आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 12
लोदी काल की मस्जिद और मक़बरा
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आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 12
लोदी काल की मस्जिद और मक़बरा
आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 11
सादिक खान और सलाबत खान का मकबरा
सादिक खान और उनके पुत्र सलाबत खान, मुगल काल के प्रमुख रईस थे और बादशाह जहांगीर एवं शाहजहाँ के अधीन उच्च पदस्थ अधिकारी थे। सलाबत खान, बादशाह शाहजहाँ के मुग़ल दरबार में मीर बख्शी (कोषाध्यक्ष) थे, जो 1644 में आगरा किले में अमर सिंह राठौर द्वारा मारे गए थे जबकि उनके पिता सादिक खान की मृत्यु 1633 में ही हो गई थी। दोनों पिता पुत्र मुग़ल दरबार में क्रमशः बादशाह जहांगीर और शाहजहां के कार्यकाल के दौरान नियुक्त थे।
आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 10
जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर का मक़बरा
17 सितम्बर 2024,
जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर का मकबरा आगरा के सिकंदरा में स्थित एक भव्य मुगलकालीन स्मारक है, जिसे उनके पुत्र जहांगीर ने 1605-1613 के बीच बनवाया था। लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर से निर्मित यह 119 एकड़ में फैली एक अनूठी पिरामिडनुमा संरचना है, जो इस्लामी, हिंदू और बौद्ध वास्तुकला का मिश्रण है।
यह एक पांच-मंजिला संरचना है जो पूरी तरह से बलुआ पत्थर से बनी है, जिसके शीर्ष पर एक सफेद संगमरमर का मंडप है। यह फारसी चारबाग शैली में निर्मित है। मुख्य मकबरे का प्रवेश द्वार बुलंद दरवाजे की शैली में बनाया गया है और जटिल नक्काशी से सजाया गया है।इस मकबरे की चारों कोनों पर सफेद संगमरमर की मीनारें हैं।
औरंगजेब के समय में इस मकबरे को जाटों द्वारा लूटा गया था, माना जाता है कि उन्होंने इस मकबरे से बादशाह अकबर के शरीर के अवशेषों को निकालकर उनका दाह संस्कार कर दिया। ब्रिटिश काल में अंग्रेजों (लॉर्ड कर्जन) ने इसकी मरम्मत कराई थी।
आगरा की ऐतिहासिक विरासतें - भाग 9
फिरोज खान का मकबरा / FIROZ KHAN TOMB
फिरोज खान शाहजहां के शाही हरम के प्रभारी और दीवान-ए-कुल थे।
जनवरी के घने कोहरे के बीच लोहागढ़ किले की एक यात्रा
16 JAN 2024,
बीती रात वृन्दावन से लौटने के बाद हम अपने घर पर आराम से सोये और अगली सुबह हम बाइक से आज भरतपुर जाने के लिए तैयार हो गए। आज , कल की अपेक्षा ठण्ड अत्यधिक थी और कोहरा भी बहुत घना था। दिन निकल आया है ऐसा प्रतीत ही नहीं हो रहा था। सौरभ भाई के अनुसार उन्हें उत्तर भारत की इस भयंकर सर्दी का एहसास नहीं था, इस कोहरे का उन्हें तनिक भी आभास नहीं था अन्यथा वह इस यात्रा को जनवरी में प्लान नहीं करते।
हम बाइक से भरतपुर मार्ग पर पहुंचे, शीतलहर चल रही थी और सड़क पर घने कोहरे का साम्राज्य था। आज मथुरा से भरतपुर की यह 30 किमी की छोटी सी दूरी भी बहुत लम्बी प्रतीत हो रही थी। मेरे पास मफलर देखकर सौरभ भाई के मित्रों ने मुझसे इसके बारे में पूछा और कल रात ही अपने लिए एक नया मफलर खरीद लिया था। आज की इस यात्रा में इस मफलर ने उन्हें बहुत राहत पहुंचाई।
रास्ते में एक दुकान पर हमने रूककर गर्मागर्म चाय पी और उनके पश्चात पुनः भरतपुर की ओर रवाना हो गए।