Tuesday, September 17, 2024

AGRA : SADIK KHAN & SALAWAT KHAN TOMB


 सादिक खान और सलाबत खान का मकबरा


सादिक खान और उनके पुत्र सलाबत खान, मुगल काल के प्रमुख रईस थे और जहांगीर एवं शाहजहाँ के अधीन उच्च पदस्थ अधिकारी थे, सलाबत खान, जो एक मीर बख्शी (कोषाध्यक्ष) थे, 1644 में आगरा किले में अमर सिंह राठौर द्वारा मारे गए, जबकि उनके पिता सादिक की मृत्यु 1633 में ही हो गई थी।


सादिक खां

सादिक खान एक ईरानी रईस, एत्माद्दौला की पदवी वाले मिर्जा ग्यास बेग के भतीजे थे जो मुगल बादशाह जहांगीर और शाहजहां के दरबार में भी रहे। जहांगीर ने मीर बख्शी के रूप में उन्हें 1622 में नियुक्त किया और उसके बाद 1623 में पंजाब का गवर्नर नियुक्त कर दिया। उन्होंने शाहजहाँ के अधीन मीर बख्शी के रूप में सेवा की, 1633 में उनकी मृत्यु हो गई, और उन्हें एक मकबरे में दफनाया गया है जिसे संभवतः उन्होंने खुद बनवाया था। 

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पास मौजूद जानकारी के मुताबिक जहांगीर के बाद शाहजहां ने सादिक खां को 4000 जात का मनसब और 4000 सवार का मनसब प्रदान किया। 3 सितंबर 1633 को सादिक खां के निधन के बाद बेटे सलावत खां ने उनका आगरा के गैलाना में मकबरा बनवाया।

सलाबत खान (मीर बख्शी)

 सलाबत खान, सादिक खान का पुत्र, व शाहजहाँ का प्रिय था और 1644 में व्यक्तिगत अपमान के कारण राव अमर सिंह राठौर द्वारा आगरा किले के दीवान-ए-आम में उसकी हत्या कर दी गई थी। रिश्ते में यह शाहजहां के साले थे और उसके मीर बख्शी (शाही कोषाध्यक्ष) थे। सादिक खां के पुत्र सलाबत खां को शाहजहां के दरबार में चार हजार का मनसब मिला हुआ था।


भारत पुरातत्व विभाग के रिकार्ड के अनुसार शाहजहां के मीर बख्शी सलाबत खां ने अमर सिंह पर टिप्पणी कर दी थी। इस पर अमर सिंह राठौड़ ने आगरा किला के दीवान-ए-आम में शाहजहां के दरबार में ही सलाबत खां को मौत के घाट उतार दिया था। मुगल सैनिक उन पर टूट पड़े थे, मगर अमर सिंह राठौड़ उन्हें परास्त कर किले से निकलने में सफल रहे थे।

उन्होंने घोड़े पर सवार होकर आगरा किला की दीवार से छलांग लगा दी थी। बाद में उनकी हत्या आगरा किला के गेट के पास कर दी गई थी। यह गेट आज अमर सिंह गेट कहलाता है
    • सादिक खान का मकबरा: 
    • एक ऊंचे चबूतरे पर निर्मित अष्टकोणीय संरचना में निर्मित है साथ ही इसमें पारसीय वास्तुकला भी दृष्टिगोचर होती है। 
    • सलाबत खान का मकबरा (चौसठ खंबा): 
    • चौंसठ स्तंभों के हॉल के रूप में जाना जाने वाला, लाल बलुआ पत्थर का यह मंडप 1644-1650 के बीच बनाया गया था।

दोनों स्मारक अपनी अलग-अलग अनूठी वास्तु और निर्माण शैली के बने हैं। और सबसे मुख्य दोनों पिता - पुत्र की कब्रें एक सीध में निर्मित हैं। 

यह मकबरे आगरा-दिल्ली राजमार्ग (एनएच19) के पास, अकबर के मकबरे के नजदीक स्थित हैं

Thursday, August 8, 2024

AGRA : FIROZ KHAN TOMB

 

फिरोज खान का मकबरा / FIROZ KHAN TOMB




फिरोज खान शाहजहां के शाही हरम का प्रभारी (ख्वाजासरा) और दीवान-ए-कुल थे। 

लाल बलुआ पत्थर से निर्मित यह दो मंजिला अष्टकोणीय मकबरा मुगलकालीन वास्तुकला का उदाहरण है।

फिरोज खान के मकबरे का इतिहास 
  • फिरोज खान के मकबरे का निर्माण 17वीं शताब्दी में मुगल बादशाह शाहजहां के शासनकाल के दौरान हुआ था, जब फिरोज खान दीवान-ए-कुल के पद पर थे। फिरोज खान शाहजहां के एक विश्वसनीय अधिकारी थे, जो शाही हरम के प्रभारी के रूप में काम करते थे। उनकी मृत्यु 1637 में हुई थी।
  • यह मकबरा लाल बलुआ पत्थर से बना है और अष्टकोणीय (octagonal) आकार का है। यह दो मंजिला इमारत है।
  •  यह स्मारक एएसआई (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) द्वारा संरक्षित है, लेकिन यह एत्माद्दौला के मकबरे की तुलना में बहुत कम प्रसिद्ध और उपेक्षित है।
  • यह मकबरा आगरा शहर से लगभग 5 किमी दूर आगरा-ग्वालियर रोड पर स्थित है।

Friday, March 22, 2024

AGRA : ETMAUDDOULA


एत्माउद्दौला का मक़बरा 



नूरजहाँ ने 1622-1628 के बीच अपने पिता मिर्ज़ा ग़ियासबेग की याद में बनवाया था। इसे 'बेबी ताज' या 'छोटा ताजमहल' भी कहा जाता है, क्योंकि यह पूरी तरह से सफेद संगमरमर से बना पहला मुगल मकबरा है और इसमें पित्रदुरा (कीमती पत्थरों की जड़ाई) का उत्कृष्ट काम किया गया है।


यह मकबरा मुगल साम्राज्ञी नूरजहाँ ने अपने पिता मिर्ज़ा ग़ियासबेग (जिन्हें जहाँगीर ने एतमादुद्दौला की उपाधि दी थी) की स्मृति में बनवाया था।

यह पूरी तरह से सफेद संगमरमर से निर्मित पहली मुगल इमारत है, जिसे अक्सर ताजमहल का अग्रदूत (precursor) माना जाता है।

अपनी सूक्ष्म नक्काशी और सुंदरता के कारण इसे 'बेबी ताज' या 'ज्वेल बॉक्स' (रत्नों का डिब्बा) भी कहा जाता है।

यह उत्तर प्रदेश के आगरा शहर में यमुना नदी के पूर्वी तट पर स्थित है।
 यह भारत में पूरी तरह सफेद संगमरमर से बनी पहली मकबरों में से एक है।




 

Thursday, October 12, 2023

AGRA : ROMAN CATHOLIC CEMETERY


 रोमन कैथोलिक कब्रिस्तान


आगरा में रोमन कैथोलिक कब्रिस्तान का निर्माण 1550 ई. में हुआ था और इसका इस्तेमाल सबसे पहले उन अर्मेनियाई ईसाइयों को दफनाने के लिए किया गया था, जो अकबर के शासनकाल के दौरान इस शहर में आकर बस गए थे। इनके बाद, जैसे-जैसे इस इलाके में दूसरे लोग आकर बसते गए, वैसे-वैसे अन्य ईसाई संप्रदायों के लोगों को भी यहाँ दफनाया जाने लगा।


इस कब्रिस्तान में सबसे पुरानी कब्र जॉन मिल्डेनहॉल की है। जॉन मिल्डेनहॉल एक अंग्रेज व्यापारी थे, जिनकी मृत्यु 1614 में हुई थी। कहा जाता है कि वह पहले ऐसे अंग्रेज थे, जिन्होंने "अकबर को आमने-सामने देखा था"। लेकिन यहाँ कुछ और कब्रें भी हैं, जो ध्यान देने लायक हैंन सिर्फ उन लोगों से जुड़ी कहानियों की वजह से, बल्कि उन कब्रों की वास्तुकला की वजह से भी।

Saturday, August 12, 2023

AGRA : KAFUR MOSQUE & STONE HORSE

  काफूर की मस्जिद और पत्थर के घोड़े की प्रतिमा 



आगरा-मथुरा हाईवे (सिकंदरा) पर स्थित काफूर की मस्जिद (या इतिबारी खां की मस्जिद) के पास एक रहस्यमयी पत्थर का घोड़ा (लाल बलुआ पत्थर की मूर्ति) स्थित है। 
1605-1623 ईस्वी के बीच निर्मित यह स्थल, जहांगीर के वफादार दरबारी इतिबारी खां द्वारा संत ख्वाजा काफूर के सम्मान में बनवाया गया था, जहां घोड़े की मूर्ति को अकबर के प्रिय घोड़े का स्मारक माना जाता है।

काफूर की मस्जिद और पत्थर के घोड़े का विवरण:
  • स्थान और इतिहास: यह स्थल आगरा के गुरु का ताल के पास, हाईवे के किनारे है। इसका निर्माण इतिबारी खां, जो एक वफादार ख्वाजासरा (शाही हरम के प्रबंधक) थे, ने 17वीं शताब्दी की शुरुआत में करवाया था।
  • पत्थर के घोड़े का रहस्य: यह मूर्ति लाल पत्थर से बनी है। मान्यता है कि जब बादशाह अकबर दिल्ली से आगरा लौट रहे थे, तो उनके प्यारे घोड़े की मृत्यु हो गई थी, और उसकी स्मृति में यह स्मारक बनाया गया।
  • स्थानांतरण: यह मूर्ति मूल रूप से पास की एक रेलवे लाइन के पास मिली थी, जिसे 1922 में वर्तमान स्थान (मस्जिद परिसर) पर स्थानांतरित किया गया था।
  • मस्जिद की वास्तुकला: यह एक छोटी, तीन-मेहराबदार मस्जिद है जिसके ऊपर एक गुंबद है।

AGRA : JASWANT SINGH CHHATRI


जसवंत सिंह की छतरी

 


जसवंत सिंह की छतरी 

 राजस्थानी वास्तुकला की एक विशिष्ट शैली में निर्मित गुंबददार स्तंभों वाला मंडपनुमा स्मारक है, जिसका निर्माण लगभग  1644-58 ईस्वी में जसवंत सिंह राठौर ने अपने बड़े भाई अमर सिंह राठौर की पत्नी रानी हाड़ा की स्मृति में करवाया था। यह छतरी आगरा में यमुना नदी के किनारे राजवाड़ा, बालकेश्वर में स्थित है । अब इसका संरक्षण भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा राष्ट्रीय महत्व के स्मारक के रूप में किया जाता है।


यह मुगलिया स्थापत्य के बीच हिंदू-राजपूत कला (लाल बलुआ पत्थर) का प्रतीक है, जिसका संबंध अमर सिंह राठौड़ से है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित, यह स्थान कभी मनोहर बाग का हिस्सा था

 यह स्मारक राजा जसवंत सिंह द्वारा बनवाया गया था और इसका इतिहास वीर अमर सिंह राठौड़ से जुड़ा है, जिन्होंने शाहजहाँ के दरबार में मीर बख्शी सलाबत खां को मार गिराया था। 

यह लाल बलुआ पत्थर से निर्मित है और इसमें हिंदू-मुगल मिश्रित वास्तुकला की झलक मिलती है, जिसमें बुर्ज, सुंदर छतरियां, और नाजुक जाली वर्क शामिल है। 

यह एएसआइ द्वारा संरक्षित है, लेकिन अब उपेक्षित है और इसके आसपास अवैध निर्माण हो चुके हैं।

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यहाँ अमर सिंह राठौड़ की पत्नी सती हुई थीं, और स्थानीय महिलाएँ यहाँ पूजा करने आती हैं।

AGRA : CHINI KA ROZA

 आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 2

चीनी का रोज़ा


इसे चाइना टॉम्ब के नाम से भी जाना जाता है, यह अफजल खान का मकबरा है जो जहांगीर के शासनकाल में एक फारसी कवि थे, बाद में वे शाहजहाँ के शासनकाल में वज़ीर बने। अफजल खान की मृत्यु 1639 में लाहौर में हुई और उन्हें आगरा में यहीं दफनाया गया। यह मकबरा मक्का शहर की ओर मुख करके बनाया गया है 

मुल्ला शुक्रुल्लाह शिराज़ी (1570–1639), जिन्हें 'अफ़ज़ल ख़ान' के शाही ख़िताब से जाना जाता था, जहाँगीर और शाहजहाँ के शासनकाल के दौरान मुग़ल दरबार के एक दरबारी थे।उन्होंने एक विद्वान के रूप में ख्याति अर्जित की और 1628–1639 की अवधि के दौरान मुग़ल साम्राज्य के 'वज़ीर-ए-आज़म' (Grand Vizier) के पद तक पहुँचे।

अफ़ज़ल खान का जन्म सफ़वी ईरान के शिराज़ में हुआ था, जहाँ उनके पिता फ़ार्स में एक छोटे राजस्व संग्राहक थे। उनके पिता के दो भाई ईरान में वित्तीय पदों पर कार्यरत थे, जबकि दो अन्य ईरान और भारत के बीच व्यापार में लगे हुए थे। 

अफ़ज़ल खान का एक भाई था, जिसका नाम अमानत खान था; वह बाद में उनके साथ भारत आया और ताजमहल पर सुलेखन (calligraphy) के रूप में लिखे गए अभिलेखों को डिज़ाइन करने के लिए प्रसिद्ध हुआ। अफ़ज़ल खान ने लेखन-कला से संबंधित विषयों, जैसे कि सुलेख, लेखा-जोखा और गद्य-रचना में शिक्षा प्राप्त की थी। उनके शुरुआती शिक्षकों में से एक विद्वान तक़ी अल-दीन मुहम्मद शिराज़ी थे।

AGRA : MEHTAB BAGH & ELEVEN STAIRES




आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 1 

मेहताब बाग़ और ताजमहल का एक दृश्य 

       यूँ तो मैं बचपन से ही आगरा शहर में रहा किन्तु कभी ताजमहल को यमुना के दूसरी पार से देखने का मौका नहीं मिला, कारण था इस स्थान की दूरी, और यहाँ जाने वाला रास्ता जिसके बारे में मुझे कोई विशेष जानकारी नहीं थी। जब कभी ताजमहल देखने का मन होता था तो इसके मुख्य द्वार से ही इसे जाकर देख आता था। किन्तु आगरा शहर छोड़ने के अनेक वर्षों बाद अपने पुराने शहर को घूमने की इच्छा मन में जाग्रत हुई और मैं अपनी बाइक उठकर निकल चला आगरा की ऐतिहासिक यात्रा पर। 

    इस यात्रा के तहत मैंने आगरा के उन स्थानों को चिन्हित किया जो मैंने पहले कभी नहीं देखे थे। इसलिए सबसे पहले मैं पहुंचा यमुना नदी के दूसरी पार, जहाँ आगरा की विभिन्न मध्यकालीन ऐतिहासिक इमारतें देखीं जा सकती थीं। 

    इन सभी स्थलों में सबसे मुख्य था मेहताब बाग़, जो मुगलकाल का एक शानदार बगीचा था। इसका निर्माण औरंगजेब ने अपने शासनकाल के दौरान कराया था। इस बगीचे से ताजमहल का बहुत ही शानदार दृश्य दिखाई देता है बिलकुल वैसे ही, जैसे हम इसे ताज के परिसर में प्रवेश करने के बाद देखते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि मेहताब बाग़ से आप सिर्फ ताजमहल को निहार सकते हैं, इसके ख़ूबसूरती को महसूस कर सकते हैं, यमुना नदी के जल में इसका प्रतिबिम्ब देख सकते हैं किन्तु आप इसे छू नहीं सकते, इसके नजदीक नहीं जा सकते हैं क्योंकि मेहताब बाग़ और ताजमहल के बीच यमुना नदी है और यहाँ इसे पार करने की इजाजत नहीं है। 

AGRA : AGRA FORT

आगरा किला 



 आगरा किले का इतिहास

यह मूलतः एक ईंटों का किला था, जो सिकरवार वंश के राजपूतों के पास था। इसका प्रथम विवरण 1080 ई० में आता है, जब महमूद गजनवी की सेना ने इस पर कब्ज़ा किया था। 

सिकंदर लोदी (1487-1517), दिल्ली सल्तनत का प्रथम सुल्तान था जिसने आगरा की यात्रा की तथा इसने इस किले की मरम्म्त १५०४ ई० में करवायी व इस किले में रहा था। सिकंदर लोदी ने इसे १५०६ ई० में राजधानी बनाया और यहीं से देश पर शासन किया। उसकी मृत्यु भी इसी किले में 1517 में हुई थी। बाद में उसके पुत्र इब्राहिम लोदी ने गद्दी नौ वर्षों तक संभाली, तब तक, जब वो पानीपत के प्रथम युद्ध (1526) में मारा नहीं गया। उसने अपने काल में यहां कई स्थान, मस्जिदें व कुएं बनवाये।

पानीपत के बाद मुगलों ने इस किले पर भी कब्ज़ा कर लिया साथ ही इसकी अगाध सम्पत्ति पर भी। इस सम्पत्ति में ही एक हीरा भी था जो कि बाद में कोहिनूर हीरा के नाम से प्रसिद्ध हुआ। तब इस किले में इब्राहिम के स्थान पर बाबर आया। उसने यहां एक बावली बनवायी। 

सन 1530 में यहीं हुमायुं का राजतिलक भी हुआ। हुमायुं इसी वर्ष बिलग्राम में शेरशाह सूरी से हार गया व किले पर उसका कब्ज़ा हो गया। इस किले पर अफगानों का कब्ज़ा पांच वर्षों तक रहा, जिन्हें अन्ततः मुगलों ने 1556 में पानीपत का द्वितीय युद्ध में हरा दिया।

Sunday, July 30, 2023

MANDU : A Historical Empire of Malwa

 MANDU - A CAPITAL OF MALWA

मालवा की प्राचीन और मध्य कालीन राजधानी - माण्डू 


मालवा प्रान्त के विंध्याचल पर्वतमाला की गोद में स्थित मांडू प्राकृतिक रूप से बहुत ही सुन्दर स्थान है। इसके शांत वातावरण और आश्चर्य चकित कर देने वाले प्राकृतिक दृश्यों की वजह से यह अनेकों भारतीय राजाओं का पसंदीदा स्थल रहा है। मानसून के समय यहाँ फैली हरियाली और सुगन्धित वायु, अनायास ही मन को मोह लेती है। इसके अलावा विंध्य पर्वतों के बीच स्थित होने के कारण यह सुरक्षा की दृष्टि से भी सक्षम स्थान है इसीलिए प्राचीन काल से लेकर मध्य काल तक यह अनेकों राजवंशो की शरण स्थली और राजधानी रहा है। 

दसवीं शताब्दी में यहाँ परमार वंश के शासकों का शासन रहा, जिनमें मुंज राज, सिद्धराज और राजा भोज का नाम प्रमुख है। हालाँकि इन शासकों की राजधानी धारा नगरी थी जो वर्तमान में धार जिला है, फिर भी उन्होने मांडू को भी अपना मुख्य राजनितिक केंद्र बनाये रखा था। 

MAHESHWAR FORT


 MAHESHWAR FORT AND GHAT'S

महेश्वर किला और घाट 


30 JUL 2023

    नर्मदा नदी के किनारे बसा महेश्वर एक अत्यंत ही सुन्दर पौराणिक नगर है। पुराणों के अनुसार यह प्राचीन काल में महिष्मती के नाम से विख्यात था और पौराणिक शासक सहस्त्रार्जुन की राजधानी था। इसके पश्चात सत्रहवीं शताब्दी में इसे मालवा की द्वितीय राजधानी होने का गौरव प्राप्त हुआ जब यहाँ महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने शासन किया। उन्होंने यहाँ अनेकों प्राचीन मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया और साथ अनेक नए मंदिरों का निर्माण कराया। माँ नर्मदा  के किनारे एक विशाल किले के साथ ही सुन्दर रमणीक घाटों का निर्माण कराया। इस किले और घाटों का प्रतिबिम्ब नर्मदा नदी के जल में एक अलग ही आकर्षण के रूप में दिखाई देता है। 

     महेश्वर में माँ नर्मदा का स्वछन्द और शीतल जल मन को अति आनंदित करने वाला है, इसके किनारे के घाट यहाँ आने वाले सभी आगंतुकों का मन मोह लेते हैं। घाटों के किनारे स्थित नवीन एवं प्राचीन मंदिरों की श्रंखलाएं सनातन धर्म की महान व्याख्या का गुणगान करती हुई दिखालाई पड़ती हैं। यहाँ के मंदिरों में  सुबह शाम होने वाली आरतियां और घंटे घड़ियालों की आवाजें रोम रोम में धार्मिक आस्था का भाव पैदा करती हैं। प्राचीन काल से ही महेश्वर धार्मिक गतिविधियों का केंद्र रहा है और वर्तमान में भी यह महेश्वर धाम के नाम से अपनी पहचान बनाये हुए है। 

Saturday, July 29, 2023

JAM GATE

 

JAM GATE

जाम गेट 

29 JUL 2023

पातालपानी जलप्रपात और चोरल बांध देखने के बाद हम महू - मंडलेश्वर मार्ग पर आ गए थे। पूरा रास्ता जंगली वनों से घिरा हुआ था।  यह रास्ता मालवा को निमाड़ प्रान्त से जोड़ने का कार्य करता है। अभी हम विंध्याचल पर्वतमाला के उच्च पठारी भाग में थे। रास्ते में छोटी जाम के नाम से एक गाँव आया जहाँ हमने कुछ समय रुकने के लिए एक दुकान पर ठहरे।  दुकानदार ने हमारे घूमने के उद्देश्य को जानकर बतलाया कि इस गांव में जाम किला है उसे आप देखकर आ सकते हो। यह किला हमें सड़क से स्पष्ट दिखाई दे रहा था। हम बिना देर किये इस किले की तरफ बढ़ चले। 

इस किले को छोटी जाम के नाम से जाना जाता है। किले से थोड़ी दूर प्रसिद्ध पर्यटक स्थल जाम गेट है जिसका निर्माण इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने सन 1791 में कराया था। महेश्वर स्थित अपने किले से वह जब भी पालकी द्वारा इंदौर आया करती थीं तो यह जाम किला ही उनका रात्रि विश्राम स्थल हुआ करता था। जाम किले अथवा गांव से थोड़ी दूर जाम गेट एक भव्य दरवाजा है जहाँ से पर्वतों की तराई में स्थित सम्पूर्ण निमाड़ प्रान्त का विहंगम दृश्य देखा जा सकता है। 

PATALPANI WATERFALL

पातालपानी जलप्रपात 

PATALPANI WATERFALL

29 JUL 2023

    मालवा प्रान्त में इंदौर के निकट एक बहुत ही खूबसूरत जलप्रपात है। यह पातालपानी ग्राम के निकट है इसलिए इसे पातालपानी जलप्रपात कहते हैं। चोरल नदी जब यहाँ 300 फ़ीट की ऊँचाई से नीचे गिरती है तो यह एक प्राकृतिक सुन्दर जलप्रपात का निर्माण करती है। वर्तमान में यह ट्रैकिंग और पिकनिक स्थल के रूप में पर्यटकों का एक पसंदीदा स्थल बनकर उभरा है। 

    ब्रिटिश काल के दौरान इस जलप्रपात के नजदीक से अंग्रेजों ने रेल ट्रेक का निर्माण किया और इसी जलप्रपात के नाम से रेलवे स्टेशन का भी निर्माण कराया। वर्तमान में यह रेलवे स्टेशन जलप्रपात से थोड़ी दूर स्थित है किन्तु जब यहाँ से ट्रैन गुजरती थी तब ट्रेन से भी इस जलप्रपात को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता था। 

    मैं और सोहन भाई इंदौर के रशिया ढाबे से खाना खाकर और मोबाइल चार्ज करने के बाद महू क्षेत्र में पहुंचे। यूँ तो महू, डॉ. भीमराव अम्बेडकर का जन्मस्थान है साथ ही यह इंदौर नगर का छावनी क्षेत्र भी है। छावनी क्षेत्र से निकलकर हम जाम गेट की तरफ बढ़ रहे थे कि अचानक सोहन भाई को पातालपानी जलप्रपात की तरफ जाने वाला एक एक मार्गसूचक पट दिखाई दिया, भाई ने गाडी पातालपानी की तरफ घुमा दी और बहुत ही शानदार रास्तों से होकर शीध्र ही हम पातलपानी जलप्रपात की तरफ पहुंचे। 

UJJAIN CITY AND KSHIPRA RIVER

 अवंतिका से मालवा की एक मानसूनी यात्रा - भाग 1 

उज्जैन में रामघाट पर क्षिप्रा स्नान 

यात्रा दिनाँक : - 29 जुलाई 2023 

    मानसून का मौसम यात्रा करने के लिए सबसे उपयुक्त और बेहद सुहावना मौसम होता है। मानसून के दौरान किसी भी स्थान की सुंदरता अपने पूर्ण चरम पर होती है और यही सुंदरता एक सैलानी के मन को यात्रा के दौरान उत्साह और आनंद से भर देती है। हम इसी मानसून में गत माह कोंकण और मालाबार की यात्रा पर गए थे जहाँ हमने केरला की राजधानी तिरुवनंतपुरम तक की यात्रा पूर्ण की थी, 

इसी यात्रा में वापसी के दौरान हम केरल के मालाबार तट, पुडुचेरी के माहे नगर, कर्नाटक के मुरुदेश्वर, गोवा की राजधानी पणजी और ओल्ड गोवा एवं कोंकण रेलवे की यात्रा पूर्ण करके घर वापस लौटे थे। किन्तु मानसून अभी भी बरक़रार था और यह हमें फिर से उत्साहित कर रहा था एक और नई यात्रा करने के लिए। 

...  

   मैं पिछले कई वर्षों से मानसून के दौरान प्राचीन राज्य मालवा और इसकी मध्यकालीन राजधानी मांडू की यात्रा करना चाहता था। ऑफिस में बैठे बैठे मैंने इस यात्रा का प्लान तैयार किया और अपने सहकर्मी सोहन भाई को इस यात्रा में अपना सहयात्री चुना। सोहन भाई इस यात्रा के लिए तुरंत तैयार हो गए और हमारा यात्रा प्लान अब कन्फर्म हो गया। 

मैंने इस यात्रा को प्राचीन अवन्ति, अर्थात उज्जैन से शुरू करके इंदौर, महेश्वर और मांडू तक पूरा करने का निर्णंय लिया जिसमें अधिकांश मालवा का भाग शामिल था। वर्तमान में यह मध्य प्रदेश कहलाता है, और प्राकृतिक सुंदरता से परिपूर्ण एवं  अनुपम दृश्यों से भरपूर है। 

Saturday, July 1, 2023

KERLA SAMPARK KRANTI EXP : MAO TO MTJ

 UPADHYAY TRIPS PRESENT'S

 कोंकण V मालाबार की मानसूनी यात्रा पर - भाग 15 

केरला संपर्क क्रांति एक्सप्रेस - मडगांव से मथुरा 

1 जुलाई 2023 

हम शाम होने तक मडगांव रेलवे स्टेशन आ गए थे। यहाँ से हमारा रिजर्वेशन मंगला लक्षद्वीप एक्सप्रेस में था, जो रात को दो बजे के लगभग यहाँ आएगी। अभी रात के नौ बजे हैं, हम प्लेटफॉर्म पर बने खानपीन की स्टॉल पर गए और यहाँ कुछ इडली और डोसा खाकर हमने अपने रात्रिभोज को पूर्ण किया, इसके बाद क्लॉक रूम से अपना बैग लेकर अब घर लौटने की तैयारी करने लगे। अब हम अपनी यात्रा के अंतिम चरण में थे, और गोवा आकर हमारी यात्रा पूर्ण हो चुकी थी, अब वापसी यात्रा की बारी थी। 

तभी रेलवे से सन्देश प्राप्त हुआ कि मंगला एक्सप्रेस में हमारी सीट आरएसी में ही रह गई थी। अब ट्रेन बदलने की प्लानिंग मेरे दिमाग में और तेज हो गई। दरअसल मंगला एक्सप्रेस में मुझे RAC सीट मिली जो मेरे लिए पर्याप्त नहीं थी, मंगला एक्सप्रेस वाया भुसावल, भोपाल होकर मथुरा आती है, इस वजह से यह एक लम्बी यात्रा करती है जिसमें समय भी बहुत अधिक लगता है। 

मैंने मोबाइल में रेलवे ऍप्स क्रिस पर यहाँ से दिल्ली जाने वाली गाड़ियों के बारे में जानकारी ली जिसमें मुझे पता चला रात को साढ़े बारह बजे तक केरला संपर्क क्रांति एक्सप्रेस आ रही है जो सीधे दिल्ली जाने के लिए एक सुपरफास्ट ट्रेन है। इसका चार्ट बन चुका था, इसलिए इसमें तत्काल में भी रिजर्वेशन करना संभव नहीं था। 

अतः एप्प में मैने ट्रेन की कोच पोजीशन देखी, जिसमें ट्रेन के अंत में अनेकों सामान्य कोच थे, और इसके बाद इस ट्रेन का शेडूअल देखा। मैंने दो सामान्य टिकट कोटा स्टेशन तक के लिए ले ली, क्योंकि कि इस ट्रेन का स्टॉप कोटा के बाद सीधे निजामुद्दीन ही था, यह मथुरा नहीं रुकने वाली ट्रेन है। इसलिए मैंने इस ट्रेन से कोटा तक आने का विचार किया था, उसके बाद वहाँ से तो मथुरा की अनेकों ट्रेनें हैं, कोई न कोई तो मिल ही जाएगी। मंगला एक्सप्रेस की टिकट कैंसल कर दी और अब केरल संपर्क क्रांति एक्सप्रेस से हमारी यात्रा निश्चित हो गई। 

ST. AUGUSTIN CHURCH

 UPADHYAY TRIPS PRESENT'S

 कोंकण V मालाबार की मानसूनी यात्रा पर - भाग 14 

सेंट ऑगस्टीन गिरिजाघर और उसके खंडहर - ओल्ड गोवा 

1 JULY 2023

प्राचीन मंदिर और उनके खंडहरों के अवशेष तो मैंने अब तक अपनी अनेकों यात्राओं में देखे थे, किन्तु आज पहलीबार मैंने अपनी इस गोवा की एक दिवसीय यात्रा के दौरान एक पुरानी चर्च के खंडहरों और उसके अवशेषों को देखा। यह चर्च ओल्ड गोवा में एक ऊँचे टीले पर स्थित थी, जब मैं यहाँ पहुंचा तो जाना यह सेंट ऑगस्टीन चर्च थी जो प्रकृति के कहर और पुर्तगाली शासन की उपेक्षाओं का शिकार हुई। 

इस चर्च का निर्माण सोलहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में सेंट ऑगस्टीन भिक्षुओं ने करवाया था, वर्तमान में यह जिस टीले पर स्थित है, उस टीले को पवित्र पहाड़ी माना जाता है। अठाहरवीं शताब्दी में शहर में महामारी फैलने के बाद पूरा शहर वीरान हो गया, शहर के साथ साथ तत्कालीन सरकार और यहाँ के लोगों ने इस चर्च को भी त्याग दिया जिसके बाद बिना देख रेख के यह जीर्ण अवस्था को प्राप्त होने लगी, अंतत सन 1931 में इसका मुख्य द्वार आधी मीनार के साथ ध्वस्त हो गया। इसके ध्वस्त होने से पूर्व ही यहाँ लगी घंटी को पणजी की आवर लेडी ऑफ़ था इमेक्यूलेट कॉन्सेप्शन चर्च में स्थानांतरित कर दिया गया था जो वर्तमान में उपलब्ध है। 

GOA TRIP 2023 : MADGAON TO PANJIM


गोवा में एक दिवसीय यात्रा 

1 JULY 2023         

मडगांव से पोंडा - बस यात्रा 

    तेज बारिश के बीच गत रात्रि मडगांव स्टेशन पर सोने के बाद, अगली सुबह हम गोवा घूमने के लिए तैयार थे। यह गोवा में हमारी पहली यात्रा थी। मडगाव स्टेशन के क्लॉक रूम में अपना बैग जमा करने के बाद, हम बतौर सामान स्वतंत्र थे, और फिर स्टेशन के बाहर निकले। 

  कोंकण रेलवे का मडगाव स्टेशन गोवा का एक मुख्य रेलवे जंक्शन स्टेशन है। बारिश के मौसम में स्टेशन के बाहर का दृश्य बहुत ही सुहावना लग रहा था। मुझे जानकारी थी कि यहाँ घूमने के लिए आसानी से बाइक किराये पर मिल जाती हैं। मैं एक ऐसी ही बाइक की तलाश में था, किन्तु स्टेशन के बाहर मुझे कोई बाइक नहीं मिली। 

  स्टेशन के बाहर ही एक बस स्टॉप था जहाँ हम काफी देर तक खड़े रहे किन्तु कोई भी बस नहीं आई। बस की प्रतीक्षा करते हुए, बारिश अवश्य आ गई, इसलिए बिना देर किये एक ऑटो द्वारा हम गोवा के सेंट्रल बस स्टैंड पहुंचे। बस स्टैंड पहुँचने से पूर्व ऑटो वाले ने हमें दो तीन बाइक रेंट वाली दुकानों पर भी मिलवाया किन्तु वे लोग बतौर एक दिन किराये पर बाइक देने के लिए तैयार नहीं थे। बारिश के मौसम और अनजान शहर को देखकर हमने किराये की बाइक लेने का निर्णय त्याग दिया। 

Friday, June 30, 2023

MATSAYGANDHA EXPRESS : MRDW TO MAO

UPADHYAY TRIPS PRESENT'

 कोंकण V मालाबार की मानसूनी यात्रा पर - भाग 12  

मत्सयगंधा एक्सप्रेस और मडगांव स्टेशन पर एक रात  

30 जून 2023 

मैंने मत्सयगंधा एक्सप्रेस में मुर्देश्वर से मडगांव तक शयनयान कोच में आरक्षण करा रखा था। मुर्देश्वर स्टेशन शाम को साढ़े पांच बजे हम इस ट्रेन में सवार हुए, हमारी सीट साइड लोअर और साइड उपर थी, जोकि हमारे आगमन तक हमें खाली ही मिली। यह पहलीबार था जब मुझे मेरी साइड लोअर सीट खाली मिली हो अन्यथा अधिकतर यात्रियों में मुझे मेरी सीट पर कोई ना कोई बैठा अवश्य मिलता है। यह ट्रेन मंगलुरु सेंट्रल से चलकर मुंबई के लोकमान्य तिलक टर्मिनल जा रही थी, हमारे आसपास बैठी सभी सवारियां मुंबई ही जा रही थीं। 

मुर्देश्वर से निकलने के बाद मौसम में भी काफी परिवर्तन हो गया। यहां काफी तेज बारिश थी और बाहर का सबकुछ दिखना लगभग बंद सा हो गया था। शाम का समय और उसपर जोरदार बारिश हो उस समय एक कप चाय मिल जाये तो उसके आनंद ही अलग होते हैं। ट्रेन में ही एक वेंडर से मैंने दो कप चाय लीं, एक कल्पना को दी और एक मैंने पी। आज के इस मत्सयगंधा एक्सप्रेस की यात्रा के एक अलग ही आनंद थे। 

MURDESHWAR TEMPLE

UPADHYAY TRIPS PRESENT'

 कोंकण V मालाबार की मानसूनी यात्रा पर - भाग 11 

 श्री मुर्देश्वर मंदिर - समुद्री तट पर अलौकिक शिव धाम  

30 जून 2023 

     कर्नाटक के उत्तरी कन्नड़ जिले में, अरब सागर के तट पर कंडूका नामक पहाड़ी है जहाँ आज वर्तमान में भगवान शिव का एक शानदार मंदिर बना हुआ है। यहाँ 123 फ़ीट ऊँची भगवान शिव की एक विशाल प्रतिमा है जो बहुत दूर से ही दिखाई देती है। यह दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी शिव प्रतिमा है, इसी प्रतिमा के नीचे भगवान का प्राचीन मंदिर है जहाँ शिव लिंग रूप में धरती से 2 फ़ीट नीचे विराजमान हैं। मंदिर परिसर के प्रमुख द्वार के समीप ही बहुत ऊँचा राजगोपुरम बना हुआ है जिसके सबसे ऊपरी शिखर से मंदिर, समुद्र और आसपास का विहंगम नजारा देखा जा सकता है। 

     मैं और कल्पना आज एक पैसेंजर ट्रेन से सुबह मंगलौर से चलकर मुर्देश्वर पहुँचे। मुर्देश्वर स्टेशन पर पहुंचकर हमने यहाँ क्लॉक रूम देखा जो उपलब्ध तो था किन्तु इसका चार्ज हमें समय की अपेक्षा ज्यादा ही लगा इसलिए हमने अपना बैग यहाँ जमा नहीं किया। रेलवे स्टेशन से मुर्देश्वर मंदिर के बीच की दूरी लगभग तीन किमी है, स्टेशन के बाहर ही मंदिर जाने के लिए ऑटो तैयार मिलते हैं और समय अंतराल पर बसें भी चलती हैं। हम एक ऑटो द्वारा मंदिर के लिए रेलवे स्टेशन से प्रस्थान कर गए। जल्द ही हम मंदिर के सामने थे। 

     हम मंगलुरु स्टेशन से  नहाधोकर तैयार होकर निकले थे, इसलिए हमनें यहाँ रुकने की कोई व्यवस्था नहीं देखी। मंदिर के सामने एक प्रसाद की दुकान से प्रसाद लिया और यहीं अपना बैग भी कुछ घंटों के लिए रख दिया। यहीं पास में ही कर्नाटक की कुछ महिलाएं दक्षिण भारत का प्रसिद्ध सुगन्धित फूलों का गजरा बेच रहीं थीं। मैंने भी यहाँ पहलीबार कल्पना के लिए यह गजरा ख़रीदा और कल्पना के बालों में लगाया। गजरा लगने के बाद कल्पना सुन्दर तो लग ही रही थी साथ ही वह अब उत्तर भारतीय से ज्यादा दक्षिण भारतीय महिला लग रही थी। 

KONKAN RAILWAY : MANGALURU CENTRAL TO MURDESHWAR

  UPADHYAY TRIPS PRESENT'

 कोंकण V मालाबार की मानसूनी यात्रा पर - भाग 10

मंगलूरु सेन्ट्रल से मुर्देश्वर : कोंकण रेलवे में पैसेंजर रेल यात्रा 


30 JUN 2023

मंगलुरु सेंट्रल स्टेशन पर रात्रि विश्राम के बाद हम अगली सुबह प्लेटफॉर्म न 2 पर पहुंचे। यहाँ मंगलुरु - मडगांव पैसेंजर तैयार खड़ी हुई थी। यह सुबह साढ़े पांच बजे यहाँ से प्रस्थान करेगी। इस ट्रेन से यात्रा करने का हमारा एक मुख्य कारण था क्योंकि यह मंगलुरु से निकलने के बाद कोंकण रेलवे क्षेत्र से होकर गुजरती है, और यह कोंकण का वह क्षेत्र है जो रात के अँधेरे की वजह से इसे हम यहाँ आते समय नहीं देख सके थे। 

सही साढ़े पांच बजे ट्रेन मंगलुरु सेंट्रल से रवाना हो गई, अभी दिन निकला नहीं था और अभी बहार अँधेरा ही था। हम जिस कोच में बैठे थे वो पूरी तरह से खाली पड़ा हुआ था। फ़िलहाल इस कोच में यात्रा करने वाले केवल हम दो ही यात्री थे। मंगलुरु नगर के मध्य से गु जरती हुई यह ट्रेन मेंगलुरु जंक्शन रेलवे स्टेशन पहुंची। 

मंगलुरु जंक्शन, मंगलुरु नगर का एक मुख्य जंक्शन रेलवे स्टेशन है। अधिकतर ट्रेनें यहीं होकर गुजरती हैं, यह केरल से दिल्ली रेलवे लाइन पर स्थित है और यहाँ से एक रेलवे लाइन पश्चिमी घाटों के पर्वतों को पार करती हुई मैसूर निकट हासन जंक्शन के लिए भी जाती है। मैंने अभी इस रेल लाइन पर यात्रा नहीं की है किन्तु इस रेल लाइन मुझे एकबार अवश्य ही यात्रा करनी है। इस स्टेशन से कुछ सवारियां हमारे कोच में सवार हुईं किन्तु अभी भी हमारा वाला कूपा खाली ही पड़ा था। कल्पना ने यहाँ चाय की इच्छा व्यक्त की तो मैं स्टेशन की स्टाल से दो चाय ले आया। जल्द ट्रेन यहाँ से रवाना हो चली।