Saturday, July 2, 2022

GOGAMERI TRIP 2022

जय गुरु गोरखनाथ 

गोगामेड़ी यात्रा - 2022

पिछले कुछ दिनों से मन में  कुलदेवता बाबा जाहरवीर के दर्शनार्थ गोगामेड़ी जाने की इच्छा सी हो रही थी, और साथ ही अपनी पत्नी कल्पना को भी मैं वहां ले जाना चाहता था। जल्द ही बाबा ने मेरी मन की बात सुन ली और मेरे पास किशोर मामा जी का फोन आया और उन्होंने मेरे गोगामेड़ी जाने के बारे में पुछा, मैंने आश्चर्यचकित होकर उनसे कहा कि आपको कैसे [पता चला कि मैं गोगामेड़ी जा रहा हूँ, तब उन्होंने कहा कि उन्हें यह बात धर्मेंद्र भाई से पता चली  है।  

दरअसल धमेंद्र भाई मेरे बड़े मामाजी के बेटे हैं, और मुझसे उम्र में बड़े हैं इसलिए  वह मेरे लिए मेरे बड़े भाई हैं, पिछली बार जब वह मथुरा आये थे तब से उनसे मैंने गोगामेड़ी जाने के प्लान के बारे में जिक्र किया था। उन्होंने मेरी यह बात इतनी पसंद आई कि उन्होंने भी सपरिवार बाबा के दर्शन हेतु यात्रा की तैयारी कर ली। उनके साथ ही किशोर मामाजी भी अपने परिवार सहित यात्रा पर चलने को तैयार हो गए। 

अब यात्रा में इतने सारे सहयात्री हो ही गए थे तो मैं अपने मुख्य सहयात्री को कैसे अकेला छोड़ सकता था और वो सहयात्री थी मेरे माँ, जिनके साथ एकबार पहले भी मैं गोगामेड़ी के यात्रा कर चुका हूँ। उस समय मीटरगेज का दौर था, हम गोगामेड़ी से जयपुर तक मीटरगेज की ट्रेन में गए थे जिसमें हमारा आरक्षण भी था स्लीपर क्लास में। मैंने भैया और किशोर मामा के साथ जाने वाली बात जब माँ को बताई तो वो भी बहुत खुश हो गईं और यात्रा पर जाने के लिए उत्साहित हो गईं। 

हम एक इ रिक्शा से रेलवे स्टेशन पहुंचे। भिवानी जाने वाली पैसेंजर ट्रेन प्लेटफॉर्म चार पर खड़ी है। ट्रेन के नजदीक पहुंचकर हमें किशोर मामा और उनका परिवार,  साथ ही धर्मेंद्र भाई, भाभी, नंदू, सन्नी और मेरी बड़ी मामी रूपवती जी हमें हमारा इंतज़ार करते हुए मिले। सभी हमें देखकर खुश हुए। मैं, माँ और कल्पना इस ट्रैन के स्लीपर कोच में सवार हो गए तथा बाकी  हमारे अन्य सहयात्री सामान्य कोच में। 

जल्द ही ट्रेन मथुरा स्टेशन से रवाना हो गई और शाम को साढ़े चार बजे के लगभग अलवर स्टेशन पहुंची। अलवर राजस्थान का एक मुख्य नगर है। इस स्टेशन पर ट्रेन का इंजन आगे से हटकर पीछे लगता है और ट्रेन रेवाड़ी जाने के लिए तैयार हो जाती है। अलवर स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर उतरकर मैंने और भैया ने एक एक चाय पी और थोड़ी देर स्टेशन पर घूमे।  इसके बाद शाम को पांच बजे ट्रेन रेवाड़ी के लिए रवाना हो चली। 

शाम को साढ़े छः बजे हम रेवाड़ी स्टेशन पहुंचे। यहाँ हमने यह ट्रेन छोड़ दी और यहाँ से गोगामेड़ी जाने वाली दूसरी ट्रैन का इंतज़ार करने लगे जो कि रात को साढ़े आठ बजे यहाँ आने वाली थी। अभी हमारे पास दो घंटे का पर्याप्त समय था। हमने रेवाड़ी के प्लेटफॉर्म पर ही अपने आसन बिछाए और इस शाम को अपने सहयात्रियों के साथ भरपूर इंजॉय किया। भैया और किशोर मामा जी स्टेशन के बाहर जाकर रात के भोजन की व्यवस्था कर लाये और गोगामेड़ी जाने के लिए टिकट भी ले आये। 

स्टेशन पर माँ के साथ बिताये गए ये क्षण, मेरे लिए कभी ना भूलने वाले थे। सभी को एक साथ अपनी इस यात्रा में साथ देखकर मैं बहुत प्रसन्न था। रात को गोगामेड़ी जाने वाली ट्रेन भी आ गई और हम इससे आगे अपनी यात्रा पर बढ़ चले। यह ट्रेन रात को डेढ़ बजे के आसपास गोगामेड़ी पहुंची। अभी आधी रात थी, इसलिए सुबह तक हमने गोगामेड़ी रेलवे स्टेशन पर ही विश्राम किया और सुबह चार - पांच बजे के आसपास हम, गोरख टीला के लिए रवाना हो गए जो स्टेशन से काफी दूर नहीं था। माँ पैदल चलने  में असमर्थ थीं, इसलिए हमने एक बैटरी वाले रिक्शे में माँ और कल्पना को बैठा दिया।

जल्द ही हम गोरख टीला पहुंचे।  यह गुरु गोरखनाथ का स्थान है  और यहाँ उनके दर्शन होते हैं। सुबह सुबह ही आसमान में घनी काली घटायें छाईं हुईं थीं, और शीघ्र ही घनघोर बारिश शुरू हो गई। अभी दिन निकला नहीं था, सुबह के चार से पांच बजे का समय था, हम सुबह की इस बारिश  में ही नहा लिए और हमारे साथ की महिलाएं, पास ही में बने सुविधाजनक बाथरूमों में नहाकर तैयार हो गईं। यहाँ गुरु गोरखनाथ और बाबा जाहरवीर के नाम से पूजा की जाती है, दो लोंग के जोड़ों के साथ उनकी भेंट दी जाती है। हमसे भी पूर्व हमारे पूर्वज इस पूजा और प्रथा को करते आ रहे हैं, उनका मानना है कि बाबा जाहरवीर हमारे कुलदेवता हैं और हमें इनकी पूजा करनी चाहिए। 

भैया और किशोरमामा जी ने भी यहाँ पूजा अर्चना की और उनके बाद हम बाबा गोरखनाथ जी के दर्शन करने गोरख टीला मंदिर में प्रवेश कर गए। गुरु गोरखनाथ जी के दर्शन करने के पश्चात हम  मंदिर के पीछे बने प्रांगण में पहुंचे, यहाँ बहुत ही सुन्दर उद्यान बना हुआ है जिसमें बहुत सुन्दर प्रतिमाएं लगी हुईं हैं। नजदीक है पवित्र सरोवर है जिसमें भक्त स्नान करते हैं। .

गोरखटीला के दर्शन करने के बाद हम यहाँ से एक किमी दूर बाबा जाहरवीर जी की समाधी पर पहुंचे।  इसे ही गोगामेड़ी कहा जाता है क्योंकि यह गोगाजी महाराज जाहरवीर की समाधी है। राजस्थान सरकार ने यहाँ काफी अच्छा विकास कराया है और भक्तों हेतु अनेकों सुविधाएँ मुहैया कराइ हैं। जाहरवीर बाबा की समाधी के दर्शन करने के बाद मन प्रफुल्लित हो उठा। मेरे साथ मेरी माँ और मेरी पत्नी कल्पना ने आज बाबा के दर्शन किये और अब हम वापस रेलवे स्टेशन  की तरफ रवाना हो चले। 

किशोर मामा जी तो हमारे साथ वापस हो लिए किन्तु धमेंद्र भाई की कुछ और ही योजना थी। इस यात्रा में उनका और हमारा साथ यही तक था, हम ट्रेन द्वारा वापस सादुलपुर की ओर रवाना हो गए और धर्मेंद्र भाई अपने परिवार सहित, हिसार की तरफ। 















































































Saturday, May 14, 2022

PURNAGIRI TEMPLE : UTTRAKHAND 2023

 शक्तिपीठ माँ पूर्णागिरि मंदिर 



आख़िरकार दो साल बाद, कोरोना जैसी महामारी को हराकर यात्राएँ फिर से शुरू हो चुकी थीं, इस वर्ष उत्तराखंड और हिमाचल में जैसे टूरिस्टों, तीर्थयात्रियों और घुमक्क्ड़ों की जैसे बाढ़ सी आ गई थी। उत्तराखंड के चारों धाम गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ के अलावा समूचे प्रदेश में हर  सड़क, हर होटल में यात्रियों का ताँता सा लगा हुआ था। हरिद्वार और ऋषिकेश जैसे तीर्थ शहर हॉउसफुल हो चुके थे। आखिरकार लोगों को दो साल बाद प्रकृति से रूबरू होने का मौका जो मिला था। इसबीच मैंने भी अपना यात्रा प्लान उत्तराखंड की ओर ही बना रखा था और अंत में तय हुआ कि कुमाँयु में ही कोई यात्रा की जाए। 

मैं काठगोदाम और नैनीताल नहीं जाना चाहता था और पिछले कुछ समय से मेरा मन टनकपुर स्थित माँ पूर्णागिरि धाम के दर्शनों को बहुत व्याकुल हो रहा था। इस बार वहीँ जाने का विचार लेकर मैं रात को आगरा फोर्ट से रामनगर जाने वाली साप्ताहिक एक्सप्रेस में आकर बैठ गया और रात को 11 बजे ट्रेन के चलने के साथ ही इसकी खाली पड़ी सीट पर बिस्तर लगाकर सो गया। सुबह तक़रीबन तीन बजे जब मेरी आँख खुली तो देखा ट्रेन बरेली के स्टेशन पर खड़ी थी। मेरा गंतव्य यहाँ से अगले स्टेशन इज़्ज़त नगर तक ही था इसलिए इस ट्रेन को मैंने इज़्ज़त नगर पर छोड़ दिया और स्टेशन पर बने वेटिंग रूम में मैंने सुबह होने तक एक नींद और खींच ली। 

अब सुबह के सात बज चुके थे, वेटिंग रूम में ही मैं नहाधोकर तैयार हो गया और अब अपनी अगली यात्रा इज़्ज़त नगर से टनकपुर के लिए होनी थी। बरेली से टनकपुर के बीच सुबह एक डीएमयु ट्रेन चलती है। इसी ट्रैन का टिकट लेकर मैं टनकपुर की ओर रवाना हो चला। टनकपुर उत्तराखंड का आखिरी रेलवे स्टेशन है, जिसतरह देहरादून, ऋषिकेश, रामनगर और काठगोदाम टर्मिनल रेलवे स्टेशन है ठीक उसी तरह टनकपुर भी उत्तराखंड का टर्मिनल स्टेशन है। कुछ समय पहले तक यहाँ सिर्फ मीटर गेज ट्रैन ही चलती थी किन्तु अब आमान परिवर्तन के बाद यहाँ ब्रॉड गेज लाइन बिछी और टनकपुर देश के कुछ मुख्य शहरों से जुड़ गया। पीलीभीत के बाद उत्तर प्रदेश की सीमा समाप्त हो जाती है और उत्तराखंड की झलक देखने को मिलती है। 

खटीमा उत्तराखंड का मुख्य शहर है जो हल्द्वानी के निकट स्थित है। पीलीभीत के बाद खटीमा ही टनकपुर रेल लाइन का बड़ा स्टेशन है जो प्राकृतिक सौन्दर्यता से निखरा हुआ है, इसके बाद ट्रेन जंगलों के बीच से होती हुई बनबसा पहुँचती है और इससे आगे हिमालय के पहाड़ दृष्टिगोचर होने लगते हैं। उत्तराखंड के पहाड़ों की तलहटी में टनकपुर बसा हुआ है जो कि चम्पावत जिले में स्थित है। 

ट्रेन टनकपुर रेलवे स्टेशन पहुँच चुकी है, मैंने जिसप्रकार आज से पहले इस रेलवे स्टेशन की कल्पना की थी, उससे इसे परे ही पाया। स्टेशन परिसर के बाहर निकलते ही मुझे इसके मीटर गेज के होने के समय का एहसास सा हो गया। यह उत्तराखंड का आखिरी टर्मिनल रेलवे स्टेशन है जहाँ  ज्यादातर ट्रेनों का आवागमन नहीं है। 

रेलवे स्टेशन के आखिरी सिरे पर एक रेलवे फाटक है जिसके किनारे ही टनकपुर का बस स्टैंड है। इस बस स्टैंड से अन्य शहरों के लिए अनेकों बसें चलती हैं किन्तु अपने अपने समय पर। यहाँ हिमाचल प्रदेश की भी बस सेवा है जो शिमला से टनकपुर के बीच पूरी होती है। मेरे सामने ही हिमाचल की यह बस यहाँ आई और कुछ समय ठहरकर शिमला के लिए वापस चली गई। 

मैंने आज लोहाघाट जाने का प्लान बनाया था परन्तु समय की कमी के चलते मेरा यह प्लान फ्लॉप हो गया और मैंने आज माँ पूर्णागिरि मंदिर जाने का विचार बनाया जहाँ मैं लोहाघाट से लौटकर जाना चाहता था। टनकपुर से पूर्णागिरि की दूरी लगभग 23 किमी है जहाँ जाने के लिए अनेकों जीपें हर समय उपलब्ध रहती हैं। इन्हीं में से एक जीप के द्वारा मैं पूर्णागिरि पहुंचा। 

जीप वाले ने मुझे भैरव मंदिर के समीप उतार दिया। इसके बाद अब रास्ता पैदल का था और चढ़ाई भरा था। किन्तु यहाँ मुझे इस चढ़ाई भरे रास्ते में दोनोंतरफ अनेकों ऐसी दुकाने दिखीं जिनमें अनेकों गद्दे बिछे हुए थे, जिसका मतलब था यह यहाँ आने वाले भक्तों के विश्राम के लिए थे। ऐसी ही एक दुकान पर मैंने भी थोड़ी देर विश्राम किया और इस दुकानदार से यहाँ की अधिकांश जानकारी एकत्र की। थोड़ी देर पश्चात मैं यहाँ से आगे बढ़ चला। मैं जैसे जैसे आगे बढ़ता जा रहा था, रास्ता और भी कठिन और चढ़ाई भरा होता जा रहा था। आज इस यात्रा में मुझे वैष्णो देवी यात्रा की याद आ गई। 

पर्वत की चोटी पर देवी माता का एक छोटा सा मंदिर है, यह एक मुख्य शक्तिपीठ है और यहाँ की मान्यता है कि यहाँ सती की नाभि गिरी थी, जिससे यह स्थान एक प्रमुख शक्तिपीठ बन गया। माता के दर्शन कर अब मैं वापस हो चला। जब मैं पर्वत से उतरकर नीचे पहुंचा तो मुझे यहाँ मेरा चचेरा भाई यतेश मिला जो अपने परिवार सहित माता के दर्शन के लिए यहाँ आया था। मुझे यह पहले से पता नहीं था अन्यथा इस यात्रा को मैं अकेले नहीं बल्कि अपने भाई के साथ कर सकता था। परन्तु अब मेरी यात्रा पूर्ण हो चुकी थी, इसलिए भाई से विदा लेकर मैं वापस तनकपुर के लिए निकल पड़ा। 

शाम को चार बजे के लगभग मैं टनकपुर पहुंचा, यहाँ पहुंचकर मैंने थोड़ी देर बाजार घुमा और रेलवे स्टेशन पहुंचकर अपनी ट्रेन को देखा, जो पीलीभीत तक जाने के लिए तैयार थी। ट्रेन बिलकुल खाली पड़ी थी, यहाँ मैंने उत्तराखंड के जाम का आनंद लिया और अब ट्रैन भी चल पड़ी थी। रात को दस बजे तक मैं पीलीभीत पहुँच चुका था, यहाँ से मेरी अगली ट्रेन बरेली के लिए थी जो रात को साढ़े ग्यारह बजे चलेगी। मेरे पास डेढ़ घंटे का समय था। 

मैंने स्टेशन से बाहर निकलकर बाजार घूमा और एक दुकान पर जाकर रात्रि भोज किया। बरेली पहुंचकर मुझे रामनगर - आगरा एक्सप्रेस मिल गई जिससे मैं मथुरा पहुँच गया। 

जय माता दी  









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