ग्वालियर किले की एक यात्रा
5 JAN 2024,
नववर्ष का आगाज हो चुका था किन्तु इस बार मैं अपनी दक्षिण भारत की यात्रा पर नहीं जा पाया था, क्योंकि मेरा कर्नाटक एक्सप्रेस में रिजर्वेशन था जो इन सर्दियों में घने कोहरे के वजह से काफी विलम्ब से चल रही थी। शाम को साढ़े 9 बजे जाने वाली यह ट्रेन अगले दिन सुबह दस बजे के आसपास मथुरा पहुंची, जिसकारण मेरी आगे की सारी यात्रा का प्लान विफल हो गया और मैंने ट्रेन छोड़ दी।
इसके अलावा दूसरा कारण यह भी था कि इस यात्रा पर मेरे साथ जाने वाला मेरा मित्र सोहन सिंह अभी स्वस्थ नहीं है, उनके पैर में हुए फ्रैक्चर के कारण वह इस यात्रा को करने में असमर्थ थे। अतः इस कारण इस नववर्ष की मेरी दक्षिण भारत की दूसरी कर्नाटक यात्रा इस बार असफल होकर रह गई।
साल के शुरूआती दिनों में जहाँ लोग नए साल की खुशियां मनाने में व्यस्त थे और एक दूसरे को नए साल के सुन्दर सुन्दर सन्देश मोबाइल पर भेज रहे थे, वहीँ मैं मथुरा रेलवे स्टेशन पर ट्रेन के जाने के बाद उदास मन से बैठा हुआ था। मेरे दिमाग में सिर्फ मेरी यात्रा चल रही थी जिसकी तैयारी मैंने कई महीने पहले से शुरू कर दी थी।
अब स्टेशन पर बैठे बैठे, मैं या तो अपनी आगामी यात्रा की कन्फर्म टिकटों को कैंसिल कर रहा था अथवा फिर विलम्बित ट्रेनों का टीडीआर फाइल कर रहा था। मेरी इस वर्ष की दक्षिण भारत यात्रा पूर्ण रूप से कैंसिल हो चुकी थी।
मैं काफी देर मथुरा जंक्शन पर बैठा रहा और फिर कुछ समय बाद घर लौट आया। माँ, मुझे देखकर अति प्रसन्न हुई कि मैं उनसे दूर नहीं गया और उनके पास रहा। किन्तु मेरे मष्तिष्क में मेरी यात्रा का पूरा प्लान घूम रहा था, मैं चाहकर भी अपने आप को संतुष्ट नहीं करपा रहा था। मुझे सिर्फ अपनी इस यात्रा के कैंसिल होने का दुःख सताये जा रहा था, सारी तैयारियों के बाबजूद मेरा यह यात्रा प्लान असफल हो गया। मैने यात्रा के लिए ऑफिस से छुट्टियां भी ले रखी थीं इसलिए मैं अभी ऑफिस नहीं जाना चाहता था।
इस वर्ष सर्दियाँ जोरो पर थीं, घने कोहरे ने पूरे उत्तर भारत को अपने आगोश में ले रखा था। लोग घरों से बाहर नहीं निकलना चाहते थे, किन्तु मेरा मन घर में बैठे बैठे बाहर की यात्राओं का प्लान कर रहा था। अंततः मेरे मन ने एक ऐसी यात्रा प्लान की जो ज्यादा दूर की तो नहीं थी किन्तु ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत ही महत्वपूर्ण थी।
यह यात्रा थी ग्वालियर किले की , जहाँ मुझे वो समस्त ऐतिहासिक स्थल देखने को मिलने वाले थे जिन्हें खोजने में कर्नाटक जा रहा था। ग्वालियर किले में जैन प्रतिमाएं और गुफाएं, गोपांचल पर्वत, प्राचीन ऐतिहासिक मंदिर, गुरुद्वारा, जलकुंड और महल देखने को मिल सकते थे।
मैंने तुरंत यह एकदिवसीय यात्रा प्लान की और माँ से आज्ञा लेकर रेलवे स्टेशन की ओर प्रस्थान किया। रेलवे स्टेशन पर आज भी वही हाल था जो एक जनवरी को था। घना कोहरा और लेट लतीफ़ ट्रेनें। लेट लतीफ़ ट्रेनों की वजह अक्सर नुकसान तो होता ही है परन्तु कभी कभी बहुत फायदा भी होता है।
ऐसा ही एक फायदा मुझे 20 घंटे की देरी से चल रही पातालकोट एक्सप्रेस से हुआ, जो मेरे सामने मथुरा जंक्शन पर जब आई तो यह पूरी खाली पड़ी हुई थी। इसके देरी के चलने की वजह से मुझे बिना भीड़भाड़ वाली एक खाली ट्रेन ग्वालियर जाने के लिए मिल गई। और मैं इसके जनरलकोच में सवार हुआ।