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Tuesday, June 4, 2019

KEDARNATH 2019 : Return from Shri Kedarnath

UPADHYAY TRIPS PRESENT'S

श्री केदारनाथ जी से मथुरा वापसी ( एक चमत्कारिक यात्रा )





यात्रा को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। 


केदारनाथ नगर में भ्रमण :-
सुबह से शाम तक लाइन में लगे रहने के बाद आख़िरकार मुझे मेरे आराध्य भगवान शिव के केदारनाथ जी   के दर्शन हो ही गए।  दर्शन से मन को तृप्त करने के बाद मैंने भीमशिला के भी दर्शन किये जिसने त्रासदी के समय केदारनाथ मंदिर जी रक्षा की थी और फिर मैंने केदारनाथ नगर का भ्रमण किया जो मात्र साल में छः महीने ही गुलजार रहता है बाकी छः महीने यह बर्फ के आगोश में छिप जाता है। त्रासदी के समय यहाँ अत्यधिक विनाश हुआ था जिसके निशाँ उस दर्द की कहानी आज भी बयां करते नजर आते हैं। नगर भ्रमण करने के बाद अब मुझे भूख भी लग आई थी, राजस्थान वालों का यहाँ विशाल भंडारा चल रहा था जिसमे स्वादिष्ट भोजन और कुछ जलेबी खाकर अब मैं वापस अपने घर की तरफ लौट लिया था किन्तु मुझे क्या पता था कि घर अभी बहुत दूर था।

केदारनाथ जी से वापसी :-
केदारनाथ से लिंचोली तक आते आते अब मैं बहुत ही बुरी तरह से थक चुका था, पहाड़ उतरते समय आज मुझे पहली बार एहसास हुआ कि पहाड़ से उतरना, पहाड़ पर चढ़ने से भी ज्यादा मुश्किल होता है। इन खाली घोड़ों को यूँ नीचे की तरफ जाते देख कभी कभी मन करता की क्यों ना इन्हीं एक घोड़े पर बैठकर मैं भी निकल जाऊं परन्तु जब जेब का ख्याल आता तो पता चला कि पैसे तो पैदल चलने के लायक भी नहीं बचे थे आज, जो आखिरी बीस रूपये थे उसका भी मैं प्रसाद ले आया था, अब तो बस मेरी मंजिल माँ ही थी जो इसवक्त भीमबली में थी और शायद मेरे अन्य सहयात्री विष्णु भाई और त्रिपाठी जी भी मुझे वहीँ मिले। शाम हो चुकी थी और अब सूर्य का प्रकाश धीरे धीरे घाटी में से प्रस्थान कर रहा था और अँधेरे का आगमन शुरू हो चुका था। अँधेरे में ये पहाड़ और भी खतरनाक हो जाते हैं और मुझे फिर इन पहाड़ों से डर लगने लगता है।

भीमबली में विश्राम :-
अपने पैरों को तसल्ली देता हुआ कदम दर कदम बढ़ते रहने की गुजरिश करता हुआ आखिर रात 10 बजे मैं भीमबली पहुँच गया। GMVN वालों की बनी एक हट्स में अपनी माँ और अपने साथियों को देखकर मैं जितना खुश हुआ उतना शायद मैं पहले कभी नहीं हुआ था। हट्स के अंदर रजाई और गद्दे बिछे हुए थे जिनपर लेटकर जल्द ही मुझे एक शुकुन भरी नींद आ गई। अगले दिन सुबह त्रिपाठी जी ने हम सभी को सुबह चार - पांच बजे ही जगा दिया। अब हमारा प्लान बद्रीनाथ जी की तरफ जाने का था किन्तु विष्णु भाई के साथ आये हुए अंकित भाई के घर से अर्जेंट घर पहुँचने के लिए फोन आ गया और फिर उन्होंने अपनी बद्रीनाथ यात्रा कैंसिल कर दी और मथुरा की ओर प्रस्थान कर दिया। विष्णू भाई ने जाते जाते मुझे 2000 रूपये दे दिए थे जो आगामी समय में मेरे बहुत ही काम आये। अपने दो सहयात्रियों को अपने से दूर होता देख मुझे दिल में कहीं ना कहीं दुःख तो अवश्य हो रहा था। 

भीमबली से वापसी :-
अब मैं, माँ और त्रिपाठी जी ही शेष रह गए थे और बहुत ही धीरे धीरे हम नीचे उतर रहे थे क्योंकि माँ बहुत ही धीरे धीरे नीचे उतर पा रही थी। सुबह पांच बजे से दस बजे तक हम दो से तीन किमी ही चल पाए थे और अभी जंगल चट्टी तक भी नहीं पहुंचे थे। त्रिपाठी जी को हमारी वजह से अपने समय का काफी नुकसान करना पड़ रहा था अतः मैंने उन्हें सोनप्रयाग पहुंचकर एक कमरा बुक रखने के लिए कह दिया था और बद्रीनाथ जाने वाली बस की बुकिंग के लिए भी। अब त्रिपाठी जी हम से आगे निकल चुके थे और मैं, माँ को धीरे धीरे लेकर नीचे उतरने लगा। शाम को करीब पांच बजे हम जंगल चट्टी पहुंचे। यहाँ बने सरकारी स्वास्थ्य केंद्र से माँ के लिए पैरों में हो रहे दर्द की मैंने एक टेबलेट ली। कुछ दूर चलने के बाद माँ ने पैदल चलने में असमर्थता जाता दी। वो थोड़ा सा चलती और बैठ जाती थीं परन्तु हम आज सुबह से रात तक भीमबली से गौरीकुंड तक नहीं पहुँच पाए थे। 

मुश्किल समय में बाबा की कृपा  :-
अब रात हो चली थी, परन्तु गौरीकुंड अभी भी सात या आठ किमी दूर था, अँधेरा काफी हो चला था। केदारनाथ के पैदलमार्ग में अब यात्रिओं की संख्या भी सीमित हो चुकी थी। एक स्थान पर आकर माँ की हिम्मत जबाब दे गई अब उनमें एक कदम भी चलने की शक्ति नहीं बची थी। यहाँ कोई खाली टोकरी वाला भी नहीं था जो माँ को नीचे गौरीकुंड तक पहुंचा सकता और नाही यहाँ बीच से बीच पालकी का इंतजाम हो सकता था। मोबाइल के नेटवर्क भी कहीं दूर गायब थे। अब मेरे सामने मुश्किल बहुत बढ़ चली थी और मैं मन ही मन बहुत घबरा रहा था। जब कोई उपाय नहीं सूझा तो आखिरकार मैंने बाबा केदारनाथ का ध्यान किया और उनसे अपनी माँ को सही सलामत घर भेजने की विनती की। कुछ ही समय में दो खाली घोड़े मेरे सामने थे, मैंने घोड़े वालों से विनती की कि वो हमें गौरीकुंड तक छोड़ दें। घोड़े वाला अपने घोड़ों से अत्यधिक प्रेम करता था और उसके घोड़े इस मार्ग पर चलने में पूरी तरह प्रशिक्षित थे। घोड़े वालों ने माँ की हालत को देखकर नीचे छोड़ने के लिए राजी होकर उन्हें बमुश्किल घोड़े पर बैठाया और दुसरे घोड़े पर मैं खुद बैठ गया। मैं पहली बार घोड़े पर बैठा था इसलिए मुझे थोड़ा सा डर भी लगा। 

गौरीकुंड बेस कैंप आगमन:- 
कुछ ही समय बाद घोडों की सहायता से हम गौरीकुंड बेस कैंप पहुँच गए, मैंने घोड़ों वालों का शुक्रिया अदा किया और उन्हें सातसौ रूपये दिए जो विष्णु भाई मुझे जाते समय दे गए थे। बाबा का धन्यवाद कर हम गौरीकुंड तक बढ़ चुके थे परन्तु माँ के पैरों में लगी चोट अब उन्हें आगे नहीं बढ़ने दे रही थी। रात के दो बजे हुए थे, केदारनाथ जी के दर्शन करने जाने वाले दर्शनार्थी यहाँ गौरीकुंड में खुले में सो रहे थे। यही तो श्रद्धा और विश्वास है भक्तों का अपने आराध्य में। मैं अपने बैग लेने उस होटल पर चला गया था जहाँ हमने अपने बैग चढ़ाई से पूर्व जमा करवा रखे थे। जब बहुत देर तक माँ नहीं आई तो मैं वापस माँ को देखने पीछे गया और मैंने देखा माँ गौरीकुंड के बाजार में बैठे बैठे ही खिसक रही थी क्योंकि अब उनके पैर बिलकुल भी उनका साथ नहीं दे रहे थे। 
त्रिपाठी जी ने सोनप्रयाग में चारसौ रूपये पर व्यक्ति के हिसाब से एक हॉल में बिस्तर बुक कर रखे थे जहाँ अभी तक हम नहीं पहुँच पाए थे। 

गौरीकुंड में गौरी माता की कृपा :-
मैंने गौरीकुंड में गौरीमाता से प्रार्थना की कि वो मेरी माँ को सही सलामत घर तक पहुंचा दे तभी एक चमत्कार हुआ एक टोकरी वाला भैया माँ को यूँ घिसटता देख माँ के पास आकर कहने लगा आइये माँ जी मैं आपको गाडी स्टैंड तक छोड़ देता हूँ। उसने माँ को अपनी पीठ पर टोकरी में बैठाया और गाडी स्टैंड तक ले आया और इतना ही नहीं वह स्वयं उस गाडी में बैठकर हमारे साथ गौरीकुंड से सोनप्रयाग तक आया क्योंकि गौरीकुंड वाली जीप सोनप्रयाग में नदी के उस पार ही उतार देती है और जहाँ त्रिपाठी जी ने बिस्तर बुक कर रखा था वो स्थान वहाँ से दो किमी दूर था। अतः वह टोकरी वाला भाई माँ को जीप से उतार कर सोनप्रयाग के बस स्टैंड तक ले आया जहाँ त्रिपाठी जी ने बिस्तर बुक किया हुआ था। मैं उस टोकरी वाले भाई को आज अपने जीवन की जमापूंजी भी दे देता तो वो भी उसके एहसान के आगे कम पड़ती परन्तु मैं अपनी केदारनाथ यात्रा का सारा उस भाई को नहीं दे सकता था अतः मैंने अपने पास आखिरी पड़े सात सौ रूपये उसे दे दिए और वो उन्हें ख़ुशी खुशी लेकर वापस गौरीकुंड चला गया। हालांकि वो मुझसे कुछ लेना नहीं चाह रहा था परन्तु यात्रा का सारा पुण्य मैं उसे नहीं दे सकता था। 

सोनप्रयाग में विश्राम एवं घरवापसी :-
एक घंटे सोने के बाद चार बजे त्रिपाठी जी ने मुझे जगा दिया और बद्रीनाथ जाने वाली बस की तलाश करने को कहा परन्तु माँ की ऐसी हालत को देखकर अब मैंने बद्रीनाथ जाने का विचार त्याग दिया था और अब मैं बस घर लौटना चाहता था। पहले तो त्रिपाठी जी ने फिर वहां अकेले जाने का निर्णय लिया किन्तु मुझे और माँ को इस हालत में देखकर उन्होंने एक बड़े भाई होने का फर्ज निभाया और मेरा साथ नहीं छोड़ा। उन्होंने भी बद्रीनाथ फिर कभी जाने का इरादा लेकर घर की तरफ कुछ कर दिया। एक फाइनल निर्णय ना हो पाने के कारण हम हरिद्वार वाली बस में अपनी सीट बुक नहीं कर पाए थे। आठ एक बस जो हरिद्वार जा रही थी उसी में हम बैठकर हरिद्वार के लिए रवाना हो लिए। हालांकि इसमें कोई भी सीट खाली नहीं थी अतः माँ के लिए मैंने गैलरी में ही दरी बिछाकर बिस्तर बना दिया और उनको लिटा दिया। त्रिपाठी भैया बस पीछे की तरफ जगह बनाकर खड़े हो गए और मैं बस के दरवाजे के पास बनी सीढ़ियों पर बैठकर अपनी वापसी यात्रा करने लगा। पूरा दिन सुबह से शाम तक चलने के बाद हम रात को हरिद्वार पहुंचे। 

हरिद्वार से घरवापसी :- 
त्रिपाठी भैया एक ट्रैन पकड़कर कानपुर की तरफ रवाना हो गए और हम एक बस द्वारा दिल्ली की ओर। दिल्ली वाली ये बॉस आधी रात को एक जगह ख़राब हो गई और हमें बमुश्किल दूसरी बस से बैठकर दिल्ली के कश्मीरी गेट बस स्टैंड आना पड़ा। यहाँ मैंने सिक्योरिटी गार्ड के मदद से माँ के लिए एक व्हील चेयर उपलब्ध कराइ और उसी के जरिये गार्ड ने हमारे लिए सरायकालेखां जाने के लिए एक ऑटो का इंतजाम किया। गार्ड को धन्यवाद कर हम अपने बस स्टैंड सराय कालेखां की तरफ रवाना हो गए। इतने दिन पहाड़ों में रहने के बाद जब सुबह सुबह अपनी राजधानी दिल्ली को देखने का मौका मिला तो दिल सारी थकान भूल चूका था, अब ऐसा लग रहा था जैसे अपने घर में ही आ गए हों। सराय कालेखां पहुंचकर हमने ईदगाह वाली बस में बैठकर मथुरा के लिए प्रस्थान किया और सुबह दस बजे तक मैं अपनी माँ सही सलामत लेकर अपने घर पहुंच गया। 

जय बाबा केदारनाथ जी 

केदारनाथ जी से वापसी 

पवनहंस 

केदारनाथ जी का पुराना क्षतिग्रस्त मार्ग 

कितनी दूर है मंदिर ? बस पहुँच गए 

हिम नदी 

हिमनदी 

यात्रा प्राकृतिक रूप से काफी दर्शनीय है 

पुराना यात्रा मार्ग 




भीमबली में माँ 

माँ और विष्णुभाई भीमबली में 

भीमबली में एक सुबह 


गंगा प्रसाद त्रिपाठी जी 

मैं और त्रिपाठी जी 

भीमबली से प्रस्थान 


माँ और त्रिपाठी जी थोड़ा सा आराम करते हुए 

माँ और त्रिपाठी जी 

प्रकृति का एक दृशय 

प्राकृतिक झरना 

केदारनाथ मार्ग में सुधीर उपाध्याय 

माँ और त्रिपाठी जी फिर से आराम करते हुए 

यहाँ प्रकृति की अनुपम छटा है  



श्री केदारनाथ पैदल यात्रा मार्ग 

दूर दिखाई देता एक झरना, केदारनाथ यात्रा मार्ग 

थम्सअप का आनंद लेती मेरी माँ 

मेरी तरह थम्स अप माँ की भी पहली पसंद है 


माँ और केदारनाथ यात्रा मार्ग 


रास्ते में एक जगह विश्राम 

श्री केदारनाथ यात्रा मार्ग 





जंगलचट्टी आगमन 



मैं और माँ केदारनाथ मार्ग में 


श्री केदारनाथ यात्रा में मेरी माँ 

श्री भैरव मंदिर 

भैरवनाथ मंदिर और माँ 


केदारनाथ की तरफ का नजारा, मौसम बहुत खराब हो चला था।  

गौरी माता का मंदिर, गौरीकुंड 


उत्तराखंड के खेत 

बस में मेरी माँ सीट ना मिल पाने के कारण दुखी होती हुईं 




अपनी ईदगाह वाली बस


यात्रा में सहभागिता हेतु आप अभी का हार्दिक धन्यवाद

केदारनाथ यात्रा 2019 समाप्त

श्री केदारनाथ यात्रा के अन्य भाग 

3 comments:

  1. बहुत सुंदर यात्रा रही

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  2. जैसे तैसे मां की केदारनाथ यात्रा तो पूरी हो ही गई
    लेकिन भोलेनाथ ने भी पूरी तपस्या कराई
    जय हो केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग की

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