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Friday, June 30, 2023

MATSAYGANDHA EXPRESS : MRDW TO MAO

UPADHYAY TRIPS PRESENT'

 कोंकण V मालाबार की मानसूनी यात्रा पर - भाग 12  

मत्सयगंधा एक्सप्रेस और मडगांव स्टेशन पर एक रात  

30 जून 2023 

मैंने मत्सयगंधा एक्सप्रेस में मुर्देश्वर से मडगांव तक शयनयान कोच में आरक्षण करा रखा था। मुर्देश्वर स्टेशन शाम को साढ़े पांच बजे हम इस ट्रेन में सवार हुए, हमारी सीट साइड लोअर और साइड उपर थी, जोकि हमारे आगमन तक हमें खाली ही मिली। यह पहलीबार था जब मुझे मेरी साइड लोअर सीट खाली मिली हो अन्यथा अधिकतर यात्रियों में मुझे मेरी सीट पर कोई ना कोई बैठा अवश्य मिलता है। यह ट्रेन मंगलुरु सेंट्रल से चलकर मुंबई के लोकमान्य तिलक टर्मिनल जा रही थी, हमारे आसपास बैठी सभी सवारियां मुंबई ही जा रही थीं। 

मुर्देश्वर से निकलने के बाद मौसम में भी काफी परिवर्तन हो गया। यहां काफी तेज बारिश थी और बाहर का सबकुछ दिखना लगभग बंद सा हो गया था। शाम का समय और उसपर जोरदार बारिश हो उस समय एक कप चाय मिल जाये तो उसके आनंद ही अलग होते हैं। ट्रेन में ही एक वेंडर से मैंने दो कप चाय लीं, एक कल्पना को दी और एक मैंने पी। आज के इस मत्सयगंधा एक्सप्रेस की यात्रा के एक अलग ही आनंद थे। 


अगला स्टेशन होन्नावर आया। यहाँ से जोग जलप्रपात के लिए रास्ता गया है। केरल आते समय हमारी ट्रेन इस स्टेशन पर भी रुक गई थी, तब मैंने और सोहन भाई ने इस स्टेशन परिसर को घूमा था। होन्नावर के बाद कुमता और उसके बाद गोकर्ण रोड स्टेशन आया। यहाँ से गोकरण के लिए रास्ता गया है जहाँ गोकर्णेश्वर मंदिर है जो मुर्देश्वर मंदिर सहित पाँच भागों में से एक है। गोकर्ण के बाद अंकोला और उसके बाद कारवार स्टेशन आया। कारवार स्टेशन आने से पूर्व ट्रेन एक लम्बी सुरंग को पार करती है। 

कारवार, कर्नाटक के उत्तरी कन्नड़ जिले का एक प्रमुख नगर है। काली नदी के किनारे बसे कारवार में एक तरफ अरब सागर है तो दूसरी तरफ पश्चिमी घाटों की श्रृंखलाएं। यहाँ के स्टेशन का नज़ारा बहुत ही अनुपम है किन्तु अभी अँधेरा हो चुका है और बाहर घनघोर बारिश है। कारवार से निकलने के बाद इस ट्रेन का अगला ठहराव मडगांव स्टेशन ही था किन्तु मडगांव पहुँचने से पूर्व ये लोलेम नामके छोटे से स्टेशन पर खड़ी हो गई, इसका मतलब था कि मडगांव की तरफ से कोई ट्रेन आने वाली है इसलिए मैं स्टेशन घूमने के लिए ट्रेन से बाहर आया। 

लोलेम स्टेशन पर कहीं भी कन्नड़ भाषा का प्रयोग नहीं था इससे सिद्ध होता है कि यह गोवा का स्टेशन है। हम कर्नाटक से निकलकर गोवा राज्य में आ चुके थे और लोलेम स्टेशन कर्नाटक के बाद गोवा राज्य की सीमा में पहला स्टेशन है। यहाँ बारिश नहीं थी, थोड़ी देर पहले ही बंद हुई है। लोलेम एक छोटा रेलवे स्टेशन है जहाँ पैसेंजर ट्रेनों का ही ठहराव है। स्टेशन पर लगी घडी गुजरे समय की याद दिलाती है, किन्तु बहुत ही रोमांचक पल एहसास कराती है। 

जल्द ही ट्रेन को हरी बत्ती  मिल गई और हम मडगांव की तरफ रवाना हो चले। एक दो स्टेशन निकलने के बाद हम मडगांव पहुँचे। हमारे स्टेशन पर उतरते ही मुंसलाधार वर्षा शुरू हो गई। मैंने पहले ही OYO के माध्यम से स्टेशन से थोड़ी दूर एक अच्छे होटल में रूम बुक कर लिया था, जिसका एडवांस भुगतान भी मैंने ऑनलाइन कर दिया था। एक फुट ओवर ब्रिज पर  खड़े हम बारिश के रुकने की प्रतीक्षा में थे किन्तु यह बंद होने का नाम ही नहीं ले रही थी। इसलिए हल्की बारिश होते ही हम होटल की तरफ बढ़ चले, जो बस थोड़ी सी दूरी पर था।

होटल के रिसेप्शनिष्ट पद पर बैठे एक युवक ने नम्रतापूर्वक हमारी बुकिंग चेक की और हमें ढाई हजार रूपये पे करने को कहा, परन्तु हमने तो यह रूम 1400 रूपये में ऑनलाइन बुक किया है। उसने 2500 /- से नीचे रूम देने से साफ़ इंकार कर दिया। हम फोन पर OYO कस्टमर केयर से बात करते हुए कब होटल से बाहर निकल आये पता ही नहीं चला। OYO वालों ने छल किया था हमारे साथ, कमरे के वास्तविक मूल्य से कम मूल्य दिखाकर बुकिंग स्वीकार कर ली और अंत में विकट परिस्थिति पैदा करके अपना पल्ला छाड़ लेना। 

अब हमारे सामने दो ही विकल्प थे, की या तो वो ढाई हजार वाला रूम ही ले लें, या फिर 1500 के बजट तक कोई और होटल देखा जाये। हमें दूसरा विकल्प उचित लगा क्योंकि आगे की यात्रा के लिए पैसा ही सबसे महत्वपूर्ण वस्तु थी जो अभी हमारे पास सीमित मात्र थी। हम हलकी हलकी बरसात की इस रात में गोवा की गलियों में घूम रहे थे। एक दो होटल घूमने पर कहीं रूम नहीं मिला तो हम वापस उसी 2500 /- वाले होटल के युवक के पास पहुंचे किन्तु यहाँ भी उसने कहा कि बुकिंग कैंसिल होते ही आप वाल रूम किसी दूसरे को अलॉट हो गया। 

अब रेलवे स्टेशन पर बने वेटिंग हॉल के अलावा रुकने का कोई दूसरा विकल्प नहीं था। हम रेलवे स्टेशन पहुंचे, यहाँ भी मंगलुरु सेंट्रल पर बने वेटिंग रूम जैसा ही है। यह भी वातानुकूलित है और बेहद शानदार है। इसमें रुकने के लिए बुकिंग कराने वालों की लाइन लगी हुई थी, मेरा नंबर आते ही यह भी फुल हो गया। यहाँ के अटेंडेंट ने मुझसे कहा कि कोई भी जगह खाली होती है तो वह हमें फोन करके सूचित करेगा तब तक यहाँ से मैं रेलवे के वेटिंग रूम पहुंचा तो देखा यहाँ बैठने की भी जगह नहीं थी। 

मडगांव स्टेशन पर बाजार  भी लगा था, कपडे से लेकर जूते चप्पलों तक यहाँ सबकुछ मिल रहा था। स्टेशन के दूसरे छोर पर खाने पीने की वस्तुओं की दुकानें थी। यहाँ भी हमें इडली और डोसा ही मिला। उत्तर भारतीय खाना खाये आज काफी दिन हो चुके थे, किन्तु जहाँ थे वहां के भोजन को सम्मान पूर्वक ग्रहण किया। खाना खाने के कुछ देर बाद तक हम यहाँ बैठे रहे किन्तु विश्राम के लिए हमें कोई उपयुक्त स्थान नहीं मिला। इधर वातानुकूलित विश्राम गृह वाले का भी कोई कॉल नहीं आया। 

अब हमारे पास प्लेटफॉर्म पर ही सोने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था, हमें बहुत तेज नींद भी आ रही थी और बाहर बहुत तेज बारिश भी हो रही थी जिसकारण हम बाहर जाकर भी कोई दूसरा विकल्प तलाश नहीं कर सकते थे। बैग में से दरी और चादर निकालकर प्लेटफॉर्म पर ही एक साफ़ सी जगह देखकर हमने अपना बिस्तर लगाया और हम सो गए। हमारे अलावा यहाँ  और भी अनेकों यात्री थे जो प्लेटफॉर्म पर ही अपने अपने बिस्तर लगाकर इस रात के गुजर जाने की प्रतीक्षा में थे। 

बाहर बारिश थी, ठंडी ठंडी हवा और फुहारों के बीच आज की इस रात का प्लेटफॉर्म पर सोने का एक अलग ही आनंद था। सचमुच यही असली घुमक्क्ड़ी थी जिसकी यादें शायद कभी नहीं भुलाई जा सकेंगी। अगली सुबह एक सिपाही प्लेटफॉर्म पर सोये हुए व्यक्तियों को उठा रहा था। वह जब तक हमारे पास आता, हम उठकर तैयार थे। अब दिन भी निकल आया था किन्तु बारिश अभी भी हो रही थी।

 सुबह फ्रेश होने की स्थिति में हम सीधे उसी वातानुकूलित विश्राम गृह में गए और कुछ चार्ज देने के बाद हम यहीं तैयार हो गए। यहाँ कल्पना ने इनका बाथरूम नहाने के उद्देश्य से प्रयोग किया जिसके एवज में मुझे सिर्फ नहाने के 150 \- रूपये देने पड़े। मडगांव स्टेशन पर हम अब गोवा घूमने के लिए के लिए पूरी तरह से तैयार थे। 




सीट पर बैठी कल्पना 

कोंकण के दृश्य 






लोलयें स्टेशन पर एक रेलवे घडी 



  





मडगांव स्टेशन के वातानुकूलित प्रतीक्षालय में एक सुबह 

🙏

कोंकण V मालाबार की मानसूनी यात्रा के अन्य भाग 

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