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Sunday, October 18, 2026

MEWAR 2024 : RAJSAMAND FORT & RUTHI RANI KA MAHAL

 मेवाड़ की ऐतिहासिक यात्रा पर - वर्ष 2024 

भाग 2 - राजसमन्द किला और रूठी रानी का महल 

कांकरोली स्टेशन से अभिषेक के साथ मैं, राजसमंद स्थित अपने छोटे भाई जीतू के घर पहुंचा। जीतू और उसकी पत्नी सुगंधा मुझे देखकर अति प्रसन्न हुए। उन्होंने बड़े प्यार और आदर के साथ मेरी आवभगत की। मैं काफी लम्बे समय बाद राजसमंद आया था इसलिए यहाँ अधिकतर जगहें मुझे बदली भी लगीं और अधिकांश जगहें पहले की तरह भी दिखी। जीतू मार्बल माइंस में काम करता है, उसके अपने कार्यक्षेत्र पर जाने का समय होने वाला था इसलिए वो अपनी ड्यूटी जाने की तैयारी में लग गया और मैं उसके पुत्र अभिषेक के साथ राजसमंद का किला देखने निकल गया। 

एक ऊँची पहाड़ी पर हम राजसमंद के किले के नजदीक पहुंचे। अब यहाँ तक आने के लिए पक्की सड़क बन गई है जिससे यहाँ अपने निजी वाहन द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है। लगभग दस और पंद्रह साल पहले जब मैं यहाँ आया था तो किले तक पैदल ही चढ़कर आया था, उस समय यहाँ तक आने का पैदल ही एक मात्र मार्ग था। अभिषेक की एक्टिवा स्कूटर द्वारा हम किले की रूठी रानी नामक महल पर पहुंचे। 

पिछली बार जब मैं राजसमद के किले पर आया था तब यह रूठी रानी का महल खंडहर के रूप दिखाई देता था। इस महल तक आने का कोई मार्ग उस समय नहीं था क्योंकि यह किले से कुछ दूर दूसरी पहाड़ी पर था और इस तक पहुँचने वाले मार्ग को पर्वतीय जंगल की कँटीली झाड़ियों ने घेर रखा था। किन्तु इस बार इसका दृश्य पूर्ण रूप से मुझे बदला हुआ प्रतीत हुआ। 

वर्षों पहले रूठी रानी नामक इस महल को जब मैंने देखा था तब यह खंडहर में तब्दील हो चुका था। यहाँ तक पहुँचने का कोई सुगम मार्ग भी उपलब्ध नहीं था किन्तु अब यहाँ बहुत परिवर्तन हो चुका है। अब सीधे सड़कमार्ग द्वारा रूठी रानी के महल तक आसानी से आया जा सकता है। पुरातत्व विभाग और राजसमंद जिला प्रशासन ने इस महल का जीर्णोद्धार कराकर इसे शानदार पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया है। अब यह देखने में बहुत सुन्दर और शानदार लगता है। 

सोलहवीं शताब्दी में मेवाड़ के महाराणा राजसिंह जी ने उदयपुर से कुछ दूर राजनगर की स्थापना की और यहाँ की एक ऊँची पहाड़ी पर उन्होंने एक किले का निर्माण करवाया। इस किले को राजनगर किला कहा जाता है। किले का अलावा यहाँ महाराणा ने एक विशाल झील का निर्माण भी करवाया था जिसे उन्होंने राजसमंद झील नाम दिया। इस  झील का निर्माण सन 1662 से 1676 ईस्वी के बीच गोमती, केलवा और ताली नदी के जल को संगृहीत करके किया गया था। 

किले के ठीक सामने ही दूसरी पहाड़ी पर एक महल के अवशेष थे जिन्हें रूठी रानी के महल के नाम से जाना जाता है। इसके निर्माण के पीछे एक कथा प्रचलित है कि  जब एक बार महाराजा से उनकी रानी रुष्ट हो गईं तो उन्होंने किले से दूर अपने लिए एक निजी महल बनवाया और वह वहां जाकर रहने लगी। रानी के राजा से रुष्ट होने और किले से दूर दूसरी पहाड़ी पर अपने लिए एक अलग महल बनवाये जाने के कारण इस महल का नाम रूठी रानी का महल पड़ा। 

वैसे राजस्थान में इस नाम से और भी महल देखने को मिलते हैं और सभी की ऐसी ही एक कथा भी सुनने को मिलती है जैसे उदयपुर के निकट जयसमंद और अजमेर की पहाड़ियों में भी रूठी रानी के महल देखने को मिलते हैं। 

  • रूठी रानी का महल 

मैं जब इस महल के पास पहुंचा तो इस महल का गेट बंद था, जिस पर एक ताला भी लगा हुआ था। मैं इसकी रेलिंग को फलांग कर इस महल को देखने पहुंचा। अब इसका स्वरूप पूर्ण रूप से बदल चुका था। काफी वर्षों पहले मैंने महाराणा राज सिंह के किले से इसे खंडहरों के रूप में देखा था और यहाँ एक आने  का प्रयत्न भी किया था किन्तु कोई सुगम मार्ग न होने के कारण मैं यहाँ तक नहीं पहुँच सका था। किन्तु आज इसे देखने की मेरी यह इच्छा पूर्ण हो गई। 

यहाँ लिखे पुरातत्व लेख के अनुसार यह महल रानी उमादे का है जिनका विवाह पंद्रहवीं शताब्दी में मारवाड़ के शासक महाराजा मालदेव के साथ हुआ था। कहा जाता है कि रानी उमादे के पिता ने दहेज़ में रानी के साथ दासियाँ भी भेजी थीं जिनमें एक भारमली नामक दासी थी जो अत्यंत सुन्दर थी। राजा मालदेव उसकी सुंदरता पर आकर्षित गए और अपने विवाह की पहली रात उसके साथ समय व्यतीत करते रहे जिसकारण वह अपनी रानी उमादे के पास काफी देर से पहुंचे। रानी उमादे ने इसे अपना अपमान समझा और उनसे जीवनभर बात ना करने की प्रतिज्ञा लेकर रूठकर इस महल में आ गईं। तभी से इस महल का नाम रूठी रानी का महल पड़ गया। 

पुरातत्व विभाग ने इसका पर्यटन की दृष्टि से काफी जीर्णोद्धार किया है और इसे पर्यावरण चेतना केंद्र के रूप में विकसित किया है। अब यह एक सुरम्य वातावरण में स्थित राजसमंद की एक ऐतिहासिक धरोहर के रूप में पर्यटकों के बीच काफी प्रचलित है। 



रूठी रानी का महल


रूठी रानी का महल


रूठी रानी का महल










रूठी रानी का महल

रूठी रानी का महल




RAJSAMAND LAKE

RAJSAMAND LAKE

  • राजगढ़ किला 










राजगढ़ किला




राजगढ़ किला






राजगढ़ किला









NEXT PART : - DESURI







Friday, January 18, 2013

MEWAR TRIP : RAJSAMAND 2013

UPADHYAY TRIPS PRESENT'S

राजसमन्द में एक बार फिर

अपनी छत पर पतंग उड़ाते धर्मेन्द्र भाई 


     इस बार आगरा में सर्दी काफी तेज थी और इन सर्दियों में, मैं फ़ालतू घर पर बैठा था। कल्पना भी अपने मायके गई हुई थी इसलिए अपने आपको फ़ालतू और अकेला महसूस कर रहा था। कंप्यूटर भी इन दिनों खराब पड़ा था, सिवाय टीवी देखने के मेरे पास कोई काम नहीं था, लेकिन टीवी भी बेचारी कब तक मेरा मन लगाती।तभी जीतू का फोन आया तो उसे मैंने अपनी परेशानी बताई, उसने मुझे अपने पास आने की कहकर मेरी परेशानी मिनटों में हल कर दी ।मे 

     माँ की आज्ञा लेकर मैं सीधे स्टेशन गया और अनन्या एक्सप्रेस में रिजर्वेशन करवा लिया । दुसरे दिन मैं राजसमन्द के लिए गया। ट्रेन सही समय पर आगरा फोर्ट पर आ गई और मैंने अपनी सीट ढूँढी, देखा तो ऊपर की थी।कमबख्त से मांगी तो साइड लोअर थी पर नसीब में ऊपर वाली ही लिखी थी। ट्रेन सवाई माधोपुर होते हुए जयपुर पहुंची । यहाँ मेट्रो का काम तेजी पर चल रहा था, ट्रेन दुर्गापुरा स्टेशन पर काफी देर खड़ी रही उसके बाद जयपुर स्टेशन पर पहुंची। यहाँ मुझे चाय पीने का मौका मिल गया, ट्रेन की चाय से यह चाय कई गुना बेहतर थी।

Monday, April 2, 2012

MEWAR TRIP : KUMBHALGARH

UPADHYAY TRIPS PRESENT'S



कुम्भलगढ़ और परशुराम महादेव  




 इस यात्रा को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

     कल हम हल्दीघाटी घूमकर आये थे, आज हमारा विचार कुम्भलगढ़ जाने की ओर था और ख़ुशी की बात ये थी कि आज धर्मेन्द्र भाई भी हमारे साथ थे। राजनगर से कुम्भलगढ़ करीब पैंतालीस किमी दूर है, भैया ने मेरे लिए एक बाइक का इंतजाम कर दिया।  भैया, भाभी अपने बच्चों के साथ अपनी बाइक पर, जीतू अपनी पत्नी - बच्चों और दिलीप के साथ अपनी बाइक पर और तीसरी बाइक पर मैं और कल्पना थे। 

    पहाड़ी रास्तो से होकर हम कुम्भलगढ़ की तरफ बढ़ते जा रहे थे, मौसम भी काफी सुहावना सा हो गया था , जंगल और ऊँचे नीचे पहाड़ों के इस सफ़र का अलग ही आनंद आ रहा था, मैं बाइक चला रहा था और कल्पना मोबाइल से विडियो बना रही थी। यहाँ काफी दूर तक बाइक बिना पेट्रोल के ही चल रही थी, ढ़लान के रास्तों पर जो करीब तीन किमी लम्बे होते थे ।

MEWAR TRIP : HALDIGHATI 2012

UPADHYAY TRIPS PRESENT'S

हल्दीघाटी - एक प्रसिद्ध रणभूमि


मैं और मेरी पत्नी कल्पना ,चेतक की समाधी पर 



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   आज हमारा विचार हल्दीघाटी जाने का बना, जीतू ने आज छुटटी ले थी साथ ही एक बाइक का इंतजाम भी कर दिया। मैं ,कल्पना, दिलीप, जीतू और उसका बेटा अभिषेक दो बाइकों से चल दिए एक प्रसिद्ध रणभूमि की तरफ जिसका नाम था हल्दीघाटी। यूँ तो हल्दीघाटी के बारे में हम कक्षा चार से ही पढ़ते आ रहे हैं, और एक कविता भी आज तक याद है जो कुछ इसतरह से थी,
             
                        रण बीच चौकड़ी भर भर कर , चेतक बन गया निराला था।
                         महाराणा प्रताप के घोड़े से   , पड़  गया  हवा का पाला था ।।

    हल्दीघाटी के मैदान में आज से पांच सौ वर्ष पूर्व मुग़ल सेना और राजपूत सेना के बीच ऐसा भीषण संग्राम हुआ जिसने हल्दीघाटी को इतिहास में हमेशा के लिए अमर कर दिया और साबित कर दिया कि भारत देश के वीर सपूत केवल इंसान ही नहीं,  जानवर भी कहलाते हैं जो अपनी जान की परवाह किये बगैर अपने मालिक के प्रति सच्ची वफ़ादारी का उदाहरण पेश करते हैं और ऐसा ही एक उदाहरण हल्दीघाटी के मैदान में महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक ने अपनी जान देकर दिया। ऐसे वीर घोड़े को सुधीर उपाध्याय का शत शत नमन।

Sunday, April 1, 2012

MEWAR TRIP : RAJSAMAND 2012

                                                      UPADHYAY TRIPS PRESENT'S                                                                                    
                                                                                                                                  
राजसमंद और कांकरोली
                                                          

कांकरोली स्टेशन पर जीतू 



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      श्री नाथजी के दर्शन करके हम राजनगर की ओर रवाना हो लिए, दिलीप एक मारुती वन में बैठ गया, मैं ,जीतू और कल्पना बाइक पर ही चल दिए। रात हो चली थी , राष्ट्रीय राजमार्ग - 8  पर आज हम बाइक से सफ़र कर रहे थे, सड़क के दोनों तरफ मार्बल की बड़ी बड़ी दुकाने और गोदाम थे और रास्ता भी बहुत ही शानदार था।
थोड़ी देर में हम कांकरोली पहुँच गए, यहाँ हमें दिलीप भी मिल गया और हम फिर जीतू के घर गए , भईया को अभी पता नहीं था कि मैं कांकरोली में आ गया हूँ, मेरा संपर्क सिर्फ जीतू के ही साथ था । जीतू और धर्मेन्द्र भैया मेरे बड़े मामा जी के लड़के हैं। दोनों ही यहाँ मार्बल माइंस में नौकरी करते हैं, इसलिए अपने परिवार को लेकर दोनों यहीं रहते हैं, मैं पहले भी कई बार कांकरोली और राजनगर आ चुका हूँ, कल्पना और दिलीप पहली बार आये थे।