Tuesday, September 17, 2024

AGRA : AKBAR TOMB



आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 10

जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर का मक़बरा  


17 सितम्बर  2024,

जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर का मकबरा आगरा के सिकंदरा में स्थित एक भव्य मुगलकालीन स्मारक है, जिसे उनके पुत्र जहांगीर ने 1605-1613 के बीच बनवाया था। लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर से निर्मित यह 119 एकड़ में फैली एक अनूठी पिरामिडनुमा संरचना है, जो इस्लामी, हिंदू और बौद्ध वास्तुकला का मिश्रण है।

 मुख्य मकबरे का प्रवेश द्वार बुलंद दरवाजे की शैली में बनाया गया है और जटिल नक्काशी से सजाया गया है।इस मकबरे की चारों कोनों पर सफेद संगमरमर की मीनारें हैं।

औरंगजेब के समय में इस मकबरे को जाटों द्वारा लूटा गया था, माना जाता है कि उन्होंने इस मकबरे से बादशाह अकबर के शरीर के अवशेषों को निकालकर उनका दाह संस्कार कर दिया। ब्रिटिश काल में अंग्रेजों (लॉर्ड कर्जन) ने इसकी मरम्मत कराई थी।

Thursday, August 8, 2024

AGRA : FIROZ KHAN TOMB

 

आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 9


फिरोज खान का मकबरा / FIROZ KHAN TOMB



  • फिरोज खान के मकबरे का निर्माण 17वीं शताब्दी में मुगल बादशाह शाहजहां के शासनकाल के दौरान हुआ था, जब फिरोज खान दीवान-ए-कुल के पद पर थे। फिरोज खान शाहजहां के एक विश्वसनीय अधिकारी थे, जो शाही हरम के प्रभारी के रूप में काम करते थे। उनकी मृत्यु 1637 में हुई थी।

फिरोज खान शाहजहां के शाही हरम के प्रभारी और दीवान-ए-कुल थे। 

लाल बलुआ पत्थर से निर्मित यह दो मंजिला मकबरा मुगलकालीन वास्तुकला का उदाहरण है।
  • यह मकबरा लाल बलुआ पत्थर से बना है और अष्टकोणीय (octagonal) आकार का है। यह दो मंजिला इमारत है।
  •  यह स्मारक एएसआई (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) द्वारा संरक्षित है, लेकिन यह एत्माद्दौला के मकबरे की तुलना में बहुत कम प्रसिद्ध और उपेक्षित है।
  • यह मकबरा आगरा शहर से लगभग 5 किमी दूर आगरा-ग्वालियर रोड पर स्थित है।

Friday, March 22, 2024

AGRA : ETMAUDDOULA


आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 7

एत्माउद्दौला का मक़बरा 


एत्माउद्दौला का मक़बरा, नूरजहाँ के पिता मिर्ज़ा ग्यासबेग़ का मकबरा है जिसे नूरजहाँ ने 1622-1628 के बीच अपने पिता मिर्ज़ा ग़ियासबेग की याद में बनवाया था। इसे 'बेबी ताज' या 'छोटा ताजमहल' भी कहा जाता है, क्योंकि यह पूरी तरह से सफेद संगमरमर से बना पहला मुगल मकबरा है और इसमें पित्रदुरा (कीमती पत्थरों की जड़ाई) का उत्कृष्ट काम किया गया है।

यह मकबरा मुगल साम्राज्ञी नूरजहाँ ने अपने पिता मिर्ज़ा ग़ियासबेग (जिन्हें जहाँगीर ने एतमादुद्दौला की उपाधि दी थी) की स्मृति में बनवाया था।

यह पूरी तरह से सफेद संगमरमर से निर्मित पहली मुगल इमारत है।

यह उत्तर प्रदेश के आगरा शहर में यमुना नदी के पूर्वी तट पर स्थित है और यह भारत में पूरी तरह सफेद संगमरमर से बने पहले मकबरों में से एक है।

Sunday, December 31, 2023

A VILLAGE TRIP : AIRAKHERA 2023


आयरा खेड़ा ग्राम में मेरी यात्रायें  - वर्ष 2023 



साल की शुरुआत में तमिलनाडु की यात्रा करने के बाद मैं इस मकर सक्रांति पर रिश्तों के सफर पर निकला था। इस सफर का मेरा प्रथम पड़ाव ग्राम आयराखेड़ा था। यह मेरी ननिहाल है यहाँ मेरे मामा जी रहते हैं अक्सर उन्हीं के पास बचपन से आता रहा हूँ। इस यात्रा का विस्तृत विवरण मैंने अपनी एक अलग पोस्ट में दिया है। इस पोस्ट का नाम है - रिश्तों के सफर पर। आप इस लिंक पर क्लिक करके सम्पूर्ण यात्रा वृतांत पढ़ सकते हैं। 

A VILLAGE TRIP : DHORPUR 2023

वर्ष 2023 में मेरी पैतृक गाँव धौरपुर की यात्रा 


मकर सक्रांति पर अपने गाँव धौरपुर में एक रात 

यूँ तो प्रत्येक वर्ष, मैं होली और दीपावली जैसे प्रमुख त्योहारों पर अपने पिताजी के अर्थात अपने गांव धौरपुर जाता हूँ। मेरा यह गाँव उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले में है। मेरे गांव का सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन हाथरस जंक्शन अथवा हाथरस रोड है। यहाँ से मेरे गांव की  कुल दूरी एक किमी के आसपास है। जब कभी कोई साधन नहीं मिलता तो मैं पैदल ही अपने गांव पहुँच जाता हूँ। मेरे गाँव में मेरे चाचा जी और मेरे चचेरे भाई रहते हैं। दादा दादी के गुजर जाने के बाद बस चाचाजी से ही मिलने गाँव आना जाना लगा रहता है और साथ ही साल के इन प्रमुख त्योहारों पर अपने पूवजों और उनके थानों को पूजकर उनसे आशीर्वाद ले लेता हूँ। 

इस बार, मैं मकर सक्रांति पर अपने रिश्तों के सफर पर था, इसलिए मेरा धौरपुर जाना भी हुआ। हाथरस जंक्शन क्षेत्र में अपनी मौसी और बुआजी के गाँव जाकर उनसे मिलने के बाद देर शाम में अपने गाँव धौरपुर पहुंचा। जनवरी का महीना है इसलिए सर्दी जोरों पर थी और वैसे भी मैं आज सुबह से ही बाइक यात्रा कर रहा हूँ, इसलिए घर आते आते और भी ठण्ड में जकड गया हूँ। 

जाते ही मुझे मेरी भाभी ने गर्मागर्म चाय लाकर दी और मैं अगहाने के निकट बैठकर गर्मागर्म चाय का आनद लेता रहा और अपने चाचाजी से बतयाता रहा। अगहाना हमारे गांव में अलाप को कहते हैं अलाप मतलब जलती हुई आग का एक ढेर। 

Saturday, December 30, 2023

A VILLAGE TRIP : RATMANGARHI 2023

 वर्ष 2023 में ग्राम रतमान गढ़ी में मेरी यात्रायें 


रातमान गढ़ी, मेरी छोटी मौसी का गाँव है जोकि हाथरस जिले में मुरसान के नजदीक स्थित है। बचपन से ही मैं यहाँ आता रहा हूँ, आज मैं अपनी कंपनी की गाडी लेकर अपने मौसा जी से मिलने पहुंचा। गाँव में मेरे दोनों छोटे भाई दिलीप और वीके मुझे मिले जो मुझसे मिलकर अत्यंत ही प्रसन्न हुए। मौसाजी अभी घर नहीं थे, वह शाम के समय अपने खेतों पर निकल जाते हैं। वीके के साथ मैं उनसे मिलने खेतों पर गया और मौसाजी से मिला। मेरे मौसाजी मुझे देखकर बहुत खुश हुए और उन्होंने मुझसे एक रात यहां रुकने की बात कही किन्तु अभी मैं अपनी ड्यूटी पर था और कम्पनी की गाडी भी मेरे साथ थी, इसलिए मैं यहाँ नहीं ठहर सका और मौसाजी से पुनः आने का वादा करके मैं वापस मथुरा चला गया। 

मकर सक्रांति के बाद इस गाँव में यह मेरी दूसरी यात्रा थी। 


मेरी कंपनी की गाडी 


वीके मेरे लिए आलू की बोरी सिलता हुआ 

वीके के साथ एक सेल्फी 

दिलीप के साथ एक सेल्फी 

मौसाजी के खेत के नजदीक खड़ी मेरी कार 


खेत किनारे मेरे मौसा जी 

अपनी कुटिया के बाहर बैठे मौसाजी और वीके व दिलीप का बेटा 


मार्च के माह में मेरा पुनः रातमान गढ़ी जाना हुआ। इस बार मेरे मौसाजी के यहाँ रामायण कथा का पाठ हुआ था जिसके दूसरे दिन भंडारा स्वरूप प्रसाद भी वितरित किया गया था। इस मौके पर जब मैं यहाँ पहुंचा तो यहाँ मुझे मेरे बड़े मामा जी और मामी जी एवं उनके पुत्र अर्थात मेरे बड़े भाई धर्मेंद्र शर्मा भी उपस्थित थे। 

मौसी और मौसा जी से मिलकर तथा मामाजी और मामी जी से मिलकर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई। हम सभी भाइयों ने मिलकर एकसाथ भोज स्वरूप प्रसाद ग्रहण किया और  इसके पश्चात हम मौसाजी के नौहरे पर पहुंचे। गाँव से बाहर मौसाजी का यह फार्म हाउस है जिसे वो नौहरा कहते हैं। यहाँ मौसाजी के कृषिकार्य से सम्बंधित उपकरण और सामान रखे रहते हैं साथ ही उनका ट्रैक्टर भी यही खड़ा होता है। 

नौहरे पर कुछ देर बैठने और घूमने के पश्चात मैं वापस अपने घर मथुरा की तरफ रवाना हो गया। 


मैं और मेरे भाई 


मेरे बड़े मामा और मामी जी 



धर्मेंद्र शर्मा 




मेरे मौसाजी का फार्म हाउस अर्थात नौहरा 

मेरी मौसी - कुसमा देवी 





यात्रा संपन्न 


Thursday, October 12, 2023

AGRA : ROMAN CATHOLIC CEMETERY


आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 6

 रोमन कैथोलिक कब्रिस्तान


आगरा में रोमन कैथोलिक कब्रिस्तान का निर्माण 1550 ई. में हुआ था और इसका इस्तेमाल सबसे पहले उन अर्मेनियाई ईसाइयों को दफनाने के लिए किया गया था, जो अकबर के शासनकाल के दौरान इस शहर में आकर बस गए थे। इनके बाद, जैसे-जैसे इस इलाके में दूसरे लोग आकर बसते गए, वैसे-वैसे अन्य ईसाई संप्रदायों के लोगों को भी यहाँ दफनाया जाने लगा।


इस कब्रिस्तान में सबसे पुरानी कब्र जॉन मिल्डेनहॉल की है। जॉन मिल्डेनहॉल एक अंग्रेज व्यापारी थे, जिनकी मृत्यु 1614 में हुई थी। कहा जाता है कि वह पहले ऐसे अंग्रेज थे, जिन्होंने "अकबर को आमने-सामने देखा था"। लेकिन यहाँ कुछ और कब्रें भी हैं, जो ध्यान देने लायक हैं न सिर्फ उन लोगों से जुड़ी कहानियों की वजह से, बल्कि उन कब्रों की वास्तुकला की वजह से भी।

Saturday, September 23, 2023

DELHI 2023 : ASHOKA EDICT


दिल्ली में सम्राट अशोक का शिलालेख 


सन 1966 में जब राजधानी दिल्ली में आवासीय प्रसार अपने चरम पर था तभी आवासीय कॉलोनी बनाने वाले एक ठेकेदार की नजर एक ऐसी ऐतिहासिक चट्टान पर पड़ी जिस पर कुछ चिन्हों की भाषा उत्कीर्ण थी जो अपठनीय थी। उसने तुरंत इसकी सूचना सम्बंधित अधिकारी को दी और इसके बाद पुरातत्ववेत्ताओं इस चट्टान की  जाँच की। इस जांच में उन्होंने पाया कि यह भाषा प्राचीन समय की है और यह प्राकृत अथवा ब्राह्मी लिपि थी। 

इस भाषा के अक्षर,  इससे पूर्व दिल्ली में पाए गए अशोक स्तम्भों से मेल खाती थी, साथ ही बैराट स्थित शिलालेख से इसकी समानता प्रतीत होती थी, इससे यह स्पष्ट हो गया कि यह शिलालेख सम्राट अशोक द्वारा ही उत्कीर्ण है और बाद में जब इस भाषा का अनुवाद किया गया तो फिर इसमें कोई संदेह ही नहीं बचा कि यह सम्राट अशोक का ही शिलालेख है। वर्तमान में भारतीय पुरातत्व विभाग ने इसे सम्राट अशोक के लघु शिलालेख की श्रेणी में रखा है। 

DELHI 2023 : LOTUS TEMPLE


बहाई उपासना मंदिर - दिल्ली 


19 वीं सदी में ईरान में एक प्रमुख संत बहाउल्लाह द्वारा बहाई धर्म की स्थापना की गई थी जो सभी धर्मों के मूल महत्त्व और मानव - एकता की शिक्षा देता है। शुरुआत में यह ईरान और पश्चिमी एशिया के कुछ हिस्सों में विकसित हुआ और अंत में यह भारत में भी विकसित होने लगा। बहाई धर्म में कोई पुरोहित नहीं होता, यह केवल ईश्वरीय प्रार्थना पर निर्भर है। 

भारत में राजधानी दिल्ली में कालकाजी के संमीप स्थित कमल मंदिर बहाई धर्म का एक मुख्य केंद्र अथवा प्रार्थना स्थल है। सफ़ेद संगमरमर से बनी 9 पंखुड़ियों वाले इस कमल मंदिर की शोभा ना सिर्फ भारत देश में अपितु समूचे विश्व भर में प्रसिद्ध है। 

बहाई कमल मंदिर सभी धर्मों के लोगों के लिए खुला है, यहाँ बिना किसी भेदभाव के, किसी भी धर्म या जाति के  लोग आसानी से प्रवेश कर सकते हैं और शांत वातावरण के बीच ईश्वर की प्रार्थना कर सकते हैं। बहाई धर्म, एक ईश्वर, एक धर्म और एक मानवता के जोर पर बल देता है। 

DELHI 2023 : ISCON TEMPLE

 

इस्कॉन मंदिर - दिल्ली 

23 SEP 2023

दिल्ली के पूर्वी कैलाश में श्री कृष्णा हिल्स में दिल्ली का इस्कॉन मंदिर स्थित है। इस मंदिर को श्री श्री राधा पार्थसारथी मंदिर कहते हैं क्योंकि मंदिर के गर्भगृह में भगवान श्री कृष्ण के साथ राधा रानी की प्रतिमा स्थापित है। इस मंदिर का उद्घाटन 5 अप्रैल 1998 को भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी जी ने किया था। यह भारत के सबसे बड़े मंदिरों में से एक है। मंदिर में अनेकों कक्ष और सभागार हैं। 

इस मंदिर की सबसे मुख्य विशेषता है कि यहाँ विश्व की सबसे बड़ी पुस्तक अद्भुत भगवत गीता रखी हुई है जो इटली में मुद्रित हुई थी और जिसका वजन अनुमानित 800 किलोग्राम है। इसका अनावरण 26 फ़रवरी 2019 को भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा किया गया था। 

मैं आज सुबह ही यहाँ पहुँच गया और मंदिर के बाहर अपने जूते खोलकर दर्शन की लाइन में लग गया। अनेको दिल्लीवासी लोग यहाँ प्रभु के दर्शनों हेतु लाइन में लगे हुए थे और कुछ ही समय बाद मुझे भी ईश्वर के दर्शन हो गए। मंदिर काफी बड़ा है, अनेकों फुवारे मंदिर की शोभा को बढ़ाते हैं। सुरक्षा के लिए यहाँ हरसमय सुरक्षा कर्मी तैनात रहते हैं। 

Friday, September 1, 2023

KURUKSHETRA 2023 : SRI KRISHNA MUSEUM

 

श्री कृष्ण संग्रहालय - कुरुक्षेत्र 


ज्योतिसर धाम देखने के बाद मैं वापस कुरुक्षेत्र आ गया। मैं श्री कृष्ण संग्रहालय के नजदीक ही बस से उतरा था, यहाँ आकर मुझे भगवान श्री कृष्ण से जुडी समस्त लीलाओं को एक छत के नीचे देखने की इच्छा  हुई इसलिए मैंने 30 रूपये का टिकट लेकर संग्रहालय में प्रवेश किया और ईश्वर के अलग अलग स्वरूपों के साथ साथ उनकी दिव्य लीलाओं के दर्शन किये। 

हालांकि मैं ब्रजवासी हूँ और मथुरा नगर में रहता हूँ जहाँ साक्षात् भगवान श्री कृष्ण ने जन्म लिया था, किन्तु भगवान श्री कृष्ण के नाम से इस तरह का कोई भी संग्रहालय मथुरा अथवा वृन्दावन में नहीं है। अपने आराध्य के नाम से आज मुझे कुरुक्षेत्र की भूमि पर इस तरह का संग्रहालय देखने को मिला अन्यथा मैंने आज तक या तो ऐतिहासिक संग्रहालय देखे थे या फिर रेल संग्रहालय देखे हैं। 

इसी संग्रहालय के नजदीक ही कुरुक्षेत्र पैनोरमा और विज्ञानं केंद्र भी स्थित है। किन्तु मेरे पास अब समय का आभाव था और मुझे शीघ्र ही कुरुक्षेत्र रेलवे स्टेशन पहुंचना था। वहां से साढ़े तीन बजे मुझे गीता जयंती एक्सप्रेस पकड़नी है जिससे मैं मथुरा पहुँच सकूँ। 

KURUKSHETRA 2023 : JYOTISAR TIRTH

 

ज्योतिसर तीर्थ - कुरुक्षेत्र 



ब्रह्म सरोवर देखने और यहाँ स्नान करने के पश्चात मैं ज्योतिसर तीर्थ के लिए रवाना हुआ जो कि यहाँ से लगभग 15 से 20 किमी दूर था। ब्रह्म सरोवर के बाहर से ही मुझे हरयाणा की एक रोडवेज बस मिल गई और मैं जल्द ही ज्योतिसर तीर्थ पहुँच गया। 

माना जाता है कि ज्योतिसर ही वह प्रमुख स्थान है जहाँ महाभारत के युद्ध के दौरान भगवान् श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था और यहीं उन्हें अपने विराट स्वरुप के दर्शन कराये थे। अतः यह बहुत ही पावन तीर्थ स्थल है और सुन्दर स्थान है। कुरुक्षेत्र के मैदान से यह थोड़ी दूरी पर स्थित है। इस पावन स्थल पर वट वृक्ष लगे हुए हैं और यहाँ हाल ही मैं भगवान् श्री कृष्ण के विराट स्वरुप की एक दिव्य प्रतिमा भी लगाईं गई है। शाम के समय यहाँ लाइट एंड साऊंड शो की व्यवस्था भी है। 

यहाँ के सभी पावन मंदिरों और स्थलों के दर्शन करने के पश्चात मैं कुछ देर ज्योतिसर ग्राम में भी घूमा और इस पावन धरा को प्रणाम किया। 

KURUKSHETRA 2023 : STHANESHWAR TEMPLE & BHADRA KALI TEMPLE, DEVIKUP


स्थानेश्वर महादेव मंदिर एवं देवीकूप धाम 


कुरुक्षेत्र की भूमि, ना केवल पौराणिक ग्रंथों में विशेष महत्त्व रखती है बल्कि इसका भारत के प्राचीन इतिहास में भी महत्वपूर्ण स्थान रहा है। छटवीं शताब्दी में यहाँ पुष्यभूति वंश के महान सम्राट हर्षवर्धन का शासन रहा है जिनकी राजधानी कुरुक्षेत्र में स्थित थानेश्वर में ही थी। थानेश्वर शब्द, यहाँ स्थित स्थानेश्वर का ही अपभ्रंश है जो कि भगवान शिव का निवास माना जाता है।  

स्थानेश्वर मंदिर अत्यंत ही प्राचीन है और वर्धन काल में पुष्यभूति वंश के सम्राटों के कुलदेवता के रूप में विद्यमान हैं। ऐतिहासिक साक्ष्यों में हर्षवर्धन के पिता प्रभाकरवर्धन द्वारा इस मंदिर में पूजा का उल्लेख है। 

KURUKSHETRA 2023 : HARSH KA TEELA


 सम्राट हर्षवर्धन का टीला - थानेश्वर 



शेख़ चिल्ली के मकबरे के ठीक पीछे सम्राट हर्षवर्धन का टीला दिखाई देता है। छटवीं शताब्दी में यहाँ पुष्यभूति वंश के राजा हर्षवर्धन की राजधानी थी जिसे थानेश्वर के नाम से जाना जाता था, उसी राजधानी के अवशेष वर्तमान में यहाँ टीले में दबे हुए दिखाई देते हैं। 

 7वीं शताब्दी के वर्धन साम्राज्य के राजा हर्षवर्धन की राजधानी रहे इस स्थान पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की खुदाई में कुषाण काल से लेकर मुगल काल तक (1-19वीं शताब्दी) की बस्तियों के अवशेष मिले हैं। यह स्थल, जो लगभग 1 किमी लंबा और 750 मीटर चौड़ा है, शेख चिल्ली के मकबरे के पास स्थित है और यहाँ खुदाई में प्राचीन महलों और संरचनाओं के अवशेष प्राप्त हुए हैं।

KURUKSHETRA : SHEIKH CHILLI TOMB


शेख़ चिल्ली का मक़बरा 


 

हरियाणा के कुरुक्षेत्र के थानेसर में स्थित शेख चिल्ली का मकबरा, मुगल बादशाह शाहजहाँ के सबसे बड़े बेटे दारा शिकोह ने लगभग 1650 ईस्वी में बनवाया था। यह मकबरा दारा शिकोह के आध्यात्मिक गुरु और प्रसिद्ध सूफी संत शेख चिल्ली की याद में निर्मित है, जिसे 'हरियाणा का ताजमहल' भी कहा जाता है।

यह मकबरा सूफी संत शेख चिल्ली (अब्दुल करीम) की याद में बनवाया गया था। जिसमें फारसी शैली, सफेद संगमरमर और पीले बलुआ पत्थर का उपयोग किया गया है।  यह मकबरा एक ऊंचे चबूतरे पर बना है और इसके परिसर में एक मदरसा और संग्रहालय भी स्थित है। 

शेखचिल्ली एक प्रसिद्ध मुस्लिम सूफ़ी संत थे।  माना जाता है कि वह 17वीं सदी में मुगल राजकुमार दारा शिकोह के गुरु थे, जिनका वास्तविक नाम अब्द-उर-रजाक या अब्द-उर-रहीम था। हरियाणा के थानेसर में स्थित उनका मकबरा भी उनके मुस्लिम सूफी परंपरा से जुड़ा होने का प्रमाण है।

KURUKSHETRA 2023 : BRAHM SAROVAR

 

ब्रह्म सरोवर 


कुरुक्षेत्र में स्थित ब्रह्म सरोवर, आध्यात्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऐसा माना जाता है कि सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा ने यहीं प्रथम यज्ञ किया था, जो सृष्टि की उत्पत्ति का प्रतीक है। ब्रह्म सरोवर का शांत और दिव्य वातावरण, तीर्थयात्रियों और पर्यटकों को आकर्षित करता है, सूर्य ग्रहण और धार्मिक त्योहारों के दौरान  इसके जल में स्नान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। 

अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव के दौरान भी यह स्थान आकर्षण का केंद्र बन जाता है , जब हजारों भक्त भगवद् गीता की शाश्वत शिक्षाओं को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए एकत्रित होते हैं। सुंदर ढंग से सजाए गए घाट, संध्या आरती और सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ इस अवसर की भव्यता को और बढ़ा देती हैं। वर्षों से, ब्रह्म सरोवर सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के केंद्र के रूप में विकसित हुआ है, जो पवित्रता, शांति और भारत की शाश्वत आध्यात्मिक विरासत का प्रतीक है।

Thursday, August 31, 2023

MATHURA TO THANESAR : KURUKSHETRA 2023

 मथुरा से थानेश्वर - एक रेल यात्रा 


सितम्बर का महीना चल रहा है जिसका मतलब ना अधिक सर्दी है और ना अधिक गर्मी है और अब बरसात भी थम सी चुकी है। यह यात्रा करने का सर्वोत्तम समय है इसलिए मैंने इस बार हरियाणा की यात्रा को महत्त्व देते हुए कुरक्षेत्र की यात्रा का मन बनाया। यहाँ प्रसिद्ध रणभूमि है जहाँ महाभारत का विशाल युद्ध हुआ था, यहीं भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को श्रीमद भगवद गीता का ज्ञान दिया था। इस पुण्य स्थान की यात्रा मेरे ब्लॉग में होनी चाहिए थे इसलिए मैंने इस यात्रा को पूर्ण किया। 

शाम को मैं मथुरा रेलवे स्टेशन पहुंचा और आगरा छावनी से होशियारपुर जाने वाली ट्रैन में बैठा। रात बारह एक बजे अम्बाला पहुँच गया क्योंकि यह ट्रैन कुरुक्षेत्र पर नहीं रुकी। अम्बाला से कुरक्षेत्र वापसी के लिए मैं कालका मेल में बैठा जिसमे टिकट चल दस्ते वालों ने मुझसे मेरा टिकट माँगा। चूँकि मैं सिर्फ कुरुक्षेत्र तक जा रहा था, इसलिए स्टाफ बोलकर उनसे बैठने की रिक्वेस्ट की। उन्होंने मुझसे कुछ नहीं कहा। 

Saturday, August 12, 2023

AGRA : KAFUR MOSQUE & STONE HORSE


आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 5


  काफूर की मस्जिद और पत्थर के घोड़े की प्रतिमा 



आगरा-मथुरा हाईवे (सिकंदरा) पर स्थित काफूर की मस्जिद (या इतिबारी खां की मस्जिद) के पास एक रहस्यमयी पत्थर का घोड़ा (लाल बलुआ पत्थर की मूर्ति) स्थित है। 
1605-1623 ईस्वी के बीच निर्मित यह स्थल, जहांगीर के वफादार दरबारी इतिबारी खां द्वारा संत ख्वाजा काफूर के सम्मान में बनवाया गया था, जहां घोड़े की मूर्ति को अकबर के प्रिय घोड़े का स्मारक माना जाता है।

AGRA : JASWANT SINGH CHHATRI

आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 4

जसवंत सिंह की छतरी

 


जसवंत सिंह की छतरी 

 राजस्थानी वास्तुकला की एक विशिष्ट शैली में निर्मित गुंबददार स्तंभों वाला मंडपनुमा स्मारक है, जिसका निर्माण लगभग 1644-58 ईस्वी में जसवंत सिंह राठौर ने अपने बड़े भाई अमर सिंह राठौर की पत्नी रानी हाड़ा की स्मृति में करवाया था। यह छतरी आगरा में यमुना नदी के किनारे राजवाड़ा, बलकेश्वर में स्थित है । अब इसका संरक्षण भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा राष्ट्रीय महत्व के स्मारक के रूप में किया जाता है।


यह मुगलिया स्थापत्य के बीच हिंदू-राजपूत कला (लाल बलुआ पत्थर) का प्रतीक है, जिसका संबंध अमर सिंह राठौड़ से है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित, यह स्थान कभी मनोहर बाग का हिस्सा था

 यह स्मारक राजा जसवंत सिंह द्वारा बनवाया गया था और इसका इतिहास वीर अमर सिंह राठौड़ से जुड़ा है, जिन्होंने शाहजहाँ के दरबार में मीर बख्शी सलाबत खां को मार गिराया था। 

यह लाल बलुआ पत्थर से निर्मित है और इसमें हिंदू-मुगल मिश्रित वास्तुकला की झलक मिलती है, जिसमें बुर्ज, सुंदर छतरियां, और नाजुक जाली वर्क शामिल है। 

यह एएसआइ द्वारा संरक्षित है, लेकिन अब उपेक्षित है और इसके आसपास अवैध निर्माण हो चुके हैं।

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यहाँ अमर सिंह राठौड़ की पत्नी सती हुई थीं, और स्थानीय महिलाएँ यहाँ पूजा करने आती हैं।

AGRA : CHINI KA ROZA

 आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 3

चीनी का रोज़ा


इसे चाइना टॉम्ब के नाम से भी जाना जाता है, यह अफजल खान का मकबरा है जो जहांगीर के शासनकाल में एक फारसी कवि थे, बाद में वे शाहजहाँ के शासनकाल में वज़ीर बने। अफजल खान की मृत्यु 1639 में लाहौर में हुई और उन्हें आगरा में यहीं दफनाया गया। यह मकबरा मक्का शहर की ओर मुख करके बनाया गया है 

मुल्ला शुक्रुल्लाह शिराज़ी (1570–1639), जिन्हें 'अफ़ज़ल ख़ान' के शाही ख़िताब से जाना जाता था, जहाँगीर और शाहजहाँ के शासनकाल के दौरान मुग़ल दरबार के एक दरबारी थे।उन्होंने एक विद्वान के रूप में ख्याति अर्जित की और 1628–1639 की अवधि के दौरान मुग़ल साम्राज्य के 'वज़ीर-ए-आज़म' (Grand Vizier) के पद तक पहुँचे।

अफ़ज़ल खान का जन्म सफ़वी ईरान के शिराज़ में हुआ था, जहाँ उनके पिता फ़ार्स में एक छोटे राजस्व संग्राहक थे। उनके पिता के दो भाई ईरान में वित्तीय पदों पर कार्यरत थे, जबकि दो अन्य ईरान और भारत के बीच व्यापार में लगे हुए थे। 

अफ़ज़ल खान का एक भाई था, जिसका नाम अमानत खान था; वह बाद में उनके साथ भारत आया और ताजमहल पर सुलेखन (calligraphy) के रूप में लिखे गए अभिलेखों को डिज़ाइन करने के लिए प्रसिद्ध हुआ। अफ़ज़ल खान ने लेखन-कला से संबंधित विषयों, जैसे कि सुलेख, लेखा-जोखा और गद्य-रचना में शिक्षा प्राप्त की थी। उनके शुरुआती शिक्षकों में से एक विद्वान तक़ी अल-दीन मुहम्मद शिराज़ी थे।

AGRA : MEHTAB BAGH & ELEVEN STAIRES




आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 2 

मेहताब बाग़ और ताजमहल का एक दृश्य 

       यूँ तो मैं बचपन से ही आगरा शहर में रहा किन्तु कभी ताजमहल को यमुना के दूसरी पार से देखने का मौका नहीं मिला, कारण था इस स्थान की दूरी, और यहाँ जाने वाला रास्ता जिसके बारे में मुझे कोई विशेष जानकारी नहीं थी। जब कभी ताजमहल देखने का मन होता था तो इसके मुख्य द्वार से ही इसे जाकर देख आता था। किन्तु आगरा शहर छोड़ने के अनेक वर्षों बाद अपने पुराने शहर को घूमने की इच्छा मन में जाग्रत हुई और मैं अपनी बाइक उठकर निकल चला आगरा की ऐतिहासिक यात्रा पर। 

    इस यात्रा के तहत मैंने आगरा के उन स्थानों को चिन्हित किया जो मैंने पहले कभी नहीं देखे थे। इसलिए सबसे पहले मैं पहुंचा यमुना नदी के दूसरी पार, जहाँ आगरा की विभिन्न मध्यकालीन ऐतिहासिक इमारतें देखीं जा सकती थीं। 

    इन सभी स्थलों में सबसे मुख्य था मेहताब बाग़, जो मुगलकाल का एक शानदार बगीचा था। इसका निर्माण औरंगजेब ने अपने शासनकाल के दौरान कराया था। इस बगीचे से ताजमहल का बहुत ही शानदार दृश्य दिखाई देता है बिलकुल वैसे ही, जैसे हम इसे ताज के परिसर में प्रवेश करने के बाद देखते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि मेहताब बाग़ से आप सिर्फ ताजमहल को निहार सकते हैं, इसके ख़ूबसूरती को महसूस कर सकते हैं, यमुना नदी के जल में इसका प्रतिबिम्ब देख सकते हैं किन्तु आप इसे छू नहीं सकते, इसके नजदीक नहीं जा सकते हैं क्योंकि मेहताब बाग़ और ताजमहल के बीच यमुना नदी है और यहाँ इसे पार करने की इजाजत नहीं है। 

AGRA : AGRA FORT


आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 1 

आगरा किला 



 आगरा किले का इतिहास


माना जाता है कि आगरा किले का निर्माण मुग़ल शासक अकबर ने करवाया था किन्तु उससे पूर्व भी आगरा किले के अस्तित्व में होने के कुछ उदाहरण मिलते हैं जिनके बाद स्पष्ट हो जाता है कि अकबर ने इस किले का निर्माण नहीं बल्कि इसके स्थान पर बने पुराने किले की मरम्मत कराकर इसे एक नया रूप दिया था। 

इससे पूर्व यह एक ईंटों का किला था, जो सिकरवार वंश के राजपूतों के पास था। इसका प्रथम विवरण 1080 ई० में आता है जब महमूद गजनवी की सेना ने इस पर कब्ज़ा किया था। 

सिकंदर लोदी (1487-1517), दिल्ली सल्तनत का प्रथम सुल्तान था जिसने आगरा की यात्रा की तथा इस किले की मरम्म्त 1504 ई० में करवायी और इस किले को अपने निवास के रूप में चुना। सिकंदर लोदी ने इसे 1506 ई० में राजधानी बनाया और यहीं से देश पर शासन किया। उसकी मृत्यु भी इसी किले में 1517 में हुई थी। 

बाद में उसके पुत्र इब्राहिम लोदी ने भी नौ वर्षों तक इस किले से राज्य किया, जब तक वो पानीपत के प्रथम युद्ध (1526) में बाबर द्वारा मारा नहीं गया। उसने अपने काल में यहां कई स्थान, मस्जिदें व कुएं बनवाये जो आज भी आगरा में विभिन्न स्थानों पर दृष्टिगोचर होते हैं। 

पानीपत के युद्ध के बाद मुगलों ने इस किले पर कब्ज़ा कर लिया साथ ही इसकी अगाध सम्पत्ति पर भी। इस सम्पत्ति में ही एक हीरा भी था जो कि बाद में कोहिनूर हीरा के नाम से प्रसिद्ध हुआ। तब इस किले में इब्राहिम के स्थान पर बाबर आया। उसने यहां एक बावली बनवायी। 

सन 1530 में आगरा किले में हुमायुं का राजतिलक भी हुआ। हुमायुं इसी वर्ष बिलग्राम में शेरशाह सूरी से हार गया व किले पर उसका कब्ज़ा हो गया। इस किले पर अफगानों का कब्ज़ा पांच वर्षों तक रहा, जिन्हें अन्ततः मुगलों ने 1556 में पानीपत का द्वितीय युद्ध में हरा दिया।

Sunday, July 30, 2023

MANDU : A Historical Empire of Malwa

 MANDU - A CAPITAL OF MALWA

मालवा की प्राचीन और मध्य कालीन राजधानी - माण्डू 


मालवा प्रान्त के विंध्याचल पर्वतमाला की गोद में स्थित मांडू प्राकृतिक रूप से बहुत ही सुन्दर स्थान है। इसके शांत वातावरण और आश्चर्य चकित कर देने वाले प्राकृतिक दृश्यों की वजह से यह अनेकों भारतीय राजाओं का पसंदीदा स्थल रहा है। मानसून के समय यहाँ फैली हरियाली और सुगन्धित वायु, अनायास ही मन को मोह लेती है। इसके अलावा विंध्य पर्वतों के बीच स्थित होने के कारण यह सुरक्षा की दृष्टि से भी सक्षम स्थान है इसीलिए प्राचीन काल से लेकर मध्य काल तक यह अनेकों राजवंशो की शरण स्थली और राजधानी रहा है। 

दसवीं शताब्दी में यहाँ परमार वंश के शासकों का शासन रहा, जिनमें मुंज राज, सिद्धराज और राजा भोज का नाम प्रमुख है। हालाँकि इन शासकों की राजधानी धारा नगरी थी जो वर्तमान में धार जिला है, फिर भी उन्होने मांडू को भी अपना मुख्य राजनितिक केंद्र बनाये रखा था। 

MAHESHWAR FORT


 MAHESHWAR FORT AND GHAT'S

महेश्वर किला और घाट 


30 JUL 2023

    नर्मदा नदी के किनारे बसा महेश्वर एक अत्यंत ही सुन्दर पौराणिक नगर है। पुराणों के अनुसार यह प्राचीन काल में महिष्मती के नाम से विख्यात था और पौराणिक शासक सहस्त्रार्जुन की राजधानी था। इसके पश्चात सत्रहवीं शताब्दी में इसे मालवा की द्वितीय राजधानी होने का गौरव प्राप्त हुआ जब यहाँ महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने शासन किया। उन्होंने यहाँ अनेकों प्राचीन मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया और साथ अनेक नए मंदिरों का निर्माण कराया। माँ नर्मदा  के किनारे एक विशाल किले के साथ ही सुन्दर रमणीक घाटों का निर्माण कराया। इस किले और घाटों का प्रतिबिम्ब नर्मदा नदी के जल में एक अलग ही आकर्षण के रूप में दिखाई देता है। 

     महेश्वर में माँ नर्मदा का स्वछन्द और शीतल जल मन को अति आनंदित करने वाला है, इसके किनारे के घाट यहाँ आने वाले सभी आगंतुकों का मन मोह लेते हैं। घाटों के किनारे स्थित नवीन एवं प्राचीन मंदिरों की श्रंखलाएं सनातन धर्म की महान व्याख्या का गुणगान करती हुई दिखालाई पड़ती हैं। यहाँ के मंदिरों में  सुबह शाम होने वाली आरतियां और घंटे घड़ियालों की आवाजें रोम रोम में धार्मिक आस्था का भाव पैदा करती हैं। प्राचीन काल से ही महेश्वर धार्मिक गतिविधियों का केंद्र रहा है और वर्तमान में भी यह महेश्वर धाम के नाम से अपनी पहचान बनाये हुए है। 

Saturday, July 29, 2023

JAM GATE

 

JAM GATE

जाम गेट 

29 JUL 2023

पातालपानी जलप्रपात और चोरल बांध देखने के बाद हम महू - मंडलेश्वर मार्ग पर आ गए थे। पूरा रास्ता जंगली वनों से घिरा हुआ था।  यह रास्ता मालवा को निमाड़ प्रान्त से जोड़ने का कार्य करता है। अभी हम विंध्याचल पर्वतमाला के उच्च पठारी भाग में थे। रास्ते में छोटी जाम के नाम से एक गाँव आया जहाँ हमने कुछ समय रुकने के लिए एक दुकान पर ठहरे।  दुकानदार ने हमारे घूमने के उद्देश्य को जानकर बतलाया कि इस गांव में जाम किला है उसे आप देखकर आ सकते हो। यह किला हमें सड़क से स्पष्ट दिखाई दे रहा था। हम बिना देर किये इस किले की तरफ बढ़ चले। 

इस किले को छोटी जाम के नाम से जाना जाता है। किले से थोड़ी दूर प्रसिद्ध पर्यटक स्थल जाम गेट है जिसका निर्माण इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने सन 1791 में कराया था। महेश्वर स्थित अपने किले से वह जब भी पालकी द्वारा इंदौर आया करती थीं तो यह जाम किला ही उनका रात्रि विश्राम स्थल हुआ करता था। जाम किले अथवा गांव से थोड़ी दूर जाम गेट एक भव्य दरवाजा है जहाँ से पर्वतों की तराई में स्थित सम्पूर्ण निमाड़ प्रान्त का विहंगम दृश्य देखा जा सकता है। 

PATALPANI WATERFALL

पातालपानी जलप्रपात 

PATALPANI WATERFALL

29 JUL 2023

    मालवा प्रान्त में इंदौर के निकट एक बहुत ही खूबसूरत जलप्रपात है। यह पातालपानी ग्राम के निकट है इसलिए इसे पातालपानी जलप्रपात कहते हैं। चोरल नदी जब यहाँ 300 फ़ीट की ऊँचाई से नीचे गिरती है तो यह एक प्राकृतिक सुन्दर जलप्रपात का निर्माण करती है। वर्तमान में यह ट्रैकिंग और पिकनिक स्थल के रूप में पर्यटकों का एक पसंदीदा स्थल बनकर उभरा है। 

    ब्रिटिश काल के दौरान इस जलप्रपात के नजदीक से अंग्रेजों ने रेल ट्रेक का निर्माण किया और इसी जलप्रपात के नाम से रेलवे स्टेशन का भी निर्माण कराया। वर्तमान में यह रेलवे स्टेशन जलप्रपात से थोड़ी दूर स्थित है किन्तु जब यहाँ से ट्रैन गुजरती थी तब ट्रेन से भी इस जलप्रपात को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता था। 

    मैं और सोहन भाई इंदौर के रशिया ढाबे से खाना खाकर और मोबाइल चार्ज करने के बाद महू क्षेत्र में पहुंचे। यूँ तो महू, डॉ. भीमराव अम्बेडकर का जन्मस्थान है साथ ही यह इंदौर नगर का छावनी क्षेत्र भी है। छावनी क्षेत्र से निकलकर हम जाम गेट की तरफ बढ़ रहे थे कि अचानक सोहन भाई को पातालपानी जलप्रपात की तरफ जाने वाला एक एक मार्गसूचक पट दिखाई दिया, भाई ने गाडी पातालपानी की तरफ घुमा दी और बहुत ही शानदार रास्तों से होकर शीध्र ही हम पातलपानी जलप्रपात की तरफ पहुंचे।