Pages

Pages

Tuesday, April 28, 2026

DELHI 2023 : ASHOKA EDICT


दिल्ली में सम्राट अशोक का शिलालेख 


सन 1966 में जब राजधानी दिल्ली में आवासीय प्रसार अपने चरम पर था तभी आवासीय कॉलोनी बनाने वाले एक ठेकेदार की नजर एक ऐसी ऐतिहासिक चट्टान पर पड़ी जिस पर कुछ चिन्हों की भाषा उत्कीर्ण थी जो अपठनीय थी। उसने तुरंत इसकी सूचना सम्बंधित अधिकारी को दी और इसके बाद पुरातत्ववेत्ताओं इस चट्टान की  जाँच की। इस जांच में उन्होंने पाया कि यह भाषा प्राचीन समय की है और यह प्राकृत अथवा ब्राह्मी लिपि थी। इस भाषा के अक्षर,  इससे पूर्व दिल्ली में पाए गए अशोक स्तम्भों से मेल खाती थी, साथ ही बैराट स्थित शिलालेख से इसकी समानता प्रतीत होती थी, इससे यह स्पष्ट हो गया कि यह शिलालेख सम्राट अशोक द्वारा ही उत्कीर्ण है और बाद में जब इस भाषा का अनुवाद किया गया तो फिर इसमें कोई संदेह ही नहीं बचा कि यह सम्राट अशोक का ही शिलालेख है। वर्तमान में भारतीय पुरातत्व विभाग ने इसे सम्राट अशोक के लघु शिलालेख की श्रेणी में रखा है। 

तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व जब भारत भूमि पर मौर्य साम्राज्य स्थापित था तब मौर्य वंश के महान शासक सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध के पश्चात बौद्ध धर्म अपना लिया था और सम्पूर्ण राज्य में अपने हृदय और धर्म परिवर्तन के बाद महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं को शिलालेखों पर उत्कीर्ण करवाया था जिससे उनके बाद आने वाली पीढ़ियां इन्हें पढ़कर अपने जीवन को सही मार्गदर्शन दे सकें और बौद्ध धर्म के नियमों का पालन कर सकें। मौर्य साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र में थी और दिल्ली, उस समय उत्तर भारत में तक्षशिला जाने वाले प्रमुख व्यापारिक अथवा प्रांतीय मार्ग पर स्थित थी। 

सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध के पश्चात बौद्ध धर्म अपनाया था और इसके बाद उन्होंने 256 दिनों तक बौद्ध धर्म के प्रमुख स्थलों की यात्रा की थी। इन्हीं स्थानों के आसपास और अपने साम्राज्य के अनेकों स्थानों पर उन्होंने बौद्ध धर्म की शिक्षाओं को खरोष्ठी और ब्राह्मी लिपि में चट्टानों पर उत्कीर्ण करवाया था। 

दिल्ली में मिला यह शिलालेख अत्यंत ही प्राचीन है और आज भी स्पष्ट रूप से अनुवादित नहीं है, किन्तु इसका जितना अनुवाद किया गया है उसके अनुसार यह शिलालेख बतलाता है कि देवताओं के प्रिय (अशोक) ने इस प्रकार कहा: "मुझे एक गृहस्थ उपासक बने हुए ढाई वर्ष से अधिक समय हो गया है। शुरुआत में मैंने कोई विशेष प्रयास नहीं किया, लेकिन पिछले एक वर्ष में मैं बौद्ध संघ के और करीब आया हूँ; मैंने पूरी लगन से प्रयास किया है और दूसरों को भी देवताओं के साथ जुड़ने के लिए प्रेरित किया है।

 यह लक्ष्य केवल महान लोगों के लिए ही सीमित नहीं है कि वे ही प्रयास करें, बल्कि एक साधारण मनुष्य भी, यदि वह प्रयास करता है, तो स्वर्ग प्राप्त कर सकता है। यह घोषणा निम्नलिखित उद्देश्य से की गई है: ताकि साधारण और महान, दोनों प्रकार के लोग प्रयास करने के लिए प्रेरित हों, और जो लोग साम्राज्य की सीमाओं से बाहर रहते हैं, उन्हें भी इस बारे में पता चले। इस नेक कार्य के लिए किया गया प्रयास सदैव जारी रहना चाहिए, और यह लोगों के बीच और अधिक फैलना चाहिए, ताकि इसकी वृद्धि डेढ़ गुना हो जाए।

वर्तमान में इस स्थान को पुरातत्व विभाग ने संरक्षित किया हुआ है। राजधानी दिल्ली के व्यस्ततम और घनी आबादी के बीच यह एक शांत और प्राकृतिक वातावरण से भरपूर स्थान है। असामाजिक तत्व, शिलालेख को क्षतिग्रस्त ना करें इसलिए पुरातत्व विभाग ने इसे लकड़ी और काँच के बंद कमरे में सुरक्षित किया है। इस शिलालेख को दूर से देखने की ही अनुमति है। देश की इन ऐतिहासिक धरोहरों को सहेजना ना केवल पुरातत्व विभाग की जिम्मेवारी है बल्कि यह देश  के समस्त नागरिकों की भी जिम्मेदारी है। 

मैं आज सुबह ही दिल्ली पहुंचा और ओखला रेलवे स्टेशन पर उतर गया। सब्जी मंडी में से होते हुए मैं इस स्थान तक पैदल ही पहुँच गया और सबसे पहले आज दिल्ली के इस सबसे प्राचीन ऐतिहासिक स्थान को देखा। दिल्ली में मौर्य काल का यह एकमात्र ऐतिहासिक स्थल है जो सम्राट अशोक से सम्बंधित है। चूँकि दिल्ली में सम्राट अशोक के दो प्रमुख स्तम्भ भी स्थित है किन्तु यह मूल रूप से दिल्ली में स्थापित नहीं थे, सल्तनत काल के दौरान इन्हें टोपरा और मेरठ से यहाँ लाकर स्थापित किया गया है किन्तु यह शिलालेख मूलरूप से उसी स्थान पर है जहाँ इसे उकेरा गया था, अतः यह दिल्ली में मौर्य काल का सबसे प्राचीन स्थल है। 

अशोक के शिलालेख को देखने के बाद मैं दिल्ली स्थित इस्कॉन मंदिर पहुंचा जिसका विवरण मैं अपने अगले लेख में प्रकाशित करूँगा। 




















.




 NEAREST RAILWAY STATION : - OKHALA (NR)

Saturday, April 25, 2026

MY TRIP IN AGRA : AGRA 2025

 

MY AGRA TRIPS IN 2025


📅10 FEB' 25

मैं आज अपनी कंपनी की किया करेन्स गाडी लेकर टेस्ट ड्राइव के लिए आगरा गया। पार्श्वनाथ पंचवटी, जो की फतेहाबाद रोड के नजदीक स्थित है, वहां मैं गाडी की एक ग्राहक को टेस्ट ड्राइव कराइ और उसके बाद लौटते समय प्रतापपुरा चौराहे पर मैं अपने मित्र कुमार से मिला। कुमार से थोड़ी देर मिलने के बाद मैं अपने एक अन्य मित्र पप्पू से भी मिला जो कि सरोजनी नायडू मेडिकल कॉलेज में ही कार्यरत है। 

बचपन के शहर और दोनों मित्रों से मिलने के बाद मैं वापस आगरा आ गया। 

MY FRIND KUMAR BHATIA

MEET TO SATENDRA S CHAUHAN