और आँखों से आंसू स्वत ही निकल आते हैं, और मंदिर के प्रांगन में काफी अच्छी अच्छी बातें मुझे पढने को मिली।
आज से हजारों वर्ष पूर्व महमूद गजनवी ने इस मंदिर पर आक्रमण किया था जहाँ से वह अनेक अमुल्य हीरे जवाहरात और अन्य बेश कीमती सामान यहाँ से लूट कर अपने देश गजनी ले गया था और मंदिर को भी उसने बुरी तरह से ध्वस्त कर दिया था, बाद कुछ हिन्दू राजाओं ने इसका पुनःनिर्माण कराया, इसके बाद भी काँगड़ा के इस मंदिर पर विपत्ति शांत नहीं हुई और 1905 में आये विनाशकारी भूकंप ने इस मंदिर फिर से मिटटी में मिला दिया, लेकिन धरती से ईश्वर का अस्तित्व कभी समाप्त नहीं हो सकता और आज भी यह मंदिर अपनी उसी स्थिति में खड़ा है ।
इस मंदिर की बनाबट से तीन धर्मो का मेल दिखाई देता है, इसका पहला गुम्बद गुरूद्वारे की तर्ज़ पर बना है जो सिख समुदाय को समर्पित है, दूसरा गुम्बद मस्जिद की तर्ज़ पर बना है जो इस्लाम धर्म को समर्पित है और तीसरा हिन्दू धर्म की तर्ज़ पर बना देवी माँ का मुख्य मंदिर है। इस मंदिर के पीछे धौलाधार की श्रेणियां स्पष्ट दिखाई देती हैं जो मन को मोह लेती हैं, मंदिर के बाहर बहुत बड़ा बाजार है जहाँ पूजा की सामग्री के सभी वस्तुएं उचित मूल्य पर मिल जाती हैं, और साथ में काँगड़ा भी बहुत बड़ा शहर है ।
मंदिर से आधे किमी की दूरी पर गुप्त गंगा के नाम से भी एक धाम है जहाँ श्रद्धालु स्नान करते हैं और फिर मंदिर पर पहुंचते हैं । गुप्त गंगा से थोडा आगे ही वह नदी भी मिल जाती है जो हमें स्टेशन के बाहर मिली थी इस नदी को यहाँ बाण गंगा के नाम से जाना जाता है, मैंने इसी नदी में स्नान किया था यहाँ से मुझे काँगड़ा वाली ट्रेन भी जाती हुई दिखी जो नदी से काफी ऊपर एक पहाड़ पर जा रही थी , वापस आने पर मैंने बाण गंगा के मंदिर के दर्शन किये और पास में ही एक अक्षरा माता के नाम से भी मंदिर है जिसमे एक खूबसूरत झरना भी बहता है ।
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रात को नगरकोट धाम मंदिर |
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SUDHIR UPADHYAY IN KANGRA |
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मेरे मातापिता और ठेल वाले बाबा |
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गीता प्रेस भवन |
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मंदिर प्रांगण में एक शेर की मूर्ति |
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काँगड़ा मंदिर |
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माँ बज्रेश्वरी का दरबार |
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काँगड़ा का बाजार |
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गुप्त गंगा |
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बाण गंगा मंदिर का रास्ता |
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बाण गंगा नदी |
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बानगंगा नदी , ऊपर से जाती ट्रेन |
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दो धर्मों का मेल |
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बाणगंगा मंदिर |
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अक्षरा माता मंदिर |
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