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Monday, January 12, 2009

पहली शिरडी यात्रा





पहली शिरडी यात्रा

     घूमने का शौक तो लगा रहता है बस मंजिल तलाशनी पड़ती है । आजकल एक गाना बहुत सुनने को मिल रहा है "शिरडी वाले साईं बाबा आया है तेरे दर पे सवाली "। बस फिर क्या था मन ने ठान लिया इसबार साईबाबा से मिलकर आना है। 2782 स्वर्णजयंती एक्सप्रेस में रिजर्वेशन करवाया कोपरगाँव तक और चल दिए साईबाबा से मिलने। साथ मैं हम कुल आठ लोग थे किशोरीलालजी,रश्मि,माँ-पापा, मैं, साधना, कुसमा मौसी, बड़ी मामी। ट्रेन ने हमें सुबह चार बजे कोपरगाँव स्टेशन पर पहुँचा दिया, यहाँ हमारी तरह और भी लोग साईबाबा के दर्शन हेतु आये हुए थे ।



    ट्रेन यहाँ काफी देर तक रुकी रही, हम स्टेशन के बाहर आये। यहाँ से शिर्डी जाने के लिए  मैजिक वाले आवाज लगा रहे थे परन्तु किराया सुनकर हमने मैजिक नहीं की और बस की तलाश में पैदल ही आगे बढ़ लिए । स्टेशन से थोड़ी दूर आने पर हमें एक अजीब सी महक आना शुरू हुई, यह जानी-पहचानी महक थी जो यूपी के अधिकांश शहरों से आती थी । यहाँ एक चीनी मिल थी जो अँधेरे के कारण हमें दिखाई नहीं दी थी । थोड़ी दूरी पर हमें एक मिल्क वैन मिल गई जो शिर्डी जा रही थी, उसी से हम भी शिर्डी के लिए रवाना हो लिए ।

   अब सूर्य देव पृथ्वी पर दिखाई देने लगे थे। गोदावरी नदी को पार कर हम शिर्डी पहुँच गए, यहाँ साईबाबा का विशाल मंदिर बना हुआ है । यात्रियों के ठहरने के लिए यहाँ काफी अच्छा टीनशेड यार्ड बना है साथ ही रुकने के लिए शिरडी साईं ट्रस्ट की तरफ से काफी कमरे हैं जिन्हे बुक करने के लिए एक लम्बी लाइन में लगना पड़ता है । यहाँ नाश्ता भी काफी सस्ता है, डेढ़ रूपये की चाय, दो रूपये का दूध और तीन रूपये की पूरी भाजी। थोड़ा आराम करने के पश्चात पिताजी को सामन के पास छोड़कर बाकी हम सभी साईंबाबा के दर्शन करने के लिए चले गए। लौटकर आये तो देखते हैं की किशोरी लाल जी का सूटकेश और रश्मि का एक पर्स बिहारी हो गया अर्थात खो गया, पिताजी सामान को पास में बैठे एक महात्मा व्यक्ति की जिम्मेवारी पर छोड़कर चाय नास्ता लेने चले गए लौटकर देखा तो न वहां सामान था और नहीं वो महात्मा।

    खैर जो भी हो जो होना था वो हो गया साईंबाबा के दर्शन करने के बाद हम खण्डोबाजी के दर्शन करने भी गए। और यहाँ से लौटकर एक गाडी करके हम शनि देव के धाम शिगनापुर पहुंचे। शिंगणापुर से पहले सोनई नाम की एक जगह पड़ती है वहां हमारी गाड़ी का एक पहिया गाडी में से निकलकर दूर खेत में चला गया, पर जाको राखे साइयाँ मार सके न कोई वाली बात आज यहाँ सच हो गई, हम गाडी में ड्राइवर समेत कुल तेरह लोग थे और किसी को भी कोई हानि नहीं हुई। दूसरी गाडी से हम लोग शिंगणापुर पहुंचे, मैंने सुना है कि यहाँ लोगों के घरों में दरवाजे नहीं होते क्योंकि यहाँ चोरी नहीं होती, काश ऐसा शिरडी में भी होता।

     शिंगणापुर में शनिदेव जी की एक विशाल शिला है जिसपर सरसों का तेल दान करने महत्व है, स्त्री प्रवेश निषेध है और पुरुष भी स्नान करके एक लंगोट पहनकर निवस्त्र शनिदेव जी पर तेल चढ़ाते हैं। शनिदेवजी का प्रसाद पाकर हम वापस शिरडी लौट आये और साईंबाबा की भोजनालय में खाना खाने के लिए लाइन में लग गए, यहाँ पांच रूपये के कूपन में एक आदमी को भोजन मिलता है।  भोजनालय के हॉल में पहुंचे तो मेरी आँखे फटी की फटी रह गई, यहाँ दस हजार आदमी एक साथ खाना खाते हैं और खाने की व्यवस्था भी एक दम मस्त है बैठने के लिए स्टील की टेबिल और कुर्सियाँ बनी हुई है और ट्रॉलियों के माध्यम से खाना वितरित किया जाता है। दुसरे दिन हम महाराष्ट्र रोडवेज की एक बस पकड़कर नाशिक पहुँच गए।


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अगला भाग -   पंचवटी की ओर

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